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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

अन्य. यो. व्य. श्लोक ११ ] स्याद्वादमञ्जरी १०१
इति वचनात् । यथा बलवदादेर्ज्वरिणो लङ्घनं, क्षीणधातोस्तु तद्विपर्ययः । एवं देशाद्यपेक्षया
ज्वरिणोऽपि दधिपानादि योज्यम् । तथा च वैद्याः—
“कालाविरोधि निर्दिष्टं ज्वरादौ लङ्घनं हितम् ।
ऋतेऽनिलश्रमक्रोधशोककामकृतज्वरान् ॥”
एवं च यः पूर्वमपथ्यपरिहारो, यत्र तत्रैवावस्थान्तरे तस्यैव परिभोगः । स खलूभयो-
रपि तस्यैव रोगस्य शमनार्थः । इति सिद्धमेकविषयकत्वमुत्सर्गापवादयोरिति ॥
भवतां चोत्सर्गोऽन्यार्थः अपवादश्चान्यार्थः “न हिंस्यात् सर्वभूतानि” इत्युत्सर्गो हि
दुर्गतिनिषेधार्थः । अपवादस्तु वैदिकहिंसाविधिर्देवताऽतिथिपितृप्रीतिसंपादनार्थः । अतश्च
परस्परनिरपेक्षत्वे कथमुत्सर्गोऽपवादेन बाध्यते । “तुल्यबलयोर्विरोध” इति न्यायात् । भिन्ना-
र्थत्वेऽपि तेन तद्बाधने अतिप्रसङ्

१०२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
अत्राग्निकार्यशब्दवाच्यस्य यागादिविधेरुपयान्तरैरपि लभ्यानां संपदामेव हेतुत्वं
वदन्नाचार्यः तस्य सुगतिहेतुत्वमर्थात् कदर्थितवानेव । तथा च स एव भावाग्निहोत्रं ज्ञान-
पालीत्यादिश्लोकैः स्थापितवान् ॥
तदेवं स्थिते तेषां वादिनां चेष्टामुपमया दूषयति स्वपुत्रेत्यादि । परेषां भवत्प्रणीतवचन-
पराङ्मुखानां स्फुरितं—चेष्टितम्, स्वपुत्रघाताद् नृपतित्वलिप्ससब्रह्मचारिनिजसुतनिपातेन
राज्यप्राप्तिमनोरथसदृशम् । यथा किल कश्चिदविपश्चित् पुरुषः परुषाशयतया निजमङ्गजं
व्यापाद्य राज्यश्रियं प्राप्तुमीहते । न च तस्य तत्प्राप्तावपि पुत्रघातपातककलङ्कपङ्कः क्वचिद-
पयाति । एवं वेदविहितहिंसया देवतादिप्रीतिसिद्धावपि, हिंसासमुत्थं दुष्

अन्य. यो. व्य. श्लोक १२ ] स्याद्वादमञ्जरी १०३
सांप्रतं नित्यपरोक्षज्ञानवादिनां मीमांसकभेदभट्टानाम् एकात्मसमवायिज्ञानान्तरवेद्य-
ज्ञानवादिनां च यौगानां मतं विकुट्टयन्नाह-
स्वार्थावबोधक्षम एव बोधः प्रकाशते नार्थकथान्यथा तु ।
परे परेभ्यो भयतस्तथापि प्रपेदिरे ज्ञातमनात्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥
बोधो—ज्ञानं, स च स्वार्थावबोधक्षम एव प्रकाशते । स्वस्य—आत्मस्वरूपस्य, अर्थस्य
च पदार्थस्य योऽवबोधः—परिच्छेदस्तत्र, क्षम एव—समर्थ एव प्रतिभासते इत्ययोगव्यवच्छेदः।
प्रकाशत इति क्रियया अवबोधस्य प्रकाशरूपत्वसिद्धेः सर्वप्रकाशानां स्वार्थप्रकाशकत्वेन,
होनेवाले सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति जैसे महान् पुण्यके सामने वह नगण्य है । जिस प्रकार कोई वैद्य रोगीको अच्छा
करनेके लिये नश्तर लगाना, लंघन कराना आदि दुख रूप क्रियाओंको करता हुआ भी अपने शुभ परिणामोंके
कारण पुण्यका ही भागी होता है, उसी तरह जिन मन्दिरोंका निर्माण शुभ परिणामोंसे अनन्त सुखकी प्राप्तिके
लिये ही किया जाता है। तथा, वेदोक्त हिंसा स्वर्गकी प्राप्तिमें कारण नहीं होती। क्योंकि वध-स्थलपर ला कर
इकट्ठे किये हुए पशुओंका करुणापूर्ण आक्रन्दन अशुभ गतिका ही कारण होता है। तथा, आप लोगोंने स्वयं
यम, नियमादिको स्वर्ग पानेमें कारण बताया है। तथा, यदि यज्ञमें वध किये हुए सब पशुओंको स्वर्ग
मिलने लगे, तो संसारके सभी हिंसकोंको स्वर्ग मिल जाना चाहिये। अतएव सांख्य मतके अनुयायियोंने
कहा है—“यदि पशुओंको मारकर, उनके रक्तसे पृथ्वी मण्डलको सींचकर, स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है, तो
फिर नरक जानेके लिये और भी महा भयंकर पाप करने चाहिये ।” तथा यदि छोटे-छोटे मूक पशुओंके वधसे
स्वर्ग मिल सकता है, तो अपने प्रिय माता-पिताकी यज्ञमें आहुति देनेसे मोक्ष मिलना चाहिये ।
शंका—वाक्य सामान्य और अपवादके भेदसे दो प्रकारके होते हैं । जैसे, 'न हिंस्यात् सर्वभूतानि,'
अर्थात् किसी प्राणीको मत मारो, यह सामान्य वाक्य है, और 'वेदोक्त हिंसा पुण्यका कारण होती है,' यह
अपवाद वाक्य है । सामान्य और अपवाद वाक्योंमें अपवाद वाक्य विशेष बलवान् होता है, इसलिये वेदोक्त
हिंसामें पाप नहीं है। समाधान—सामान्य और अपवाद दोनों वाक्य एक ही भावके द्योतक होने चाहिये,
परन्तु प्रस्तुत प्रसंगमें अपवाद वाक्य देवता, अतिथि और पितरोंको प्रसन्न करनेके लिये है, और सामान्य
वाक्य पाप और उसके फलको दूर करनेके लिये बताया गया है। तथा, देवता आदिको प्रसन्न करनेके लिये
हिंसाके अतिरिक्त अन्य दूसरे उपाय आपके शास्त्रोंमें भी बतलाये हैं, फिर आप हिंसात्मक उपायोंका ही क्यों
समर्थन करते हैं।
(२) इस लोकमें ब्राह्मणोंको खिलाया हुआ भोजन किसी भी तरह मृत प्राणियोंको तृप्त नहीं कर
सकता। इसलिये श्राद्ध करना भी धर्म नहीं है ( देखिये व्याख्या ) ।
( ३ ) वर्णात्मक वेद तालु आदिसे उत्पन्न होता है, और तालु आदि स्थान पुरुषके ही संभव हैं।
तथा, श्रुतिके तात्पर्यको समझानेके लिये भी किसी वक्ताकी आवश्यकता है, अतएव वेदको पौरुषेय मानना ही
युक्तियुक्त है।
अब ज्ञानको प्रत्यक्ष न मान कर उसे नित्य परोक्ष माननेवाले भट्ट मीमांसक, तथा एक ज्ञानको अन्य
ज्ञानोंसे संवेद्य स्वीकार करनेवाले न्याय-वैशेषिक लोगोंके मतको दूषित सिद्ध करते हुए कहते हैं—
श्लोकार्थ—ज्ञान अपनेको और दूसरे पदार्थोंको जाननेमें समर्थ ही है। यदि वह स्वरूप-प्रकाशक न
हो तो पदार्थ सम्बन्धी कथन प्रकट नहीं हो सकता। तथापि ज्ञानके स्वपर-प्रकाशक होने पर भी पूर्वपक्ष
वादियोंके भयसे अन्य लोग ज्ञानको आत्मनिष्ठ स्वीकार नहीं करते ।
व्याख्यार्थ—जिस प्रकार दीपक अपने और दूसरे पदार्थोंको प्रकाशित करता है, वैसे ही ज्ञान निज
और पर पदार्थोंको जानता है। यदि ज्ञानको स्वसंविदित न माना जाय, तो पदार्थोंकी अस्ति-नास्ति रूप
व्यवस्था नहीं बन सकती । क्योंकि यदि ज्ञान स्वसंवेदन रूप नहीं हो, तो एक ज्ञानके जाननेके लिये दूसरा

