स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
७४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ९
अथात्मनः कायपरिमाणत्वे तत्खण्डने खण्डनप्रसङ्गः, इति चेत्, कः किमाह शरीरस्य
खण्डने कथंचित् तत्खण्डनस्येष्टत्वात् । शरीरसम्बद्धात्मप्रदेशेभ्यो हि कतिपयात्मप्रदेशानां
खण्डितशरीरप्रदेशेऽवस्थानादात्मनः खण्डनम् । तच्चात्र विद्यत एव । अन्यथा शरीरात् पृथग-
भूतावयवस्य कम्पोपलब्धिर्न स्यात् । न च खण्डितावयवानुप्रविष्टस्यात्मप्रदेशस्य पृथगात्म-
त्वप्रसङ्गः, तत्रैवानुप्रवेशात् । न चैकत्र सन्तानेऽनेके आत्मानः । अनेकार्थप्रतिभासिज्ञानाना-
मेकप्रमात्राधारतया प्रतिभासाभावप्रसङ्गात् । शरीरान्तरव्यवस्थितानेकज्ञानावसेयार्थसंवि-
त्तिवत् ॥
कथं खण्डितावयवयोः संघट्टनं पश्चाद् इति चेत्, एकान्तेन छेदानभ्युपगमात् । पद्मिना-
लतन्तुवत् छेदस्यापि स्वीकारात् । तथाभूतादृष्टवशात् तत्संघट्टनमविरुद्धमेवेति तनुपरिमाण
एवात्माङ्गीकर्तव्यः, न व्यापकः । तथा च आत्मा व्यापको न भवति, चेतनत्वात्, यत्तु व्यापकं न
तत् चेतनम्, यथा व्योम, चेतनश्चात्मा, तस्माद् न व्यापकः । अव्यापकत्वे चास्य तत्रैवोपल-
शरीरके पहले परिमाणको छोड़े बिना उत्तर परिमाणकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? समाधान—यह ठीक
नहीं । क्योकि बालकका शरीर छोड़ कर युवा शरीर प्राप्त करते समय आत्माका सर्वथा विनाश नहीं होता ।
जैसे फण सहित अवस्थाको छोड़कर फण रहित अवस्थाको प्राप्त करते समय सर्पकी आत्माका सर्वथा विनाश
नहीं होता, उसी तरह बाल शरीरसे युवा शरीरकी अवस्था प्राप्त करते समय आत्माका नाश नहीं होता ।
अतएव आत्माको शरीर-परिमाण माननेपर परलोक आदिका अभाव नहीं हो सकता । क्योंकि पर्यायकी
अपेक्षासे अनित्य होने पर भी द्रव्यकी अपेक्षासे आत्मा नित्य है ।
शंका—आत्माको शरीर-परिमाण माननेपर शरीरके नाश होनेसे आत्माका भी नाश हो जाना चाहिये ।
समाधान—आप यह क्या कहते हैं, शरीरके नाश होनेपर आत्माका कथंचित् नाश हमने स्वयं स्वीकार
किया है । क्योंकि शरीरसे सम्बद्ध आत्मप्रदेशोंमें कुछ आत्मप्रदेशोंके खण्डित शरीरमें रहनेकी अपेक्षासे आत्माका
नाश होता ही है । यदि इस अपेक्षासे आत्माका नाश न माना जाय, तो शरीरके तलवार आदिसे काटे जानेपर
शरीरसे भिन्न अवयवोंमें कम्पन की उपलब्धि नहीं होनी चाहिये । परन्तु जिस समय पूर्ण शरीरसे कुछ अवयव
कट कर अलग हो जाते हैं, उस समय उन अवयवोंमें कम्पन आदि क्रिया होती है ( जैन मान्यताके अनुसार,
इन कटे हुए अवयवोंमें आत्माके कुछ प्रदेश रहते हैं, इसीलिये यह क्रिया होती है ) अतएव आत्मा नाशमान भी
है । शंका—शरीरके खण्डित अवयवोंमें आत्माके प्रदेशोंको स्वीकार करनेसे खण्डित अवयवोंमें भिन्न आत्मा
मानना चाहिये । समाधान—यह बात नहीं है । क्योंकि खण्डित अवयवोंमें रहनेवाले आत्माके प्रदेश फिरसे
पहले शरीरमें ही लौट आते हैं । तथा, एक स्थानमें अनेक आत्मा नहीं बन सकते, अन्यथा अनेक पदार्थोंका
निश्चय करानेवाली नेत्र आदि इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानको एक ज्ञाता रूप आत्माके आधारसे पदार्थोंका
निश्चय न हो सकेगा । इसलिये एक शरीरमें अनेक आत्मा माननेपर जिस रूपको शरीरके नेत्र रूप अवयवमें
स्थित आत्मा देखता है, उसका निश्चय नेत्रस्थ आत्माको ही होना चाहिये, कानकी आत्माको नहीं । फिर,
एक ज्ञाताके आधारसे प्रत्येक आत्मामें ‘मैं देखता हूँ’, ‘मैं सूँघता हूँ’ इस प्रकारका निश्चित ज्ञान नहीं हो
सकता ।
शंका—आत्माके अवयव खण्डित हो जानेपर वे बादमें एक कैसे हो जाते हैं ? समाधान—हम
लोग आत्माके प्रदेशोंका सर्वथा उच्छेद नहीं मानते । हमारे मतमें कमलकी डण्डीके तन्तुओंकी तरह आत्माका
उच्छेद स्वीकार किया गया है । जिस प्रकार कमलकी नालके टुकड़े करनेपर टूटे हुए तन्तु फिरसे आकर मिल
जाते हैं, वैसे ही शरीरके खण्डित होनेपर खण्डित आत्माके प्रदेश फिरसे पहले आत्माके प्रदेशोंसे आकर मिल
जाते हैं । इन आत्माके प्रदेशोंका मिल जाना अदृष्टके बलसे सम्भव है, इसलिए आत्माको व्यापक न मानकर
शरीर-परिमाण ही मानना चाहिये । तथा, चेतन होनेसे आत्मा व्यापक नहीं है । जो व्यापक है वह चेतन
नहीं है, जैसे आकाश । आत्मा चेतन है, इसलिये वह व्यापक नहीं है । आत्माके अव्यापक होनेपर, 'जहां
अन्य. यो. व्य. श्लोक ९ ] स्याद्वादमञ्जरी ७५
भ्यमानगुणत्वेन सिद्धा कायप्रमाणता । यत्पुनरष्टसमयेसाध्यकेवलिसमुद्घातदशायामार्हता-
नामपि चतुर्दशरज्जूच्चैस्तमकलोकव्यापित्वेनात्मनः सर्वव्यापकत्वम्, तत् कादाचित्कम्, इति
न तेन व्यभिचारः । स्याद्वादमन्त्रकवचावगुण्ठितानां च नेदृशविभीषिकाभ्यो भयम् ।। इति
काव्यार्थः ॥ ९ ॥
जिसके गुण पाये जाते हैं' हेतुसे आत्मा शरीर-परिमाण ही सिद्ध होती है। तथा केवलीके समुद्घात दशामें
आठ समयमें चौदह राजू परिमाण तीन लोकमें व्याप्त होनेकी अपेक्षा जो आत्माको व्यापक कहा है, वह कभी-
कभी होता है, नियमित रूपसे नहीं, इसलिये यहाँ पर समुद्घात दशामें आत्माके व्यापक होनेसे व्यभिचार नहीं
आता। ( मूल शरीरको न छोड़ कर आत्माके प्रदेशोंके बाहर निकलनेको समुद्घात कहते हैं। यह समुद्घात
वेदना, कषाय, मारणांतिक, तैजस, विक्रिया, आहारक और केवलीके भेदसे सात प्रकारका है। ( १ ) तीव्र
वेदना होनेके समय मूल शरीरको न छोड़ कर आत्माके प्रदेशोंके बाहर जानेको वेदनासमुद्घात कहते हैं।
( २ ) तीव्र कषायके उदयसे दूसरेका नाश करनेके लिये मूल शरीरको विना छोड़े आत्माके प्रदेशोंके बाहर
निकलनेको कषायसमुद्घात कहते हैं। ( ३ ) जिस स्थानमें आयुका बन्ध किया हो, मरनेके अन्तिम समय उस
स्थानके प्रदेशोंको स्पर्श करनेके लिये मूल शरीरको न छोड़ कर आत्माके प्रदेशोंके बाहर निकलनेको मारणां-
तिकसमुद्घात कहते हैं। ( ४ ) तैजससमुद्घात शुभ और अशुभके भेदसे दो प्रकारका होता है। जीवोंको किसी
व्याधि अथवा दुर्भिक्षसे पीड़ित देखकर मूल शरीरको न छोड़ मुनियोंके शरीरसे बारह योजन लम्बे, मूलभागमें
सूच्यंगुलके असंख्येयभाग, अग्रभागमें नौ योजन, शुभ आकृति वाले पुतलेके बाहर निकल कर जानेको शुभ-
तैजससमुद्घात कहते हैं। यह पुतला, व्याधि, दुर्भिक्ष आदिको नष्ट करके वापिस लौट आता है। किसी प्रकार-
के अपने अनिष्टको देखकर क्रोधके कारण मूल शरीरके बिना छोड़े ही मुनियोंके शरीरसे उक्त परिमाणवाले
अशुभ पुतलेके बाहर निकल कर जानेको अशुभ-तैजससमुद्घात कहते हैं। यह अशुभ पुतला अपनी अनिष्ट
वस्तुको नष्ट करके मुनिके साथ स्वयं भी भस्म हो जाता है। द्वीपायन मुनिने अशुभ-तैजससमुद्घात किया
था। ( ५ ) मूल शरीरको न छोड़ कर किसी प्रकारकी विक्रिया करनेके लिये आत्माके प्रदेशोंके बाहर जानेको
विक्रियासमुद्घात कहते हैं। ( ६ ) ऋद्धिधारी मुनियोंको किसी प्रकारकी तत्वसम्बन्धी शंका होनेपर उनके
मूल शरीरको बिना छोड़े शुद्ध स्फटिकके आकार, एक हाथके बराबर पुतलेका मस्तकके बीचसे निकलकर शंकाकी
निवृत्तिके लिये केवली भगवान्के पास जाना, आहारकसमुद्घात है। यह पुतला अन्तर्मुहूर्तमें केवलीके पास
पहुँच जाता है, और शंकाकी निवृत्ति होनेपर अपने स्थानको लौट आता है। ( ७ ) वेदनीय कर्मके अधिक
रहनेपर और आयु कर्मके कम रह जानेपर आयु कर्मको बिना भोगे ही आयु और वेदनीय कर्मके बराबर करनेके
लिये आत्मप्रदेशोंका समस्त लोकमें व्याप्त हो जाना केवलिसमुद्घात है। वेदना, कषाय, मारणांतिक, तैजस,
वैक्रियक और आहारक समुद्घातमें छह समय ( लोकप्रकाश आदि श्वेताम्बर शास्त्रोंमें इनका समय अन्तमुहूर्त
