स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
२६ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ५
अथ य एव एकत्रोपादानभावः स एवान्यत्र सहकारिभाव इति न स्वभावभेद इष्यते ।
तर्हि नित्यस्यैकरूपस्यापि क्रमेण नानाकार्यकारिणः स्वभावभेदः कार्यसाङ्कर्यं च कथमिष्यते
क्षणिकवादिना । अथ नित्यमेकरूपत्वादक्रमं; अक्रमाच्च क्रमिणां नानाकार्याणां कथमुत्पत्तिः
इति चेत्, अहो स्वपक्षपाती देवानांप्रियः यः खलु स्वयमेकस्माद् निरंशाद् रूपाटिक्षणात्
कारणाद् युगपदनेककार्याण्यङ्गीकुर्वाणोऽपि परपक्षे नित्येऽपि वस्तुनि क्रमेण नानाकार्यकरणेऽपि
विरोधमुद्भावयति । तस्माद् क्षणिकस्यापि भावस्याक्रमेणार्थक्रिया दुर्घटा । इत्यनित्यैकान्तादपि
क्रमाक्रमयोर्व्यापकयोर्निवृत्त्यैव व्याप्यार्थक्रियापि व्यावर्तते । तद्व्यावृत्तौ च सत्त्वमपि व्यापका-
नुपलब्धिबलेनैव निवर्तते । इत्येकान्तानित्यवादो
अन्य. यो. व्य. श्लोक ५ ] स्याद्वादमञ्जरी २७
“भागे सिंहो नरो भागे योऽर्थो भागद्वयात्मकः ।
तमभागं विभागेन नरसिंहं प्रचक्षते” ॥ इति ॥
वैशेषिकैरपि चित्ररूपस्यैकस्यावयविनोऽभ्युपगमात् एकस्यैव पटादेश्चलाचलरक्तरक्ता-
वृतानावृत्तत्वादिविरुद्धधर्माणामुपलब्धेः । सौगतैरप्येकत्र चित्रपटीज्ञाने नीलानीलयोर्विरोधा-
नङ्गीकारात् ॥
अत्र च यद्यप्यधिकृतवादिनः प्रदीपदिकं कालान्तरावस्थायित्वात् क्षणिकं न मन्यन्ते
तन्मते पूर्वापरान्तावच्छिन्नायाः सत्ताया एवानित्यता लक्षणात्, तथापि बुद्धिसुखादिकं तेऽपि
क्षणिकतयैव प्रतिपन्नाः इति तदधिकारेऽपि क्षणिकवादचर्चा नानुपपन्ना । यद्यपि च कालान्त-
रावस्थायि वस्तु तदापि नित्यानित्यमेव । क्षणोऽपि न खलु सोऽस्ति यत्र वस्तु उत्पादव्ययध्रौ-
व्यात्मकं नास्ति
२८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
अथ तदभिमतमीश्वरस्य जगत्कर्तृत्वमभ्युपगमं मिथ्याभिनिवेशरूपं निरूपयन्नाह—
कर्तास्ति कश्चिज्जगतः स चैकः स सर्वगः स स्ववशः स नित्यः ।
इमाः कुहेवाकविडम्बनाः स्युस्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम् ॥६॥
जगतः—प्रत्यक्षादिप्रमाणोपलक्ष्यमाणचराचररूपस्य विश्वत्रयस्य, कश्चिद्—अनिर्वच-
नीयस्वरूपः पुरुषविशेषः, कर्ता—स्रष्टा, अस्ति—विद्यते । ते हि इत्थं प्रमाणयन्ति । उर्वीपर्वत-
तर्वाऽऽदिकं सर्वं, बुद्धिमत्कर्तृकं, कार्यत्वात् ; यद् यत् कार्यं तत् तत्सर्वं बुद्धिमत्कर्तृकं, यथा घटः,
तथा चेदं, तस्मात् तथा । व्यतिरेके व्योमादि । यश्च बुद्धिमांस्तत्कर्ता स भगवानीश्वर एवेति ॥
उत्तर प्रदेशोंके साथ संयोग होनेस उत्पाद, तथा पूर्वोत्तर दोनों पर्यायोंमें आकाश द्रव्यके मौजूद रहनेसे ध्रौव्य
अवस्थाएँ पायी जाती हैं । इसलिए द्रव्यकी अपेक्षा आकाश नित्य है, और पर्यायकी अपेक्षा अनित्य । दूसरे
शब्दोंमें, जैनसिद्धान्तके अनुसार, द्रव्य और पर्याय कथंचित्-भिन्न हैं और कथंचित्-अभिन्न । जिस प्रकार
बिना द्रव्यके पर्याय नहीं रह सकती, उसी तरह बिना पर्यायके द्रव्य नहीं रह सकते । परन्तु वैशेषिक लोग
कुछ पदार्थोंको सर्वथा नित्य मानते हैं और कुछको सर्वथा अनित्य । इसीलिए वैशेषिकों द्वारा मान्य 'अप्रच्युत,
अनुत्पन्न और स्थिररूप' नित्यका लक्षण न स्वीकार करके जैन लोग 'पदार्थके भावका नष्ट नहीं होना' ही
नित्यत्वका लक्षण मानते हैं ।
इस श्लोककी व्याख्यामें टीकाकार मल्लिषेणने निम्न विषयोंपर भी विचार किया है ।
(१) अन्धकार तेजकी ही एक पर्यायविशेष है, सर्वथा अभावरूप नहीं है । जैनदर्शनके अनुसार
प्रकाशकी तरह तम भी चक्षुका विषय है । इसलिए जैनशास्त्रोंमें अन्धकारको पौद्गलिक—स्पर्श, रस, गन्ध
और वर्णयुक्त—स्वीकार किया गया है । जैन लोगोंका कहना है कि यदि वैशेषिक लोग दीपककी प्रभाको
पौद्गलिक मानते हैं, तो उ-हें अन्धकारको पुद्गलकी पर्याय माननेमें क्या आपत्ति है ?
(२) पदार्थको एकान्त-नित्य अथवा एकान्त-अनित्य स्वीकार करनेसे उसमें अर्थक्रियाकारित्व अर्थात्
वस्तुत्व ही सिद्ध नहीं होता । इस विषयको नाना ऊहापोहात्मक विकल्पोंके साय टीकाकारने विस्तारपूर्वक
प्रतिपादित किया है ।
( ३ ) नित्यानित्यके सिद्धान्तको दूसरे वादी भी रूपान्तरसे स्वीकार करते हैं । उदाहरणके लिए,
वैशेषिक लोग पृथिवीको नित्य और अनित्य दोनों मानते हैं; तथा एक ही अवयवीके चित्ररूपकी कल्पना
करते हैं । बौद्ध लोग भी एक ही चित्रपटमें नील-अनील धर्मोंको मानते हैं । इसी तरह पातंजलमतके अनु-
यायी धर्म, लक्षण और अवस्थाको धर्मीसे भिन्न और अभिन्न मानते हैं ।
अब, वैशेषिकों द्वारा मान्य ईश्वरके जगत्कर्तृत्वमें दूषण देते हुए कहते हैं—
श्लोकार्थ—हे नाथ, जो अप्रामाणिक लोग 'जगत्का कोई कर्त्ता है (१) वह एक है, (२) सर्व-
व्यापी है, (३) स्वतन्त्र है और (४) नित्य है' आदि दुराग्रहसे परिपूर्ण सिद्धान्तोंको स्वीकार करते हैं, उनका
तू अनुशास्ता नहीं हो सकता ।
व्याख्यार्थ—पूर्वपक्ष—'जगतः कश्चित् कर्ता अस्ति'—प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे जाने हुए स्थावर और
जंगमरूप तीनों विश्वका अनिर्वचनीय स्वरूप कोई पुरुषविशेष सृष्टिकर्ता है । इसमें निम्नलिखित प्रमाण दिया
गया है—'पृथिवी, पर्वत, वृक्ष अ.दि पदार्थ किसी बुद्धिमान कर्ताके बनाये हुए हैं, क्योकि ये कार्य हैं; जो
जो कार्य होते हैं वे सब किसी बुद्धिमान् कर्ताके बनाये हुए होते हैं, जैसे घट पृथिवी, पर्वत आदि भी कार्य
हैं, इसलिए ये भी बुद्धिमान् कर्ताके बनाये हुए होने चाहिए' । व्यतिरेक रूपमें—'आकाश आदि कार्य नहीं
हैं, इसलिए किसी बुद्धिमान् कर्ताका बनाया हुआ भी नहीं है ।' जो कोई इन पदार्थोंका बुद्धिमान् कर्ता है
वह भगवान् ईश्वर ही है ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी २९
न चायमसिद्धो¹ हेतुः । यतो भूभूधरादेः स्वस्वकारणकलापजन्यतया अवयवितया वा
कार्यत्वं सर्ववादिनां प्रतीतमेव । नाप्यनैकान्तिको² विरुद्धो³ वा । विपक्षादत्यन्तव्यावृत्तत्वात् ।
नापि कालात्ययापदिष्टः⁴ । प्रत्यक्षानुमानागमाबाधितधर्मधर्म्यनन्तरप्रतिपादितत्वात् । नापि
प्रकरणसमः⁵ तत्प्रतिपन्थिधर्मोपपादनसमर्थप्रत्यनुमानाभावात् ॥
न च वाच्यम् ईश्वरः पृथ्वीपृथ्वीधरादेर्विधाता न भवति; अशरीरत्वात्, निवृत्तात्मवत्,
इति प्रत्यनुमानं तद्बाधकमिति । यतोऽत्रेश्वररूपो धर्मी प्रतीतोऽप्रतीतो वा प्ररूपितः ? न
तावदप्रतीतः, हेतोराश्रयासिद्धिप्रसङ्गात् । प्रतीतश्चेत्, येन प्रमाणेन स प्रतीतस्तेनैव किं स्वय-
मुत्पादितस्वतनुर्न प्रतीयते । इत्यतः कथमशरीरत्वम् । तस्मान्निरवद्य एवायं हेतुरिति ॥
उक्त हेतु असिद्ध नहीं है। क्योंकि अपने-अपने कारणोंसे उत्पन्न होनेके और अवयवी होनेके कारण
पृथिवी, पर्वत आदिका कार्यत्व सभी वादियोंने स्वीकार किया है। यह हेतु अनैकान्तिक ( व्यभिचारी )
अथवा विरुद्ध भी नहीं है, क्योंकि इसकी विपक्षसे अत्यन्त व्यावृत्ति है। ( जिस हेतुकी विपक्षमें भी अविरुद्ध
वृत्ति हो, अर्थात् जो हेतु विपक्षमें भी चला जाय उसे अनैकान्तिक हेत्वाभास कहते हैं। जैसे घड़ा ठण्डा है,
क्योंकि मूर्तिक है। यहाँ मूर्तिकत्वकी व्याप्ति ठण्डा और गरम दोनोंके साथ है, अर्थात् मूर्तिकत्व हेतु विपक्ष
( गरम ) में भी चला जाता है, इसलिए दूषित है। यहाँ कार्यत्व हेतुकी विपक्ष अर्थात् आकाश आदिसे
व्यावृत्ति है, इसलिए यह हेतु अनैकान्तिक नहीं है। इसीलिए कार्यत्व हेतु विरुद्ध भी नहीं है। जिस
हेतुका अविनाभावसम्बन्ध साध्यसे विरुद्धके साथ निश्चित हो उसे विरुद्ध हेत्वाभास कहते हैं। जैसे शब्द
परिवर्तनशील है, क्योंकि उत्पत्तिवाला है। यहाँ उत्पत्तिकी व्याप्ति परिवर्तनशीलताके साथ है, जो साध्यसे
विरुद्ध है। प्रस्तुत कार्यत्व हेतु अपने साध्य बुद्धिमत्कर्तृत्वके साथ अविनाभावसम्बन्धसे रहता है, इस-
लिए विरुद्ध नहीं है।) कार्यत्व हेतु कालात्ययापदिष्ट भी नहीं है, क्योंकि यह प्रत्यक्ष अनुमान और
आगमसे अबाधित, धर्म और धर्मीके सिद्ध हो जानेपर प्रतिपादन किया गया है—अर्थात् पहले प्रमाणसिद्ध
धर्म-धर्मीका कथन करके बादमें हेतुका कथन किया गया है। यह हेतु प्रकरणसम भी नहीं है, क्योंकि यहाँ
कोई बाधक प्रत्यनुमान नहीं है। (जहाँ साध्यके अभावका साधक कोई दूसरा अनुमान मौजूद हो उसे प्रकरणसम
कहते हैं। यहाँ कार्यत्व हेतुके प्रतिकूल बुद्धिमदकर्तृकत्व धर्मको सिद्ध करनेवाला कोई प्रत्यनुमान नहीं है।)