१०४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १२
बोधस्यापि तत्सिद्धिः । विपर्यये दूषणमाह । नार्थकथान्यथा त्विति । अन्यथेति—अर्थप्रकाशने
ऽविवादाद्, ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वानभ्युपगमेऽर्थकथैव न स्यात् । अर्थकथा—पदार्थसम्बन्धिनी
वार्ता, सदसद्रूपात्मकं स्वरूपमिति यावत् । तुशब्दोऽवधारणे भिन्नक्रमश्च स चार्थकथया सह
योजित एव । यदि हि ज्ञानं स्वसंविदितं नेष्यते, तदा तेनात्मज्ञानाय ज्ञानान्तरमपेक्षणीयं
तेनाप्यपरमित्याद्यनवस्था । ततो ज्ञानं तावत् स्वावबोधनव्यग्रतामग्नम् । अर्थस्तु जडतया
स्वरूपज्ञापनासमर्थ इति को नामार्थस्य कथामपि कथयेत् । तथापि एवं ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वे
युक्त्या घटमानेऽपि, परे—तीर्थान्तरीयाः, ज्ञानं—कर्मतापन्नम्, अनात्मनिष्ठं—न विद्यते
आत्मनः स्वस्य निष्ठा निश्चयो यस्य तदनात्मनिष्ठम्, अस्वसंविदितमित्यर्थः, प्रपेदिरे—प्रपन्नाः
कुतः इत्याह । परेभ्यो भयतः, परे—पूर्वपक्षवादिनः, तेभ्यः सकाशात् ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वं
नोपपद्यते, स्वात्मनि क्रियाविरोधादित्युपालम्भसम्भावनासम्भवं यद्भयं तस्मात् तदाश्रित्ये-
त्यर्थः ॥
इत्थमक्षरगमनिकां विधाय भावार्थः प्रपञ्च्यते । भाट्टास्तावदिदं वदन्ति । यत् ज्ञानं
स्वसंविदितं न भवति, स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । न हि सुशिक्षितोऽपि नटबटुः स्वस्कन्धम-
धिरोढुं पटुः, न च सुतीक्ष्णाप्यसिधारा स्वं छेत्तुमाहितव्यापारा । ततश्च परोक्षमेव ज्ञानमिति ।
तदेतन्न सम्यक् । यतः किमुत्पत्तिः स्वात्मनि विरुध्यते ज्ञप्तिर्वा ? यद्युत्पत्तिः सा विरुध्यताम् ।
नहि वयमपि ज्ञानमात्मानमुत्पादयतीति मन्यामहे । अथ ज्ञप्तिः नेयमात्मनि विरुद्धा । तदात्म-
नैव ज्ञानस्य स्वहेतुभ्य उत्पादात् । प्रकाशात्मनेव प्रदीपालोकस्य । अथ प्रकाशात्मैव प्रदीपालोक
उत्पन्न इति परप्रकाशोऽस्तु । आत्मानमप्येतावन्मात्रेणैव प्रकाशयतीति कोऽयं न्यायः इति चेत्,
तत्किं तेन वराकेणाप्रकाशितेनैव स्थातव्यम्, आलोकान्तराद् वास्य प्रकाशेन भवितव्यम् ।
प्रथमे प्रत्यक्षबाधः । द्वितीयेऽपि सैवानवस्थापत्तिश्च ॥
और दूसरेके लिये तीसरे ज्ञानकी आवश्यकता होनेसे अनवस्था दोष मानना पड़ेगा । इसलिये जब ज्ञान ही
अपने आपको नहीं जान सकता, तो फिर जड़ रूप पदार्थोके ज्ञान कैसे हो सकता है ? अतएव पदार्थके विषयमें
कोई बात करना भी असंभव हो जायगा । इस प्रकार युक्तिसे ज्ञानके स्वसंवेदन रूप सिद्ध होनेपर भी 'आत्मामें
क्रियाके विरोध होनेसे ज्ञान स्वप्रकाशक नहीं हो सकता'—दूसरे वादियोंके इस उपालंभके भयसे भट्टमतके
अनुयायी ज्ञानको स्वप्रकाशक नहीं मानते ।
भट्ट मीमांसक—ज्ञान स्वप्रकाशक नहीं होता, वह पहले नहीं जाने हुए पदार्थोंको ही जानता है ।
प्रकाश होना क्रिया है, इसलिये कोई भी क्रिया स्वयं ही अपना विषय नहीं हो सकती । जैसे चतुरसे चतुर नट
भी स्वयं अपने कंधेपर नहीं चढ़ सकता, तथा पैनीसे पैनी तलवारकी धार भी अपने आपको नहीं काट सकती,
वैसे ही ज्ञानमें भी क्रिया होना संभव नहीं है, अतएव ज्ञान परोक्ष ही है । जैन—यह ठीक नहीं । हम पूछते
हैं, ज्ञानमें ज्ञानकी उत्पत्ति होनेसे विरोध आता है ? अथवा ज्ञानमें जाननेकी क्रियाकी ( ज्ञप्तिकी ) उत्पत्ति
होनेमें विरोध आता है ? यदि ज्ञानमें ज्ञानकी उत्पत्ति होनेमें विरोध आता है तो भले ही आ जाय ।
ज्ञान अपने आपको उत्पन्न करता है, ऐसा हम भी नहीं मानते । यदि ज्ञानमें जाननेकी क्रियाकी उत्पत्ति
होनेमें विरोध आता है तो यह जाननेकी क्रियाकी ज्ञानमें उत्पत्ति होना विरुद्ध नहीं है । क्योंकि जिस प्रकार
प्रकाशात्मक रूपसे ही प्रदीपका प्रकाश उत्पन्न होता है, उसी प्रकार जाननेकी क्रिया रूपसे ही ज्ञान अपने
हेतुओंसे उत्पन्न होता है । शंका—प्रकाशात्मक रूपसे उत्पन्न प्रदीपका आलोक दूसरे पदार्थोंको प्रकाशित
करने वाला भले ही हो, लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपने आपको भी प्रकाशित करता
है । समाधान—यदि ऐसी बात है तो उस विचारेको अप्रकाशित ही रहना चाहिये, अथवा किसी अन्य
प्रकाशसे प्रकाशित होना चाहिये । प्रथम पक्षमें प्रत्यक्षसे बाधा आती है । द्वितीय पक्षमें वही अनवस्था दोष
उपस्थित होता है ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १२ ] स्याद्वादमञ्जरी १०५
अथ नासौ स्वमपेक्ष्य कर्मतया चकास्तीत्यस्वप्रकाशकः स्वीक्रियते, आत्मानं न प्रकाश-
यतीत्यर्थः । प्रकाशरूपतया तूत्पन्नत्वात् स्वयं प्रकाशत एवेति चेत्, चिरञ्जीव । न हि वयमपि
ज्ञानं कर्मतयैव प्रतिभासमानं स्वसंवेद्यं ब्रूमः । ज्ञानं स्वयं प्रतिभासत इत्यादावकर्मकस्य तस्य
चकासनात् । यथा तु ज्ञानं स्वं जानामीति कर्मतयापि तद्भाति, तथा प्रदीपः स्वं प्रकाशयतीत्य-
यमपि कर्मतया प्रथित एव ॥
यस्तु स्वात्मनि क्रियाविरोधो दोष उद्भावितः सोऽयुक्तः । अनुभवसिद्धेऽर्थे विरोधो-
सिद्धेः । घटमहं जानामीत्यादौ कर्तृकर्मवद् ज्ञप्तेरप्यवभासमानत्वात् । न चाप्रत्यक्षोपलम्भ-
स्यार्थदृष्टिः प्रसिध्यति । न च ज्ञानान्तरात् तदुपलम्भसम्भावना, तस्याप्यनुपलब्धस्य प्रस्तुतो-
पलम्भप्रत्यक्षीकाराभावात् । उपलम्भान्तरसम्भावने चानवस्था । अर्थोपलम्भात् तस्योपलम्भे
अन्योन्याश्रयदोषः ॥
अथार्थप्राकट्यमन्यथा नोपपद्येत यदि ज्ञानं न स्यात्, इत्यर्थापत्त्या२ तदुपलम्भ इति
चेत् । न । तस्या अपि ज्ञापकत्वेनाज्ञाताया ज्ञापकत्वायोगात् । अर्थापत्त्यन्तरान तज्ज्ञानेऽनव-
स्थेतरेतराश्रयदोषापत्तेः तदवस्थः परिभवः । तस्मादर्थोन्मुखतयेव स्वोन्मुखतयाऽपि ज्ञानस्य
प्रतिभासात् स्वसंविदितत्वम् ॥
शंका—अपनी अपेक्षा करके यह प्रदीप कर्म रूपसे प्रकाशमान नहीं होता, अतः अस्वप्रकाशक
रूपसे स्वीकृत होता है, अर्थात् वह अपने आपको प्रकाशित नहीं कर सकता; प्रकाश रूपसे उत्पन्न होनेसे
वह स्वयं प्रकाशमान होता ही है । समाधान—यदि ऐसी बात है तो ज्ञान कर्म रूपसे ही प्रकाशमान होनेसे
स्वसंवेद्य होता है, ऐसा हम भी नहीं मानते । क्योंकि 'ज्ञान स्वयं प्रकाशमान होता है' इस वाक्यमें भी
कर्मरूप न होनेवाला ज्ञानका प्रकाश होता है । जिस प्रकार 'ज्ञान अपने आपको जानता है' इस प्रकार कर्म
रूपसे वह भासित होता है, वैसे ही 'प्रदीप अपने आपको प्रकाशित करता है' इस प्रकार प्रदीप भी कर्म रूपसे
प्रकट होता है ।
ज्ञानमें स्वसंवेदन क्रियाका सद्भाव होनेसे जो विरोध रूप दोष बताया गया है, वह भी ठीक नहीं ।
क्योंकि अनुभवसे सिद्ध पदार्थोंमें यह विरोध नहीं देखा जाता । जिस प्रकार 'मैं घटको जानता हूँ' इत्यादि
प्रयोगोंमें कर्ता और कर्मका ज्ञान होता है, उसी तरह जाननेकी क्रियाका ज्ञान भी अवभासित होनेसे विरोध
रहित है । जो ज्ञान स्वयंको नहीं जानता उस ज्ञान द्वारा ज्ञेयार्थको जानना सिद्ध नहीं होता । किसी अन्य
ज्ञान द्वारा उस अज्ञात ज्ञानको जाननेकी संभावना नहीं, क्योंकि अज्ञात रूप अन्य ज्ञान प्रस्तुत अज्ञात ज्ञानको
प्रत्यक्ष रूपसे नहीं जान सकता । उस अज्ञात रूप अन्य ज्ञानको जानने वाले अन्य ज्ञानकी कल्पना करने
पर अनवस्था दोष आता है । ज्ञेयार्थका ज्ञान होने पर ज्ञातृज्ञानका ज्ञान होता है, इस सिद्धांतके माननेसे
अन्योन्याश्रय दोष आता है । क्योंकि ज्ञेयार्थका ज्ञान होने पर ज्ञातृज्ञानका ज्ञान होगा और ज्ञातृज्ञान होने पर
ज्ञेयार्थका ज्ञान हो सकेगा ।
भट्टमीमांसक—यदि अर्थ ( घट ) का ज्ञान न हुआ तो उस अर्थज्ञान ( घटज्ञान ) के अभावमें
अर्थ ( घट ) की प्रकटता नहीं होगी, अतएव अर्थापत्तिसे अर्थ-( घट ) ज्ञातृज्ञान जाना जाता है । जैन—यह
भी ठीक नहीं । क्योंकि जिसे अपना ज्ञापकत्व स्वरूप अज्ञात होता है, ऐसी अर्थापत्तिका ज्ञापकत्व ( अर्थज्ञातृ-
ज्ञापकत्व ज्ञान ) घटित नहीं होता । अन्य अर्थापत्ति ज्ञानसे प्रकृत अर्थापत्तिके ज्ञापकत्व स्वरूपका ज्ञान होने
पर अनवस्था और इतरेतराश्रय दोष आ जानेसे दोषापत्ति जैसी की तैसी बनी रहती है । अतएव जिस प्रकार
ज्ञान ज्ञेयार्थके उन्मुख होता है, उसी प्रकार स्वोन्मुख भी होनेसे उसका स्वसंविदितत्व सिद्ध होता है ।
१. न हि दृष्टेऽनुपपन्नं नामेति न्यायात् ।
२. 'पुष्टो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते' इति वाक्ये पुष्टत्वान्यथानुपपत्

१०६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १२
नन्वनुभूतेरनुभाव्यत्वे घटादिवदननुभूतित्वप्रसङ्गः । प्रयोगस्तु ज्ञानमनुभवरूपम-
प्यनुभूतिर्न भवति, अनुभाव्यत्वाद्, घटवत्, अनुभाव्यं च भवद्भिरिष्यते ज्ञानं, स्वसंवेद्यत्वात् ।
नैवम् । ज्ञातुर्ज्ञातृत्वेनेवानुभूतेरनुभूतित्वेनैवानुभवात् । न चानुभूतेरनुभाव्यत्वं दोषः । अर्था-
पेक्षयानुभूतित्वात्¹ स्वापेक्षया चानुभाव्यत्वात् । स्वपितृपुत्रापेक्षयैकस्य पुत्रत्वपितृत्ववद्
विरोधाभावात् ॥
अनुमानाच्च स्वसंवेदनसिद्धिः । तथाहि । ज्ञानं स्वयं प्रकाशमानमेवार्थं प्रकाशयति,
प्रकाशकत्वात्, प्रदीपवत् । संवेदनस्य प्रकाश्यत्वात् प्रकाशकत्वमसिद्धमिति चेत् । न । अज्ञान-
निरासादिद्वारेण प्रकाशकत्वोपपत्तेः ॥
ननु नेत्रादयः प्रकाशका अपि स्वं न प्रकाशयन्तीति प्रकाशकत्वहेतोरनैकान्तिकतेति चेत्,
न नेत्रादिभिरनैकान्तिकता । तेषां लब्ध्युपयोग²लक्षणभावेन्द्रियरूपाणामेव प्रकाशकत्वात् ।
भावेन्द्रियाणां च स्वसंवेदनरूपतयैवेति न व्यभिचारः । तथा संवित् स्वप्रकाशा, अर्थ-
प्रतीतित्वात्, यः स्वप्रकाशो न भवति नासावर्थप्रतीतिः, यथा घटः ॥
शंका—यदि अनुभूति ( ज्ञानको ) को अनुभाव्य ( ज्ञेय ) स्वीकार किया जाय, तो ज्ञेय घट-पटके
समान ज्ञानको भी अज्ञान रूप मानना चाहिये । अतएव 'ज्ञान अनुभव रूप हो कर भी अनुभाव्य ( ज्ञेय )
होनेसे घटकी तरह अनुभूति ( ज्ञान ) नहीं हो सकता ।' और आपने ज्ञानको अनुभाव्य माना है, स्वसंवेद्य
होनेसे । समाधान—जैसे ज्ञाताका ज्ञातृत्व रूपसे अनुभव होता है, वैसे ही अनुभूति भी अनुभूति रूपसे
ही अनुभवमें आती है । तथा, अनुभूतिको अनुभाव्य माननेमें दोष नहीं आता, क्योंकि अनुभूति पदार्थोंको
जाननेकी अपेक्षा अनुभूति रूप है, परन्तु जब वही अनुभूति स्वसंवेदन करती है, तब वह अनुभाव्य कही जाती
है । जिस प्रकार एक ही पुरुषको अपने पिताकी अपेक्षा पुत्र और अपने पुत्रोंकी अपेक्षा पिता कहा जाता है,
उसी प्रकार एक ही अनुभूति भिन्न-भिन्न अपेक्षाओंसे अनुभूति और अनुभाव्य कही जाती है । इसलिये कोई
विरोध नहीं है ।
तथा, 'ज्ञान स्वयं प्रकाशित होता हुआ ही दूसरे पदार्थोंको जानता है, क्योंकि वह प्रकाशक है, दीपककी
तरह' इस अनुमानसे ज्ञानके स्वसंवेदनकी सिद्धि होती है । यदि कहो कि ज्ञान प्रकाश्य है, इसलिये प्रकाशक
नहीं हो सकता तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि ज्ञान अज्ञानको नाश करता है, इसलिये वह प्रकाशक ही है ।
शंका--नेत्र आदि प्रकाशक होनेपर भी अपने आपको प्रकाशित नहीं करते, इसलिये प्रकाशकत्व हेतु
अनैकान्तिक है । समाधान—यह ठीक नहीं, क्योंकि नेत्र आदि लब्धि और उपयोग रूप भावेन्द्रियद्वारा
अपने आपको भी जानते हैं । (मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न होनेवाली विशुद्धि, अथवा विशुद्धिसे
उत्पन्न होनेवाले उपयोगात्मक ज्ञानको भावेन्द्रिय कहते हैं । लब्धि और उपयोग भावेन्द्रिय कही जाती हैं ।
स्पर्शन, रसना आदि पांच इन्द्रियोंके आवरणके क्षयोपशम होनेपर पदार्थोंके जाननेकी शक्तिविशेषको लब्धि,
तथा अपनी अपनी लब्धिके अनुसार आत्माके पदार्थोंमें प्रवृत्ति करनेको उपयोग कहते हैं ।) भावेन्द्रियां
स्वसंवेदन रूप होती हैं, अतएव इसमें कोई विरोध नहीं है । अतएव ज्ञान स्वप्रकाशक है, क्योंकि वह पदार्थों
को जानता है; जो स्वप्रकाशक नहीं होता, वह पदार्थोंको नहीं जानता, जैसे घट ।
१. प्रदीपस्याप्यपेक्षया प्रकाशकत्वं स्वापेक्षया च प्रकाश्यप्रकाशकत्वम् ।
२. जन्तोः श्रोत्रादिविषयस्तत्तदावरणस्य यः ।
स्यात् क्षयोपशमो लब्धिरूपं भावेन्द्रियं हि तत् ॥
स्वस्वलब्ध्यनुसारेण विषयेषु यः आत्मनः ।
व्यापार उपयोगाख्यं भवेद्भावेन्द्रियं च तत् ॥ लोकप्रकाशे ३ ॥