१. हंतेर्गमिक्रियात्वात्संभूयात्मप्रदेशानां च बहिरुद्गमनं समुद्घातः । स सप्तविधः । वेदनाकषायमारणां-
तिकतेजोविक्रियाऽऽहारककेवलिविषयभेदात् । वेदनीयस्य बहुत्वार्दलपत्वाच्चायुषोऽनाभोगपूर्वक्रमायुःसमकरणार्थं
द्रव्यस्वभावत्वात् सुराद्रव्यस्य फेनवेगबुद्बुदाविर्भावोपशमनवद्देहस्यात्मप्रदेशानां बहिःसमुद्घातनं केवलिसमु-
द्घातः । केवलिसमुद्घातः अष्टसमयिकः । दंडकपाटप्रतरलोकपूरणानि चतुर्षु समयेषु, पुनः प्रतरकपाटदण्ड-
स्वशरीरानुप्रवेशाश्चतुर्षु इति । राजवार्तिके पृ० ५३
२. उब्भियदलेकमुरवद्धयसंचयसण्णिहो हवे लोगो ।
अद्धदयो मुरवसमो चोद्दसरज्जूउदो सव्वो ॥
छाया-उद्भूतदलैकमुरजध्वजसंचयसन्निभो भवेत् लोकः ।
अर्धोदयः मुरजसमः चतुर्दशरज्ज्वोदयः सर्वः ॥
त्रिलोकसारे १-६
७६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ९
बताया गया है ) और केवलिसमुद्घातमें आठ समय लगते हैं। केवलिसमुद्घातमें पहले चार समयोंमें आत्माके
प्रदेश क्रमसे दण्ड, कपाट, प्रतर ( मन्थान—लोकप्रकाश ) और लोकपूर्ण होते हैं, तथा बादमें प्रतर
( मन्थान ) कपाट और दण्ड-परिमाण होकर अपने स्थानको लौट जाते हैं। यहाँ केवलिसमुद्घात अवस्थामें
ही आत्माको सर्वव्यापक कहा है। ) स्याद्वाद रूपी मंत्रके कवचसे अवगुण्ठित हम लोगों को इस प्रकार की
विभीषिकाओंका भय नहीं है। यह श्लोकका अर्थ है।
भावार्थ—इस श्लोकमें आत्माके सर्वव्यापकत्वका खंडन किया गया है। अनुमान—'जहाँ जिस
वस्तुके गुण पाये जाते हैं, वह वस्तु उसी जगह उपलब्ध होती है, जैसे जहाँ घटके रूपादि गुण पाये जाते हैं,
वहीं पर घट उपलब्ध होता है।'
शंका—पुष्पके एक स्थानमें रहनेपर भी उसकी गंध दूसरे स्थानमें भी देखी जाती है। समा-
धान—दूर देशमें पाये जानेवाली गंध पुष्पका गुण नहीं है, पुष्पमें रहनेवाले गंध पुद्गल ही उड़कर हमारी
नाक तक आते हैं।
शंका—मंत्र आदि दूर स्थानसे भी मारण, उच्चाटन आदि क्रिया करते हैं। समाधान—मारण,
उच्चाटन मंत्रका गुण नहीं हैं, परन्तु मंत्रके अधिष्ठाता देव ही मारण आदि क्रिया करनेमें समर्थ होते हैं।
इसलिए 'आत्मा व्यापक नहीं हैं, क्योंकि आत्माके गुण सर्वत्र उपलब्ध नहीं होते । जिसके गुण सर्वत्र उपलब्ध
नहीं होते, वह व्यापक नहीं होता, जैसे घटके गुण सर्वत्र उपलब्ध नहीं होते, इसलिए घट व्यापक नहीं है।
आत्माके गुण भी सर्वत्र नहीं पाये जाते, इसलिए आत्मा भी व्यापक नहीं है। आकाश व्यापक है, इसलिये
आकाशके गुण सर्वत्र पाये जाते हैं।'
शंका—अदृष्ट आत्माका गुण है। यह अदृष्ट दूर स्थानमें भी क्रिया करता है। यदि आत्माको सर्व-
व्यापक न मानें, तो अदृष्ट दूर देशमें क्रिया नहीं कर सकता। समाधान—अदृष्टके माननेकी कोई आवश्य-
कता नहीं है। अदृष्टकी सिद्धिमें हमें कोई प्रमाण भी नहीं मिलता। अग्निकी शिखाका ऊँचा जाना आदि
कार्य वस्तुओंके स्वभावसे ही होते हैं। यदि अदृष्टसे सत्र कार्य होने लगें, तो फिर ईश्वरकी भी कोई आवश्य-
कता न रहे। तथा, आत्माको सर्वव्यापक मानकर उसे नाना स्वीकार करनेमें आत्माओंमें परस्पर भिड़न्त हो
जानी चाहिये, और एक आत्माका सुख दूसरी आत्माको उपभोग करना चाहिये। तथा, सर्वव्यापक आत्माको
ईश्वरकी आत्मामें प्रवेश करना चाहिए, इसलिए या तो ईश्वर भी सृष्टिकर्ता न रहेगा, अथवा आत्मा भी
सृष्टिकर्ता हो जायेगा।
शंका—यदि आत्माको व्यापक न मानें तो आत्मा अपने दूसरे जन्मके शरीरके योग्य परमाणुओंको
अपनी ओर कैसे आकर्षित कर सकता है ? यदि किसी तरह वह अपने शरीरके योग्य परमाणुओंको आकर्षित
कर भी ले, तो भी आत्मा शरीर-परिमाण ही ठहरेगा, इसलिए आत्माको सावयव होनेसे कार्य ( अनित्य )
मानना चाहिये। समाधान—जैन लोग आत्माको सावयव मानते हैं, इसलिए आत्मामें परिमाण भी होता
है। हम लोग किसी भी पदार्थको एकान्त नित्य नहीं मानते।
शंका—यदि आत्मा शरीर-परिमाण हैं, तो वह शरीरमें प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि एक मूर्त
पदार्थका दूसरे मूर्त पदार्थमें प्रवेश नहीं हो सकता। समाधान—मूर्तत्वसे यदि आप लोगोंका अभिप्राय
रूपादिको धारण करनेवालेसे है, तो हम लोग आत्माको रूप आदिसे युक्त नहीं मानते। हाँ, यदि अव्यापकत्व-
को आप लोग मूर्त कहते हैं, तो हम आत्माको अवश्य शरीर-परिमाण मानते हैं। अतएव जैनसिद्धान्त के
अनुसार आत्मा द्रव्यकी अपेक्षा नित्य है, और पर्यायकी अपेक्षा अनित्य ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ७७
वैशेषिकनैयायिकयोः प्रायः समानतन्त्रत्वादौलुक्यमते क्षिप्ते यौगमतमपि क्षिप्तमेवा-
वसेयम्। पदार्थेषु च तयोरपि न तुल्या प्रतिपत्तिरिति सांप्रतमक्षपादप्रतिपादितपदार्थानां
सर्वेषां चतुर्थपुरुषार्थं प्रत्यसाधकतमत्वे वाच्येऽपि, तदन्तःपातिनां छलजातिनिग्रहस्थानानां
परोपन्यासनिरासमात्रफलतया अत्यन्तमनुपादेयत्वात् तदुपदेशदातुर्वैराग्यमुपहसन्नाह—
स्वयं विवादग्रहिले वितण्डापाण्डित्यकण्डूलमुखे जनेऽस्मिन् ।
मायोपदेशात् परमर्म भिन्दन्नहो विरक्तो मुनिरन्यदीयः ॥१०॥
अन्ये—अविज्ञाततत्वदाङ्गासारतयाऽनुपादेयनामानः परे, तेषामयं शास्त्रत्वेन सम्बन्धी
अन्यदीयो मुनिः अक्षपादऋषिः, अहो विरक्तः–अहो वैराग्यवान् । अहो इत्युपहासगर्भमाश्र्चर्यं
सूचयति । अन्यदीय इत्यत्र “ईयकारके”१ इति दोऽन्तः । किं कुर्वन्नित्याह । परमर्म भिन्दन्—
जातावेकवचनप्रयोगात् परमर्माणि व्यथयन् । “बहुभिरात्मप्रदेशैरधिष्ठिता देहावयवा मर्माणि”
इति पारिभाषिकी संज्ञा। तत उपचारात् साध्यस्वतत्त्वसाधनाव्यभिचरितया प्राणभूतः
साधनोपन्यासोऽपि मर्मैव मर्म । कस्मात् तद्भिन्दन्, मायोपदेशाद्धेतोः, माया–परवञ्चनम्,
तस्या उपदेशः छलजातिनिग्रहस्थानलक्षणपदार्थत्रयप्ररूपणद्वारेण शिष्येभ्यः प्रतिपादनं, तस्मात्
“गुणाद्स्त्रियां न वा”२ इत्यनेन हेतौ तृतीयाप्रसङ्गे पञ्चमी । कस्मिन् विषये मायामयमुपदिष्टवान्
इत्याह । अस्मिन् प्रत्यक्षोपलक्ष्यमाणे, जने–तत्त्वातत्त्वविमर्शबहिर्मुखतया प्राकृतप्राये लोके ।
कथम्भूते, स्वयम्-आत्मना परोपदेशनिरपेक्षमेव, विवादग्रहिले-विरुद्धः-परस्परलक्ष्यीकृतपक्षा-
धिक्षेपपक्षः, वादो-वचनोपन्यासो विवादः। तथा च भगवान् हरिभद्रसूरिः—
“लब्धिख्यात्यर्थिना तु स्याद् दुःस्थितेनामहात्मना ।
छलजातिप्रधानो यः स विवाद इति स्मृतः ”३ ॥
तेन ग्रहिल इव-ग्रहगृहीत इव । तत्र यथा ग्रहाद्यपस्मारपरवशः पुरुषो यत्किञ्चनप्रलापी स्याद्
एवमयमपि जन इति भावः । तथा, वितण्डा–प्रतिपक्षस्थापनाहीनं वाक्यम् । वितण्ड्यते
आहन्यतेऽनया प्रतिपक्षसाधनमिति व्युत्पत्तेः । “अभ्युपेत्य पक्षं यो न स्थापयति स वैतण्डिक
वैशेषिक और नैयायिकोंके सिद्धान्त प्रायः एकसे ही हैं, इसलिये वैशेषिकोंके सिद्धान्तोंका खण्डन होनेसे
नैयायिकोंके सिद्धान्तोंका भी खण्डन हो गया समझना चाहिये । वैशेषिक और नैयायिक लोग पदार्थोंको भिन्न
प्रकारसे स्वीकार करते हैं । अतएव यद्यपि अक्षपादद्वारा प्रतिपादित सम्पूर्ण पदार्थ मोक्षके कारण नहीं हैं,
फिर भी उन पदार्थोंमें गर्भित, केवल दूसरेके कथनका तिरस्कार करनेवाले छल, जाति और निग्रहस्थान
नामक पदार्थ सर्वथा त्याज्य हैं, इसलिए छल जाति और निग्रहस्थानके उपदेष्टाके वैराग्यका उपहास करते
हुए कहते हैं—
श्लोकार्थ—आश्चर्य है कि स्वयं ही विवाद रूपी पिशाचसे जकड़े हुए, वितण्डा रूप पाण्डित्यसे
मुँहको खुजलाते हुए, तथा छल, जाति और निग्रहस्थानके उपदेशसे दूसरोंके निर्दोष हेतुओंका खण्डन करने-
वाले मुनि, वीतराग समझे जाते हैं !