प्रतिवादी—'ईश्वर पृथिवी, पर्वत आदिका कर्ता नहीं है, क्योंकि वह अशरीरी है, मुक्तात्माकी
तरह'—यह प्रत्यनुमान उक्त कार्यत्व हेतुका बाधक है, इसलिए कार्यत्वहेतु प्रकरणसम हेत्वाभाससे दूषित
है। वैशेषिक—यह शंका ठीक नहीं। क्योंकि 'ईश्वर पृथिवी, पर्वत आदिका कर्ता नहीं है'—इस वाक्यमें
ईश्वररूप धर्मी प्रतीत है, अथवा अप्रतीत ? यदि धर्मी अप्रतीत हो, तो हेतु आश्रयासिद्ध होगा; अर्थात् जब
धर्मी ही अप्रतीत है तब अशरीरत्व हेतु कहाँ रहेगा ? यदि कहो कि उक्त अनुमानमें ईश्वर प्रतीत है तो जिस
प्रमाणसे ईश्वर प्रतीत है; उसी प्रमाणसे यह क्यों नहीं मानते कि ईश्वर स्वयं उत्पन्न किये हुए शरीरको ही
धारण करता है। अर्थात् ईश्वरको प्रतीत ( जाना हुआ ) माननेसे क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि ईश्वरने
अपना शरीर स्वयं बनाया है, और वह जगत्को बनानेमें समर्थ है। इसलिए ईश्वरको शरीररहित नहीं
कह सकते । अतएव ईश्वरके कर्तृत्वमें हमारा दिया हुआ कार्यत्व हेतु असिद्ध, विरुद्ध आदि दोषोंसे रहित
होनेके कारण निर्दोष है।
१. अयं साध्यसमशब्देनाभिधीयते । 'साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्साध्यसमः' । गौतमसूत्रे । १-२-८ ।
२. 'अनैकान्तिकः सव्यभिचारः' । गौतमसूत्रे १-२-५ । ३. 'सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः' ।
गौतमसूत्रे १-२-६ । ४. 'कालात्ययापदिष्टः कालातीतः' । गौतमसूत्रे १-२-९ । ५. 'यस्मात्प्रकरणचिन्ता स
निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः' । गौतमसूत्रे १-२-७ ।
३० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
स चैक इति । चः पुनरर्थे । स पुनः-पुरुषविशेषः; एकः-अद्वितीयः । बहूनां हि विश्व-
विधातृत्वस्वीकारे परस्परविमतिसम्भावनाया अनिवार्यत्वाद् एकैकस्य वस्तुनोऽन्यान्यरूपतया
निर्माणे सर्वमसमञ्जसमापद्येत इति ॥
तथा स सर्वग इति । सर्वत्र गच्छतीति सर्वगः-सर्वव्यापी । तस्य हि प्रतिनियतदेश-
वर्तित्वेऽनियतदेशवृत्तीनां विश्वत्रयान्तर्वर्तिपदार्थसार्थानां यथावन्निर्माणानुपपत्तिः । कुम्भकारा-
दिषु तथा दर्शनाद् । अथवा सर्वं गच्छति जानातीति सर्वगः-सर्वज्ञः “सर्वे गत्यर्था
ज्ञानार्थाः१” इति वचनात् । सर्वज्ञत्वाभावे हि यथोचितोपादानकारणायनभिज्ञत्वाद् अनुरूप-
कार्योत्पत्तिर्न स्यात् ॥
तथा स स्ववशः-स्वतन्त्रः, सकलप्राणिनां स्वेच्छया सुखदुःखयोरनुभावनसमर्थत्वात् ।
तथा चोक्तम्—
“ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा ।
अन्यो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः ॥”
पारतन्त्र्ये तु तस्य परमुखप्रेक्षितया मुख्यकर्तृत्वव्याघाताद् अनीश्वरत्वापत्तिः ॥
तथा स नित्य इति । अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरैकरूपः । तस्य ह्यनित्यत्वे परोत्पाद्यतया
कृतकत्वप्राप्तिः । अपेक्षितपरव्यापारो हि भावः स्वभावनिष्पत्तौ कृतक इत्युच्यते । यश्चापरस्त-
त्कर्ता कल्प्यते, स नित्योऽनित्यो वा स्यात् ? नित्यश्चेत् अधिकृतेश्वरेण किमपराद्धम् । अनित्य-
श्चेत्, तस्याप्युत्पादकान्तरेण भाव्यम् । तस्यापि नित्यानित्यत्वकल्पनायाम् अनवस्थादौ-
स्थ्यमिति ॥
(१) वह पुरुषविशेष एक अर्थात् अद्वितीय ( 'एक' ) है । क्योंकि यदि बहुतसे ईश्वरोंको संसारका
कर्ता स्वीकार किया जाय, तो एक दूसरेकी इच्छामें विरोध उत्पन्न होनेके कारण एक वस्तुके अन्य रूपमें
निर्माण होनेसे संसारमें असमञ्जस उत्पन्न हो जायेगा ।
(२) ईश्वर सर्वव्यापी ('सर्वग') है। यदि ईश्वरको नियत प्रदेशमें ही व्याप्त माना जाय, तो अनियत
स्थानोंके तीनों लोकोंके समस्त पदार्थोंकी यथारीति उत्पत्ति सम्भव न होगी। जैसे कुम्भकार एक प्रदेशमें रहकर
नियत प्रदेशके घटादिक पदार्थोंको ही बना सकता है, वैसे ही ईश्वर भी नियत प्रदेशमें रहकर अनियत प्रदेशके
पदार्थोंकी रचना नहीं कर सकता । अथवा, ईश्वर सब पदार्थोंको जाननेवाला ( 'सर्वज्ञ' ) है । क्योंकि कहा
है "गत्यर्थक धातु ज्ञानार्थक होती हैं" । यदि ईश्वरको सर्वज्ञ न मानें, तो यथायोग्य उपादान कारणोंके न
जाननेके कारण वह ईश्वर अनुरूप कार्योंकी उत्पत्ति न कर सकेगा ।
(३) ईश्वर स्वतन्त्र ('स्ववश') है, क्योंकि वह अपनी इच्छासे ही सम्पूर्ण प्राणियोंको सुख-दुखका
अनुभव करानेमें समर्थ है । कहा भी है—
“ईश्वर द्वारा प्रेरित किया हुआ जीव स्वर्ग और नरकमें जाता है। ईश्वरकी सहायताके बिना कोई
अपने सुख-दुःख उत्पन्न करनेमें स्वतन्त्र नहीं है।”
ईश्वरको परतन्त्र स्वीकार करनेमें उसके परमुखापेक्षी होनेसे, मुख्य कर्तृत्वको बाधा पहुँचेगी जिससे
कि उसका ईश्वरत्व ही नष्ट हो जायेगा ।
(४) ईश्वर अविनाशी, अनुत्पन्न और स्थिररूप 'नित्य' है। ईश्वरको अनित्य माननेमें एक ईश्वर
दूसरे ईश्वरसे उत्पन्न होगा, इसलिए वह कृतक—अपने स्वरूपकी सिद्धिमें दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाला—हो
जायगा। तथा ईश्वरका जो कोई दूसरा कर्ता मानोगे, वह नित्य है या अनित्य ? यदि नित्य है तो एक ही
ईश्वरको नित्य क्यों नहीं मान लेते । यदि ईश्वरका कर्ता अनित्य है, तो उस अनित्य कर्ताका कोई दूसरा
उत्पादक होना चाहिए । फिर वह कर्ता नित्य होगा या अनित्य ? इस प्रकार अनवस्था दोष उत्पन्न होगा ।
१. 'गत्यर्था ज्ञानार्थाः' हेमहंसगणिसमुच्चितहेमचन्द्रव्याकरणस्थन्यायः ४४ इति ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३१
तदेवमेकत्वादिविशेषणविशिष्टो भगवानीश्वरस्त्रिजगत्कर्तेति पराभ्युपगममुपदर्श्य उत्तरा-
र्धेन तस्य दुष्टत्वमाचष्टे । इमाः—एताः, अनन्तर्रोक्ताः, कुहेवाकविडम्बनाः—कुत्सिता हेवाकाः-
आग्रहविशेषाः कुहेवाकाः कदाग्रहा इत्यर्थः । त एव विडम्बनाः विचारचातुरीवाह्यत्वेन तिर-
स्काररूपत्वाद् विगोपकप्रकाराः । स्युः--भवेयुः । तेषां प्रामाणिकापसदानाम् । येषां हे स्वामिन्
त्वं नानुशासकः—न शिक्षादाता ॥
तदभिनिवेशानां विडम्बणारूपत्वज्ञापनार्थमेव पराभिप्रेतपुरुषविशेषणेषु प्रत्येकं तच्छब्द-
प्रयोगमसूयागर्भमाविर्भावयाञ्चकार स्तुतिकारः । तथा चैवमेव निन्दनीयं प्रति वक्तारो
वदन्ति । स मूर्खः स पापीयान् स दरिद्र इत्यादि । त्वमित्येकवचनसंयुक्तयुष्मच्छब्दप्रयोगेण
परमेशितुः परसकारुणिकतयानपेक्षितस्वपरपक्षविभागमद्वितीयं हितोपदेशकत्वं ध्वन्यते ।।
अतोऽत्रायमाशयः । यद्यपि भगवानविशेषेण सकलजगज्जन्तुजातहितावहां सर्वेभ्य एव
देशनावाचमाचष्टे, तथापि सैव केषाञ्चिद् निचितनिकाचित¹पापकर्मकलुषितात्मनां रुचिरूपतया
न परिणमते । अपुनर्बन्धक²ादिव्यतिरिक्तत्वेनायोग्यत्वात् । तथा च ³ कादम्ब्यां बाणोऽपि
वभाण—“अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव रजनिकरगभस्तयो विशन्ति सुखमुपदेश-
गुणाः । गुरुवचनममलमपि सलिलमिव महदुपजनयति श्रवणस्थितं शूलमभव्यस्य” इति ।
अतो वस्तुवृत्त्या न तेषां भगवाननुशासक इति ॥
उत्तरपक्ष—'इमाः कुहेवाकविडम्बनाः'—इस प्रकारकी कुत्सित आग्रहरूप विडम्बनाएँ विचाररहित
होनेके कारण तिरस्कारके योग्य हैं। अप्रामाणिक लोगोंकी ये विडम्बनाएँ अपने दोषोंको छिपानेके लिए ही
हैं। ऐसे लोगोंके उपदेष्टा, हे स्वामिन्, आप नहीं हो सकते ।
न्याय-वैशेषिकोंकी मान्यताको विडम्बना सिद्ध करनेके लिए ही श्लोकमें न्याय-वैशेषिकों द्वारा अभीष्ट
ईश्वरके प्रत्येक विशेषणोंके साथ 'तत्' शब्दका प्रयोग किया गया है। जिस प्रकार वक्ता लोग किसी निन्दनीय
पुरुषको कहते हैं कि वह मूर्ख है, वह पापी है, वह दरिद्र है, आदि; उसी प्रकार यहाँ भी ईश्वरके लिए
कहा गया है, कि वह जगत्का कर्ता है, वह एक है, वह नित्य है, आदि । श्लोकमें युष्मत् (त्वं) शब्दके
प्रयोगसे परम दयालु होनेके कारण पक्षपातकी भावना रहित जिनेन्द्र भगवान्का अद्वितीय हितोपदेशकत्व
ध्वनित होता है ।
भाव यह है कि यद्यपि भगवान् सामान्यरूपसे सम्पूर्ण प्राणियोंको हितोपदेश करते हैं, परन्तु वह
उपदेश पूर्व जन्ममें उपार्जन किये हुए निकाचित ( जिस कर्मकी उदीरणा, संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षणरूप
अवस्थाएँ न हो सकें उसे निकाचित कर्म कहते हैं ) पापकर्मोंसे मलिन आत्मावाले प्राणियोंको सुखकर नहीं
लगता । कारण कि इस प्रकारके पापी जीव अपुनर्बन्धक ( जो जीव तीव्र भावोंसे पाप नहीं करता है तथा