. अन्य. यो. व्य. श्लोक १२ ] स्याद्वादमञ्जरी १०७
तदेवं सिद्धेऽपि प्रत्यक्षातुमानाभ्यां ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वे “सत्संप्रयोगे इन्द्रियबुद्धि-
जन्मलक्षणं ज्ञानं, ततोऽर्थप्राकट्यं, तस्मादर्थापत्तिः, तया प्रवर्त्तकज्ञानस्योपलम्भः'” इत्येवंरूपा
त्रिपुटीप्रत्यक्षकल्पना भट्टानां प्रयासफलैव ॥
यौगास्त्वाहुः । ज्ञानं स्वान्यप्रकाश्यम्, ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति प्रमेयत्वात्, घटवत्
समुत्पन्नं हि ज्ञानमेकात्मसमवेतमनन्तरोद्भूविष्णुमानसप्रत्यक्षेणैव लक्ष्यते, न पुनः स्वेन । न
चैवमनवस्था । अर्थावसायिज्ञानोत्पादमात्रेणैवार्थसिद्धौ प्रमातुः कृतार्थत्वात् । अर्थज्ञानजिज्ञा-
सायां तु तत्रापि ज्ञानमुत्पद्यत एवेति । तदयुक्तम् । पक्षस्य प्रत्यनुमानबाधितत्वेन हेतोः
कालात्ययापदिष्टत्वात् । तथाहि । विवादास्पदं ज्ञानं स्वसंविदितं, ज्ञानत्वात्, ईश्वरज्ञानवत् ।
न चायं वाद्यप्रतीतो दृष्टान्तः, पुरुषविशेषस्येश्वरतया जैनैरपि स्वीकृतत्वेन तज्ज्ञानस्य तेषां
प्रसिद्धेः ॥
व्यर्थविशेष्यश्चात्र तव हेतुः, समर्थविशेषणोपादानेनैव साध्यसिद्धेः । अग्निसिद्धौ
धूमवत्त्वे सति द्रव्यत्वादितिवद्, ईश्वरज्ञानान्यत्वादित्येतावत्तैव गतत्वात् । न हीश्वरज्ञाना-
दन्यत् स्वसंविदितमप्रमेयं वा ज्ञानमस्ति, यद्व्यवच्छेदार्थं प्रमेयत्वादिति क्रियेत । भवन्मते
तदन्यज्ञानस्य सर्वस्य प्रमेयत्वात् ॥
इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमानसे ज्ञानके स्वयं संवेदक सिद्ध हो जानेपर भाट्टोंकी त्रिपुटी प्रत्यक्षकी
कल्पना करना भी बिलकुल व्यर्थ है । भाट्टोंके अनुसार, ( १ ) विद्यमान पदार्थोंके साथ इन्द्रिय और बुद्धिका
संयोग होनेसे ज्ञान उत्पन्न होता है, ( २ ) इस ज्ञानसे अर्थप्राकट्य, अर्थात् पदार्थका ज्ञान होता है, ( ३ )
पदार्थके ज्ञानसे होनेवाली अर्थापत्तिसे प्रकाशक ज्ञानका संवेदन होता है। इसे भाट्ट मतमें त्रिपुटी प्रत्यक्ष कहा है ।
न्यायवैशेषिक—घटसे भिन्न ज्ञानके द्वारा जिस प्रकार घट प्रकाशित किया जाता है, उसी प्रकार
ईश्वरज्ञानसे भिन्नता होने पर प्रमेय रूप होनेसे ज्ञान अपनेसे भिन्न ज्ञानके द्वारा प्रकाश्य है । अपनी उत्पत्ति
होनेके बाद जिसका एक आत्माके साथ समवाय संबंध होता है, ऐसे पदार्थका ज्ञान अपनी उत्पत्तिके बाद
उत्पन्न होने वाले मानस प्रत्यक्षके द्वारा जाना जाता है, स्वयं अपने द्वारा नहीं जाना जाता । इस प्रकार
ज्ञानको अन्य ज्ञान द्वारा प्रकाश्य मानने पर अनवस्था दोष नहीं आता । क्योंकि अर्थको जाननेवाले ज्ञानकी
उत्पत्ति मात्रसे ज्ञातृज्ञानके प्रयोजनकी सिद्धि हो जाने पर ज्ञातृज्ञान कृतार्थ हो जाता है । जब प्रमाताको
पदार्थोंको जानने की इच्छा होती है उस समय भी ज्ञानकी उत्पत्ति होती है । जैन—यह कथन ठीक
नहीं है । क्योंकि 'ज्ञान अपने से भिन्न ज्ञानके द्वारा जाना जाता है'—इस अनुमानका पक्ष 'विवादास्पद ज्ञान
स्वसंविदित है, ज्ञान होनेसे, ईश्वरज्ञानकी भाँति'—इस प्रति अनुमानसे बाधित होनेके कारण हेतु काला-
त्ययापदिष्ट ( हेत्वाभास ) हो गया है ( जो हेतु पक्षके प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आदि प्रमाणोंके द्वारा बाधित
किये जाने पर उपस्थित किया जाता है, उसे कालात्ययापदिष्ट कहते हैं ) । यहाँ ईश्वरज्ञानका दृष्टान्त अप्रतीत
नहीं क्योंकि पुरुष विशेषको जैनोंने भी ईश्वररूपसे स्वीकार किया है ।
इसके अतिरिक्त, उक्त हेतु व्यर्थविशेष्यसे दूषित है, क्योंकि यहाँ समर्थ विशेषणसे ही साध्यकी सिद्धि
हो जाती है । 'ज्ञानं स्वान्यप्रकाश्यम् ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति प्रमेयत्वात् घटवत्' ( ज्ञान अपनेसे भिन्न ज्ञानके
द्वारा प्रकाश्य है, ईश्वरज्ञानसे भिन्न होने पर, घटकी भाँति )—यहाँ 'ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति' विशेषणको
ग्रहण करनेसे ही 'ज्ञानं स्वान्यप्रकाश्यं'—साध्यकी सिद्धि हो जाती है, अतएव 'प्रमेयत्वात्' विशेष्य व्यर्थ है ।
१. जैमिनिसूत्रे १-१-४५ सूत्रार्थानुगुणमेतत् । घटादिविषये ज्ञाने जाते 'मया ज्ञातोऽयं घटः' इति
घटस्य ज्ञातत्वं प्रतिसंधीयते । तेन, ज्ञाने जाते सति 'ज्ञातता नाम कश्चिद्धर्मो जातः' इत्यनुमीयते । सा च
( ज्ञातता ) ज्ञानात्पूर्वमजातत्वात्, ज्ञाने जाते च जातत्वाच्च, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां 'ज्ञानेन जन्यते' इत्यवधार्यते
( तर्कभाषा पृ. २२ ) । ज्ञानस्य मितिः माता मेयम् तद्विषयकत्वात् त्रिपुटी तत्प्रत्यक्षता ।

१०८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १२
अप्रयोजकञ्चायं हेतुः । सोपाधित्वात् । साधनाव्यापकः साध्येन समव्याप्तिश्च खलु
उपाधिरभिधीयते । तत्पुत्रत्वादौना श्यामत्वे साध्ये शाकाद्याहारपरिणामवत् । उपाधिश्चात्र
जडत्वम् । तथाहि ईश्वरज्ञानान्यत्वे प्रमेयत्वे च सत्यपि यदेव जडं स्तम्भादि तदेव स्वस्मादन्येन
प्रकाश्यते । स्वप्रकाशे परमुखप्रेक्षित्वं हि जडस्य लक्षणं । न च ज्ञानं जडस्वरूपम् । अतः
साधनाव्यापकत्वं जडत्वस्य । साध्येन समव्याप्तिकत्वं चास्य स्पष्टमेव । जाड्यं विहाय
स्वप्रकाशाभावस्य तं च त्यक्त्वा जाड्यस्य क्वचिदप्यदर्शनात् इति ॥
यच्चोक्तं समुत्पन्नं हि ज्ञानमेकात्मसमवेतम् इत्यादि । तदप्यसत्यम् । इत्थमर्थज्ञानतज्ज्ञा-
नयोरुत्पद्यमानयोः क्रमानुपलक्ष्णत्वात् । आशूत्पादात्क्रमानुपलक्षणमुत्पल

अन्य. यो. व्य. श्लोक १२ ] स्याद्वादमञ्जरी १०९
मुत्पाद्यत्वं घटते अजिज्ञासितेष्वपि योग्यदेशेषु विषयेषु तदुत्पादप्रतीतेः। न चार्थज्ञानमयोग्य-
देशम्। आत्मसमवेतस्यास्य समुत्पादात्। इति जिज्ञासा मन्तरेणैवार्थज्ञाने ज्ञानोत्पादप्रसङ्गः।
अथोत्पद्यतां नामेदं को दोषः इति चेत्, नन्वेवमेव तज्ज्ञानज्ञानेऽप्यपरज्ञानोत्पादप्रसङ्गः। तत्रापि
चैवमयम्। इत्यपरापरज्ञानोत्पादपरम्परायामेवात्मनो व्यापारात् न विषयान्तरसंचारः
स्यादिति। तस्माद्यज्ज्ञानं तदात्मबोधं प्रत्यनपेक्षितज्ञानान्तरव्यापारम्, यथा गोचरान्तरग्राहि-
ज्ञानात् प्राग्भावि गोचरान्तरग्राहिधारावाहिज्ञान१प्रबन्धस्यान्त्यज्ञानम्। ज्ञानं च विवादाध्या-
सितं रूपादिज्ञानम्, इति न ज्ञानस्य ज्ञानान्तरज्ञेयता युक्तिं सहते ॥ इति काव्यार्थः ॥ १२ ॥
पत्तोंके ढेरको सूईंसे बींधते समय हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हमने सभी पत्तोंका एक ही साथ वेधन किया है,
परन्तु वास्तवमें इनके बींधनेमें सूक्ष्म क्रम रहता है, उसी तरह पदार्थके ज्ञान और ज्ञानके ज्ञानमें भी सूक्ष्म
क्रम रहता है। यह ठीक नहीं। क्योंकि पदार्थज्ञानके ज्ञानकी उत्पत्ति, पदार्थज्ञानकी उत्पत्तिके बाद उत्पन्न
[L12