व्याख्यार्थ—‘अस्मिन् स्वयं विवादग्रहिले वितण्डापाण्डित्यकण्डूलमुखे जने मायोपदेशात् परमर्म
भिन्दन् अन्यदीयः मुनिः अहो विरक्तः’—भूत पिशाच आदिके वशीभूत हुए पुरुषकी तरह स्वयं दूसरोंके उपदेशके
बिना. ही विवाद [ दूसरेके मतको खण्डन करनेवाला वचन । हरिभद्रसूरिने कहा है—
“लाभ और ख्यातिके चाहनेवाले कलुषित और नीच लोग छल और जातिसे युक्त जो कुछ कथन करते
हैं, वह विवाद है ।” ] से ग्रसित, तथा वितण्डा [ जिससे प्रतिपक्ष, अर्थात् अपने पक्षमें प्रतिवादीद्वारा दिये हुए
१. हैमसू. ३-२-१२१ । २. हैमसू. २-२२-७७ । ३. हरिभद्रसूरिकृते अष्टके १२-४ ।
७८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १०
इत्युच्यते'” इति न्यायवार्त्तिकम् । वस्तुतस्त्वपरामृष्टतत्त्वात्त्वविचारं मौखर्यं वितण्डा । तत्र
यत्पाण्डित्यम्-अविकलं कौशलं, तेन कण्डूलं मुखं लपनं यस्य स तथा तस्मिन् । कण्डूः-खर्जूः,
कण्डूरस्यास्तीति कण्डूलम्, सिध्मादित्वाद् मत्वर्थीयो लप्रत्ययः । यथा क्लान्तरुत्पन्नकृमि-
कुलजनितां कण्डूतिं निरोद्धुमपारयन् पुरुषो व्याकुलतां कलयति, एवं तन्मुखमपि वितण्डा-
पाण्डित्येनासंबद्धप्रलापचापलमाकलयत् कण्डूलमित्युपचर्यते ॥
एवं च स्वरसत एव स्वस्वाभिमतव्यवस्थापनाविसंस्थुलो वैतण्डिकलोकः । तत्र च
तत्परमाप्तभूतपुरुषविशेषपरिकल्पितपरवञ्चनप्रचुरवचनरचनोपदेशश्चेत् सहायः समजनेि, तदा
स्वत एव ज्वालाकलापजटिले प्रज्वलति हुताशन इव कृतो घृताहुतिप्रक्षेप इति । तैश्च भवाभि-
नन्दिभिर्वादिभिरेतादृशोपदेशदानमपि तस्य मुनेः कारुणिकत्वकोटावारोपितम् । तथा चाहुः-
“दुःशिक्षितकुतर्कांशलेशवाचालितstepाननाः ।
शक्याः किमन्यथा जेतुं वितण्डाटोपमण्डिताः ॥१॥
गतानुगतिको लोकः कुमार्गं तत्रतारितः ।
मा गादिति छलादीनि प्राह कारुणिको मुनिः” ॥२॥
कारुणिकत्वं च वैराग्याद् न भिद्यते । ततो युक्तमुक्तम् अहो विरक्त इति स्तुतिकारेणो-
पहासवचनम् ॥
अथ मायोपदेशादिति सूचनासूत्रं वितन्यते । अक्षपादमते किल षोडशपदार्थाः।
“प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रह-
स्थानानां तत्त्वज्ञानाद् निःश्रेयसाधिगमः” इति वचनात् । न चैतेषां व्यस्तानां समस्तानां वा
दोषोंका खण्डन कर अपने पक्षका स्थापन न किया जा सके। न्यायवार्तिकमें कहा है- “अपने पक्षको
स्वीकार कर के जो स्वपक्षको स्थापित नहीं कर सकता, उसे वैतण्डिक कहते हैं।" वास्तवमें तत्त्व-अतत्त्वका
विचार न कर मौखर्यको ही वितण्डा कहा है] रूप पाण्डित्यसे असम्बद्ध प्रलाप करनेवाले तत्त्व और
अतत्त्वके विचारसे बहिर्मुख, छल जाति और निग्रहस्थानका उपदेश देकर दूसरोंके निर्दोष हेतुओंका खण्डन
करनेवाले, आपकी आज्ञासे बाह्य, ऐसे अक्षपाद ऋषि, आश्चर्य है कि वीतराग कहे जाते हैं !
यदि अपने मतको स्थापित करनेके लिए आतुर वैतण्डिक लोगोंको परम आप्त कहे जानेवाले पुरुषोंके
द्वारा दूसरोंकी वंचना करनेवाले वचनोंका उपदेश दिया जाय, तो वह जलती हुई अग्निमें घीकी आहुतिका
काम देता है । संसारमें आनन्द माननेवाले वादियोंने इस प्रकारका उपदेश करनेवाले मुनि भी कारुणिक
बताया है ! उन लोगोंने कहा है-
“कुतर्कसे वाचालित वितण्डावादी छल आदिके बिना नहीं जीते जा सकते ॥१॥
लोग एक दूसरेके पीछे चलनेवाले होते हैं। इसलिये कुताकिकोंसे ठगाये जाकर लोग उनका अनुकरण
न करने लग जांय, अतएव कारुणिक मुनि ने छल आदि का उपदेश किया है।" ॥२॥
करुणा और वैराग्य अलग अलग नहीं हैं । अतएव स्तुतिकारने, 'अहो विरक्तः' ऐसा कह कर जो
उपहासवचन का प्रयोग किया है, वह ठीक है ।
१ उद्योतकरविरचितन्यायवार्त्तिके १-१-१ ।
२ भवाभिनन्दी-
असारोऽप्येष संसारः सारवानिव लक्ष्यते ।
दधिदुग्धाम्बुताम्बूलपुष्पपण्याङ्गनादिभिः ॥
इत्यादिवचनैः संसाराभिनन्दनशीलः ।
३ गौतमसूत्रे १-१-१
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ७९
अधिगमो निःश्रेयसावाप्तिहेतुः। न ह्येकेनैव क्रियाविरहितेन ज्ञानमात्रेण मुक्तिर्युक्तिमती ।
असमग्रसामग्रीकत्वात् । विघटितैकचक्ररथेन मनीषितनगरप्राप्तिवत् ॥
न च वाच्यं न खलु वयं क्रियां प्रतिषिधामः, किन्तु तत्त्वज्ञानपूर्विकाया एव तस्या
मुक्तिहेतुत्वमिति ज्ञानार्थं तत्त्वज्ञानाद् निःश्रेयसाधिगम इति ब्रूम इति। न ह्यमीषां संहते अपि
ज्ञानक्रिये मुक्तिप्राप्तिहेतुभूते । वितथत्वात् तज्ज्ञानक्रिययोः । न च वितथत्वमसिद्धम् । विचार्य-
माणानां षोडशानामपि तत्त्वाभासत्वात् । तथाहि तैः प्रमाणस्य तावद् लक्षणमित्थं सूत्रितम्—
“अर्थोपलब्धिहेतुः प्रमाणम्” १इति । एतच्च न विचारसहम् । यतोऽर्थोपलब्धौ हेतुत्वं यदि
निमित्तत्वमात्रं, तत्सर्वकारकासाधारणमिति कर्तृकर्मादेरपि प्रमाणत्वप्रसङ्गः । अथ कर्तृकर्मादि-
विलक्षणं हेतुशब्देन करणमेव विवक्षितं, तर्हि तज्ज्ञानमेव युक्तं, न चेन्द्रियसन्निकर्षादि ।
यस्मिन् हि सत्यर्थ उपलब्धो भवति, स तत्करणम् । न चेन्द्रियसन्निकर्षसामग्र्यादौ सत्यपि
ज्ञानाभावेऽर्थोपलम्भः । साधकतमं हि करणम् । अव्यवहितफलं च तदिष्यते । व्यवहितफल-
स्यापि करणत्वे दुग्धभोजनादेरपि तथाप्रसङ्गः । तन्न ज्ञानादन्यत्र प्रमाणत्वम् । अन्यत्रोपचा-
रात् । यदपि न्यायभूषणसूत्रकारेणोक्तम्— “सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम्” २ इति, तत्रापि
साधनग्रहणात् कर्तृकर्मनिरासेन करणस्यैव प्रमाणत्वं सिध्यति । तथाऽप्यव्यवहितफलत्वेन
साधकतमत्वं ज्ञानस्यैव इति न तत् सम्यग्लक्षणम् । “स्वपरव्यवसायि ज्ञानं प्रमाणम्” ३
इति तु तात्त्विकं लक्षणम् ॥
अक्षपादके (नैयायिकोंके) मतमें सोलह पदार्थ माने गये हैं । कहा भी है— “प्रमाण, प्रमेय, संशय,
प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान
के तत्त्वज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है ।” किन्तु इन सोलह पदार्थोंमें एक-एकका अथवा समस्त पदार्थोंका जान
लेना मोक्षकी प्राप्तिमें कारण नहीं है । क्योंकि क्रियाके बिना केवल ज्ञानमात्रसे ही मुक्ति नहीं मिलती । जिस
प्रकार रथके दो पहियोंके बिना केवल एक पहियेसे नगरमें नहीं घूमा जा सकता, उसी तरह ज्ञान और क्रिया
दोनोंके बिना केवल ज्ञान-मात्रसे मोक्ष नहीं मिलता ।
शंका—हम लोग क्रियाका निषेध नहीं करते, किन्तु सोलह पदार्थोंके तत्त्वज्ञानसे होनेवाली क्रिया ही
मोक्षकी प्राप्तिमें कारण है, यह बतानेके लिये हमने कहा है “तत्त्वज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती हैं ।”
समाधान—आप लोगोंके द्वारा माने हुए ज्ञान और क्रिया दोनों मिल कर भी मोक्षके कारण नहीं हो सकते,
क्योंकि वे ज्ञान और क्रिया दोनों मिथ्या हैं । ज्ञान और क्रियाका मिथ्या होना असिद्ध नहीं है, क्योंकि विचार
करनेपर ये सोलह पदार्थ तत्त्वाभास सिद्ध होते हैं । आप लोगोंने जो “अर्थोपलब्धिमें हेतुको प्रमाण”
स्वीकार किया है, वह ठीक नहीं । क्योंकि यदि निमित्त मात्रको ही अर्थोपलब्धिमें हेतु कहा जाय तो
कर्ता, कर्म आदि कारकोंको भी प्रमाण मानना चाहिये । कर्ता, कर्म आदि भी पदार्थोंके ज्ञानमें निमित्त कारण
हैं । यदि आप कर्ता, कर्म आदि कारकोंसे विलक्षण करण कारकको ही हेतु कहें, तो इन्द्रिय और पदार्थके
सम्बन्धको पदार्थके ज्ञानमें कारण न कह कर केवल ज्ञानको ही पदार्थोंके करण मानना चाहिये । क्योंकि
इन्द्रिय और पदार्थका सम्बन्ध होनेपर भी ज्ञानका अभाव होनेसे पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता । जिसके होनेपर