जिसकी मुक्ति पुद्गलपरावर्तनमें हो जाती है। उसे अपुनर्बन्धक कहते हैं । ) ( देखिए परिशिष्ट [ क ],
आदि जीवोंसे भिन्न हैं, इसलिये उपदेशके पात्र नहीं हैं। बाणने भी कादम्बरीमें कहा है—“जिस
प्रकार निर्मल स्फटिक मणिमें चन्द्रमाकी किरणोंका प्रवेश होता है, उसी तरह निर्मल चित्तमें उपदेश प्रवेश
१. उदये संकममुदये चउसुवि दातुं कमेण णो सक्कं । उवसंतं च णिवत्ति णिकाचिदं होदि जं कम्मं ।
छाया—उदये संक्रमोदययोः चतुर्ष्वपि दातुं क्रमेण नो शक्यम् । उपशान्तं च निधत्तिः निकाचितं यत् कर्म ॥
( गोम्मटसार कर्मकाण्ड गा० ४४० )
२. 'पावं ण तिव्वभावा कुणइ ण बहुमन्नई भवं घोरम् ।
उच्चिअट्ठिइं च सेवइ सव्वत्थ वि अपुणबन्धोत्ति' ॥
छाया—पापं न तीव्रभावात् करोति न बहुमन्यते भवं घोरम् ।
उचितार्थं च सेवते सर्वत्रापि अपुनर्बन्धक इति ॥ इति धर्मसंग्रहे तृतीयाधिकरणे ।
३. बाणभट्टकृतकादम्बरी पूर्वार्ध, पृ० १०३, पं० १० ।
३२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
न चैतावता जगद्गुरोरसामर्थ्यसम्भावना । न हि कालदष्टमनुजीवयन् समुज्जीवितेत-
रदष्टको विषभिषगुपालम्भनीयः, अतिप्रसङ्गात् । स हि तेषामेव दोषः । न खलु निखिलभुवना-
भोगमवभासयन्तोऽपि भावनीया भानवः १ कौशिक २ लोकस्यालोकहेतुतामभजमाना उपालम्भ-
सम्भावनास्पदम् । तथा च श्रीसिद्धसेनः—
“सद्धर्मबीजवपनानघकौशलस्य यल्लोकबान्धव ! तवापि खिलान्यभूवन् ३ ।
तन्नाद्भुतं खगकुलेष्विह तामसेषु सूर्यांशवो मधुकरीचरणावदाताः ॥४”
अथ कथमिव तत्कुहेवाकानां विडम्बनारूपत्वम् इति । ब्रूमः । यत्तावदुक्तं परैः
'क्षित्यादयो बुद्धिमत्कर्तृकाः, कार्यत्वाद् घटवदिति' । तदयुक्तम् । व्याप्तेरग्रहणात् । “साधनं
हि सर्वत्र व्याप्तौ प्रमाणेन सिद्धायां साध्यं गमयेत्” इति सर्ववादिसम्वादः । स चायं जगन्ति
सृजन् सशरीरोऽशरीरो वा स्यात् ? सशरीरोऽपि किमस्मदादिवद् दृश्यशरीरविशिष्टः, उत
पिशाचादिवददृश्यशरीरविशिष्टः ? प्रथमपक्षे प्रत्यक्षबाधः; तमन्तरेणापि च जायमाने तृणतरु-
पुरन्दरधनुरादौ कार्यत्वस्य दर्शनात् प्रमेयत्वादिवत् साधारणानैकान्तिको हेतुः ॥
करता है । तथा जैसे कानोंमें भरा हुआ निर्मल जल भी महान् पीड़ाको उत्पन्न करनेवाला होता है, वैसे ही
गुरुओंके वचन भी अभव्य जीवको क्लेश उत्पन्न करनेवाले होते हैं ।” इसलिये वास्तवमें भगवान् दुराग्रही
पुरुषोंके उपदे
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३३
द्वितीयविकल्पे पुनरदृश्यशरीरत्वे तस्य माहात्म्यविशेषः कारणम्, आहोस्विदस्मदाद्य-
दृष्टवैगुण्यम् ? प्रथमप्रकारः कोशपानप्रत्यायनीयः,^१ तत्सिद्धौ प्रमाणाभावात् । इतरेतराश्रयदोषो-
पत्तेश्च । सिद्धे हि माहात्म्यविशेषे तस्यादृश्यशरीरत्वं प्रत्येत्तव्यम् । तत्सिद्धौ च माहात्म्यविशेष-
सिद्धिरिति । द्वैतीयिकस्तु प्रकारो न संचरत्येव विचारगोचरे; संशयानिवृत्तेः । किं तस्या-
सत्त्वाद् अदृश्यशरीरत्वं वान्धेयादिवत् किं वास्मदाद्यदृष्टवैगुण्यात् पिशाचादिवदिति
निश्चयाभावात् ।
अशरीरश्चेत् तदा दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोर्वैषम्यम् । घटादयो हि कार्यरूपाः सशरीरकर्तृका
दृष्टाः । अशरीरस्य च सतस्तस्य कार्यप्रवृत्तौ कुतः सामर्थ्यम् ? आकाशादिवत् । तस्मात्
सशरीराशरीरलक्षणे पक्षद्वयेऽपि कार्यत्वहेतोर्व्याप्त्यसिद्धिः ।
किञ्च, त्वन्मतेन कालात्ययापदिष्टोऽप्ययं हेतुः । धर्म्येकदेशस्य तरुविद्युदभ्रादेरिदानी-
मप्युत्पद्यमानस्य विधातुरनुपलभ्यमानत्वेन प्रत्यक्षबाधितधर्म्यनन्तरं हेतुभणनात् । तदेवं न
कश्चिद् जगतः कर्ता । एकत्वादीनि तु जगत्कर्तृत्वव्यवस्थापनायानीयमानानि तद्विशेषणानि
षण्ढं प्रति कामिन्या रूपसंपन्निरूपणप्रायाण्येव । तथापि तेषां विचारासहत्वख्यापनार्थं
किञ्चिदुच्यते ।
अनैकांतिक हेत्वाभास है। इसी प्रकार यहाँ भी कार्यत्वहेतु पृथ्वो आदि पक्षमें घट आदि सपक्षमें तथा
ईश्वरके शरीर-द्वारा नहीं बनाये हुए घास, वृक्ष आदि विपक्षमें भी कार्यत्वहेतु चला गया, इसलिये यह
हेतु साधारण अनैकांतिक हेत्वाभास होनेसे दोषपूर्ण है । )
यदि कहो कि ईश्वर पिशाच आदिके समान अदृश्य शरीरसे जगत्की सृष्टि करता है तो इस शरीरके
अदृश्य होनेमें ईश्वरका माहात्म्यविशेष कारण है, अथवा हम लोगोंका दुर्भाग्य ? प्रथम पक्ष विश्वासके
योग्य नहीं है। क्योंकि ईश्वरके अदृश्य शरीर सिद्ध करनेमें कोई प्रमाण नहीं है। तथा ईश्वरके माहात्म्य-
विशेष सिद्ध होनेपर उसके अदृश्य शरीर सिद्ध हो, और अदृश्य शरीर सिद्ध होनेपर माहात्म्यविशेष सिद्ध हो,
इस प्रकार इतरेतराश्रय दोष भी आता है। यदि कहो कि हम लोगोंके दुर्भाग्यसे ईश्वरका शरीर दृष्टिगोचर
नहीं होता तो यह भी ठीक नहीं जँचता । क्योंकि वंध्यापुत्रकी तरह ईश्वरका अभाव होनेसे उसका शरीर
दिखाई नहीं देता, अथवा जिस प्रकार हमारे दुर्भाग्यवश पिशाच आदिका शरीर दिखाई नहीं देता, वैसे ही
ईश्वरका शरीर भी अदृश्य है ? इस तरह कुछ भी निश्चय नहीं होता ।
तथा ईश्वरको अशरीरस्रष्टा माननेमें दृष्टांत और दार्ष्टान्तिक विषम हो जाते हैं । क्योंकि घटादिक
कार्य शरीर सहित कर्ताके बनाये हुए ही देखे जाते हैं। फिर आकाशकी तरह अशरीर ईश्वर किस प्रकार
कार्य करनेमें समर्थ हो सकता है ? ( तात्पर्य यह कि 'जगत् अशरीर ईश्वरका बनाया हुआ है, कार्य होनेसे
घटकी तरह' इस अनुमानमें घट दृष्टान्त और जगत् दार्ष्टान्तिकमें समता नहीं है, क्योंकि घट सशरीरीका
बनाया हुआ माना जाता है। तथा जिस तरह अशरीरी आकाश कोई कार्य आदि नहीं कर सकता, उसी तरह
अशरीरी ईश्वर भी कार्य करनेमें असमर्थ है । ) इस कारण सशरीर और अशरीर दोनों पक्षोंमें कार्यत्व हेतु-
की सकर्तृकत्व साध्यके साथ व्याप्ति सिद्ध नहीं होती ।
तथा, तुम्हारे मतसे कार्यत्व हेतु कालात्ययापदिष्ट भी है । क्योंकि जगत्रूप धर्मी ( साध्य ) के एक
देश, इस कालमें उत्पन्न वृक्ष, विद्युत्, मेघ आदि किसी कर्ताके बनाये हुए नहीं देखे जाते हैं, इसलिए यहाँ
प्रत्यक्षसे बाधित धर्मीके अनन्तर हेतुका कथन किया गया है, अतएव यह हेतु दोषपूर्ण है । अतएव कोई
जगत्का कर्ता नहीं है। तथा ईश्वरके जगत्कर्तृत्व साधनमें जो एकत्व आदि विशेषण दिये गये हैं वे सब
नपुंसकके प्रति स्त्रियोंके रूप-लावण्य आदिका कथन करनेके समान हैं। फिर भी इन विशेषणोंपर कुछ विचार
किया जाता है ।
१. शपथेन विभावनीयः ।
५
३४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
तत्रैकत्वचर्चास्तावत् । बहूनामेककार्यकरणे वैमत्यसम्भावना इति नायमेकान्तः । अनेक-
कीटिकाशतनिष्पाद्यत्वेऽपि शक्रमूर्द्ध्नः, अनेकशिल्पिकल्पितत्वेऽपि प्रासादादीनां, नैकसरघानि-
र्वर्तितत्वेऽपि मधुच्छत्रादीनां चैकरूपताया अविगानेनोपलम्भात् । अथैतेष्वप्येक एवेश्वरः कर्तेति
ब्रूषे । एवं चेद् भवतो भवानीपतिं प्रति निष्प्रतिमा वासना, तर्हि कुविन्दकुम्भकारादिति-
रस्कारेण पटघटादीनामपि कर्ता स एव किं न कल्प्यते । अथ तेषां प्रत्यक्षसिद्धं कर्तृत्वं कथम-
पह्नोतुं शक्यम् । तर्हि कीटिकादिभिः किं तव विराद्धं यत् तेषामसह्यतादृशप्रयाससाध्यं कर्तृ-
त्वमेकहेल्यैवापलप्यते । तस्माद् वैमत्यभयाद् महेशितुरेकत्वकल्पना भोजनादिव्ययभयात्
कृपणस्यात्यन्तवल्लभपुत्रकलत्रादिपरित्यजनेन शून्यारण्यानीसेवनमिवाभासते ।
तथा सर्वगतत्वमपि तस्य नोपपन्नम् । तद्धि शरीरात्मना, ज्ञानात्मना वा स्यात् ? प्रथम-
पक्षे तदीयेनैव देहेन जगतत्रयस्य व्याप्तत्वाद् इतरनिर्मेयपदार्थानामाश्रयानवकाशः । द्वितीयपक्षे
तु सिद्धसाध्यता । अस्माभिरपि निरतिशयज्ञानात्मना परमपुरुषस्य जगत्त्रयक्रोडीकरणाभ्यु-
पगमात् । यदि परमेवं भवत्प्रमाणीकृतेन वेदेन विरोधः । तत्र हि शरीरात्मना सर्वगतत्व-
मुक्तम्—“विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतः पाणिरुत विश्वतः पात्” इत्यादिश्रुतेः ॥
यच्चोक्तं तस्य प्रतिनियतदेशवर्तित्वे त्रिभुवनगतपदार्थानामनियतदेशवृत्तीनां यथावन्नि-
र्माणानुपपत्तिरिति । तत्रेदं पृच्छयते । स जगत्त्रयं निर्मिमाणस्तक्षादिवत् साक्षाद् देहव्यापारेण
(१) एकत्व—‘बहुत-से ईश्वरोंद्वारा जगतरूप एक कार्यके किये जानेपर ईश्वरोंमें मतिका भे दउत्पन्न
होगा’ यह कथन एकान्त-सत्य नहीं है । क्योंकि सैकड़ों कीड़ियां एक ही वमीको बनाती हैं, बहुत से शिल्पी
एक ही महलको बनाते हैं, बहुत सी मधुमक्खी एक ही शहदके छत्तेका निर्माण करती हैं, फिर भी वस्तुओंकी