इस प्रत्यनुमानसे बाधित है । इसलिये ज्ञानको स्वसंवेदक ही मानना चाहिये ।`

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(२) यह अनुमान व्यर्थविशेष्य भी है, क्योंकि यहां 'ईश्वरज्ञानान्यत्व' हेतुके विशेष्य 'प्रमेयत्व' हेतुके कहनेसे

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कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । (३) उक्त हेतु अप्रयोजक होनेसे सोपाधिक भी है । क्योंकि 'स्वान्य-

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प्रकाश्यं ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति, प्रमेयत्वात्' यह तर्क ज्ञानके साथ व्याप्त न हो कर जड़ पदार्थोंके साथ व्याप्त

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है, क्योंकि ईश्वरज्ञानसे भिन्न हो कर प्रमेय होनेपर भी स्तंभ वगैरह जड़ पदार्थ ही अपनेको छोड़ कर

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दूसरेसे प्रकाशित होते हैं ।

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अब अविद्या अथवा मायाके कारण तीनों लोकोंके वस्तु-प्रपंचको अपारमार्थिक स्वीकार करनेवाले

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ब्रह्माद्वैतवादियोंका उपहास करते हुए कहते हैं—

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श्लोकार्थ—यदि माया सत् रूप है, तो ब्रह्म और माया दो पदार्थोंका सद्भाव होनेसे अद्वैतकी सिद्धि

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अन्य. यो. व्य. श्लोक १३ ] स्याद्वादमञ्जरी १११
तैर्वादिभिस्तात्त्विकात्मब्रह्मव्यतिरिक्ता या माया-अविद्या प्रपञ्चहेतुः परिकल्पिता, सा
सद्रूपा असद्रूपा वा द्वयी गतिः। सती-सद्रूपा चेत् तदा द्वयतत्त्वसिद्धिः—द्वाववयवौ यस्य तद्
द्वयं, तथाविधं यत् तत्त्वं परमार्थः, तस्य सिद्धिः। अयमर्थः। एकं तावत् त्वदभिमतं तात्त्वि-
कमात्मब्रह्म, द्वितीया च माया तत्त्वरूपा सद्रूपतयाऽङ्गीक्रियमाणत्वात्। तथा चाद्वैतवादस्य
मूले निहितः कुठारः। अथेति पक्षान्तरद्योतने। यदि असती-गगनाम्भोजवद्वस्तुरूपा सा
माया, ततः हन्त इत्युपदर्शने आश्चर्यं वा। कुतः प्रपञ्चः। अयं त्रिभुवनोदरविवरवर्तिपदार्थ-
सार्थरूपः प्रपञ्चः कुतः ? न कुतोऽपि संभवतीत्यर्थः। मायाया अवस्तुत्वेनाभ्युपगमात् अवस्तु-
नश्च तुरङ्गशृङ्गस्येव सर्वोपाख्याविरहितस्य साक्षात्क्रियमाणेद्दशविवर्तजननेऽसमर्थत्वात्।
किलेन्द्रजालादौ मृगतृष्णादौ वा मायोपदर्शितानामर्थक्रियायामसामर्थ्यं दृष्टम् अत्र तु तदु-
पलम्भात् कथं मायाव्यपदेशः श्रद्धीयताम्। अथ मायापि भविष्यति, अर्थक्रियासमर्थपदार्थो-
पदर्शनक्षमा च भविष्यति इति चेत्, तर्हि स्ववचनविरोधः। न हि भवति माता च वन्ध्या
चेति। एनमेवार्थं हृदि निधायोत्तरार्धमाह। मायैव चेदित्यादि। अत्रैवकारोऽप्यर्थः। अपि च
समुच्चयार्थः। अग्रेतनचकारश्च तथा। उभयोश्च समुच्चयार्थयोर्योगपद्यद्योतकत्वं प्रतीतमेव।
यथा रघुवंशे “ते च प्रापुरुदन्वन्तं बुबुधे चादिपूरुषः”१। इति तदयं वाक्यार्थः माया च भवि-
ष्यति अर्थसहा च भविष्यति। अर्थसहा-अर्थक्रियासमर्थपदार्थोपदर्शनक्षमा। चेच्छब्दोऽत्र
योज्यते, इति चेत्, एवं परमाशङ्क्य तस्य स्ववचनविरोधमुद्भावयति। तत् किं भवत्परेषां
माता च वन्ध्या च। किमिति-संभावने। संभाव्यत एतत्-भवतो ये परे-प्रतिपक्षाः,
तेषां भवत्परेषां भवद्व्यतिरिक्तानां, भवदाज्ञापृष्ठग्भूतत्वेन तेषां वादिनां, यन्माता च
भविष्यति, वन्ध्या च भविष्यतीत्युपहासः। माता हि प्रसवधर्मिणी वनितोच्यते। वन्ध्या च
तद्विपरीता। ततश्च माता चेत्कथं वन्ध्या, वन्ध्या चेत्कथं माता तदेवं। मायाया अवास्तव्या
अप्यर्थसहत्वेऽङ्गीक्रियमाणे, प्रस्तुतवाक्यवत् स्पष्ट एव स्ववचनविरोधः। इति समासार्थः॥
व्यासार्थस्त्वयम्। ते वादिन इदं प्रणिगदन्ति। तात्त्विकमात्मब्रह्मैवास्ति—
नहीं हो सकती। यदि माया असत् है, तो तीनों लोकोंके पदार्थोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। यदि कहो कि
माया माया भी होकर अर्थक्रिया करती है, तो जैसे एक ही स्त्री माता और वंध्या दोनों नहीं हो सकती,
वैसे ही मायामें भी एक साथ दो विरोधी गुण नहीं रह सकते।
व्याख्यार्थ—ब्रह्माद्वैतवादियोंने जो तत्त्वरूप ब्रह्मात्मसे भिन्न माया (अविद्या) को प्रपंचका
कारण स्वीकार किया है, वह माया सत् रूप है, या असत् रूप ? यदि माया सत् है, तो ब्रह्म और माया दो
पदार्थोंके अस्तित्व होनेसे अद्वैतकी सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि अद्वैतवादियोंने एक आत्मा (ब्रह्म) को
ही सत् पदार्थ स्वीकार किया है, इसलिये यदि माया भी सत् हो, तो अद्वैतके मूलमें ही कुठाराघात होता है।
यदि मायाको आकाशके पुष्प की तरह अवस्तु स्वीकार करो, तो संसारके किसी भी पदार्थकी उत्पत्ति नहीं
हो सकती। क्योंकि मायाके अवस्तु होनेसे घोड़ेके सींगकी तरह वह प्रत्यक्षसे दृष्टिगोचर होनेवाले प्रपंचको
उत्पन्न नहीं कर सकती। इन्द्रजाल तथा मृगतृष्णा आदिमें मायाद्वारा दिखाये जानेवाले पदार्थ अर्थक्रिया नहीं
करते। परन्तु समस्त पदार्थोंमें अर्थक्रिया देखनेमें आती है, अतएव इन पदार्थोंमें मायाका व्यवहार नहीं हो
सकता। यदि आप कहें कि माया माया भी है, और वह अर्थक्रिया भी करती है, यह ठीक नहीं। क्योंकि
इसमें स्ववचन विरोध आता है। जिस प्रकार एक ही स्त्री माता और वंध्या दोनों नहीं हो सकती, वैसे ही
माया भी माया (अवस्तु) होकर अर्थक्रिया (वस्तु) नहीं कर सकती। यह संक्षिप्त अर्थ है।
यहाँ विस्तृत अर्थ दिया जाता है।
वेदान्ती—हमारे मतसे तत्त्व रूप एक ब्रह्म ही सत् है। शास्त्रोंमें कहा भी है—
१ अव्याक्षेपो भविष्यन्त्याः कार्यसिद्धेर्हि लक्षणम्। इत्युत्तरार्धम्। रघुवंशे १०-६।