पदार्थका ज्ञान होता है, वह पदार्थके ज्ञानका करण है, परन्तु इन्द्रियसन्निकर्ष आदि सामग्रीके रहते हुए भी
ज्ञानके अभावमें पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता । तथा, साधकतमको ही करण मानना चाहिये । इसी साधकतम
ज्ञान रूप करणके होनेसे ही पदार्थोंके जानने रूप कार्यकी उत्पत्ति होती है । यदि करणको परम्परासे फल
देनेवाला माना जाय, तो दुग्ध, भोजन आदि भी पदार्थके ज्ञानमें करण हो सकते हैं । अतएव ज्ञानको छोड़
कर और कोई प्रमाण नहीं मानना चाहिये । क्योंकि ज्ञान ही पदार्थोंके जाननेमें करण है, ज्ञानको छोड़कर
१. वात्स्यायनभाष्ये । २. न्यायसारे भासर्वज्ञप्रणीते १-१ । ३. प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकारे १-२ ।
८० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १०
प्रमेयमपि तत्रात्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रत्यभावफलदुःखापवर्गभेदाद्
द्वादशविधमुक्तम् । तन्न सम्यग् । यतः शरीरेन्द्रियबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषफलदुःखानाम् आत्म-
न्येवान्तर्भावो युक्तः । संसारिण आत्मनः कथञ्चित् तद्विषयभूतत्वात् । आत्मा च प्रमेय
एव न भवति । तस्य प्रमातृत्वात् । इन्द्रियबुद्धिमनसां तु करणत्वात् प्रमेयत्वाभावः । दोषास्तु
रागद्वेषमोहाः, ते च प्रवृत्तेर्न पृथग्भवितुमर्हन्ति । वाङ्मनःकायव्यापारस्य शुभाशुभफलस्य
विंशतिविधस्य तन्मते प्रवृत्तिशब्दवाच्यत्वात् । रागादिदोषाणां । च मनोव्यापारात्मकत्वात् ।
दुःखस्य शब्दादीनामिन्द्रियार्थानां च फल एवान्तर्भावः । “प्रवृत्तिदोषजनितं सुखदुःखात्मकं
मुख्यं फलं, तत्साधनं तु गौणम्” १ इति जयन्तवचनात् । प्रेत्यभावापवर्गयो
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ८१
चेति । तत्र साधारणे शब्दे प्रयुक्ते वक्तुरभिप्रेतादर्थादर्थान्तरकल्पनया तन्निषेधो वाक्छलम् ।
यथा नवकम्बलोऽयं माणवक इति नूतनविवक्षया कथिते, परः संख्यामारोप्य निषेधति कुतोऽ
स्य नव कम्बलाः इति । संभावनायातिप्रसङ्गिनोऽपि सामान्यस्योपन्यासे हेतुत्वारोपणेन तन्नि-
षेधः सामान्यच्छलम् । यथा अहो नु खल्वसौ ब्राह्मणो विद्याचरणसंपन्न इति ब्राह्मणस्तुतिप्रसङ्गे,
कश्चिद् वदति सम्भवति ब्राह्मणे, विद्याचरणसम्पदिति, तत् छलवादी ब्राह्मणत्वस्य हेतुतामा-
रोप्य निराकुर्वन्नभियुङ्क्ते यदि ब्राह्मणे विद्याचरणसंपद् भवति, व्रात्ये¹ऽपि सा भवेद्, व्रात्योऽपि
ब्राह्मण एवेति । औपचारिके प्रयोगे मुख्यप्रतिषेधेन प्रत्यवस्थानम् उपचारच्छलम् । यथा मञ्चाः
क्रोशन्तीत्युक्ते, परः प्रत्यवतिष्ठते कथमचेतनाः मञ्चाः क्रोशन्ति मञ्चस्थाः पुरुषाः क्रोशन्तीति ॥
तथा सम्यग्हेतौ हेत्वाभासे वा वादिना प्रयुक्ते, झटिति तद्दोषतत्त्वाप्रतिभासे हेतुप्रति-
बिम्बनप्रायं किमपि प्रत्यवस्थानं जातिः दूषणाभास इत्यर्थः । सा च चतुर्विंशतिभेदा । साध-
र्म्यादिप्रत्यवस्थानभेदेन यथा "साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यऽवर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्य-
प्राप्तिप्रसङ्गप्रतिदृष्टान्ताऽनुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुपलब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः" ॥²
तत्र साधर्म्येण प्रत्यवस्थानं साधर्म्यसमा जातिर्भवति । अनित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्,
घटवदिति प्रयोगे कृते साधर्म्यप्रयोगेणैव प्रत्यवस्थानम् नित्य शब्दो, निरवयवत्वात्,
आकाशवत् । न चास्ति विशेषहेतुः घटसाधर्म्यात् कृतकत्वाद्वनित्यः शब्दः, न पुनराकाश-
बदल कर वादीके वचनोंके निषेध करनेको छल कहते हैं। यह छल वाक्, सामान्य और उपचारके भेदसे तीन
प्रकारका है । ( १ ) वक्ताके किसी साधारण शब्दके प्रयोग करनेपर उसके विवक्षित अर्थको जान बूझकर
उपेक्षा कर अर्थान्तरकी कल्पना करके वक्ताके वचनके निषेध करनेको वाक्छल कहते हैं। जैसे वक्ताने कहा
कि 'नवकम्बलोऽयं माणवकः' — यहाँ हम जानते हैं, कि 'नव' कहनेसे वक्ताका अभिप्राय 'नूतनसे' है फिर भी
दुर्भावनासे उसके वचनोंका निषेध करनेके लिये हम 'नव' शब्दका अर्थ 'नौ' करके वक्तासे पूछते हैं कि इस
माणवकके पास नौ कम्बल कहाँ हैं ? ( २ ) सम्भावना मात्रसे व्यापक सामान्य का कथन करने पर सामान्यके
ऊपर हेतुका आरोप करके सामान्यका निषेध करना सामान्यछल है। जैसे 'आश्चर्य है कि यह वाह्मण विद्या
और आचरणसे युक्त है,' यह कह कर कोई पुरुष ब्राह्मणकी स्तुति करता है। इस पर कोई दूसरा पुरुष कहता
है कि विद्या और आचरणका तो ब्राह्मणमें होना स्वाभाविक है। यहाँ यद्यपि ब्राह्मणत्वका सम्भावना मात्रसे
कथन किया गया है, फिर भी छलवादी ब्राह्मणमें विद्या और आचरणके होनेके सामान्य नियम बना कर
कहता है कि यदि ब्राह्मणमें विद्या और आचरण का होना स्वाभाविक है, तो विद्या और आचरण व्रात्य
(पतित) ब्राह्मणमें भी होना चाहिये, क्योंकि व्रात्य ब्राह्मण भी ब्राह्मण ही है। ( ३ ) उपचार अर्थमें मुख्य
अर्थका निषेध करके वक्ताके वचनोंका निषेध करना, उपचारछल है। जैसे कोई कहे कि मंच रोते हैं, तो
छलवादी उत्तर देता है कि कहीं मंच जैसे अचेतन पदार्थ भी रो सकते हैं, अतएव कहना चाहिये कि मंचपर
बैठे हुए आदमी रोते हैं ।
वादीके द्वारा सम्यक् हेतु अथवा हेत्वाभासके प्रयोग करनेपर, वादीके हेतुकी सदोषताकी बिना
परीक्षा किये हुए, हेतुके समान मालूम होनेवाला शीघ्रतासे कुछ भी कह देना जाति है । अर्थात् दूषणाभास
यह जाति "साधर्म्य, वैधर्म्य, उत्कर्ष, अपकर्ष, वर्ण्य, अवर्ण्य, विकल्प, साध्य, प्राप्ति, अप्राप्ति, प्रसंग,
प्रतिदृष्टांत, अनुत्पत्ति, संशय, प्रकरण, हेतु, अर्थापत्ति, अविशेष, उपपत्ति, उपलब्धि, अनुपलब्धि, नित्य, अनित्य
और कार्यसम" के भेदसे चौबीस प्रकारकी है ।
( १ ) साधर्म्यसे उपसंहार करने पर दृष्टांत की समानता दिखला कर साध्यसे विपरीत कथन करनेको ·
साधर्म्यसमा जाति कहते हैं। जैसे, वादीने कहा, 'शब्द अनित्य है, क्योंकि कृतक है; जो कृतक होता है, वह
१. सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः । २. गौतमसूत्रे ५-१-१।
११
८२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १०
साधर्म्याद् निरवयवत्वाद् नित्यः इति । वैधर्म्येण प्रत्यवस्थानं वैधर्म्यसमा जातिर्भवति ।
अनित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, घटवदित्यत्रैव प्रयोगे, स एव प्रतिहेतुर्वैधर्म्येण प्रयुज्यते नित्यः
शब्दो निरवयवत्वात् । अनित्यं हि सावयवं दृष्टम् घटादीति । न चास्ति विशेषहेतुः घटसा-
धर्म्यात् कृतकत्वादनित्यः शब्दः, न पुनस्तद्वैधर्म्याद् निरवयवत्वाद् नित्य इति । उत्कर्षापक-
र्षाभ्यां प्रत्यवस्थानम् उत्कर्षापकर्षसमे जाती भवतः । तत्रैव प्रयोगे, दृष्टान्तधर्मं कञ्चित्
साध्यधर्मिण्यापादयन् उत्कर्षसमां जातिं प्रयुङ्क्ते । यदि घटवत् कृतकत्वादनित्यः शब्दः
घटवदेव मूर्त्तोऽपि भवतु, न चेद् मूर्तः, घटवदनित्योऽपि मा भूदिति शब्दे धर्मान्तरोत्कर्षमा-
पादयति । अपकर्षस्तु घटः कृतकः सन् अश्रावणो दृष्टः, एवं शब्दोऽप्यस्तु, नो चेद् घटवद्-
नित्योऽपि मा भूदिति शब्दे श्रावणत्वधर्ममपकर्षतीति । इत्येताश्चतस्रो दिङ्मात्रदर्शनार्थं जातय
उक्ताः । एवं शेषा अपि विंशतिरक्षपादशास्त्रादवसेयाः । अत्र त्वनुपयोगित्वाद् न लिखिताः ॥
अनित्य है, जैसे घड़ा' । इसमें दोष देनेके लिये प्रतिवादी कहता है, 'यदि कृतक रूप धर्मसे शब्द और घड़ेमें