एकरूपतामें कोई विरोध नहीं आता । यदि वादी कहे कि बमी, प्रासाद आदिका कर्ता भी ईश्वर ही है, तो
इससे ईश्वरके प्रति आप लोगोंकी निरुपम श्रद्धा ही प्रगट होती है, और इस तरह तो जुलाहे और कुंभकार
आदिको पट और घट आदिका कर्ता न मानकर ईश्वरको ही इनका भी कर्ता मानना चाहिये । यदि आप
कहें कि पट घट आदिके कर्ता जुलाहा और कुंभकारके प्रत्यक्ष-सिद्ध कर्तृत्वका अपलाप कैसे किया जा सकता
है ? तो फिर कीटिका आदिको बमी आदिका कर्ता माननेमें क्या दोष है ? कीटिका आदिने आप लोगोंका
क्या अपराध किया है जो आप उनके असाधारण परिश्रमसे साध्य कर्तृत्वको एक चुटकीमें ही उड़ा देना
चाहते हैं ? इसलिए परस्पर मतिभेद होनेके भयसे जो एक ईश्वरकी कल्पना है, वह भोजन आदिके व्ययके
डरसे कृपण पुरुषके अपने अत्यन्त प्रिय पुत्र और स्त्री आदिको छोड़कर शून्य जंगलमें वास करनेके समान
है । ( जैसे कोई कृपण पुरुष खर्चके भयसे अपने स्त्री-पुत्रादिको छोड़कर वनमें चला जाय, उसी तरह मतिभेदके
भयसे आप लोग भी एक ईश्वरकी कल्पना करते हैं ।)
(२) सर्वगतत्व—तथा ईश्वर सर्वगत भी सिद्ध नहीं होता, क्योंकि ईश्वरका सर्वगतत्व शरीर
की अपेक्षासे है, अथवा ज्ञानकी ? प्रथम पक्षमें ईश्वरका अपना शरीर ही तीनों लोकोंमें व्याप्त हो जायेगा,
फिर दूसरे बनाने योग्य ( निर्मेय ) पदार्थोंके लिए कोई स्थान ही न रहेगा । यदि आपलोग ज्ञानकी अपेक्षा
ईश्वरको सर्वव्यापी मानें, तो इसमें हमारे साध्यको सिद्धि है, क्योंकि हम लोग ( जैन ) भी परमात्माको
निरतिशय ज्ञानकी अपेक्षा तीनों लोकोंमें व्यापी मानते हैं । परन्तु ईश्वरको ज्ञानकी अपेक्षा सर्वगत माननेसे
आपके वेदसे विरोध आता है । वेदमैं ईश्वरको शरीरकी अपेक्षासे सर्वव्यापी कहा है । श्रुति भी है—“ईश्वर
सर्वत्र नेत्रोंका, मुखका, हाथोंका और पैरोंका धारक है ।”
तथा ईश्वरको शरीरकी अपेक्षा सर्वव्यापक माननेमें वादीने हेतु दिया है कि यदि ईश्वरको नियत
स्थानवर्ती माना जाय, तो तीनों लोकोंमें अनियत स्थानोंके पदार्थोंकी यथावत् उत्पत्ति नहीं हो सकेगी; तो
१. शुक्लयजुर्वेदमाध्यन्दिनसंहितायां सप्तदशोऽध्याये १९ मन्त्रे ।
· अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३५
निर्मिमीते, यदि वा सङ्कल्पमात्रेण ? आद्ये पक्षे एकस्यैव भूभूधरादेर्विधानेऽक्षोदीयसः कालक्षे-
पस्य सम्भवाद् बहीयसाप्यनेहसा न परिसमाप्तिः । द्वितीयपक्षे तु सङ्कल्पमात्रेणैव कार्यकल्प-
नायां नियतदेशस्थायित्वेऽपि न किञ्चिद् दूषणमुत्पश्यामः । नियतदेशस्थायिनां सामान्यदेवा-
नामपि सङ्कल्पमात्रेणैव तत्तत्कार्यसम्पादनप्रतिपत्तेः ॥
किञ्च, तस्य सर्वगतत्वेऽङ्गीक्रियमाणेऽशुचिषु निरन्तरसन्ततमसेषु नरकादिस्थानेष्वपि
तस्य वृत्तिः प्रसज्यते । तथा चानिष्टापत्तिः । अथ युष्मत्पक्षेऽपि यदा ज्ञानात्मना सर्वं जगत्त्रयं
व्याप्नोतीत्युच्यते तदाशुचिरसास्वादादीनामप्युपलम्भसम्भवात् नरकादिदुःखस्वरूपसंवेदनात्म-
कतया दुःखानुभवप्रसङ्गाच्च अनिष्टापत्तिस्तुल्यैवेति चे
३६ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
बहिर्निर्गत्य प्रमेयं परिच्छिनत्तीति । तत्रेदमुत्तरम् । किरणानां गुणत्वमसिद्धम्; तेषां तैजस-
पुद्गलमयत्वेन द्रव्यत्वात् । यश्च तेषां प्रकाशात्मा गुणः स तेभ्यो न जातु पृथग् भवतीति ।
तथा च धर्मसङ्ग्रहिण्यां श्रीहरिभद्राचार्यपादाः—
“किरणा गुणा न दव्वं तेसिं पयासो गुणो न वा दव्वं ।
जं णाणं आयगुणो कहमद्दव्वो स अन्नत्थ ॥ १ ॥
गन्तूण न परिच्छिन्दइ णाणं णेयं तयम्मि देसम्मि ।
आयत्थं चिय नवरं अचिंतसत्तीउ विण्णेयं ॥२॥
लोहोवलस्स सत्ती आयत्था चेव भिन्नदेसंपि ।
लोहं आगरिसंती दीसइ इह कज्जपच्चक्खा ॥३॥
एवमिह नाणसत्ती आयत्था चेव हंदि लोगंतं ।
जइ परिछिंदइ सम्मं को णु विरोहो भवे एत्थं”१ ॥४॥
इत्यादि ॥
चलती है, उसी तरह यहां भी हमने जिनेन्द्रके ज्ञानकी शक्तिको देखकर जिनेन्द्रको ज्ञानकी अपेक्षा सर्वव्यापक
कहा है । तथा ज्ञान प्राप्यकारी नहीं है, क्योंकि वह आत्माका धर्म है, इसलिये ज्ञान आत्मासे बाहर निकल
कर नहीं जा सकता । यदि ज्ञान आत्माके बाहर निकल कर जाने लगे तो आत्माके अचेतनत्वकी आपत्ति खड़ी
हो जानेसे उसके अजीवत्वका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा । लेकिन यह संभव नहीं, क्योंकि धर्मीको छोड़कर
केवल धर्म कहीं भी नहीं रहता । तथा वैशेषिक लोगोंने जो सूर्यका दृष्टांत दिया है कि जैसे सूर्यकी किरणें
गुणरूप होकर भी सूर्यसे बाहर जाकर संसारको प्रकाशित करती हैं, उसी तरह ज्ञान आत्माका गुण होकर भी
आत्मासे बाहर जाकर प्रमेय पदार्थको जानता है, यह भी ठीक नहीं । क्योंकि किरणोंका गुणत्व ही असिद्ध
है, कारण कि किरणें तैजस पुद्गलरूप हैं, इसलिये वे द्रव्य हैं । तथा किरणोंका प्रकाशात्मक गुण कभी
किरणोंसे अलग नहीं होता । हरिभद्राचार्यने धर्मसंग्रहिणीमें भी कहा है—
“किरणें द्रव्य हैं, गुण नहीं हैं । किरणोंका प्रकाश गुण है । यह प्रकाशरूप गुण द्रव्यको छोड़कर
अन्यत्र नहीं रहता । इसी तरह ज्ञान आत्माका गुण है, वह आत्माको छोड़कर अन्यत्र नहीं जाता ॥१॥
जिस देशमें ज्ञेय पदार्थ स्थित है उस प्रदेशमें ज्ञान जाकर ज्ञेयको नहीं जानता, किन्तु आत्मामें रहते
हुए ही दूर देशमें स्थित ज्ञेयको जानता है; आत्माके ज्ञानमें अचिंत्य शक्ति है ॥२॥
जिस प्रकार चुम्बक पत्थरकी शक्ति चुम्बकमें ही रहकर दूर रखे हुए लोहेको अपनी ओर
खींचती है; ॥३॥
इसी प्रकार ज्ञान शक्ति आत्मामें ही रहकर लोकके अंत तक रहनेवाले पदार्थोंको भलीभांति जानती
है, इसमें कोई विरोध नहीं है ॥४॥” इत्यादि ।
१. किरणा गुणा न द्रव्यं तेषां प्रकाशो गुणो न वा द्रव्यं ।
यज्ज्ञानमात्मगुणः कथमद्रव्यः सः अन्यत्र ॥
गत्वा न परिच्छिनत्ति ज्ञानं ज्ञेयं तस्मिन्देशे ।
आत्मस्थमेव नवरं अचिन्त्यशक्त्या तु विज्ञेयम् ॥
लोहोपलस्य शक्तिः आत्मस्थैव भिन्नदेशमपि ।
लोहमाकर्षती दृश्यते इह कार्यप्रत्यक्षा ॥
एवमिह ज्ञानशक्तिः आत्मस्थैव हन्त लोकान्तम् ।
यदि परिच्छिनत्ति सम्यक् को नु विरोधो भवेदत्र ॥
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३७
अथ सर्वगः सर्वज्ञ इति व्याख्यातम् । तत्रापि प्रतिविधीयते । ननु तस्य सार्वज्ञ्यं
केन प्रमाणेन गृहीतम् । प्रत्यक्षेण, परोक्षेण वा ? न तावत् प्रत्यक्षेण, तस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षो-
त्पन्नतयातीन्द्रियग्रहणासामर्थ्यात् । नापि परोक्षेण । तद्धि अनुमानं, शाब्दं वा स्यात् ? न
तावदनुमानम्, तस्य लिङ्गलिङ्गिसम्बन्धस्मरणपूर्वकत्वात् । न च तस्य सर्वज्ञत्वेऽनुमेये
किञ्चिदव्यभिचारी लिङ्गं पश्यामः । तस्यात्यन्तविप्रकृष्टत्वेन तत्प्रतिबद्धलिङ्गसम्बन्धग्रहणा-
भावात् ॥
अथ तस्य सर्वज्ञत्वं विना जगद्वैचित्र्यमनुपपद्यमानं सर्वज्ञत्वमर्थादापादयतीति चेत्
न । अविनाभावाभावात् । न हि जगद्वैचित्री तत्सार्वज्ञ्यं विनान्यथा नोपपन्ना । द्विविधं हि
जगत् स्थावरजङ्गमभेदात् । तत्र जङ्गमानां वैचित्र्यं स्वोपात्तशुभाशुभकर्मपरिपाकवशेनैव ।
स्थावराणां तु सचेतनानामियमेव गतिः । अचेतनानां तु तदुपभोगयोग्यतासाधनत्वेनानादिकाल-
सिद्धमेव वैचित्र्यमिति ॥
नाप्यागमस्तत्साधकः । स हि तत्कृतोऽन्यकृतो वा स्यात् ? तत्कृत एव चेत् तस्य सर्व-
ज्ञतां साधयति तदा तस्य महत्त्वक्षतिः । स्वयमेव स्वगुणोत्कीर्त्तनस्य महतामनधिकृतत्वात् ।
अन्यच्च, तस्य शास्त्रकर्तृत्वमेव न युज्यते । शास्त्रं हि वर्णात्मकम् । ते च तालुवादिव्यापार-
( ३) सर्वज्ञत्व—वैशेषिकोंके ईश्वरका सर्वज्ञत्व प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी भी प्रमाणसे सिद्ध
नहीं होता । प्रत्यक्ष प्रमाणसे ईश्वरका सर्वज्ञत्व इसलिये सिद्ध नहीं हो सकता कि प्रत्यक्ष इंद्रिय और मनके
संयोगसे उत्पन्न होता है, इसलिये वह अतीन्द्रिय ज्ञानको नहीं जान सकता । परोक्ष ज्ञानसे भी ईश्वरके
सर्वज्ञत्वकी सिद्धि नहीं होती । क्योंकि वह परोक्ष ज्ञान अनुमानसे सर्वज्ञत्वको जानता है, अथवा शब्दसे ? अनु-
मानसे ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि लिंगी और लिंग (साध्य और हेतु) दोनोंके संबंधके
स्मरणपूर्वक ही अनुमान होता है । (जैसे 'पर्वत अग्निवाला है, धूमवान् होनेसे—' यहाँ पहले धूमरूप
लिंगका ग्रहण होता है और फिर अग्निरूप लिंगीके साथ लिंगके संबंधका स्मरण होता है । इसी तरह