११२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १३
“सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ।
आरामं तस्य पश्यन्ति न तत्पश्यति कश्चन” ॥
इति समयात् । अयं तु प्रपञ्चो मिथ्यारूपः, प्रतीयमानत्वात् । यदेवं तदेवम् । यथा शुक्तिकशकले
कलधौतम् । तथा चायं, तस्मात् तथा ॥
तदेतद्वार्तम् । तथाहि । मिथ्यारूपत्वं तैः कीदृग् विवक्षितम् । किमत्यन्तासत्त्वम्,
उतान्यस्यान्याकारतया प्रतीतत्वम्, आहोस्विदनिर्वाच्यत्वम् ? प्रथमपक्षे ऽसत्ख्यातिप्रसङ्गः ।
द्वितीये विपरीतख्यातिस्वीकृतिः । तृतीये तु किमिद‌मनिर्वाच्यत्वम् ? निःस्वभावत्वं चेत्, निसः
प्रतिषेधार्थत्वे, स्वभावशब्दस्यापि भावाभावयोरन्यतरार्थत्वे, असत्ख्यातिसत्ख्यात्यभ्युपगम-
प्रसङ्गः । भावप्रतिषेधे असत्ख्यातिः, अभावप्रतिषेधे सत्ख्यातिरिति । प्रतीत्यगोचरत्वं निःस्व-
भावत्वमिति चेत् । अत्र विरोधः । स प्रपञ्चो हि न प्रतीयते चेत् कथं धर्मितयोपात्तः । कथं च
प्रतीयमानत्वं हेतुतयोपात्तम् । तथोपादाने वा कथं न प्रतीयते । यथा प्रतीयते न तथेति चेत्,
तर्हि विपरीतख्यातिरिय‌मभ्युपगता स्यात् ॥
“यह सब ब्रह्मका ही स्वरूप है, इसमें नाना रूप नहीं हैं । ब्रह्मके प्रपंचको सब लोग देखते है, परन्तु
ब्रह्मको कोई नहीं देखता ।”
तथा, ‘यह प्रपंच मिथ्या है, क्योंकि यह प्रतीतिका विषय है । जो प्रतीतिका विषय होता है, वह
मिथ्या रूप होता है । जैसे सीपके टुकड़ेमें प्रतीत होनेवाला चाँदी मिथ्या रूप होती है । उसी तरह यह प्रपंच
प्रतीत होता है, इसलिये यह मिथ्या रूप है ।’
जैन—यह ठीक नहीं है । आप लोगोंने जो दृश्यमान प्रपंचको मिथ्या कहा है, सो आपका मिथ्यात्वसे
क्या अभिप्राय है ? (१) यदि वंध्या के पुत्रकी तरह अत्यंत असत्त्वको मिथ्यात्व कहते हो तो असत्ख्याति दोष
आता है । ( शून्यवादी बौद्धोंके अनुसार समस्त पदार्थोंका ज्ञान मिथ्या है, क्योंकि समस्त पदार्थ असत्
हैं । अतएव जब हमें सीपमें चांदीका ज्ञान होता है, उस समय असत् रूप चांदी सत् रूपमें प्रतिभासित
होती है । अतएव विपरीत ज्ञानका विषय सर्वथा असत् है । क्योंकि असत् पदार्थोंको सत् रूप
देखना ही विपरीत ज्ञान है । असत्ख्याति-वादियोंके मतमें पदार्थ और पदार्थका ज्ञान दोनों ही असत्
हैं । परन्तु वेदान्तो शून्यवादियोंकी असत्ख्यातिको स्वीकार नहीं करते । ) (२) यदि एक पदार्थके
दूसरे रूपमें प्रतिभासित होनेको मिथ्या कहो तो विपरीतख्याति दोष आता है । ( नैयायिक आदि मतके
अनुसार जब सीपमें चांदीका मिथ्या ज्ञान होता है, उस समय सीप चाँदीके रूपमें प्रतिभासित होती है,
इसलिये एक पदार्थको दूसरे पदार्थके रूपमें जानना ही मिथ्या है, वास्तवमें सीप अथवा चाँदीमें कोई मिथ्यापन
नहीं । इस विपरीत अथवा अन्यथाख्यातिमें दो पदार्थोंके सद्भाव ( द्वैत ) होनेके कारण वेदान्ती इसे भी
स्वीकार नहीं करते ) । (३) यदि अनिर्वचनीयत्व अर्थात् निस्स्वभावत्वको मिथ्यात्व कहो तो ‘निस्स्वभावत्व’
में स्वभाव शब्दका अर्थ क) ‘भाव’ लिया जाय तो असत्ख्याति दोष आता है ( परन्तु यह असत्ख्याति
वेदान्तियों को मान्य नहीं है ) । (ख) यदि स्वभावका अर्थ ‘अभाव’ किया जाय, तो सत्ख्याति दोष आता
है । ( रामानुजका सिद्धांत है कि जब सीपमें चांदीका मिथ्या ज्ञान होता है, उस समय इस मिथ्या ज्ञानका
विषय मिथ्या नहीं होता, क्योंकि सीपमें चाँदीके परमाणु मिले रहते हैं, इसीलिये सीपमें चाँदीका ज्ञान होता
है । परन्तु यह सत्ख्याति भी वेदान्तियोंको मान्य नहीं है ) । (ग) यदि दृश्यमान प्रपंचके ज्ञानके विषय न
होनेको निस्स्वभाव कहो तो ‘अर्थप्रपंचः मिथ्यारूपः प्रतीयमानत्वात्’ इस अनुमानमें जब प्रपंच प्रतीत ही नहीं
होता तो ‘प्रपंच’ को पक्ष नहीं बना सकते । तथा प्रपंचके ज्ञानका विषय न होनेसे ‘प्रतीयमानत्व’ हेतु भी
१. छांदोग्य उ. ३–१४ ।
२. आत्मख्यातिर‌सत्ख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा ।
तथानिर्वचनख्यातिरित्युक्तख्यातिपञ्चकम् ॥ षड्विधाः ख्यातिरित्त्यन्ये मन्यन्ते ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १३ ] स्याद्वादमञ्जरी ११३
किञ्च, इयमानर्वाच्यता प्रपञ्चस्य प्रत्यक्षबाधिता। घटोऽयमित्याद्याकारं हि प्रत्यक्षं
प्रपञ्चस्य सत्यतामेव व्यवस्यति, घटादिप्रतिनियतपदार्थपरिच्छेदात्मनस्तस्योत्पादात्। इतरेतर-
विविक्तवस्तूनामेव च प्रपञ्चशब्दवाच्यत्वात्। अथ प्रत्यक्षस्य विधायकत्वात् कथं प्रतिषेधे
सामर्थ्यम्। प्रत्यक्षं हि इदमिति वस्तुस्वरूपं गृह्णाति, नान्यत्स्वरूपं प्रतिषेधति।
“आहुर्विधातृ प्रत्यक्षं न निषेद्धृ विपश्चितः।
नैकत्व आगमस्तेन प्रत्यक्षेण प्रबाध्यते” ॥
इति वचनात्। इति चेत्। न। अन्यरूपनिषेधमन्तरेण तत्स्वरूपपरिच्छेदस्याप्यसंपत्तेः।
पीताद्यवच्छिन्नं हि नीलं नीलमिति गृहीतं भवति, नान्यथा। केवलवस्तुस्वरूपप्रतिपत्ते
रेवान्यप्रतिषेधप्रतिपत्तिरूपत्वात्, मुण्डभूतलग्रहणे घटाभावग्रहणवत्। तस्माद् यथा प्रत्यक्षं
विधायकं प्रतिपन्नं, तथा निषेधकमपि प्रतिपत्तव्यम्। अपि च, विधायकमेव प्रत्यक्षमित्यङ्गी-
कृते, यथा प्रत्यक्षेण विद्या विधीयते, तथा किं नाविद्यापीति। तथा च द्वैतापत्तिः। ततश्च
सुव्यवस्थितः प्रपञ्चः। तदमी वादिनोऽविद्याविवेकेन सन्मात्रं प्रत्यक्षात् प्रतियन्तोऽपि न
निषेधकं तदिति ब्रुवाणाः कथं नोन्मत्ताः। इति सिद्धं प्रत्यक्षबाधितः पक्ष इति॥
अनुमानबाधितश्च। प्रपञ्चो मिथ्या न भवति, असद्विलक्षणत्वात्, आत्मवत्। प्रतीय-
मानत्वं च हेतुर्ब्रह्मात्मना व्यभिचारी। स हि प्रतीयते, न च मिथ्या। अप्रतीयमानत्वे त्वस्य
नहीं बन सकता। तथा प्रतीयमानत्व हेतुके होनेसे प्रपंचको प्रतीयमान होना चाहिये। (घ) यदि कहो कि
प्रपंच जैसा है, वैसा प्रतीत नहीं होता-यही निस्स्वभावत्वका अर्थ है, तो इसे स्वीकार करनेमें विपरीत ख्याति
ही माननी पड़ेगी, जिसे मायावादी स्वीकार नहीं करते।
तथा प्रपंचकी यह अनिर्वाच्यता ( निस्स्वभावता ) प्रत्यक्षसे बाधित है। 'यह घट है' इत्यादि रूप
प्रत्यक्ष, प्रपंच की सत्यताका निश्चय करता है, क्योंकि घटादि रूप निश्चित पदार्थको जाननेवाले के रूपमें
उसकी उत्पत्ति होती है। तथा, इतरेतर भिन्न पदार्थ ही प्रपंच शब्दके वाच्य हैं। शंका-प्रत्यक्ष विधायक
है, अतएव प्रतिषेध करनेकी सामर्थ्य उसमें कैसे हो सकती है ? प्रत्यक्ष, 'यह है' इस प्रकार वस्तुके स्वरूप
को जानता है, दूसरे स्वरूपका प्रतिषेध वह नहीं करता। कहा भी है-
"प्रत्यक्ष विधायक है, निषेधक नहीं, अतएव एकत्वका प्रतिपादन करनेवाला आगम प्रत्यक्षसे बाधित
नहीं हो सकता।"
समाधान-यह ठीक नहीं है। क्योंकि अन्य स्वरूपके निषेधके बिना, वस्तु-स्वरूपका ज्ञान नहीं हो
सकता। जैसे, पीत आदि वर्णवाले पदार्थसे भिन्न नील वर्णवाला पदार्थ, 'यह नील वर्ण है' इस प्रकार जाना
जाता है, अन्य प्रकारसे नहीं। शून्य भूतलका ज्ञान होने पर जिस प्रकार घटके अभावका ज्ञान होता है, उसी
प्रकार केवल वस्तुस्वरूपका ग्रहण ही अन्यका प्रतिषेध रूप ग्रहण होता है। अतएव जिस प्रकार प्रत्यक्षको
विधायक माना है, उसी प्रकार उसे निषेधक भी मानना चाहिये। तथा, यदि प्रत्यक्षको केवल विधायक ही
माना जाय तो जिस प्रकार प्रत्यक्ष द्वारा विद्याका विधान किया जाता है, वैसे ही उसीके द्वारा अविद्याका
विधान भी क्यों नहीं माना जाता ? यदि प्रत्यक्षको अविद्याका भी विधायक माना जाय, तो विद्या और
अविद्या, ब्रह्म और जगत्-इन दो पदार्थोंके होनेसे द्वैतका प्रसंग उपस्थित हो जाता है। इस प्रकार प्रपंच
सुव्यवस्थित है। अतएव जब ब्रह्माद्वैतवादी, प्रत्यक्षसे अविद्याका निषेध करके प्रत्यक्षको सन्मात्रग्राही मानने
पर भी, उसे निषेधक नहीं स्वीकार करते, तो उन्हें उन्मत्त क्यों न कहा जाये ? इस प्रकार 'प्रपंच मिथ्यारूप
है'-यह पक्ष प्रत्यक्षसे बाधित है, यह सिद्ध हो जाता है।
तथा, 'प्रपञ्चो मिथ्यारूपः प्रतीयमानत्वात्', यह पक्ष 'प्रपञ्चो मिथ्या न भवति असद्विलक्षणत्वात्
आत्मवत्' इस अनुमानसे बाधित है। (अर्थात् जिस प्रकार ब्रह्मरूप आत्मा असत् से भिन्न होने से मिथ्यारूप
नहीं है, उसी प्रकार प्रपंच भी असत् से भिन्न होने पर भी मिथ्यारूप नहीं)। यहाँ, प्रतीयमानत्व हेतु
१५

११४ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १३
तद्विषयवचसामप्रवृत्तेर्मूकतैव तेषां श्रेयसी । साध्यविकलश्च दृष्टान्तः । शुक्तिशकलकलधौतेऽपि
प्रपञ्चान्तर्गतत्वेन अनिर्वचनीयतायाः साध्यमानत्वात् । किञ्च, इदमनुमानं प्रपञ्चाद् भिन्नम्
अभिन्नं वा ? यदि भिन्नं, तर्हि सत्यमसत्यं वा ? यदि सत्यं, तर्हि तद्वदेव प्रपञ्चस्यापि सत्यत्वं
स्यात् । अद्वैतवादप्राकारे खण्डिपातात् । अथासत्यम् , तर्हि न किञ्चित् तेन साधयितुं शक्यम्,
अवस्तुत्वात् । अभिन्नं चेत्, प्रपञ्चस्वभावतया तस्यापि मिथ्यारूपत्वापत्तिः । मिथ्यारूपं च
तत् कथं स्वसाध्यसाधनायालम् । एवं प्रपञ्चस्यापि मिथ्यारूपत्वासिद्धेः कथं परब्रह्मणस्ता-
त्त्विकत्वं स्यात् यतो बाह्यार्थाभावो भवेदिति ।।
अथवा प्रकारान्तरेण सन्मात्रलक्षणस्य परब्रह्मणः साधनं दूषणं चोपन्यस्यते । ननु
परब्रह्मण एवैकस्य परमार्थसतो विधिरूपस्य विद्यमानत्वात् प्रमाणविषयत्वम् । अपरस्य
द्वितीयस्य कस्यचिदप्यभावात् । तथाहि । प्रत्यक्षं तदावेदकमस्ति । प्रत्यक्षं द्विधा भिद्यते
निर्विकल्पकसविकल्पकभेदात् । ततश्च निर्विकल्पकप्रत्यक्षात् सन्मात्रविषयात् तस्यैकस्यैव
सिद्धिः । तथा चोक्तम्—
“अस्ति ह्यालोचनाज्ञानं प्रथमं निर्विकल्पकम् ।
बालमूकादिविज्ञानसदृशं शुद्धवस्तुजम्”॥¹
न च विधिवत् परस्परव्यावृत्तिरप्यध्यक्षत एव प्रतीयते इति द्वैतसिद्धिः । तस्य निषेधा-
ब्रह्मात्मरूप विपक्ष में रहता है, अतएव व्यभिचारी है । क्योंकि ब्रह्मात्मा प्रतीयमान है, परन्तु मिथ्या नहीं
है । यदि ब्रह्मको अप्रतीयमान मानो तो ब्रह्मके विषयमें वचनोंकी प्रवृत्ति न होनेसे मौन रहना ही श्रेयस्कर
होगा । तथा, ‘सीपमें चाँदी' (शुक्तिशकले कलधौतं) का जो दृष्टान्त दिया गया है, वह 'प्रपंच मिथ्यारूप'
साध्यमें नहीं रहता, इसलिये साध्यविकल है । क्योंकि सीप और चाँदी दोनों ही प्रपंचके अन्तर्भूत हैं, इसलिये
उनका अनिर्वचनीयत्व (मिथ्यारूपता) साध्यमान ही है—सिद्ध नहीं है (जो दृष्टान्त दिया जाता है, वह
सिद्ध होता है, असिद्ध नहीं। इसे अनुपसंहारी हेत्वाभास भी कहते हैं) । तथा, आपका अनुमान 'यह प्रपंच
मिथ्यारूप है प्रतीयमान होनेसे' प्रपंचसे भिन्न है, या अभिन्न ? यदि भिन्न है, तो सत्य है, या असत्य ? यदि
अनुमान प्रपंचसे भिन्न होकर सत्य है, तो अनुमानके समान प्रपंच भी सत्य होना चाहिये । तथा, प्रपंचकी
सत्यता स्वीकार करनेमें अद्वैतरूपी प्राकारपर कुठाराघात होता है । यदि अनुमान असत्य है, तो वह
अवस्तु होनेसे साध्यकी सिद्धि नहीं कर सकता । यदि अनुमान प्रपंचसे अभिन्न है, तो प्रपंचरूप होनेसे अनु-
मान भी मिथ्यारूप होना चाहिये, और मिथ्यारूप अनुमान साध्यकी सिद्धि नहीं कर सकता । इस प्रकार जब
प्रपंच मिथ्यारूप सिद्ध नहीं हो सकता, तो परब्रह्मकी तात्त्विकता भी सिद्ध नहीं हो सकती, जिससे बाह्य
पदार्थोंका अभाव सिद्ध हो सके ।
अथवा प्रकारान्तरसे सत्तामात्र रूप परब्रह्मके साधन और दूषणका उपन्यास किया जाता है ।
वेदान्ती—वास्तवमें एकमात्र परमार्थ सत् विधिरूप ब्रह्म विद्यमान होनेसे प्रमाणका विषय है, क्योंकि वह
परमार्थ सत् विधिरूप किसी भी दूसरे पदार्थका अभाव है । तथाहि—प्रत्यक्ष एक परमार्थ सत् विधिरूप
ब्रह्मको जानता है । यह प्रत्यक्ष निर्विकल्पक और सविकल्पकके भेदसे दो प्रकारका है । सन्मात्रको जाननेवाले
निर्विकल्पक प्रत्यक्षसे एकमात्र ब्रह्मकी सिद्धि होती है । कहा भी है—
“चक्षुके सन्निपातके अनन्तरवर्ती और सविकल्पक ज्ञानके पूर्ववर्ती तथा शुद्ध वस्तु अर्थात् सामान्य-
विशेष रहित वस्तुको जाननेवाला बालक और गूँगेके ज्ञानके समान, ऐसे इन्द्रियज्ञान का सद्भाव है ।”
विधिके समान घट, पट पदार्थोंकी परस्पर व्यावृत्तिका ज्ञान भी प्रत्यक्षसे ही होता है, अतएव द्वैतकी
१. मीमांसाश्लोकवार्तिक ४ प्रत्यक्षसूत्रे ११२ ।