समानता है, तो निरवयव रूप धर्मसे शब्द और आकाशमें भी समानता है, अतएव शब्द आकाशके समान नित्य
होना चाहिये' । यहाँ वादीद्वारा शब्दको अनित्य सिद्ध करनेमें कृतकत्व हेतुका प्रतिवादीने बिलकुल खण्डन नहीं
किया । और केवल दृष्टान्तकी समानता दिखानेसे साध्यका खण्डन नहीं होता । उसके लिए हेतु देना चाहिए,
या वादीके हेतुका खण्डन करना चाहिये । ( २ ) वैधर्म्यके उपसंहार करनेपर वैधर्म्य दिखला कर खण्डन करना,
वैधर्म्यसमा जाति है । जैसे, 'शब्द अनित्य है, कृतक होने से, घटकी तरह' । इसके खण्डन में प्रतिवादीका कथन
है, 'शब्द नित्य है, निरवयव होनेसे, आकाशकी तरह' । यहाँ प्रतिवादीका कहना है कि यदि नित्य आकाशके
वैधर्म्यसे शब्द अनित्य है, तो अनित्य घटके वैधर्म्यसे शब्दको अनित्य मानना चाहिये । परन्तु यहाँ कोई ऐसा
नियामक नहीं है कि घटके रूप साधर्म्यसे कृतक होनेके कारण शब्द नित्य नहीं हो । अतएव इससे वादीके
हेतुका कोई खण्डन नहीं होता । ( ३ ) दृष्टांतके धर्मको साध्यमें मिला कर वादीके खण्डन करनेको उत्कर्षसमा
जाति कहते हैं । जैसे, वादी ने कहा, 'शब्द अनित्य है, कृतक होनेसे, घटकी तरह' । इस अनुमानमें दोष
देनेके लिये प्रतिवादी कहता है, 'जैसे घटकी तरह शब्द अनित्य है, वैसे ही उसे घटकी तरह मूर्त भी मानना
चाहिये । यदि शब्द मूर्त नहीं है, तो वह घटकी तरह अनित्य भी नहीं है।' यहाँ वादी घटका दृष्टान्त देकर
शब्दमें अनित्यत्व सिद्ध करना चाहता है, परन्तु प्रतिवादी घटके दूसरे धर्म मूर्तत्वको शब्दमें सिद्ध करके वादीका
खण्डन करता है । ( ४ ) उत्कर्षसमाकी उल्टी अपकर्षसमा जाति कही जाती है । साध्यधर्मीमें से दृष्टान्तमें
नहीं रहनेवाले धर्मको निकाल कर वादीके प्रति विरुद्ध भाषण करनेको अपकर्षसमा जाति कहते हैं । जैसे,
'शब्द अनित्य है, कृतक होनेसे, घटकी तरह' । इस पर प्रतिवादीका कथन है, 'जैसे, घट कृतक होनेसे श्रवणका
विषय नहीं है, इसी तरह शब्दको भी श्रवणका विषय नहीं होना चाहिए । यदि शब्द अश्रावण नहीं है, तो
वह घटकी तरह अनित्य भी नहीं हो सकता । यहाँ केवल चार ही जातियोंका दिग्दर्शन कराया गया है ।
[ (५-६) “जिसका कथन किया जाता है, उसे वर्ण्य और जिसका कथन नहीं किया जाता, उसे अवर्ण्य
कहते हैं । वर्ण्य या अवर्ण्यकी समानतासे जो असदुत्तर दिया जाता है, उसे वर्ण्यसमा या अवर्ण्यसमा कहते हैं ।
जैसे, यदि साध्यमें सिद्धिका अभाव है, तो दृष्टांतमें भी होना चाहिये (वर्ण्यसमा), और यदि दृष्टान्तमें सिद्धिका
अभाव नहीं है, तो साध्यमें भी न होना चाहिये ( अवर्ण्यसमा ) । (७) दूसरे धर्मके विकल्प उठा कर मिथ्या
उत्तर देना, विकल्पसमा जाति है । जैसे, कृत्रिमता और गुरुत्वका सम्बन्ध ठीक ठीक नहीं मिलता, गुरुत्व और
अनित्यत्वका नहीं मिलता, अनित्यत्व और मूर्तत्वका नहीं मिलता, अतएव अनित्यत्व और कृत्रिमताका भी सम्बन्ध
न मानना चाहिये, जिससे कृत्रिमतासे शब्द अनित्य सिद्ध किया जा सके । ( ८ ) वादीने जो साध्य बनाया है,
उसीके समान दृष्टान्त आदिको प्रतिपादन कर मिथ्या उत्तर देना, साध्यसमा जाति है । जैसे, यदि मिट्टीके ढेलेके
समान आत्मा है, तो आत्माके समान मिट्टीके ढेलेको भी मानना चाहिये । आत्मामें 'क्रिया' साध्य ( सिद्ध
करने योग्य, न कि सिद्ध ) है, तो मिट्टीके ढेलेमें भी साध्य मानो । यदि ऐसा नहीं मानते हो तो आत्मा और
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ८३
मिट्टीके ढेलेको समान मत मानो । ये सब मिथ्या उत्तर हैं, क्योंकि दृष्टान्तमें सब धर्मोंकी समानता नहीं देखी
जाती; उसमें सिर्फ साध्य और साधनकी समानता देखी जाती है। विकल्पसमामें जो अनेक धर्मोंका व्यभिचार
बतलाया है, उससे वादीका अनुमान खण्डित नहीं होता, क्योंकि साध्य-धर्मके सिवाय अन्य धर्मोंके साथ यदि
साधनकी व्याप्ति न मिले, तो इससे साधनको व्यभिचारी नहीं कह सकते । हाँ, यदि साध्य-धर्मके साथ व्याप्ति
न मिले, तो व्यभिचारी हो सकता है । दूसरे धर्मोंके साथ व्यभिचार आनेसे साध्यके साथ भी व्यभिचारकी
कल्पना व्यर्थ है । धूमकी यदि पत्थरके साथ व्याप्ति नहीं मिलती, तो यह नहीं कहा जा सकता कि धूमकी
व्याप्ति, अग्निके साथ भी नहीं है । (९-१०) प्राप्ति और अप्राप्तिका प्रश्न उठाकर सच्चे हेतुको खण्डित प्रति-
पादन करना, प्राप्तिसमा और अप्राप्तिसमा जाति है । जैसे, हेतु साध्यके पास रहकर साध्यको सिद्ध करता है,
या दूर रहकर ? यदि पास रहकर तो कैसे ज्ञात होगा कि यह साध्य है और यह हेतु है ( प्राप्तिसमा ) ।
यदि दूर रह कर तो यह साधन अमुक धर्मकी ही सिद्धि करता है, दूसरेकी नहीं यह कैसे ज्ञात हो ( अप्राप्ति-
समा ) । ये असदुत्तर हैं, क्यों कि धूँआ आदि पास रह कर अग्निकी सिद्धि करते हैं तथा दूर रह कर भी
पूर्वचर आदि साधन, साध्यकी सिद्धि करते हैं। जिनमें अविनाभाव सम्बन्ध है, उन्हीं में साध्य-साधकता हो
सकती है, न कि सबमें । (११) जैसे साध्यके लिये साधनकी जरूरत है, उसी प्रकार दृष्टान्त के लिए भी
साधनकी जरूरत है, यह कथन प्रसंगसमा जाति है । दृष्टान्तमें वादी और प्रतिवादीको विवाद नहीं होता,
अतएव उसके लिए साधनकी आवश्यकता प्रतिपादन करना व्यर्थ है, अन्यथा वह दृष्टान्त ही न कहलायगा ।
(१२) बिना व्याप्तिके केवल दूसरा दृष्टान्त देकर दोष लगाना प्रतिदृष्टान्तसमा जाति है । जैसे घड़ेके दृष्टान्त-
से यदि शब्द अनित्य है, तो आकाशके दृष्टांतसे वह नित्य कहलाये । प्रतिदृष्टान्त देनेवाले ने कोई हेतु नहीं दिया
है जिससे यह कहा जाय कि दृष्टान्त साधक नहीं है-प्रतिदृष्टान्त साधक है । किन्तु बिना हेतु के खण्डन-
मण्डन कैसे हो सकता है ? ( १३ ) उत्पत्तिके पहले, कारणका अभाव दिखला कर मिथ्या खण्डन करना
अनुत्पत्तिसमा है । जैसे उत्पत्तिके पहले शब्द कृत्रिम है, या नहीं ? यदि है तो उत्पत्तिके पहले मौजूद होनेसे
शब्द नित्य हो गया; यदि नहीं है तो हेतु आश्रयासिद्ध हो गया । यह उत्तर ठीक नहीं है, क्योंकि उत्पत्तिके
पहले शब्द ही नहीं था, फिर कृत्रिम-अकृत्रिमका प्रश्न ही क्या ? (१४) व्याप्तिमें मिथ्या सन्देह प्रतिपादन कर
वादीके पक्षका खण्डन करना, संशयसमा जाति है । जैसे, कार्य होनेसे शब्द नित्य है—यहाँ यह कहना कि
इन्द्रियका विषय होनेसे शब्दकी अनित्यतामें सन्देह है, क्योंकि इन्द्रियोंके विषय नित्य भी होते हैं ( जैसे
गोत्व घटत्व आदि सामान्य ) और अनित्य भी ( जैसे घट, पट आदि ) । यह संशय ठीक नहीं, क्योंकि जब
तक कार्यत्व और अनित्यत्वकी व्याप्ति खण्डित न की जाय, तब तक वहाँ संशयका प्रवेश नहीं हो सकता ।
कार्यत्वकी व्याप्ति यदि नित्यत्व और अनित्यत्व दोनोंके साथ हो तो संशय हो सकता है, अन्यथा नहीं ।
लेकिन कार्यत्वकी व्याप्ति दोनोंके साथ नहीं हो सकती । ( १५ ) मिथ्या व्याप्तिके ऊपर अवलम्बित दूसरे
अनुमानसे दोष देना, प्रकरणसमा जाति है । जैसे, यदि अनित्य ( घट ) साधर्म्यसे कार्यत्व हेतु शब्दकी अनि-
त्यता सिद्ध करता है, तो गोत्व आदि सामान्यके साधर्म्यसे ऐन्द्रियकत्व ( इन्द्रियका विषय होना ) हेतु
नित्यताको सिद्ध करे । अतएव दोनों पक्ष समान कहलाये । यह असत्य उत्तर है, क्योंकि अनित्य और
कार्यत्वकी व्याप्ति है, लेकिन ऐन्द्रियकत्व और नित्यत्वकी व्याप्ति नहीं । ( १६ ) भूत आदि कालकी असिद्धि
प्रतिपादन कर हेतु मात्रको हेतु कहना, अहेतुसमा जाति है । जैसे, हेतु साध्यके पहले होता है, या पीछे होता
है, या साथ होता है ? पहले तो हो नहीं सकता, क्योंकि जब साध्य ही नहीं, तब साधक किस का ? न पीछे