'ईश्वर सर्वज्ञ है, क्योंकि वह अपनी इच्छासे ही संपूर्ण प्राणियोंको सुख-दुःखका अनुभव करानेमें समर्थ है—'
इस अनुमानमें लिंगका ग्रहण और इस लिंगका सर्वज्ञत्वरूप लिंगीके साथ संबंधका स्मरण होना चाहिये ।
परन्तु ऐसा नहीं होता; इसलिये अनुमानसे ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान नहीं हो सकता ।) तथा ईश्वरके
सर्वज्ञत्वरूप अनुमेयमें हम कोई भी अव्यभिचारी लिंग नहीं देखते, क्योंकि वह ईश्वर अत्यन्त दूर है,
इसलिये ईश्वरसे संबद्ध लिंगका सर्वज्ञत्वरूप लिंगीके साथ संबंधका ग्रहण नहीं हो सकता ।
यदि वादी लोग कहें कि ईश्वरके सर्वज्ञत्वके बिना जगत्की विचित्रता नहीं बन सकती, इस कारण
अर्थापत्तिसे ईश्वरके सर्वज्ञत्वकी सिद्धि होती है, तो यह कथन भी ठीक नहीं । क्योंकि जगत्की विचित्रता
और सर्वज्ञताकी व्याप्तिका अभाव है । जगत्की विचित्रता ईश्वरकी सर्वज्ञताके बिना अन्य प्रकारसे घटित
नहीं होती, ऐसी बात नहीं है । जंगम (त्रस) और स्थावरके भेदसे संसार दो प्रकारका है । जंगम
जीवोंकी विचित्रता स्वयं उपार्जित शुभ और अशुभ कर्मोंके उदयसे ही होती है और स्थावर जीवोंकी यही
दशा होती है । अचेतन पदार्थोंका वैचित्र्य स्थावर और जंगमके उपभोगकी योग्यताके साधन रूपमें अनादि-
कालसे सिद्ध ही है ।
आगमसे भी ईश्वरकी सिद्धि नहीं होती । क्योंकि ईश्वरको सिद्ध करनेवाला आगम ईश्वरका बनाया
हुआ है, या किसी दूसरेका ? यदि वह आगम ईश्वरप्रणीत होकर ही ईश्वरकी सिद्धि करता है तो ईश्वरकी
महान् क्षति होगी । क्योंकि महात्मा लोग स्वयं ही अपने गुणोंकी प्रशंसा नहीं करते हैं । तथा ईश्वरका शास्त्र-
कर्तृत्व ही सिद्ध नहीं होता । क्योंकि शास्त्र वर्णात्मक होता है । ये वर्ण तालु आदिकी क्रियासे उत्पन्न होते
३८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
जन्याः । स च शरीरे एव सम्भवी । शरीराभ्युपगमे च तस्य पूर्वोक्ता एव दोषाः । अन्यकृतञ्चेत्
सोऽन्यः सर्वज्ञोऽसर्वज्ञो वा ? सर्वज्ञत्वे तस्य द्वैतापत्त्या प्रागुक्ततदेकत्वाभ्युपगमबाधः तत्सा-
धकप्रमाणचर्चायामनवस्थापातश्च । असर्वज्ञश्चेत् कस्तस्य वचसि विश्वासः ।
अपरं च भवदभीष्ट आगमः प्रत्युत तत्प्रणेतुरसर्वज्ञत्वमेव साधयति । पूर्वापरविरुद्धार्थ-
वचनोपेतत्वात् । तथाहि "न हिंस्यात् सर्वभूतानि" इति प्रथममुक्त्वा, पश्चात् तत्रैव पठितम्-
“षट्शतानि नियुज्यन्ते पशूनां मध्यमेऽहनि ।
अश्वमेधस्य वचनान्न्यूनानि पशुभिस्त्रिभिः” ॥
तथा “अग्नीषोमीयं पशुमालभेत²”, “सप्तदश प्राजापत्यान् पशूनालभेत³” इत्यादि वच-
नानि कथमिव न पूर्वापरविरोधमनुरुध्यन्ते । तथा "नानृतं ब्रूयात्” इत्यादिना अनृतभाषणं
प्रथमं निषिध्य, पश्चात् "ब्राह्मणार्थेऽनृतं ब्रूयात्⁴” इत्यादि । तथा-
“न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले ।
प्राणात्यये सर्वधनापहारे पञ्चानृतान्याहुरपातकानि⁵” ॥
तथा “परद्रव्याणि लोष्ठवत्” इत्यादिना अदत्तादानमनेकधा निरस्य, पश्चादुक्तम्
“यद्यपि ब्राह्मणो हठेन परकीयमादत्ते छलेन वा तथापि तस्य नादत्तादानम् । यतः सर्वमिदं
ब्राह्मणेभ्यो दत्तम् ब्राह्मणानां तु दौर्बल्याद् वृषलाः परिभुञ्जते । तस्मादपहरन् ब्राह्मणः स्वमादत्ते
स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति⁶" इति । तथा "अपुत्रस्य गतिर्नास्ति⁷" इति
लपित्वा,
हैं। यह तालु आदिकी क्रिया शरीर होनेपर ही संभव है। यदि ईश्वरको शरीरी मानोगे तो ईश्वरमें पूर्वोक्त
दोष मानने पड़ेंगे। यदि आप कहें कि ईश्वरको सिद्ध करनेवाला आगम दूसरेका बनाया हुआ है, तो वह
दूसरा पुरुष सर्वज्ञ है, या असर्वज्ञ ? यदि सर्वज्ञ है तो ईश्वरके द्वैतका प्रसंग होनेसे आपने जो पहले ईश्वरको
एक माना है, उसमें बाधा उपस्थित होगी । तथा अन्य पुरुषको सर्वज्ञ माननेपर बहुत-से पुरुषोंके सर्वज्ञ
स्वीकार करनेमें अनवस्था दोष आयेगा । तथा यदि आगमका प्रणेता अन्य पुरुष असर्वज्ञ है, तो उसके
वचनोंमें विश्वास कौन करेगा ?
इसके अतिरिक्त, आप लोगोंका आगम अपने प्रणेताको असर्वज्ञ ही सिद्ध करता है। क्योंकि वह
आगम पूर्वापरविरुद्ध है। जैसे "किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनी चाहिए"- यह कहकर तत्पश्चात्
“अश्वमेध यज्ञके मध्यम दिनमें ५९७ पशुओंका वध किया जाता है,”
तथा “अग्नि और सोम सम्बन्धी पशुका वध करना चाहिये", "प्रजापति सम्बन्धी सत्रह पशुओंको
मारना चाहिए” आदि वचनोंका कथन करना शास्त्रोंके पूर्वापरविरोधको सिद्ध करता है। तथा "असत्य नहीं
बोलना चाहिए" आदि वचनोंसे असत्यका निषेध करके, तत्पश्चात् "ब्राह्मणके लिए असत्य बोलनेमें दोष
नहीं है", तथा-
"हास्यमें, स्त्रियोंके साथ संभोगके समय, विवाहके अवसरपर, प्राणोंका नाश होनेपर और सर्वधनके
हरण होनेके समय असत्य बोलना पाप नहीं है।"
आदि वचनोंका कथन पूर्वापर विरुद्ध है । इसी प्रकार पहले "दूसरेकी सम्पत्ति मिट्टीके ढेलेके
१. छान्दोग्य उ. ८ अ. । २. ऐतरेय ६-३ । ३. तैत्तरीयसंहिता १-४ ।
४. आपस्तंबसूत्रे ।
५. “उद्वाहकाले रतिसम्प्रयोगे प्राणात्यये सर्वधनापहारे ।
विप्रस्य चार्थे ह्यनृतं वदेयुः पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ वसिष्ठधर्मसूत्रे १६-३६ ।
६. मनुस्मृतौ १-१०१ इत्यत्रल्पांशेनैतत्समम् । ७. देवीभागवते ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३९
“अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् ।
दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसन्ततिम्”१॥
इत्यादि । कियन्तो वा दधिमाषभोजनात् कृपणा विवेच्यन्ते । तदेवमागमोऽपि न
तस्य सर्वज्ञतां वक्ति । किञ्च, सर्वज्ञः सन्नसौ चराचरं चेद् विरचयति, तदा जगदुपप्लवकरण-
वैरिणः पश्चादपि कर्त्तव्यनिग्रहान् सुरवैरिणः एतदधिक्षेपकारिणश्चास्मदादीन् किमर्थं सृजति
इति, तन्नायं सर्वज्ञः ।
तथा स्ववशतत्त्वं-स्वातन्त्र्यं । तदपि तस्य न क्षोदक्षमम् । स हि यदि नाम स्वाधीनः
सन् विश्वं विधत्ते, परमकारुणिकश्च त्वया वर्ण्यते, तत् कथं सुखितदुःखिताद्यवस्थाभेदवृन्द-
स्थपुटितं घटयति भुवनम् एकान्तशर्मसंपत्कान्तमेव तु किं न निर्मिमीते ? अथ जन्मान्तरोपा-
र्जिततत्तत्तदीयशुभाशुभकर्मप्रेरितः सन् तथा करोतीति, दत्तस्तर्हि स्ववशतत्त्वाय जलाञ्जलिः२॥
कर्मजन्ये च त्रिभुवनवैचित्ये शिपिविष्ट३हेतुकविष्टप४सृष्टिकल्पनायाः कष्टैकफलत्वात्
अस्मन्मतमेवाङ्गीकृतं प्रेक्षावता । तथा चायातोऽयं “घटकुट्यां प्रभातम्५” इति न्यायः ।
किञ्च, प्राणिनां धर्माधर्मावपेक्षमाणश्चेदयं सृजति, प्राप्तं तर्हि यदयमपेक्षते तन्न करोतीति ।
समान हैं" आदि वचनोंसे चोरीका निषेध करके, “यदि कोई ब्राह्मण हठसे या छलसे दूसरेके द्रव्यको हरण
करता है, तो भी उसे चोरीका दोष नहीं लगता, क्योंकि जगत्की सर्वसंपत्ति ब्राह्मणोंको ही दी गयी है;
ब्राह्मणोंकी दुर्बलतासे शूद्र लोग इस संपत्तिका उपभोग करते हैं । इसलिये यदि ब्राह्मण दूसरेके धनको
छीनता है, तो भी वह अपने ही धनको लेता है, अपने ही का उपभोग करता है, अपना ही पहनता है
और अपना ही देता है" आदि वाक्योंका उल्लेख पूर्वापरविरोधको सूचित करता है । इसीप्रकार “पुत्ररहितकी
गति नहीं होती” कहकर,
हजारों कुमार ब्रह्मचारी ब्राह्मण अपने कुलकी संततिको उत्पन्न न करके स्वर्ग गये हैं ।”
आदि वाक्योंका कथन आगमके पूर्वापरविरोधको स्पष्टरूपसे प्रगट करता है । दही और उड़दके
भोजनसे कितने कृपणोंको सन्तुष्ट किया जाये ? इसलिये आगमसे भी ईश्वरकी सर्वज्ञता सिद्ध नहीं होती ।
और कहाँतक कहा जाये, यदि सर्वज्ञ ईश्वर इस स्थावर-जंगमरूप जगत्को बनाता है, तो वह जगत्में
उपद्रव करनेवाले, जिनका निग्रह करना आवश्यक है ऐसे दानवों को, तथा ईश्वरपर आक्षेप करनेवाले हम
जैसे लोगोंको क्यों बनाता है ? इससे मालूम होता है कि ईश्वर सर्वज्ञ नहीं है ।
( ४ ) स्वतंत्र—तथा स्ववशतत्वका अर्थ है स्वातन्त्र्य । ईश्वर स्वतंत्र भी नहीं है । यदि ईश्वर
स्वाधीन होकर जगत्को रचता है, और वह परम दयालु है, तो वह सर्वथा सुख-सम्पदाओंसे परिपूर्ण जगत्को
न बनाकर सुख-दुःखरूप जगत्का क्यों सर्जन करता है ? यदि कहो कि जीवोंके जन्मान्तरमें उपार्जन किये
हुए शुभ-अशुभ कर्मोंसे प्रेरित ईश्वर जगत्को बनाता है, तो फिर ईश्वरके स्वाधीनत्वका ही लोप हो
जाता है ।
तथा, संसारकी विचित्रताको कर्मजन्य स्वीकार करनेपर सृष्टिको ईश्वरजन्य मानना केवल कष्टरूप