विषयत्वात् । “आहुर्विधातृ प्रत्यक्षं न निषेद्धृ” इत्यादिवचनात् । यच्च सविकल्पकप्रत्यक्षं
घटपटादिभेदसाधकं, तदपि सत्तारूपेणान्वितानामेव तेषां प्रकाशकत्वात् सत्ताऽद्वैतस्यैव
साधकम् । सत्तायाश्च परब्रह्मरूपत्वात् । तदुक्तम्- "यदद्वैतं तद् ब्रह्मणो रूपम्" इति ॥
अनुमानादपि तत्सद्भावो विभाव्यत एव । तथाहि । विधिरेव तत्त्वं, प्रमेयत्वात् । यतः
प्रमाणविषयभूतोऽर्थः प्रमेयः । प्रमाणानां च प्रत्यक्षानुमानागमोपमानार्थापत्तिसंज्ञकानां
भावविषयत्वेनैव प्रवृत्तेः । तथा चोक्तम्—
“प्रत्यक्षाद्यवतारः स्याद् भावांशो गृह्यते यदा ।
व्यापारस्तदनुत्पत्तेरभावांशे जिघृक्षिते” ॥
यच्चाभावाख्यं प्रमाणं तस्य प्रामाण्याभावाद् न तत् प्रमाणम् । तद्विषयस्य कस्यचिद-
प्यभावात् । यस्तु प्रमाणपञ्चकविषयः स विधिरेव । तेनैव च प्रमेयत्वस्य व्याप्तत्वात् । सिद्धं
प्रमेयत्वेन विधिरेव तत्त्वम्, यत्तु न विधिरूपं, तद् न प्रमेयम्, यथा खरविषाणम् । प्रमेयं चेदं
निखिलं वस्तुतत्त्वम्, तस्माद् विधिरूपमेव । अतो वा तत्सिद्धिः । ग्रामारामादयः पदार्थाः
प्रतिभासान्तःप्रविष्टाः, प्रतिभासमानत्वात्, यत्प्रतिभासते तत्प्रतिभासान्तःप्रविष्टम्, यथा
प्रतिभासस्वरूपम् । प्रतिभासन्ते च ग्रामारामादयः पदार्थाः, तस्मात् प्रतिभासान्तःप्रविष्टाः ॥
आगमोऽपि परब्रह्मरण एव प्रतिपादकः समुपलभ्यते— “पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं
सिद्धि नहीं होती । क्योंकि "प्रत्यक्षको विधायक कहते हैं, निषेधक नहीं"—इस वचनके अनुसार, निषेध
प्रत्यक्षका विषय नहीं होता । तथा, घट, पट आदिके विकल्प ( भेद ) को ग्रहण करनेवाला सविकल्पक
प्रत्यक्ष भी सत्तारूप से अन्वित घट, पट आदिको ही जानता है, इसलिये सविकल्पक प्रत्यक्ष भी सत्ता
अद्वैतका ही साधक है । क्योंकि सत्ता परब्रह्म रूप है । कहा भी है— “जो अद्वैत है वही ब्रह्मका स्वरूप है"
अनुमान प्रमाणसे भी ब्रह्मका अस्तित्व सिद्ध होता ही है । तथाहि—'विधि ( अर्थात् परब्रह्म )
ही तत्त्व ( परमार्थभूत पदार्थ ) है, प्रमेय होनेसे' । प्रमाणके विषयभूत अर्थको प्रमेय कहते हैं । प्रत्यक्ष,
अनुमान, आगम, उपमान और अर्थापत्ति नामसे कहे जानेवाले प्रमाण पदार्थोंको अपना विषय बनाकर प्रवृत्त
होते हैं । कहा भी है—
“जब वस्तुके भावांशको ग्रहण किया जाता है, तब प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंकी उपस्थिति होती है, तथा
वस्तुके अभाव अंशको जाननेकी इच्छा होनेपर प्रत्यक्ष आदिके अभावकी प्रवृत्ति होती है ।” ( मीमांसक
वस्तुको सदसदात्मक मानते हैं, अर्थात् उनके अनुसार, वस्तु भावांश और अभाव-अंशसे युक्त होती है ) ।
तथा, अभाव नामक प्रमाणमें प्रामाण्यका अभाव होनेसे ( प्रमितिका साधकतम साधन न होनेके
कारण ), वह प्रमाण नहीं है, क्योंकि उसके विषयभूत किसी भी पदार्थका अस्तित्व नहीं है, अर्थात् उसका
कोई भी विषय नहीं है । प्रत्यक्ष आदि पांचों प्रमाणों का जो विषय है वह विधिरूप ही है । प्रमेयत्व उस
विधि से व्याप्त है । अतएव प्रमेयत्व होनेसे विधि ही तत्त्वरूपसे सिद्ध है । जो विधिरूप नहीं है, वह प्रमेय
भी नहीं है, जैसे गधेके सींग । यह सम्पूर्ण वस्तुतत्त्व प्रमेयरूप है, इसलिये वह विधिरूप ही है । अथवा,
'गांव, बगीचा आदि पदार्थ प्रतिभासमें गर्भित हो जाते हैं, प्रतिभासका विषय होनेसे । जो प्रतिभासका
विषय है, वह प्रतिभासमें गर्भित हो जाता है, जैसे प्रतिभासका स्वरूप । गांव, बगीचे आदि प्रतिभासित
होते हैं, इसलिये वे प्रतिभासके ही भीतर आ जाते हैं'—इस अनुमानसे भी ब्रह्मकी सिद्धि होती है ।
आगम भी ब्रह्मका प्रतिपादन करता है । जैसे, “जो हुआ है, जो होगा; जो अमृतका अधिष्ठाता है,
आहारसे वृद्धिको प्राप्त होता है ।” “जो गतिमान है, स्थिर है, दूर है, पास है, चेतन और अचेतन सबमें
१. मीमांसाश्लोकवार्तिक ५ अभावपरिच्छेदे १७ ।