हो सकता है, क्योंकि जब साध्य ही नहीं रहा, तब वह सिद्ध किसे करेगा ? अथवा जिस समय साध्य था,
उस समय यदि साधन नहीं था, तो वह साध्य कैसे कहलायेगा ? दोनों एक साथ भी नहीं बन सकते, क्योंकि
उस समय यह सन्देह हो सकता है कि कौन साध्य है, कौन साधक है ? जैसे, विंध्याचल से हिमालयकी और
हिमालयसे विंध्याचलकी सिद्धि करना अनुचित है, उसी तरह एक कालमें होनेवाली वस्तुओंको साध्य-साधक
ठहराना अनुचित है। यह असत्य उत्तर है, क्योंकि इस प्रकार त्रिकालकी असिद्धि प्रतिपादन करनेसे जिस हेतुके
द्वारा जातिवादीने हेतुको अहेतु ठहराया है, वह हेतु (जातिवादीका त्रिकालसिद्धि हेतु ) भी अहेतु ठहर
८४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १०
गया, जिससे जातिवादीका वक्तव्य स्वयं खण्डित हो गया। दूसरी बात यह है कि कालभेद होनेसे या अभेद
होनेसे अविनाभाव सम्बन्ध बिगड़ता नहीं है, यह बात पूर्वचर, उत्तरचर, सहचर, कार्य, कारण, आदि हेतुओंके
स्वरूपसे स्पष्ट विदित हो जाती है। जब अविनाभाव सम्बन्ध नहीं बिगड़ता, तब हेतु, अहेतु कैसे कहा जा
सकता है ? कालकी एकतासे साध्य-साधनमें सन्देह नहीं हो सकता, क्योंकि दो वस्तुओंके अविनाभावमें ही
साध्य-साधनका निर्णय होता है। अथवा दोनोंसे जो असिद्ध हो वह साध्य, और जो सिद्ध हो, उसे हेतु मान
लेनेसे संदेह मिट जाता है। ( १७ ) अर्थापत्ति दिखलाकर मिथ्या दूषण देना, अर्थापत्तिसमा जाति है। जैसे,
यदि अनित्यके साधर्म्य ( कृत्रिमता ) से शब्द अनित्य है, तो इसका मतलब हुआ कि नित्य ( आकाश ) के
साधर्म्य ( स्पर्श रहितता ) से नित्य है। यह उत्तर असत्य है, क्योंकि स्पर्श रहित होनेसे ही कोई नित्य
कहलाने लगे, तो सुख वगैरह भी नित्य कहलायेंगे। ( १८ ) पक्ष और दृष्टान्तमें अविशेषता देख कर किसी
अन्य धर्मसे सब जगह ( विपक्षमें भी ) अविशेषता दिखला कर साध्यका आरोप करना, अविशेषसमा जाति
है। जैसे, शब्द और घटमें कृत्रिमतासे अविशेषता होनेसे अनित्यता है, वैसे ही सब पदार्थोंमें सत्त्व धर्मसे
अविशेषता है, अतएव सभी ( आकाशादि-विपक्ष भी ) को अनित्य होना चाहिये। यह असत्य उत्तर है,
क्योंकि कृत्रिमताका अनित्यताके साथ अविनाभाव सम्बन्ध है, लेकिन सत्त्वका अनित्यताके साथ नहीं। ( १९ )
साध्य और साध्यविरुद्ध, इन दोनोंके कारण दिखला कर मिथ्या दोष देना, उपपत्तिसमा जाति है। जैसे, यदि
शब्दके अनित्यत्वमें कृत्रिमता कारण है तो उसके नित्यत्वमें स्पर्शरहितता कारण है। यहाँ जातिवादी अपने ही
शब्दोंसे अपने कथनका विरोध करता है। जब उसने शब्दके अनित्यत्वका कारण मान लिया तो नित्यत्वका
कारण कैसे मिल सकता है ? फिर स्पर्शरहितताकी नित्यत्वके साथ व्याप्ति नहीं है। ( २० ) निर्दिष्ट कारण
( साध्यकी सिद्धिका कारण-साधन ) के अभावमें साध्यकी उपलब्धि बताकर दोष देना, उपलब्धिसमा जाति
है। जैसे, प्रयत्नके बाद पैदा होनेसे शब्दका अनित्यत्व प्रतिपादन करना। लेकिन ऐसे बहुतसे शब्द हैं जो
प्रयत्नके बाद न होने पर भी अनित्य हैं; उदाहरणके लिए, मेघ गर्जना आदिमें प्रयत्नकी आवश्यकता नहीं
है। यह दूषण मिथ्या है, क्योंकि साध्यके अभावमें साधनके अभावका नियम है, न कि साधनके अभावमें
साध्यके अभावका। अग्निके अभावमें नियमसे धुँआ नहीं रहता, लेकिन धुँएके अभावमें नियमसे अग्निका
अभाव नहीं कहा जा सकतता। (२१) उपलब्धिके अभावमें अनुपलब्धिका अभाव कथन कर दूषण देना,
अनुपलब्धिसमा जाति है। जैसे, किसीने कहा कि उच्चारणके पहले शब्द नहीं था, क्योंकि उपलब्ध नहीं होता
था। यदि कहा जाय कि उस समय शब्दपर आवरण था, इसलिए अनुपलब्ध था, तो उसका आवरण तो
उपलब्ध होना चाहिये था। जैसे कपड़ेसे ढकी हुई कोई वस्तु भले ही दिखाई न दे लेकिन कपड़ा तो दिखाई
देता है, उसी तरह शब्दका आवरण तो उपलब्ध होना चाहिये। इसके उत्तरमें जातिवादी कहता है, जैसे
आवरण उपलब्ध नहीं होता, उसी तरह आवरणकी अनुपलब्धि ( अभाव ) भी तो उपलब्ध नहीं होती। यह
उत्तर ठीक नहीं है, क्योंकि आवरणकी अनुपलब्धि नहीं होनेसे ही आवरणकी अनुपलब्धि उपलब्ध हो जाती है।
(२२) एककी अनित्यतासे सबको अनित्य प्रतिपादन कर दूषण देना, अनित्यसमा जाति है। जैसे, यदि किसी
धर्मकी समानतासे शब्दको अनित्य सिद्ध किया जाये, तो सत्त्वकी समानतासे सब वस्तुएँ अनित्य सिद्ध हो
जायेंगी। यह उत्तर ठीक नहीं। क्योंकि वादी और प्रतिवादीके शब्दोंमें भी प्रतिज्ञा आदिकी समानता तो है
ही, इसलिए जिस प्रकार प्रतिवादी ( जातिका प्रयोग करनेवाला ) के शब्दोंसे वादीका खण्डन होगा, उसी
प्रकार प्रतिवादीका भी खण्डन हो जायगा। अतएव जहाँ जहाँ अविनाभाव हो, वहीं वहीं साध्यकी सिद्धि
मानना चाहिए, न कि सब जगह। (२३) अनित्यत्वमें नित्यत्वका आरोप करके खण्डन करना, नित्यसमा
जाति है। जैसे, शब्दको अनित्य सिद्ध करते हो, तो शब्दमें अनित्यत्व नित्य है, या अनित्य ? यदि अनित्यत्व
नित्य है, तो शब्द भी नित्य कहलाया ( धर्मके नित्य होनेपर धर्मीको नित्य मानना पड़ेगा )। यदि अनित्यत्व
अनित्य है, तो शब्द नित्य कहलाया। यह असत्य उत्तर हैं, क्योंकि जब शब्दमें अनित्यत्व सिद्ध है, तो उसीका
अभाव कैसे कहा जा सकता है। दूसरे, इस तरह कोई भी वस्तु अनित्य सिद्ध नहीं हो सकेगी। तीसरे
अनित्यत्व एक धर्म है, यदि धर्ममें भी धर्मकी कल्पना की जायगी तो अनवस्था हो जायगो। ( २४ ) कार्यको
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ८५
तथा विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम् । तत्र विप्रतिपत्तिः साधनाभासे साधन-
बुद्धिः, दूषणाभासे च दूषणबुद्धिरिति । अप्रतिपत्तिः साधनस्यादूषणं, दूषणस्य चानुद्धरणम् ।
तच्च निग्रहस्थानं द्वाविंशतिविधम् । तद्यथा—प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरम् प्रतिज्ञाविरोधः
प्रतिज्ञासंन्यासः हेत्वन्तरम् अर्थान्तरम् निरर्थकम् अविज्ञातार्थम् अपार्थकम् अप्राप्तकालम्
न्यूनम् अधिकम् पुनरुक्तम् अननुभाषणम् अज्ञानम् अप्रतिभा विक्षेपः मतानुज्ञा पर्यनुयोज्यो-
पेक्षणम् निरनुयोज्यानुयोगः अपसिद्धान्तः हेत्वाभासाश्च ।
तत्र हेतावनैकान्तिकीकृते प्रतिदृष्टान्तधर्मं स्वदृष्टान्तेऽभ्युपगच्छतः प्रतिज्ञाहानिर्नाम
निग्रहस्थानम् । यथा अनित्यः शब्दः, ऐन्द्रियकत्वाद्, घटवदिति प्रतिज्ञासाधनाय वादी वदन्,
परेण सामान्यमैन्द्रियकमपि नित्यं दृष्टमिति हेतावनैकान्तिकीकृते, यद्येवं ब्रूयात् सामान्यवद्
घटोऽपि नित्यो भवत्विति, स एवं ब्रुवाणः शब्दाऽनित्यत्वप्रतिज्ञां जह्यात् । प्रतिज्ञातार्थप्रति-
षेधे परेण कृते तत्रैव धर्मिणि धर्मान्तरं साधनीयमभिदधतः प्रतिज्ञान्तरं नाम निग्रहस्थानं
भवति । अनित्यः शब्दः, ऐन्द्रियकत्वादित्युक्ते, तथैव सामान्येन व्यभिचारे चोदिते, यदि
ब्रूयाद् युक्तं यत् सामान्यमैन्द्रियकं नित्यम्, तद्धि सर्वगतम्, असर्वगतस्तु शब्द इति । तदिदं
शब्देऽनित्यत्वलक्षणपूर्वप्रतिज्ञातः प्रतिज्ञान्तरमसर्वगतः शब्द इति निग्रहस्थानम् अनया दिशा
शेषाण्यपि विंशतिर्ज्ञेयानि । इह तु न लिखितानि, पूर्वहेतोरेव । इत्येवं मायाशब्देनात्र छला-
द्वित्त्रयं सूचितम् । तदेवं परवञ्चनात्मकान्यपि छलजातिनिग्रहस्थानानि तत्त्वरूपतयोपदिशतो
अक्षपादर्षेर्वैराग्यव्यावर्णनं तमसः प्रकाशात्मकत्वप्रख्यापनमिव कथमिव नोपहसनीयम् ॥ इति
काव्यार्थः ॥ १० ॥
अभिव्यक्तिके समान मानना ( क्योंकि दोनोंमें प्रयत्नकी आवश्यकता होती है ), और केवल इतनेसे ही सत्य