हो है । इससे अच्छा तो आप हमारा ही मत स्वीकार कर लें । तथा हमारे मतको स्वीकार करनेपर आपको
“घटकुट्यां प्रभातम्” न्यायका प्रसंग होगा । ( अर्थात् जैसे कोई मनुष्य महसूली सामानका महसूल न देनेके
विचारसे रास्तेमे आनेवाले चुंगीघरको छोड़कर किसी दूसरे रास्तेसे शहरके भीतर जानेके लिये रातभर इधर-
उधर चक्कर मारकर प्रातःकाल फिरसे उसी चुंगीघरपर जा पहुँचता है ( घटकुट्यां प्रभातम् ), उसी प्रकार
आप लोगोंने ईश्वरको जगत्का नियन्ता सिद्ध करनेमें बहुत कुछ प्रयत्न किया, पर आखिरमें हमारा ही मत
१. आपस्तंबसूत्रे । २. स्ववशतवं नष्टमित्यर्थः । ३. महेश्वरः ४. विश्वं ५. उद्देश्यासिद्धिर्यत्र प्रतीयते
तत्रायं उपयुज्यते । न्यायार्थः—कश्चित् शाकटिको मध्ये मार्गं राजदेयं द्रव्यं दातुमनिच्छन्मार्गान्तरं समासाद-
यति परं रात्रौ भ्रष्टमार्गः प्रभाते राजग्राह्याद्रव्यग्राहिकुटीसविधावेवागच्छति । तेन तदुद्देश्यं न सिध्यतीति ।
न हि कुलालो दण्डादि करोति । एवं कर्मापेक्षश्चेदीश्वरो जगत्कारणं स्यात् तर्हि कर्मणीश्वरत्वम्,
ईश्वरोऽनीश्वरः स्यादिति ॥
तथा नित्यत्वमपि तस्य स्वगृह एव प्रणिगद्यमानं हृद्यम् । स खलु नित्यत्वेनैकरूपः
सन्, त्रिभुवनसर्गस्वभावोऽतत्स्वभावो वा ? प्रथमविधायां जगन्निर्माणात् कदाचिदपि
नोपरमेत । तदुपरमे तत्स्वभावत्वहानिः एवं च सर्गक्रियाया अपर्यवसानाद् एकस्यापि कार्यस्य
न सृष्टिः । घटो हि स्वारम्भक्षणादारभ्य परिसमाप्तेरुपान्त्यक्षणं यावद् निश्चयनयाभिप्रायेण
न घटव्यपदेशमासादयति । जलाहरणाद्यर्थक्रियायामसाधकतमत्वात् ॥
अतत्स्वभावपक्षे तु न जातु जगन्ति सृजेत् तत्स्वभावायोगाद् गगनवत् । अपि च
तस्यैकान्तनित्यस्वरूपत्वे सृष्टिवत् संहारोऽपि न घटते । नानारूपकार्यकरणेऽनित्यत्वापत्तेः। स
हि येनैव स्वभावेन जगन्ति सृजेत् तेनैव तानि संहरेत्, स्वभावान्तरेण वा ? तेनैव चेत् सृष्टि-
संहारयोर्यौगपद्यप्रसङ्गः, स्वभावाभेदात् । एकस्वभावात् कारणादनेकस्वभावकार्योत्पत्तिविरो-
धात् । स्वभावान्तरेण चेद् नित्यत्वहानिः । स्वभावभेद एव हि लक्षणमनित्यतायाः । यथा
पार्थिवशरीरस्याहारपरमाणुसहकृतस्य प्रत्यहमपूर्वापूर्वोत्पादेन स्वभावभेदादनित्यत्वम् । इष्टश्च
स्वीकार करना पड़ा । ) तथा, ईश्वर जीवोंके पुण्य-पापकी अपेक्षा रखता हुआ जगत्को बनाता है तो
वह जिसकी अपेक्षा रखता है उसको नहीं बनाता । जैसे कुम्हार घटके बनानेमें दण्डकी सहायता लेता है,
इसलिये वह दण्डको नहीं बनाता, उसी तरह यदि ईश्वर जगत्के बनानेमें जीवोंके पुण्य-पापकी अपेक्षा
रखता है, तो वह पुण्य-पापकी सृष्टि नहीं करता है, इसलिये यदि ईश्वर जगत्के बनानेमें कर्मोंकी अपेक्षा
रखता है, तो वह कर्मोंके बनानेवाला नहीं कहा जा सकता । अतएव ईश्वर अनीश्वर ( असमर्थ ) है,
स्वतंत्र नहीं ।
( ५ ) नित्यत्व—तथा ईश्वर नित्य भी नहीं है । क्योंकि नित्य होनेसे एकरूपके धारक उस
ईश्वरके त्रिभुवनकी रचना करनेका स्वभाव है, या बिना स्वभावके भी वह त्रिभुवनकी रचना करता है ? यदि
ईश्वरका त्रिभुवनकी रचना करनेका स्वभाव है, तो वह रचनासे कभी विश्राम ही न लेगा। यदि विश्राम
लेगा तो ईश्वरके स्वभावकी हानि होगी । इस प्रकार जगत्की रचनाका कभी अन्त न होगा, और फिर
एक भी कार्यकी रचना न हो सकेगी। क्योंकि वास्तवमें घटकी रचनाके आरंभ होनेके प्रथम क्षणसे लगाकर
घटकी रचनाकी समाप्तिके अंतिम क्षण तक निश्चयनयकी दृष्टिसे घट व्यवहार नहीं होता। कारण कि उत्पद्यमान
घट जल लाना आदि प्रयोजनभूत क्रियाका साधकतम नहीं होता—जबतक घट बन कर तैयार न हो जाय,
उस समय तक घटमें जल लाने आदिकी क्रिया नहीं हो सकती । ( भाव यह है कि यदि ईश्वर नित्य है,
तो उसका जगत् बनानेका स्वभाव भी नित्य होना चाहिये । इसलिये उसे सदा जगत्को बनाते ही
रहना चाहिये । जगत्के इस अविराम निर्माणसे एक भी कार्यकी रचना समाप्त न हो सकेगी । तथा, जब तक
किसी कार्यको रचना समाप्त न हो, उस समय तक हम ईश्वरको स्रष्टा नहीं कह सकते ) ।
यदि ईश्वरका जगत्के रचनेका स्वभाव नहीं है, तो ईश्वर कभी भी जगत्को नहीं बना सकता ।
जैसे आकाशका स्वभाव जगत्को बनानेका नहीं है, वैसे ही ईश्वरका स्वभाव भी जगत्को बनानेका न
रहेगा । तथा, ईश्वरको एकान्त-नित्य माननेपर सृष्टिकी तरह संहार भी न बन सकेगा। क्योंकि यदि
ईश्वर सृष्टि और संहार आदि अनेक कार्योंको करेगा, तो वह अनित्य हो जायगा। तथा, जिस स्वभावसे
ईश्वर सृष्टिकी रचना करता है, उसी स्वभावसे वह सृष्टिका संहार करता है, अथवा दूसरे स्वभावसे ?
यदि ईश्वर उसी स्वभावसे संहार करता है, तो सृष्टि और संहार एककालीन हो जायेंगे, क्योंकि
ईश्वरके स्वभावमें भेद नहीं है । एक स्वभावरूप कारणसे अनेक स्वभावरूप कार्योंकी उत्पत्ति नहीं
हो सकती । यदि कहो कि जिस स्वभावसे ईश्वर सृष्टिको बनाता है, उस स्वभावके अतिरिक्त
भवतां सृष्टिसंहारयोः शम्भो स्वभावभेदः । रजोगुणात्मकतया सृष्टौ, तमोगुणात्मकतया संह-
रणे, सात्त्विकतया च स्थितौ, तस्य व्यापारस्वीकारात् । एवं चावस्थाभेदः, तद्भेदे, चावस्था-
वतोऽपि भेदाद् नित्यत्वक्षतिः ॥
अथास्तु नित्यः, तथापि कथं सततमेव सृष्टौ न चेष्टते । इच्छावशान् चेत्, ननु ता
अपीच्छाः स्वसत्तामात्रनिबन्धनात्मलाभाः सदैव किं न प्रवर्तयन्तीति स एवोपालम्भः । तथा
शम्भोरष्टगुणाधिकरणत्वे, कार्यभेदानुमेयानां तदिच्छानामपि विषमरूपत्वाद् नित्यत्वहानिः
केन वार्यते ॥
किञ्च, प्रेक्षावतां प्रवृत्तिः स्वार्थकरुणाभ्यां व्याप्ता । ततश्चायं जगत्सर्गे व्याप्रियते
स्वार्थात्, कारुण्याद् वा ? न तावत् स्वार्थात् तस्य कृतकृत्यत्वात् । न च कारुण्यात्, परदुःख-
प्रहाणेच्छा हि कारुण्यम् । ततः प्राक् सर्गाज्जीवानामिन्द्रियशरीरविषयानुत्पत्तौ दुःखाभावेन
कस्य प्रहाणेच्छा कारुण्यम् ? सर्गोत्तरकाले तु दुःखिनोऽवलोक्य कारुण्याभ्युपगमे दुरुत्तर-
मितरेतराश्रयम् । कारुण्येन सृष्टिः सृष्ट्या च कारुण्यम् । इति नास्य जगत्कर्तृत्वं कथमपि
सिद्धयति ॥
दूसरे स्वभावसे वह संहार करता है, तो यह माननेमें ईश्वर नित्य नहीं कहा जा सकता । क्योंकि स्वभावका
भेद होना ही अनित्यताका लक्षण है । जिस प्रकार आहारके परमाणुओंसे युक्त पार्थिव शरीरमें प्रतिदिन
नवीन-नवीन उत्पत्ति होनेके कारण स्वभावभेद होता है, इसलिए पार्थिव शरीर अनित्य है, उसी तरह
ईश्वरके स्वभावका भेद माननेपर ईश्वर भी अनित्य होगा । परन्तु आप लोग जगत्की सृष्टि और संहारमें
ईश्वरके स्वभाव-भेदको स्वीकार करते हैं । क्योंकि आपके अनुसार ईश्वर सृष्टिमें रजोगुणरूप, संहारमें
तमोगुणरूप, और स्थितिमें सत्त्वगुणरूप प्रवृत्ति करता है । इस प्रकार अनेक अवस्थाओंके भेद होनेसे ईश्वर
नित्य नहीं कहा जा सकता ।
यदि ईश्वरको नित्य मान भी लिया जाय, तो वह जगतके बनानेमें सदा ही प्रयत्नवान् क्यों नहीं
रहता ? यदि कहो कि अपनी इच्छाके कारण ईश्वर जगत्को बनानेमें सदा ही प्रयत्नवान् नहीं होता तो
अपनी सत्तामात्रसे उत्पन्न हुई इच्छाएँ भी ईश्वरको सदा काल प्रवृत्त क्यों नहीं करतीं ? इस प्रकार पूर्वोक्त
दोष ही आता है । तथा आप लोग ईश्वरमें बुद्धि, इच्छा, प्रयत्न, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और
विभाग-नामके आठ गुणोंको स्वीकार करते हैं । परन्तु कार्य-भेदसे अनुमेय ईश्वरकी इच्छाओंके विषमरूप
होनेसे ईश्वरके नित्यत्वकी हानिको कौन दूर कर सकता है ? (अर्थात् यदि ईश्वर नित्य है, तो उसकी इच्छाएँ
भी सदा समान ही रहनी चाहिए । परन्तु संसारके नाना कार्योंको देखकर अनुमान होता है कि ईश्वरकी
इच्छाएँ भी नाना प्रकारकी (विषम) हैं, और ईश्वरकी इच्छाओंके विषम होनेसे ईश्वरको भी अनित्य
मानना चाहिए ।)
तथा, बुद्धिमान् पुरुषोंकी प्रवृत्ति स्वार्थ (किसी प्रयोजनसे) अथवा करुणाबुद्धिपूर्वक ही होती है ।
यहाँ प्रश्न होता है कि जगत्को सृष्टिमें ईश्वर स्वार्थसे प्रवृत्त होता है अथवा करुणासे ? स्वार्थसे ईश्वरकी
प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वह कृतकृत्य है । यह प्रवृत्ति करुणासे भी सम्भव नहीं, क्योंकि दूसरेके दुःखों-
को दूर करनेकी इच्छाको करुणा कहते हैं । परन्तु ईश्वरके सृष्टि रचनेसे पहले जीवोंके इन्द्रिय, शरीर और
विषयोंका अभाव था, इसलिये जीवोंके दुःख भी नहीं था, फिर किस दुखको दूर करनेकी इच्छासे ईश्वरके