११६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १३
यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।" १ "तदेजति, तन्नैजति, यद् दूरे,
यदन्तिके। यदन्तरस्य सर्वस्य यदुत सर्वस्यास्य बाह्यतः"२ इत्यादिः । "श्रोतव्यो मन्तव्यो
निदिध्यासितव्यः अनुमन्तव्यः" ३ इत्यादिवेदवाक्यैरपि तत्सिद्धेः । कृत्रिमेणापि आगमेन
तस्यैव प्रतिपादनात् । उक्तं च—
“सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म४ नेह नानाऽस्ति किञ्चन ।
आरामं तस्य पश्यन्ति न तन् पश्यति कश्चन”६ ॥
इति प्रमाणतस्तस्यैव सिद्धेः । परमपुरुष एक एव तत्त्वम्, सकलभेदानां तद्विवर्तत्वात् ।
तथाहि । सर्वे भावा ब्रह्मविवर्ताः सत्त्वैकरूपेणान्वितत्वात् । यद् यद्रूपेणान्वितं तत् तदात्म-
कमेव । यथा घटघटीशरावोदञ्चनादयो मृद्रूपेणैकेनान्विता मृद्विवर्ताः । सत्त्वैकरूपेणान्वितं
च सकलं वस्तु । इति सिद्धं ब्रह्मविवर्तित्वं निखिलभेदानामिति ॥
तदेतत् सर्वं मदिरास्वादगद्गदोद्गदितमिवाभासते, विचारासहत्वात् । सर्वं हि
वस्तु प्रमाणसिद्धं न तु वाङ्मात्रेण । अद्वैतमते च प्रमाणमेव नास्ति, तत्सद्भावे द्वैतप्रसङ्गात् ।
अद्वैतसाधकस्य प्रमाणस्य द्वितीयस्य सद्भावात् । अथ मतम् लोकप्रत्यायनाय तदपेक्षया
प्रमाणमप्यभ्युपगम्यते । तदसत् । तन्मते लोकस्यैवासम्भवात्, एकस्यैव नित्यनिरंशस्य
परब्रह्मण एव सत्त्वात् ॥
अथास्तु यथाकथञ्चित् प्रमाणमपि तत्किं प्रत्यक्षमनुमानमागमो वा तत्साधकं
प्रमाणमुररीक्रियते । न तावत् प्रत्यक्षम् । तस्य समस्तवस्तुजातगतभेदस्यैव प्रकाशकत्वात् ।
व्याप्त है और सबके बाह्य है, वह सब ब्रह्म ही है" आदि । तथा, "अतएव ऐसे ब्रह्मको सुनना, मनन करना,
निरन्तर स्मरण करना, और पुनः पुनः मनन करना चाहिये," आदि वेदके वाक्योंसे ब्रह्मकी सिद्धि होती है।
स्मृति आदि पौरुषेय आगम भी ब्रह्मकी सिद्धि करते हैं। कहा भी है—
यह सब ब्रह्मका ही स्वरूप है, ब्रह्मको छोड़ कर नाना रूप कुछ नहीं है। ब्रह्मकी पर्यायोंको सब देखते
हैं, परन्तु ब्रह्म किसीको दिखाई नहीं देता ।
इस प्रकार परब्रह्मके प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमसे सिद्ध होनेपर परब्रह्म ही एक तत्त्व सिद्ध होता
है; दृश्यमान सम्पूर्ण भेद इस ब्रह्मकी ही पर्याय हैं। अतएव 'सम्पूर्ण पदार्थ ब्रह्मकी पर्याय हैं, क्योंकि संपूर्ण
पदार्थ सत्तात्मक एक रूप से अन्वित हैं। जो जिस रूपसे अन्वित होता है, वह उसी रूप होता है जैसे घट,
घटी, शराव आदि मिट्टीके बर्तन मिट्टीके एक स्वरूपसे अन्वित हैं, इसलिये सब मिट्टी की पर्याय हैं। सम्पूर्ण
पदार्थ एक सत्ता स्वरूपसे अन्वित हैं, इसलिये सम्पूर्ण पदार्थ एक ब्रह्मकी ही पर्याय हैं' ।
जैन—यह कथन मद्यपायीके प्रलापके समान प्रतीत होता है, क्योंकि यह कथन विचार को सह्य
नहीं है। सभी वस्तुओं की सिद्धि प्रमाणसे होती है, केवल कथनमात्रसे नहीं । तथा, अद्वैतवादियोंके मतमें
कोई प्रमाण ही नहीं बन सकता, क्योंकि ब्रह्मसे भिन्न किसी प्रमाणके माननेपर द्वैत मानना पड़ता है। अद्वैतका
साधक कोई अन्य प्रमाण नहीं है। यदि आप कहें कि लोगोंको समझानेके लिये उनकी अपेक्षासे प्रमाण
स्वीकार किया जाता है; वास्तवमें एक ब्रह्म ही सत्य है, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि अद्वैतवादियोंके
मतमें एक नित्य निरंश परब्रह्म ही सत्य है, इसलिये उनके मतमें लोक ही संभव नहीं।
यदि अद्वैत मत में किसी प्रकार प्रमाणका सद्भाव मान भी लिया जाय, तो अद्वैत के साधक जिस
प्रमाण को स्वीकार किया जाता है, वह प्रमाण प्रत्यक्ष रूप है, या अनुमान रूप है अथवा आगम रूप ?
१. ऋग्वेदपुरुषसूक्ते । २. ईशावास्योपनिषदि । ३. बृहदारण्यक० उ० । युक्तिभिरनुचिन्तनम् मननं ।
श्रुतस्यार्थस्य नैरन्तर्येण दीर्घकालमनुसंधानम् निदिध्यासनं । ४. मैत्र्युपनिषदि । ५. बृहदारण्यक उ० ४.४.१९;
कठोपनिषदि ४.११ । ६. बृहदारण्यक उ० ४.३.१४ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १३ ] स्याद्वादमञ्जरी ११७
आबालगोपालं तथैव प्रतिभासनात् । यच्च निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं तद्भावेदकम् इत्युक्तम् । तदपि
न सम्यक् । तस्य प्रामाण्यानभ्युपगमात् । सर्वस्यापि प्रमाणतत्त्वस्य व्यवसायात्मकस्यैवावि-
संवदाकत्वेन प्रामाण्योपपत्तेः । सविकल्पकेन तु प्रत्यक्षेण प्रमाणभूतेनैकस्यैव विधिरूपस्य
परब्रह्मणः स्वप्नेऽप्यप्रतिभासनात् । यदप्युक्तं “आहुर्विधातृ प्रत्यक्षम्” इत्यादि । तदपि न
पेशलम् । प्रत्यक्षेण ह्यनुवृत्तव्यावृत्ताकारात्मकवस्तुन एव प्रकाशनात् । एतच्च प्रागेव क्षुण्णम् ।
न ह्यनुस्यूतमेकमखण्डं सत्तामात्रं विशेषनिरपेक्षं सामान्यं प्रतिभासते । येन “यदद्वैतं तद्ब्रह्मणो
रूपम्” इत्याद्युक्तं शोभेत । विशेषनिरपेक्षस्य सामान्यस्य खरविषाणवदप्रतिभासनात् । तदुक्तम्-
“निर्विशेषं हि सामान्यं भवेत् खरविषाणवत् ।
सामान्यरहितत्वेन विशेषास्तद्वदेव हि” ॥
ततः सिद्धे सामान्यविशेषात्मन्यर्थे प्रमाणविषये कुत एवैकस्य परब्रह्मणः प्रमाणविषय-
त्वम् । यच्च प्रमेयत्वादित्यनुमानमुक्तम्, तदप्येतेनैवापास्तं बोद्धव्यम् । पक्षस्य प्रत्यक्षबाधित-
त्वेन हेतोः कालात्ययापदिष्टत्वात् । यच्च तत्सिद्धौ प्रतिभासमानत्वसाधनमुक्तम्, तदपि
साधनाभासत्वेन न प्रकृतसाध्यसाधनायालम् । प्रतिभासमानत्वं हि निखिलभावानां स्वतः
परतो वा ? न तावत् स्वतः, घटपटमुकुटशकटादीनां स्वतः प्रतिभासमानत्वेनासिद्धेः । परतः
प्रतिभासमानत्वं च परं विना नोपपद्यते इति । यच्च परब्रह्मविवर्तवर्तित्वमखिलभेदानामित्यु-
क्तम् । तदप्यन्वेत्रन्वीयमानद्वयाविनाभावित्वेन पुरुषाद्वैतं प्रतिबध्नात्येव । न च घटादीनां
प्रत्यक्षसे अद्वैत की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि वह संपूर्ण वस्तुसमूहमें विद्यमान होनेवाले भेदको ही
अर्थात् व्यावर्तक विशेषको ही प्रकाशित करता है । इसी प्रकारसे सभी लोगोंको प्रत्यक्षका ज्ञान होता है ।
निर्विकल्पक प्रत्यक्ष अद्वैत रूप ब्रह्मका ज्ञान कराता है, ऐसा जो कहा है, वह भी ठीक नहीं । क्योंकि निर्वि-
कल्पक प्रत्यक्षको प्रमाण रूपसे स्वीकार ही नहीं किया गया । कारण कि व्यवसायात्मक ( स्वपरको जाननेमें
साधकतम होनेवाले ) सभी प्रमाण अविसंवादी होनेसे प्रामाण्य माने जाते हैं ( और निर्विकल्पक प्रत्यक्ष
स्वपरको जाननेमें साधकतम नहीं है ) । प्रमाणभूत सविकल्पक प्रत्यक्षके द्वारा भी केवल एकरूप विधिरूप
परब्रह्म स्वप्नमें भी प्रतिभासित नहीं हो सकता । तथा, “प्रत्यक्ष विधायक (सन्मात्रका ग्राहक) है”—ऐसा जो
कहा है, वह भी ठीक नहीं। क्योंकि प्रत्यक्षके द्वारा सामान्य-विशेषात्मक पदार्थ ही प्रकाशित किया जाता है—
इसका पहले ही खण्डन किया जा चुका है । पदार्थोंमें अनुस्यूत, एकमात्र रूप, अखण्ड और सत्तामात्र रूप
विशेषकी अपेक्षा न रखनेवाला सामान्य प्रतिभासित नहीं होता जिससे यह कहा जा सके कि “जो अद्वैत
है वह ब्रह्मका स्वरूप है ।” जिस प्रकार खरविषाण प्रतिभासित नहीं होता उसी तरह विशेष की अपेक्षा न
रखनेवाला सामान्य प्रतिभासित नहीं होता । कहा भी है—
“विशेष रहित सामान्य खरविषाणकी तरह है, और सामान्य रहित होनेसे विशेष भी वैसा ही है ।”
इस प्रकार यह सिद्ध हो जाने पर कि सामान्य-विशेषात्मक पदार्थ प्रमाणका विषय होता है, केवल
एकरूप परब्रह्म प्रमाणका विषय कैसे बन सकता है ? तथा, ‘विधिरेव तत्त्वं प्रमेयत्वात्' यह अनुमान भी
इसीसे खंडित हो जाता है । क्योंकि ‘विधिरेव तत्त्वं' इस पक्षके प्रत्यक्षसे बाधित होनेके कारण प्रमेयत्व हेतु
कालात्ययापदिष्ट है । तथा, ‘विधिरेव तत्त्वं' इस पक्षकी सिद्धिके लिए जो 'प्रतिभासमानत्व' हेतु दिया गया था,
वह साधनाभास होनेसे प्रकृत साध्यकी सिद्धि करनेमें असमर्थ है । हम पूछते हैं कि सम्पूर्ण पदार्थोंका प्रतिभास
स्वयं होता है, या दूसरेसे ? सम्पूर्ण पदार्थ स्वयं प्रतिभासित नहीं हो सकते, क्योंकि घट, पट, मुकुट, शकट
आदि पदार्थोंकी स्वतः प्रतिभासमानत्वके रूपसे सिद्धि नहीं होती । पदार्थोंका दूसरेसे प्रतिभासित होना भी
नहीं बन सकता क्योंकि दूसरेसे प्रतिभासित होना दो पदार्थों (द्वैत) के बिना संभव नहीं । तथा, ‘संपूर्ण पदार्थ
१. मीमांसाश्लोकवार्तिक ५ आकृतिवादे १० ।