हेतुका खण्डन करना, कार्यसमा जाति है । जैसे, प्रयत्नके बाद शब्दकी उत्पत्ति भी होती है, और अभिव्यक्ति
( प्रगट होना ) भी, फिर शब्द को अनित्य कैसे कहा जा सकता है ? यह उत्तर ठीक नहीं है, क्योंकि प्रयत्नके
अनन्तर होनेका मतलब है, स्वरूप लाभ करना । और अभिव्यक्तिको स्वरूप लाभ नहीं कह सकते । प्रयत्नके
पहले यदि शब्द उपलब्ध होता, या उसका आवरण उपलब्ध होता, तो अभिव्यक्ति कही जा सकती थी १ ।'' ]
विप्रतिपत्ति और अप्रतिपत्तिको निग्रहस्थान कहते हैं । साधनाभासमें साधनकी बुद्धि और दूषणाभासमें
दूषणकी बुद्धिको विप्रतिपत्ति, अर्थात् विरुद्धप्रतिपत्ति कहते हैं । तथा प्रतिवादीके साधनको दोष रहित मान
लेना, अथवा प्रतिवादीके दूषणको दूर न करना, अप्रतिपत्ति है । निग्रहस्थान बाईस प्रकार है—१ प्रतिज्ञाहानि
२ प्रतिज्ञान्तर, ३ प्रतिज्ञाविरोध, ४ प्रतिज्ञासंन्यास, ५ हेत्वन्तर, ६ अर्थान्तर, ७ निरर्थक, ८ अविज्ञातार्थ,
९ अपार्थक, १० अप्राप्तकाल, ११ न्यून, १२ अधिक, १३ पुनरुक्त, १४ अननुभाषण, १५ अज्ञान, १६ अप्र-
तिभा, १७ विक्षेप, १८ मतानुज्ञा, १९ पर्यनुयोज्योपेक्षण, २० निरनुयोज्यानुयोग, २१ अपसिद्धान्त, २२
हेत्वाभास । ( इनमें अननुभाषण, अज्ञान, अप्रतिभा, विक्षेप, मतानुज्ञा, पर्यनुयोज्योपेक्षण छह अप्रतिपत्तिसे, और
शेष सोलह विप्रतिपत्तिसे होते हैं । )
(१) प्रतिवादीद्वारा हेतुके अनैकांतिक सिद्ध किये जानेपर वादीद्वारा विरोधीके दृष्टांतका धर्म अपने
दृष्टांतमें स्वीकार किये जानेको प्रतिज्ञाहानि कहते हैं । जैसे, वादीने कहा, 'शब्द अनित्य है, क्योंकि वह
इन्द्रियका विषय है, घटकी तरह' । इसपर प्रतिवादीका कथन है कि यह अनुमान अनैकांतिक हेत्वाभास है,
क्योंकि सामान्य ( जाति ) भी इन्द्रियोंका विषय है, लेकिन वह नित्य है । इससे वादीके पक्षकी पराजय होतो
है, लेकिन वादी पराजय न मान कर उत्तर देता है कि 'सामान्यकी तरह घट भी नित्य रहे' । यहाँ वादी अपनी
अनित्यत्वकी प्रतिज्ञाको छोड़ देता है । (२) प्रतिज्ञाके खण्डित होनेपर धर्मीमें दूसरे धर्मको स्वीकार करनेको,
१ दरबारीलाल न्यायतीर्थ, न्यायप्रदीप. पृ० ८०-८७
८६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १०
प्रतिज्ञान्तर कहते हैं। जैसे, 'शब्द अनित्य है, क्योंकि वह इन्द्रियका विषय है, घटकी तरह,' इस अनुमानमें
प्रतिज्ञाके खण्डित होनेपर यह कथन करना कि सामान्य जो इन्द्रियोंका विषय होकर नित्य है, वह सर्वव्यापक
है, परन्तु शब्द तो घटके समान असर्वगत है, इसलिये उसीके समान अनित्य भी है। यहाँ शब्दको असर्वगत
कह कर दूसरी प्रतिज्ञा की गई, लेकिन इससे पूर्वोक्त व्यभिचार दोषका परिहार नहीं होता ।
[ “(३) प्रतिज्ञा और हेतुका विरोध होना, प्रतिज्ञाविरोध है। जैसे, 'गुण, द्रव्यसे भिन्न है, क्योंकि
द्रव्यसे पृथक् नहीं होता' । किन्तु पृथक् प्रतीत न होनेसे अभिन्नता सिद्ध होती है, न कि भिन्नता । इसे विरुद्ध
हेत्वाभासमें भी सम्मिलित किया जा सकता है। (४) अपनी प्रतिज्ञाका त्याग कर देना, प्रतिज्ञासंन्यास है। जैसे
'मैंने ऐसा कब कहा !' इत्यादि । (५) हेतुके खण्डित हो जानेपर उसमें कुछ जोड़ देना, हेत्वन्तर है। जैसे,
'शब्द अनित्य है, क्योंकि इन्द्रियका विषय है'। यहाँ घटत्वमें दोष उपस्थित होने पर हेतुको बढ़ा दिया कि
सामान्यवाला हो कर जो इन्द्रियका विषय है। किन्तु घटत्व स्वयं सामान्य तो है, परन्तु सामान्यवाला नहीं
है। यदि इस तरह हेतुमें मनमानी वृद्धि होती रहे, तो व्यभिचारी हेतुमें व्यभिचार दोष न दिखलाया जा
सकेगा। क्योंकि ज्योंही व्यभिचार दिखलाया गया कि एक विशेषण जोड़ दिया। (६) प्रकृत विषय
( जिस विषयपर शास्त्रार्थ हो रहा है ) से सम्बन्ध न रखनेवाला कथन, अर्थान्तर है । जैसे वादीने कोई हेतु
दिया और उसका खण्डन न हो सका, तो कहने लगे 'हेतु किस भाषाका शब्द है, किस धातुसे निकला है ?'
इत्यादि । (७) अर्थ रहित शब्दोंका उच्चारण करने लगना, निरर्थक है। जैसे, 'शब्द अनित्य है क्योंकि क ख
ग घ ङ हैं; जैसे, च छ ज झ ञ आदि' । (८) ऐसे शब्दोंका प्रयोग करना कि तीन तीन बार कहनेपर भी
जिनका अर्थ न प्रतिवादी समझे, न कोई सभासद् समझे, अविज्ञातार्थ है । जैसे, 'जंगलके राजाके आकारवाले
के खाद्यके शत्रु का शत्रु यहाँ है।' जंगलका राजा शेर, उसके आकारवाला बिलाव, उसका खाद्य मूषक, उसका
शत्रु सर्प, उसका शत्रु मोर । (९) पूर्वापर सम्बन्धको छोड़ कर अंडवंड बकना, अपार्थक है। जैसे, 'कलकत्तेमें
पानी बरसा, कौओंके दांत नहीं होते, बम्बई बड़ा शहर है, यहाँ दश वृक्ष लगे हैं, मेरा कोट बिगड़ गया'
इत्यादि। इसे निरर्थक बकवास ही समझना चाहिये। (१०) प्रतिज्ञा आदिका बेसिलसिले प्रयोग करना,
अप्राप्तकाल है। (११) बिना अनुवादके शब्द और अर्थको फिरसे कहना, पुनरुक्त है। (१२) वादीने तीन
बार कहा, परिषदने भी समझ लिया, लेकिन प्रतिवादी उसका अनुवाद न कर पाया, इसे अनुभाषण
कहते हैं। (१३) वादीके वक्तव्यको सभा समझ गई, किन्तु प्रतिवादी न समझा, यह अज्ञान है।
(१४) उत्तर न सूझना, अप्रतिभा है। (१५) विपक्षी निग्रहस्थानमें पड़ गया हो, फिर भी यह न कहना
कि तुम्हारा निग्रह हो गया है, पर्यनुयोज्योपेक्षण है। (१६) निग्रहस्थानमें न पड़ा हो, फिर भी उसका निग्रह
बतलाना, निरनुयोज्यानुयोग है। (१७) स्व पक्षको कमजोर देखकर बात उड़ा देना, विक्षेप है। जैसे 'अभी
मुझे यह काम करना है, फिर देखा जायगा' आदि । (१८) स्व पक्षमें दोष स्वीकार करके, पर पक्षमें भी वही
दोष प्रतिपादन करना, मतानुज्ञा है। जैसे, 'यदि हमारे पक्षमें भी यह दोष है तो आपके पक्षमें भी हैं'।
(१९-२०) पाँच अंगों ( प्रतिज्ञा आदि ) से कमका प्रयोग करना, न्यून है, और दो-दो तीन-तीन हेतु दृष्टांत
आदि देना, अधिक है। (२१) स्वीकृत सिद्धांतके विरुद्ध कथन करना, अपसिद्धांत है। जैसे, 'सत्का उत्पाद
नहीं, असत्का विनाश नहीं,' यह मान करके भी आत्माका नाश प्रतिपादन करना १ ]” (२२) असिद्ध,
विरुद्ध, अनैकान्तिक, कालात्ययापदिष्ट और प्रकरणसमके भेदसे हेत्वाभास पाँच प्रकारका है।
यहाँ माया शब्दसे छल, जाति और निग्रहस्थानका सूचन किया गया है। ये छल, जाति और निग्रह-
स्थान केवल दूसरोंका वंचन करनेके लिये हैं, फिर भी इनका तत्त्व रूपसे उपदेश किया गया है। इस
प्रकारके उपदेश देनेवाले अक्षपाद ऋषिको वीतराग कहना अंधकारको प्रकाश कहनेके समान होनेसे हास्या-
स्पद है ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥ १० ॥
भावार्थ—इस श्लोकमें योग नामसे कहे जानेवाले नैयायिकोंके प्रमाण, प्रमेय आदि पदार्थोंका खण्डन
१-पं० दरबारीलाल न्यायतीर्थ-न्यायप्रदीप, पृ० ८९-९३
अन्य. यो. व्य. श्लोक ११ ] स्याद्वादमञ्जरी ८७
अधुना मीमांसकभेदाभिमतं वेदविहितहिंसाया धर्महेतुत्वमुपपत्तिपुरःसरं निरस्यन्नाह-
न धर्महेतुर्विहितापि हिंसा नोत्सृष्टमन्यार्थमपोद्यते च ।
स्वपुत्रघाताद् नृपतित्वलिप्सा सब्रह्मचारि स्फुरितं परेषाम् ॥११॥
इह खल्वर्चिर्मार्गप्रतिपक्षधूममार्गाश्रिता जैमिनीया इत्थमाचक्षते । या हिंसा गाद्ध्र्याद्
व्यसनितया वा क्रियते सैवाधर्मानुबन्धहेतुः, प्रमादसंपादितत्वात् शौनिकलुब्धकादीनामिव ।
वेदविहिता तु हिंसा प्रत्युत धर्महेतुः, देवतातितिथिपित्रूणां प्रीतिसंपादकत्वात्, तथाविधपूजो-
किया गया है। ग्रन्थकारका कहना है कि नैयायिकोंके सोलह पदार्थोंमें गिने जानेवाले छल, जाति और
निग्रहस्थान सर्वथा अनुपादेय हैं, इनके ज्ञानसे मुक्ति नहीं हो सकती । तथा मुक्ति प्राप्त करनेके लिये ज्ञान और