करुणाका भाव उत्पन्न हुआ ? यदि कहो कि सृष्टिके बाद दुखी जीवोंको देखकर ईश्वरके करुणाका भाव
उत्पन्न होता है, तो इतरेतराश्रय नामका दोष आता है । क्योंकि करुणासे जगत्की रचना हुई, और जगत्की
रचनासे करुणा हुई । इस प्रकार ईश्वरके किसी भी तरह जगत्का कर्तृत्व सिद्ध नहीं होता ।
१. बुद्धीच्छाप्रयत्नसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाख्या अष्टौ गुणाः ।
६
४२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
तदेवमेवंविधदोषकलुषिते पुरुषविशेषे यस्तेषां सेवाहेवाकः स खलु केवलं बलवन्मोह-
विडम्बनापरिपाक इति । अत्र च यद्यपि मध्यवर्तिनो नकारस्य “घण्टालालान्यायेन” योज-
नादर्थान्तरमपि स्फुरति यथा इमाः कुहेवाकविडम्बनास्तेषां न स्युर्येषां त्वमनुशासक इति
तथापि सोऽर्थः सहृदयैर्न हृदये धारणीयः, अन्ययोगव्यवच्छेदस्याधिकृतत्वात् ॥ इति
काव्यार्थः ॥ ६ ॥
इस प्रकार अनेक दोषोंसे दूषित पुरुषविशेष ईश्वर को जगत्के कर्ता माननेका आग्रह केवल बलवान्
मोहकी विडम्बनाका ही फल है । 'इमाः कुहेवाकविडम्बनाः स्युस्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम्', यहाँ मध्यवर्ती
नकारका 'घण्टालालान्याय' से ( मध्यमणिन्याय अथवा देहलीदीपकन्याय या घण्टालालान्याय एक ही अर्थको
सूचित करते हैं । जैसे एक ही मणि, अथवा दीपक घरकी देहलीपर रखनेसे दोनों ओरकी वस्तुओंको प्रकाशित
करते हैं; अथवा एक ही घण्टा अपनी दोनों तरफ बजता है, उसी तरह यहाँ भी एक ही 'नकार' का दो तरह-
से अन्वय होता है ) श्लोकका दूसरा अर्थ भी निकलता है कि जिनके आप अनुशासक हैं, उनके कदाग्रहरूप
विडम्बनायें नहीं हैं । परन्तु यह अर्थ विद्वानोंको नहीं लेना चाहिये । क्योंकि यहाँ स्तुतिकारने अन्ययोग-
व्यवच्छेदका अवलम्बन लिया है ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥६॥
भावार्थ—इस श्लोकमें वैशेषिकोंके ईश्वरके स्वरूपका खण्डन किया गया है । वैशेषिकोंके अनुसार
ईश्वर ( १ ) जगत्का कर्ता है, ( २ ) एक है, ( ३ ) सर्वव्यापी है, ( ४ ) स्वतन्त्र है, और ( ५ ) नित्य है ।
( १ ) वैशेषिक—'पृथिवी, पर्वत आदि किसी बुद्धिमान् कर्ताके बनाये हुए हैं, क्योंकि ये कार्य हैं;
जो-जो कार्य होता है, वह किसी बुद्धिमान् कर्ताका बनाया हुआ देखा जाता है, जैसे घर । पृथिवी, पर्वत आदि
भी कार्य हैं, इसलिये ये भी किसी कर्ताके बनाये हुए हैं; जो किसी कर्ताका बनाया हुआ नहीं होता, वह कार्य
भी नहीं होता, जैसे आकाश' । जैन—( क ) उक्त अनुमान प्रत्यक्षसे बाधित है, क्योंकि हमें पृथिवी, पर्वत
आदिका कोई कर्ता दृष्टिगोचर नहीं होता । ( ख ) घटका दृष्टान्त विषम है । क्योंकि घटादि कार्य सशरीर
कर्ताके ही बनाये हुए देखे जाते हैं, तथा ईश्वरको अशरीर कर्ता माना गया है । तथा ईश्वरको सशरीर
माननेमें इतरेतराश्रय आदि अनेक दोष आते हैं ।
( २ ) वैशेषिक—ईश्वर एक है, क्योंकि अनेक ईश्वर होनेसे जगत्में एकरूपता और क्रम नहीं रह
सकता । जैन—उक्त मान्यता एकान्तरूपसे सत्य नहीं है । क्योंकि शहदके छत्ते आदि पदार्थोंको अनेक
मधुमक्खियां तैयार करती हैं, फिर भी छत्तेमें क्रम और एकरूपता देखी जाती है ।
( ३ ) वैशेषिक—ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है । जैन—ईश्वर सर्वव्यापी नहीं हो सकता, क्योंकि
उसके सर्वव्यापी होनेसे प्रमेय पदार्थोंके लिये कोई स्थान न रहेगा । ईश्वरका सर्वज्ञत्व भी किसी प्रमाणसे सिद्ध
नहीं हो सकता । क्योंकि स्वयं सर्वज्ञत्व प्राप्त किये बिना हम प्रत्यक्षसे ईश्वरका साक्षात् ज्ञान नहीं कर सकते ।
अनुमानसे भी हम ईश्वरको नहीं जान सकते, क्योंकि वह बहुत दूर हैं, इसलिए सर्वज्ञत्वसे सम्बद्ध किसी हेतुसे
उसका ग्रहण नहीं हो सकता । 'सर्वज्ञत्वके बिना जगत्की विचित्र रचना नहीं हो सकती'—इस अर्थापत्ति
प्रमाणसे भी सर्वज्ञत्व सिद्ध नहीं होता । क्योंकि जगत्की विचित्रताकी व्याप्ति सर्वज्ञत्वके साथ नहीं है । आगम
प्रमाणसे भी हम सर्वज्ञको नहीं जान सकते, क्योंकि वेद आदि आगम पूर्वापरविरोध आदि दोषोंसे युक्त हैं,
इसलिए आगम विश्वसनीय नहीं है ।
( ४ ) वैशेषिक—ईश्वर स्वतन्त्र है । जैन—यदि ईश्वर स्वतन्त्र है, तो वह दुःखोँसे परिपूर्ण
विश्वकी क्यों रचना करता है ? अन्यथा ईश्वरको क्रूर और निर्दय मानना चाहिये । यदि कहा जाय कि
१. मध्यमणिन्यायः, देहलीदीपकन्यायस्तद्वदेवाय घण्टालालान्याय उपयुज्यते ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ४३
अथ चैतन्यादयो रूपादयश्च धर्मा आत्मादेर्घटादेश्च धर्मिणोऽत्यन्तं व्यतिरिक्ता¹ अपि
समवायसम्बन्धेन² संबद्धाः सन्तो धर्मधर्मिव्यपदेशमश्नुवते तन्मतं दूषयन्नाह—
न धर्मधर्मित्वमतीवभेदे वृत्त्यास्ति चेन्न त्रितयं चकास्ति ।
इहेदमित्यस्ति मतिश्च वृत्तौ न गौणभेदोऽपि च लोकबाधः ॥७॥
धर्मधर्मिणोरतीवभेदे [ अतीवेत्यत्र इवशब्दो वाक्यालंकारे तं च प्रायोऽतिशब्दात्
किं वृत्ते च प्रयुञ्जते शाब्दिकाः, यथा-“आवर्जिता किञ्चिदिव स्तनाभ्याम्³, “उद्वृत्तः क इव
सुखावहः परेषाम्⁴” इत्यादि ] ततश्च धर्मधर्मिणोः अतीवभेदे-एकान्तभिन्नत्वेऽङ्गीक्रियमाणे,
स्वभावहानेर्धर्मधर्मित्वं न स्यात् । अस्य धर्मिण इमे धर्माः, एषां च धर्मानामयमाश्रयभूतो
धर्मी इत्येवं सर्वप्रसिद्धो धर्मधर्मिव्यपदेशो न प्राप्नोति । तयोरत्यन्तभिन्नत्वेऽपि तत्कल्पनायां
पदार्थान्तरधर्मानामपि विवक्षितधर्मधर्मित्वापत्तेः ॥
प्राणियोंके अदृष्टवलसे ही ईश्वर जीवोंको सुख-दुःख देता है, तो फिर कर्म-प्रधान ही सृष्टि माननी चाहिए,
ईश्वरको कर्त्ता माननेकी आवश्यकता नहीं ।
(५) वैशेषिक-ईश्वर नित्य है। जैन-सर्वथा नित्य ईश्वर सतत क्रियाशील है, अथवा
अक्रियाशील ? ईश्वरको सतत क्रियाशील माननेपर कोई कार्य कभी समाप्त ही नहीं हो सकेगा। तथा अक्रिया-
शील माननेपर ईश्वर जगत्का निर्माण नहीं कर सकता ।
'चैतन्य तथा रूप आदि धर्म, आत्मा तथा घट आदि धर्मियोंसे सर्वथा भिन्न हैं, तथा धर्म-धर्मीका
सम्बन्ध समवाय सम्बन्धसे होता हैं'-वैशेषिकोंकी इस मान्यताको सदोष सिद्ध करते हैं—
श्लोकार्थ-धर्म और धर्मीके सर्वथा भिन्न माननेपर 'यह धर्मी है', 'ये इस धर्मीके धर्म हैं' और
'यह धर्म-धर्मीमें सम्बन्ध करानेवाला समवाय है'-इस प्रकार तीन बातोंका अलग-अलग ज्ञान नहीं हो सकता ।
यदि कहो कि समवाय सम्बन्धसे परस्पर भिन्न धर्म और धर्मीका सम्बन्ध होता है, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि
जिस तरह हमें धर्म और धर्मीका ज्ञान होता है, वैसे समवायका ज्ञान नहीं होता । यदि कहो कि एक समवायको
मुख्य मानकर समवायमें समवायत्वको गौणरूपसे स्वीकार करेंगे, तो यह कल्पना मात्र है । तथा इसे माननेमें
लोकविरोध आता है ।
व्याख्यार्थ - 'धर्मधर्मिणोरतीवभेदे' [यहाँ अतीवमें 'इव' शब्द वाक्यके अलंकारमें प्रयुक्त हुआ है,
इसका कोई अर्थ नहीं है । शाब्दिक लोग 'इव' शब्दका 'अति' और 'किम्' शब्दके साथ प्रयोग करते हैं;
जैसे—“आवर्जिता किंचिदिव स्तनाभ्यां'', ''उद्वृत्तः क इव सुखावहः परेषाम्”] धर्म और धर्मीका एकान्त
भेद माननेपर, स्वभावका अभाव हो जाने से धर्मत्व और धर्मित्व नहीं बनता, इसलिये इस धर्मीके ये धर्म
हैं, और इन धर्मोंका आश्रय यह धर्मी है, इस प्रकारका व्यवहार नहीं हो सकता । धर्म-धर्मीको सर्वथा भिन्न
मानकर भी यदि धर्म-धर्मी भावकी कल्पना की जायगी, तो एक पदार्थके धर्म दूसरे पदार्थके धर्म हो जाया
करेंगे । (वैशेषिक लोग द्रव्य (धर्मी) और गुण (धर्म) को सर्वथा भिन्न मानते हैं । उनके अनुसार उत्पन्न
होनेके प्रथम क्षणमें द्रव्य गुणोंसे रहित होता है। जैनदर्शनके अनुसार, धर्म और धर्मीका एकान्त-भेद सम्भव
नहीं है, क्योंकि एकान्त-भेद माननेमें एक पदार्थका धर्म दूसरे पदार्थका धर्म हो जाना चाहिये । जैसे अग्निका
उष्णत्व धर्म अग्निसे और जलका शीतत्व धर्म जलसे सर्वथा भिन्न हो तो अग्निके उष्णत्व धर्मका जलके साथ
और जलके शीतत्व धर्मका अग्निके साथ सम्बन्ध हो जाना चाहिये, क्योंकि धर्म और धर्मी सर्वथा भिन्न हैं।)
१. उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं निष्क्रियं च तिष्ठतीति समयात् गुणानां गुणिनो व्यतिरिक्तत्वम् ।
२. 'अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः संबन्ध इहप्रत्ययेहेतुः स समवायः' इति प्रशस्तपादभाष्ये
समवायप्रकरणे । ३. कुमारसम्भवमहाकाव्ये ३-५४ । ४. शिशुपालवधमहाकाव्ये ।