११८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १३
चैतन्यान्वयोऽप्यस्ति मृदान्वयस्यैव तत्र दर्शनात् । ततो न किञ्चिदेतदपि । अतोऽनुमानादपि
न तत्सिद्धिः । किञ्च, पक्षहेतुदृष्टान्ता अनुमानोपायभूताः परस्परं भिन्नाः अभिन्ना वा ? भेदे
द्वैतसिद्धिः । अभेदे त्वेकरूपतापत्तिः । तत् कथमेतेभ्योऽनुमानमात्मानमासादयेत् । यदि च
हेतुमन्तरेणापि साध्यसिद्धिः स्यात्, तर्हि द्वैतस्यापि वाङ्मात्रतः कथं न सिद्धिः । तदुक्तम्—
“हेतोरद्वैतसिद्धिश्चेद् द्वैतं स्याद्धेतुसाध्ययोः ।
हेतुना चेद् विना सिद्धिर्द्वैतं वाङ्मात्रतो न किम्”१ ॥
“पुरुष एवेदं सर्वम्” इत्यादेः, “सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म” इत्यादेश्चागमादपि न
तत्सिद्धिः । तस्यापि द्वैताविनाभावित्वेन अद्वैतं प्रति प्रामाण्यासम्भवात् । वाच्यवाचकभाव-
लक्षणस्य द्वैतस्यैव तत्रापि दर्शनात् । तदुक्तम्—
“कर्मद्वैतं फलद्वैतं लोकद्वैतं विरुध्यते ।
विद्याऽविद्याद्वयं न स्याद्बन्धमोक्षद्वयं तथा”२ ॥
ततः कथमागमादपि तत्सिद्धिः । ततो न पुरुषाद्वैतलक्षणमेकमेव प्रमाणस्य विषयः । इति
सुव्यवस्थितः प्रपञ्चः ॥ इति काव्यार्थः ॥१३॥
एक ब्रह्मकी ही पर्याय हैं' (सर्वे भावाः ब्रह्मविवर्ताः) इस अनुमानमें भी अन्वेतृ (अन्वित करनेवाला-ब्रह्म) और
अन्वीयमान ( जिसके साथ सम्बन्ध हो-पर्याय ) इन दोनोंका अविनाभाव संबंध होनेसे पुरुषाद्वैतका विरोध
उपस्थित होता है ( क्योंकि दो भिन्न भिन्न पदार्थोंका ही संबंध होता है ) । तथा, घट आदिमें ( परब्रह्मके )
चैतन्य का संबंध भी नहीं पाया जाता, क्योंकि घटका संबंध मिट्टी आदिके साथ है। इसलिये यह भी कुछ नहीं
है । अतः अनुमानसे भी ब्रह्म सिद्ध नहीं होता । तथा, पक्ष, हेतु और दृष्टांतसे अनुमान बनता है; ये पक्ष, हेतु
और दृष्टांत परस्पर भिन्न हैं, अथवा अभिन्न ? भेद माननेसे द्वैत मानना चाहिये, और अभेद माननेसे पक्ष, हेतु
और दृष्टांत एक हो जाते हैं, और पक्ष आदि तीनोंके एक होनेसे अनुमान अपने स्वरूपको कैसे प्राप्त कर सकता
है ( अनुमेय पदार्थको कैसे जान सकता है ) ? यदि आप अनुमानके बिना ही साध्यकी सिद्धि मानें तो
वचन मात्रसे भी द्वैतकी सिद्धि हो सकती है। कहा भी है—
“यदि अद्वैतकी सिद्धि हेतुसे होती हो तो हेतु और साध्यके होनेसे द्वैतकी सिद्धि हो जाती है । यदि
हेतुके बिना ही अद्वैतकी सिद्धि मानो तो वचन मात्रसे द्वैतकी सिद्धि क्यों नहीं हो जाती ?”
तथा, “पुरुष एवेदं सर्वं”, “सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म” आदि आगमसे भी ब्रह्म सिद्ध नहीं होता । क्योंकि
आगममें वाच्य-वाचक संबंध होनेसे द्वैतकी ही सिद्धि होती है । कहा भी है—
“लौकिक और वैदिक अथवा शुभ और अशुभ अथवा पुण्य और पाप रूप कर्मद्वैत, प्रशस्त और
अप्रशस्त रूप फलद्वैत, इहलोक और परलोक रूप लोकद्वैत, विद्या और अविद्या तथा बंध और मोक्ष का अभाव
हो जायेगा ।”
अतएव आगमसे भी अद्वैत परब्रह्मकी सिद्धि नहीं होती । इसलिए पुरुषाद्वैतरूप केवल एक किसी
भी प्रमाणका विषय नहीं हो सकता । अतएव इस दृश्यमान प्रपंचको तात्त्विक ही मानना चाहिये । यह
श्लोकका अर्थ है ॥१३॥
भावार्थ—इस श्लोकमें अद्वैतवादियोंके मायावादकी समीक्षा की गयी है । जैन लोगोंका कहना है
कि यदि माया भावरूप है, तो ब्रह्म और माया दो वस्तुओंके होनेसे अद्वैतवादियोंका अद्वैत नहीं बनता ।
तथा, यदि माया अभावरूप है, तो मायासे जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि अद्वैतवादी मायाको मिथ्या
रूप मान कर भी वस्तु ( अर्थक्रियाकारी ) स्वीकार करें तो स्ववचन विरोध आता है, क्योंकि मिथ्या रूप
और वस्तु दोनों एक साथ नहीं रह सकते ।
१. आप्तमीमांसा २-२६ । २. आप्तमीमांसा २-२५ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी ११५
अथ स्वाभिमतसामान्यविशेषोभयात्मकवाच्यवाचकभावसमर्थनपुरःसरं तीर्थान्तरी-
यप्रकल्पिततदेकान्तगोचरवाच्यवाचकभावनिरासद्वारेण तेषां प्रतिभावैभवाभावमाह—
वेदान्ती—'यह प्रपंच मिथ्या है, क्योंकि मिथ्या प्रतीत होता है, जैसे सीपमें चांदीका ज्ञान मिथ्या
प्रतीत होनेसे मिथ्या है' ( अयं प्रपञ्चो मिथ्यारूपः प्रतीयमानत्वात्, यदेवं तदेवं, यथा शुक्तिशकले कलधौतम्,
तथा चायं तस्मात्तथा )—इस अनुमानसे जगत् मिथ्या सिद्ध होता है। जैन—मिथ्या रूपसे आपका क्या
अभिप्राय है ? यदि ( १ ) अत्यन्त असत्त्वको मिथ्या कहते हो तो शून्यवादियोंकी असत्ख्याति; ( २ ) अन्य
वस्तुके अन्य रूपमें प्रतिभासित होनेको मिथ्या कहते हो तो नैयायिकोंकी विपरीतख्याति स्वीकार करनी
चाहिए। यदि ( ३ ) मिथ्या रूपका अर्थ अनिर्वाच्य, अर्थात् निस्स्वभावत्व, करते हो तो 'निस्स्वभाव' में
स्वभाव शब्दका अर्थ 'भाव' अथवा 'अभाव' करनेपर क्रमसे असत्ख्याति और सत्ख्याति स्वीकार करनी
पड़ेगी। यदि कहो कि ज्ञानके अगोचर होना ही निस्स्वभावत्व है, तो इस जगत्‌के प्रपंचका ज्ञान नहीं होना
चाहिये। तथा प्रपंचके ज्ञानका विषय न होनेसे प्रतीयमानत्व हेतु भी नहीं बन सकता। यदि अर्थप्रपंचके
जैसेके तैसे प्रतिभासित होनेको निस्स्वभावत्व कहो तो विपरीतख्याति माननी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त, यह
अनुमान प्रत्यक्षसे भी बाधित है। वेदान्ती—हमारा अनुमान प्रत्यक्षसे बाधित नहीं हो सकता, क्योंकि
प्रत्यक्ष प्रमाण केवल सामान्य रूप ही है, वह विधि रूप ही वस्तुओंका ज्ञान करता है, निषेध रूप नहीं ।
जैन—प्रत्यक्ष केवल सामान्य रूप नहीं हो सकता, क्योंकि किसी वस्तुका निषेध किये बिना उसका विधि
रूप ज्ञान होना असंभव है, इसलिये प्रत्यक्षको सामान्यविशेषात्मक स्वीकार करके विधायक और निषेधक
दोनों ही स्वीकार करना चाहिये। उक्त अनुमान 'प्रपञ्चो मिथ्या न भवति, असद्विलक्षणत्वात्, आत्मवत्'
इस प्रत्यनुमानसे बाधित भी है। तथा प्रतीयमानत्व हेतु ब्रह्मके साथ व्यभिचारी है।
वेदान्ती—निर्विकल्पक प्रत्यक्षसे ब्रह्मकी सिद्धि होती है, क्योंकि निर्विकल्पक प्रत्यक्ष सत्ता मात्रको
जानता है। निर्विकल्पक प्रत्यक्षसे ब्रह्मका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष विधि रूप ही होता
है, निषेध रूप नहीं। तथा पदार्थोंके भेदको ग्रहण करनेवाला सविकल्पक प्रत्यक्ष भी पदार्थोंको सत्ता रूपसे
जानता है, इसलिये सविकल्पक प्रत्यक्ष भी ब्रह्मका साधक है। क्योंकि सत्ता परब्रह्म रूप है। 'विधिरेव तत्त्वं
प्रमेयत्वात्' इस अनुमानसे भी ब्रह्मकी सिद्धि होती है। इसी तरह आगम आदि भी ब्रह्मके अस्तित्वके साधक
हैं। जैन—निश्चयात्मक और विसंवादसे रहित ज्ञान ही प्रमाण होता है, इसलिये निर्विकल्पक प्रत्यक्ष प्रमाण
नहीं कहा जा सकता। सविकल्पक प्रत्यक्ष भी समस्त भेदोंसे रहित केवल विधि रूप ब्रह्मको नहीं जान
सकता है। क्योंकि जिस प्रकार विशेष रहित सामान्य और सामान्य रहित विशेष वस्तुका ज्ञान असंभव है,
उसी तरह विधिके बिना प्रतिषेध और प्रतिषेधके बिना विधि रूप ज्ञान नहीं हो सकता । अतएव प्रत्यक्ष भी
सामान्य-विशेष रूप हो कर विधि और प्रतिषेध दोनों रूपसे ही पदार्थोंका ज्ञान करता है। 'विधिरेव तत्त्वं
प्रमेयत्वात्' अनुमानमें भी प्रमेयत्व हेतु प्रत्यक्षसे बाधित है, क्योंकि प्रत्यक्ष विधि और निषेध दोनों तरहसे
पदार्थोंका ज्ञान करता है, यह अनुभवगम्य है। तथा आगम प्रमाण माननेपर वाच्य-वाचक भाव माननेसे
द्वैतकी ही सिद्धि होती है।
अब कथंचित् सामान्य और कथंचित् विशेषरूप वाच्य-वाचक भावका समर्थन करके प्रतिवादियोंद्वारा
मान्य एकान्त सामान्य और एकान्त विशेष रूप वाच्य-वाचक भावका खंडन करते हुए उनके प्रतिभा वैभव के
अभाव को सिद्ध करते हैं—

१२० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
अनेकमेकात्मकमेव वाच्यं द्वयात्मकं वाचकमप्यवश्यम् ।
अतोऽन्यथा वाचकवाच्यकॢप्तावतावकानां प्रतिभाप्रमादः ॥१४॥
वाच्यम्—अभिधेयं, चेतनमचेतनं च वस्तु, एवकारस्याप्यर्थत्वात् । सामान्यरूपतया
एकात्मकमपि व्यक्तिभेदेनानेकम्—अनेकरूपम् । अथवानेकरूपमपि एकात्मकम् । अन्योऽन्यं
संवलितत्वात् । इत्थमपि व्याख्याने न दोषः । तथा च वाचकम्—अभिधायकं, शब्दरूपम् ।
तदप्यवश्यम्—निश्चितं । द्वयात्मकं—सामान्यविशेषोभयात्मकत्वाद् एकानेकात्मकमित्यर्थः ।
उभयत्र वाच्यलिङ्गत्वेऽप्यव्यक्तत्वाद् नपुंसकत्वम् । अवश्यमिति पदं वाच्यवाचकयोरुभयोर-
प्येकानेकात्मकत्वं निश्चिन्वत् तदेकान्तं व्यवच्छिनत्ति । अतः—उपदर्शितप्रकारात्, अन्यथा—
सामान्यविशेषैकान्तरूपेण प्रकारेण, वाचकवाच्यकॢप्तौ वाच्यवाचकभावकल्पनायाम्,
अतावकानाम्—अत्वदीयानाम्, अन्ययूथ्यानाम् । प्रतिभाप्रमादः—प्रज्ञास्खलितम् । इत्यक्ष-
रार्थः । अत्र चाल्पस्वरत्वेन वाच्यपदस्य प्रागूनिपाते प्राप्तेऽपि यदादौ वाचकग्रहणं, तत्प्रायोऽर्थ-
प्रतिपादनस्य शब्दाधीनत्वेन वाचकस्यार्च्यत्वज्ञापनाथँम् । तथा च शाब्दिकाः—
“न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते” ॥ इति ॥
भावार्थस्त्वेवम् । एके तीर्थिकाः सामान्यरूपमेव वाच्यतयाभ्युपगच्छन्ति । ते च
द्रव्यास्तिकनयानुपातिनो मीमांसकभेदा अद्वैतवादिनः सांख्याश्च । केचिच्च विशेषरूपमेव वाच्यं
निर्वचन्ति । ते च पर्यायास्तिकनयानुसारिणः सौगताः । अपरे च परस्परनिरपेक्षपदार्थपृथग्भूत-
सामान्यविशेषयुक्तं वस्तु वाच्यत्वेन निश्चिन्वते । ते च नैगमनयानुरोधिनः काणादाः,
आक्षपादाश्च ॥
श्लोकार्थ—जिस प्रकार समस्त पदार्थ ( वाच्य ) अनेक हो कर भी एक हैं, और एक होकर भी
अनेक हैं उसी तरह उन पदार्थोंको कहनेवाले शब्द ( वाचक ) भी एक होकर भी अनेक और अनेक होकर
भी एक हैं। इससे भिन्न प्रकारसे आपको न माननेवालों की, वाच्य-वाचक विषयकल्पना में प्रज्ञाका दोष
स्पष्ट हो जाता है।
व्याख्यार्थ—जैसे चेतन-अचेतन वस्तु ( वाच्य ) सामान्यसे एक हो कर भी व्यक्तिरूप से अनेक,
और विशेषरूप से अनेक हो कर भी सामान्य से एक हैं, वैसे ही चेतन और अचेतन वस्तु का वाचक भी
सामान्य और विशेष होनेसे एक रूप और अनेक रूप है। वाच्य-वाचकको सामान्य-विशेष रूप न स्वीकार
करनेवाले अन्यमतावलम्बी प्रज्ञासे स्खलित होते हैं। वाच्य शब्द में अल्प स्वर होनेसे वाच्यका वाचक शब्दसे
पहले निपात होना चाहिये था, परन्तु अर्थका प्रतिपादन करना शब्दके आधीन है, यह बतानेके लिये वाचक
शब्दको ही पहले रखा है। वैयाकरणोंने कहा भी है—
“शब्दके सम्बन्धके बिना लोकमें कोई ज्ञान नहीं होता, सम्पूर्ण ज्ञान शब्दके साथ ही सम्बद्ध है ।”
( १ ) केवल द्रव्यास्तिक नयको माननेवाले अद्वैतवादी, मीमांसक और सांख्य सामान्यको ही
सत् ( वाच्य ) स्वीकार करते हैं। ( २ ) केवल पर्यायास्तिक नयको माननेवाले बौद्ध लोग विशेषको ही
सत् मानते हैं। ( ३ ) केवल नैगम नयका अनुकरण करनेवाले न्याय-वैशेषिक परस्पर भिन्न और निरपेक्ष
सामान्य और विशेष दोनोंको स्वीकार करते हैं।
१. भर्तृहरिकृतवाक्यपदीये १-१२४।