४४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
एवमुक्ते सति परः प्रत्यवतिष्ठते । वृत्त्यास्तीति-अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानामिह-
प्रत्ययहेतुतः सम्बन्धः समवायः। स च समवयनात् समवाय इति द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषेषु
पञ्चसु पदार्थेषु वर्तनाद् वृत्तिरिति चाख्यायते । तया वृत्त्या समवायसम्बन्धेन, तयोधर्म-
धर्मिणोः इतरेतरविनिर्लुठितत्त्वेऽपि धर्मधर्मिव्यपदेश इष्यते । इति नानन्तरोक्तो दोष इति ।।
अत्राचार्यः समाधत्ते । चेदिति । यद्येवं तव मतिः सा प्रत्यक्षप्रतिक्षिप्ता । यतो न त्रितयं
चकास्ति । अयं धर्मी, इमे चास्य धर्माः, अयं चैतत्सम्वन्धनिबन्धनं समवाय इत्येतत् त्रितयं-
वस्तुत्रयं, न चकास्ति-ज्ञानविषयतया न प्रतिभासते । यथा किल शिलाशकलयुगलस्य मिथोऽनु-
संधायकं रालादिद्रव्यं तस्मात् पृथक् तृतीयतया प्रतिभासते, नैवमत्र समवायस्यापि प्रतिभा-
सनम्, किन्तु द्वयोरेव धर्मधर्मिणोः इति शपथप्रत्यायनीयोऽयं समवाय इति भावार्थः ॥
किञ्च, अयं तेन वादिना एको नित्यः सर्वव्यापकोऽमूर्तश्च परिकल्पते । ततो यथा
घटाश्रिताः पाकजरूपादयो धर्माः समवायसम्बन्धेन घटे समवेतास्तथा किं न पटेऽपि ।
तस्यैकत्वनित्यत्वव्यापकत्वैः सर्वत्र तुल्यत्वात् ।।
यथाकाश एको नित्यो व्यापकोऽमूर्तश्च सन् सर्वैः सम्बन्धिभिर्युगपदविशेषेण सम्बध्यते,
तथा किं नायमपीति । विनश्यदेकवस्तुसमवायाभावे च समस्तवस्तुसमवायाभावः प्रसज्यते ।
तत्तदवच्छेदकभेदाद् नायं दोष इति चेत्, एवमनित्यत्वापत्तिः । प्रतिवस्तुस्वभावभेदादिति ।
वैशेषिक—हम वृत्ति ( समवाय ) से धर्म और धर्मीमें सम्बन्ध मानते हैं । अयुतसिद्ध ( एक दूसरेके
विना न रहनेवाले ) आधार्य ( पट ) और आधार ( तन्तु ) पदार्थोंका इहप्रत्यय हेतु ( इन तन्तुओंमें पट है )
सम्बन्ध 'समवाय' है । समवायसे पदार्थोंमें सम्बन्ध होता है, इसलिये इसे समवाय कहते हैं । यह समवाय
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन पाँच पदार्थोंमें रहता है, इसलिये इसे वृत्ति भी कहते हैं। समवाय
सम्बन्धसे सर्वथा भिन्न धर्म और धर्मीमें धर्म-धर्मीका व्यवहार होता है। (यह समवाय अवयव-अवयवी, गुण-
गुणी, क्रिया-क्रियावान्, जाति-व्यक्ति, नित्यद्रव्य और विशेषमें रहता है ।)
जैन—उक्त मान्यता प्रत्यक्षसे बाधित है । क्योंकि हमें 'यह धर्मी है', 'ये इस धर्मीके धर्म' और 'यह
धर्म-धर्मीमें सम्बन्ध करानेवाला समवाय है'—इस प्रकार तीन पदार्थोंका अलग-अलग ज्ञान नहीं होता । जिस
प्रकार एक पत्थरके दो टुकड़ोंको परस्पर जोड़नेवाले राल आदि पदार्थ पत्थर के दो टुकड़ोंसे अलग दिखाई
देते हैं, उस तरह धर्म और धर्मीका सम्बन्ध करानेवाला समवाय कोई अलग पदार्थ प्रत्यक्षसे दृष्टिगोचर नहीं
होता । हमें केवल धर्म और धर्मीका ही प्रतिभास होता है । इसलिये धर्म-धर्मी सम्बन्ध करानेवाला समवाय
कोई अलग पदार्थ नहीं है ।
तथा, वैशेषिक लोग समवायको एक, नित्य, सर्वव्यापक और अमूर्त स्वीकार करते हैं । इसलिये
घटके अग्निमें पकानेसे उत्पन्न होनेवाले रूप आदि धर्म यदि समवाय सम्बन्धसे घटमें रहते हैं, तो ये रूप
आदि पटमें भी क्यों नहीं रहते ? क्योंकि समवाय एक, नित्य और व्यापक होनेसे सर्वत्र विद्यमान है । अतएव
समवाय-सम्बन्धसे घटमें रहनेवाले धर्म पटमें भी रहने चाहिए; क्योंकि घटधर्म समवाय और पटधर्म समवाय
दोनों ही एक, नित्य, व्यापक और अमूर्त हैं ।
जैसे एक, नित्य, व्यापक और अमूर्त आकाश एक ही साथ सब सम्बन्धियोंसे समानरूपसे सम्बद्ध होता
है, उसी तरह समवाय भी सब सम्बन्धियोंसे समानरूपसे ही क्यों सम्बद्ध नहीं होता ? तथा, घटके नष्ट होने-
पर घटके समवायका अभाव हो जाता है, इसलिए समवायका ही सर्वथा अभाव मानना चाहिए । क्योंकि
समवाय एक है, इसलिए घटके नष्ट होनेसे नष्ट होनेवाले घट-समवायका फिर कभी सद्भाव ही नहीं होगा ।
यदि वैशेषिक लोग कहें कि समवाय वास्तवमें एक ही है, लेकिन वह घटत्वावच्छेदक-समवाय, पटत्वावच्छेदक-
समवाय आदि भिन्न-भिन्न अवच्छेदकोंके भेदसे घट, पट आदि भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें रहता है, इसलिए घट-
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ४५
अथ कथं समवायस्य न ज्ञाने प्रतिभासनम् यतस्तस्येहेतिप्रत्ययः सावधानं साधनम् ।
इह प्रत्ययाश्चानुभवसिद्ध एव । इह तन्तुषु पटः, इहात्मनि ज्ञानम्, इह घटे रूपादय इति
प्रतीतेरुपलम्भात् । अस्य च प्रत्ययस्य केवलधर्मधर्म्यनालम्बनत्वादस्ति समवायाख्यं पदार्था-
न्तरं तद्धेतुरिति पराशङ्कामभिसन्धाय पुनराह । 'इहेदमित्यस्ति मतिश्च वृत्ताविति ।' इहेद-
मिति-इहेदमिति आश्रयाश्रयिभावहेतुक इहप्रत्ययो वृत्तावप्यस्ति-समवायसंबन्धेऽपि विद्यते ।
चशब्दोऽपिशब्दार्थः । तस्य च व्यवहितः सम्बन्धस्तथैव च व्याख्यातम् ॥
इदमत्र हृदयम् । यथा तन्मते पृथिवीत्वाभिसंबन्धात् पृथिवी, तत्र पृथिवीत्वं पृथिव्या
एव स्वरूपमस्तित्वाख्यं नापरं वस्त्वन्तरम् । तेन स्वरूपेणैव समं योऽसावभिसम्बन्धः पृथिव्याः
स एव समवाय इत्युच्यते । “प्राप्तानामेव प्राप्तिः समवायः” इति वचनात् । एवं समवाय-
त्वाभिसम्बन्धात् समवाय इत्यपि किं न कल्प्यते । यतस्तस्यापि यत् समवायत्वं स्वस्वरूपं,
तेन सार्धं सम्बन्धोऽस्त्येव । अन्यथा निःस्वभावत्वात् शशविषाणवद्वस्तुत्वमेव भवेत् ।
ततश्च इह समवाये समवायत्वमित्युल्लेखेन इहप्रत्ययः समवायेऽपि युक्त्या घटत एव । ततो
यथा पृथिव्यां पृथिवीत्वं समवायेन समवेतं, एवं समवायेऽपि समवायत्वं समवायान्तरेण
सम्बन्धनीयम्, तदप्यपरेण, इत्येवं दुस्तरानवस्थामहानदी ॥
एवं समवायस्यापि समवायत्वाभिसम्बन्धे युक्त्या उपपादिते साहसिक्यमालम्ब्य पुनः
पूर्वपक्षवादी वदति । ननु पृथिव्यादीनां पृथिवीत्वाद्यभिसम्बन्धनिबन्धनं समवायो मुख्यः ।
त्वावच्छेदक-समवायके नाश होनेसे पटत्वावच्छेदक-समवायका नाश नहीं होता, यह भी ठीक नहीं। क्योंकि
इस तरह प्रत्येक वस्तुके साथ समवायके स्वभावका भेद होनेसे समवाय अनित्य ठहरेगा ।
वैशेषिक—आप कैसे कह सकते हैं कि समवायका ज्ञान नहीं होता ? 'इहप्रत्य' ( इन तन्तुओंमें पट
है ) समवायके ज्ञान करानेमें प्रबल साधन है 'इन तन्तुओंमें पट है,' 'इस आत्मामें ज्ञान है,' 'इस घटमें रूप
आदि हैं'—यह 'इहप्रत्यय' अनुभवसे सिद्ध है। यह 'इहप्रत्यय' केवल धर्म और धर्मीके आधारसे नहीं होता,
इस कारण धर्म-धर्मीसे भिन्न 'इहप्रत्यय'का हेतु समवाय अवश्य मानना चाहिए । इस प्रकार दूसरोंकी शंकाको
लक्ष्य करके यहाँ फिरसे कहा गया है—'यहाँ यह है, इस प्रकारकी बुद्धि समवायमें होती है।' 'यहाँ यह
है'—इस प्रकारके आश्रयाश्रियभावके कारण व्यक्त होनेवाला इहप्रत्यय समवायमें भी होता है । 'च' शब्द-
का अर्थ 'अपि' है । इसका सम्बन्ध व्यवहित है ।
जैन—धर्म ( आश्रयी ) और धर्मी ( आश्रय ) में 'इहप्रत्यय' हेतु समवाय सम्बन्ध ठीक नहीं बनता ।
क्योंकि धर्म और धर्मीका हेतु 'इहप्रत्यय' समवाय सम्बन्धमें भी रहता है । वैशेषिकोंके मतमें पृथिवीत्वके
सम्बन्धसे पृथिवीका ज्ञान होता है, तथा पृथिवीत्व ही पृथिवीका अस्तित्व नामक स्वभाव है । इसी
पृथिवीत्वके साथ पृथिवीके सम्बन्धको समवाय कहते हैं । कहा भी है—"प्राप्त पदार्थोंकी प्राप्ति ही
समवाय है।" इसी तरह वैशेषिक लोग समवायत्वके सम्बन्धसे ही समवाय क्यों नहीं मानते ? क्योंकि सम-
वायत्व समवायका स्वभाव है, और समवायका समवायत्वके साथ सम्बन्ध है । अन्यथा यदि समवायत्वको
समवायका स्वभाव नहीं मानोगे, तो समवायको स्वाभावरहित मानना होगा, और स्वाभावरहित होनेसे खर-
गोशके सींगकी तरह समवाय अवस्तु ठहरेगा । इसलिए 'समवायमें समवायत्व हैं'—यह 'इहप्रत्यय' समवायमें
भी युक्तिसे सिद्ध होता है । अतएव जिस प्रकार पृथिवीमें पृथिवीत्व समवाय सम्बन्धसे है, वैसे ही समवायमें
समवायत्व दूसरे समवायसे, दूसरेमें तीसरेसे—इस प्रकार एक समवायकी सिद्धिमें अनन्त समवाय माननेसे
अनवस्था दोष आता है ।
इस प्रकार समवायका भी समवायत्वके साथ होने वाले सम्बन्धकी युक्तिसे सिद्धि की जानेपर साहसका
अवलम्बन करके पूर्वपक्षवादी ( वैशिषिक ) पुनः कहता है : समवाय मुख्य और गौणके भेदसे दो प्रकारका है ।
पृथिवीमें पृथिवीत्व मुख्य-समवाय सम्बन्धसे रहता है। इस मुख्य-समवायका ज्ञान 'त्व', 'तल' आदि प्रत्ययोंसे