क्रिया दोनोंकी आवश्यकता होती है, केवल सोलह पदार्थोंके ज्ञान मात्रसे मुक्ति सम्भव नहीं।
(१) क—जो पदार्थोंके ज्ञानमें हेतु हो, उसे प्रमाण कहते हैं ( अर्थोपलब्धिहेतुः प्रमाणम्-वात्स्या-
यनभाष्य )। ख—सम्यक् अनुभवको प्रमाण कहते हैं ( सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम्—भासर्वज्ञकृत-न्यायसार )।
नैयायिकोंके ये दोनों प्रमाणके लक्षण दोषपूर्ण हैं, क्योंकि नैयायिक लोग इन्द्रिय और पदार्थोंके संनिकर्षको ही
प्रमाण मानते हैं, इन्द्रिय और पदार्थोंके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाले प्रत्यक्षके करण ज्ञानको प्रमाण नहीं मानते।
परन्तु इन्द्रिय और पदार्थका संनिकर्ष होनेपर भी ज्ञानका अभाव होनेसे पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता । तथा
‘पदार्थोंके ज्ञानमें हेतु’ को प्रमाण माननेपर, यदि निमित्त मात्रको ही हेतु कहा जाय तो कर्ता, कर्म आदिको
भी प्रमाण मानना चाहिये । यदि ‘हेतु’ का अर्थ कारण हो, तो फिर ज्ञानको ही प्रमाण मानना चाहिये,
क्योंकि ज्ञान ही पदार्थोंके जाननेमें साधकतम है । इसलिये ‘स्वपरव्यवसायिज्ञानं प्रमाणं’ ही प्रमाणका
निर्दोष लक्षण है ।
(२) नैयायिकोंके आत्मा, शरीर आदिके भेदसे बारह प्रकारके प्रमेयकी मान्यता भी ठीक नहीं हैं ।
क्योंकि शरीर आदिका आत्मामें अन्तर्भाव हो जाता है, तथा प्रेत्यभाव ( पुनर्जन्म ) और अपवर्ग ( मोक्ष )
भी आत्माकी ही अवस्था हैं । तथा आत्मा प्रमेय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह प्रमाता है। दोष मनकी
क्रिया है, उसका प्रवृत्तिमें अन्तर्भाव हो जाता है। दुःख और इन्द्रियार्थ फलमें गर्भित हो जाते हैं, इसे जयन्तने
भी स्वीकार किया है। अतएव ‘द्रव्यपर्यायात्मकं वस्तु प्रमेयं’ यही प्रमेयका निर्दोष लक्षण है।
(३) छल, जाति और निग्रहस्थान दूसरोंको केवल वंचन करनेके साधन हैं, इसलिये इन्हें तत्त्व नहीं
कहा जा सकता । अतएव इनके ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती है ।
अब मीमांसक सम्मत वेदमें कही हुई हिंसा धर्मका कारण नहीं होती, इसका युक्तिपूर्वक खण्डन करते हैं—
श्लोकार्थ—वेद विहित होने पर भी हिंसा धर्मका कारण नहीं है। अन्य कार्यके लिये प्रयुक्त उत्सर्ग
वाक्य उस कार्य से भिन्न कार्यके लिये प्रयुक्त वाक्यके द्वारा अपवादका विषय नहीं बनाया जा सकता । दूसरों
( अन्य मतानुयायी ) का यह प्रयत्न अपने पुत्रको मार कर राजा बननेकी इच्छाके समान है ।
व्याख्यार्थ—अर्चि मार्गके प्रतिपक्षी धूममार्गको स्वीकार करने वाले जैमिनियों ( पूर्वमीमांसक ) का
कथन : हिंसाजीवी व्याध आदिकी हिंसाकी तरह लोभ अथवा किसी व्यसनसे की हुई हिंसा ही
पापका कारण होती है, क्योंकि वह हिंसा प्रमादसे उत्पन्न होती है। वेदोंमें प्रतिपादित हिंसा
धर्मका ही कारण है, क्योंकि वेदमें अभिहित पूजा-उपचारकी तरह वेदोक्त हिंसा भी देव, अतिथि
१. अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
इत्यर्चिर्मार्गः । अयमेवोत्तरमार्ग इत्यभिधीयते । भगवद्गीता ८-२४ ।
२. धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
इति धूममार्गः । अयमेव दक्षिणमार्ग इत्यप्यभिधीयते । भगवद्गीता ८-२५ ।
८८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
पचारवत् । न च तत्प्रीतिसंपादकत्वमसिद्धम् । कारीरीप्रभृतियज्ञानां स्वसाध्ये वृष्ट्यादिफले यः
खल्वव्यभिचारः, स तत्प्रीणितदेवताविशेषाऽनुग्रहहेतुकः । एवं त्रिपुरार्णवेवर्णितच्छगलजाङ्गल
होमात् परराष्ट्रवशीकृतिरपि तदनुकूलितदैवतप्रसादसंपाद्या । अतिथिप्रीतिस्तु मधुपर्के³संस्कारा-
दिसमास्वादजा प्रत्यक्षोपलक्ष्यैव । पितॄणामपि तत्तदुपयाचितश्राद्धादिविधानेन प्रीणितात्मनां
स्वसन्तानवृद्धिविधानं साक्षादेव वीक्ष्यते । आगमश्चात्र प्रमाणम् । स च देवप्रीत्यर्थमश्वमेध-
गोमेधनरमेधादिविधानाभिधायकः ⁴-⁵प्रतीत एव । अतिथिविषयस्तु—"महोक्षं वा महाजं
वा श्रोत्रियायोपकल्पयेत् ।” इत्यादीः । पितृप्रीत्यर्थस्तु—
“द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु ।
औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनेह पञ्च तु”⁸॥ इत्यादिः ।
एवं पराभिप्रायं हृदि संप्रधार्याचार्यः प्रतिविधत्ते न धर्मेत्यादि । विहितापि-वेदप्रतिपा-
दितापि । आस्तां तावदविहिता हिंसा-प्राणिप्राणव्यपरोपणरूपा । न धर्महेतुः-न धर्मानुबन्ध-
निबन्धनम् । यतोऽत्र प्रकट एव स्ववचनविरोधः । तथाहि । 'हिंसा चेद् धर्महेतुः कथम्',
'धर्महेतुश्चेद् हिंसा कथम् ।' ‘श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ” इत्यादीः । न
हि भवति माता च, वन्ध्या चेति । हिंसा कारणं, धर्मस्तु तत्कार्यमिति पराभिप्रायः । न चायं
निरपायः । यतो यद् यस्यान्वयव्यतिरेकानुविधत्ते तत् तस्य कार्यम्, यथा मृत्पिण्डादेर्घटादिः।
न च धर्मो हिंसात एव भवतीति प्रातीतिकम् तपोविधानदानादीनां तदकारणत्वप्रसङ्गात् ॥
और पितरोंको आनन्द देनेवाली होती है। वेदोक्त हिंसाका आनन्ददायकपना असिद्ध नहीं है, क्योंकि कारीरी
(जिस यज्ञके करनेसे वृष्टि होती है) आदि यज्ञोंके करनेसे वृष्टिका होना देखा जाता है। वृष्टि होना
यज्ञोंसे प्रसन्न हुए देवता लोगोंके अनुग्रहका ही फल है। अतएव जिस प्रकार कारीरी यज्ञसे देवता
लोग प्रसन्न होकर वृष्टि करते हैं, उसी तरह वेदोक्त हिंसा भी देवताओंको आनन्द देनेवाली है । इसी
प्रकार त्रिपुरार्णव नामक मंत्रशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थमें कहे हुए बकरे और हरिणका मांस होम करनेसे
आनन्दित देवताओंकी कृपासे ही दूसरे देश वशमें किये जाते हैं। तथा, मधुपर्क (दही, घी, जल, मधु और
चीनीसे बना हुआ पदार्थ) से अतिथि लोग प्रसन्न होते हैं। इसी प्रकार पितर भी श्राद्धसे प्रसन्न होकर अपनी
सन्तानकी वृद्धि करते हुए देखे जाते हैं। आगममें भी कहा है, देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये अश्वमेध,
गोमेध, नरमेध आदि यज्ञ करने चाहिये । “अतिथिको प्रसन्न करनेके लिए श्रोत्रिय (वेदपाठी) को बड़ा बैल
अथवा घोड़ा मार कर देना चाहिये ।” तथा,
“मछलीके मांससे दो, हरिणके मांससे तीन, मेढ़ेके मांससे चार, और पक्षीके मांससे पाँच मास तक
पितरोंकी तृप्ति होती है ।”
जैन—वेदोंमें प्रतिपादित प्राणियों के प्राणों की संहारकारक हिंसा धर्मका कारण नहीं हो सकती,
क्योंकि हिंसाको धर्म प्रतिपादन करना साक्षात् अपने वचनोंका विरोध करना है । क्योंकि 'जो हिंसा है, वह
धर्मका कारण नहीं हो सकती', और 'जो धर्मका कारण है, उसे हिंसा नहीं कह सकते'। कहा भी है—"धर्मका
सार सुनकर उसे ग्रहण करना चाहिए । (अपने प्रतिकूल बातोंको कभी दूसरोंके लिए न करना चाहिये) ।"
जिस प्रकार कोई स्त्री एक ही समय माता और वंध्या दोनों नहीं हो सकती, उसी तरह हिंसाका हिंसारूप
और धर्म रूप होना परस्पर विरुद्ध है । अतएव हिंसा और धर्मको कारण और कार्य रूपसे प्रतिपादन करनेवाले
१. कं जलमुच्छतीति कारो जलदस्तमीरयति प्रेरयतीति कारीरी । २. मन्त्रशास्त्रविषयको निबन्धः ।
३. दधि सर्पिः जलं क्षौद्रं सितैताभिस्तु पंचभिः प्रोच्यते मधुपर्कस्तु सर्वदेवौघतुष्टये ॥ कालिकापुराणे । ४. ऐतरे-
यब्राह्मणे ४; श्रौतसूत्रे । ५. मनुस्मृतौ पंचमाध्याये; आपस्तंबगृह्यसूत्रे । ६. एकां शाखां सकल्पां वा षड्भिरङ्गै-
रधीत्य वा । षट्कर्मनिरतो विप्रः श्रोत्रियो नाम धर्मवित् ॥ ७. याज्ञवल्क्यस्मृतौ आचाराध्यायः १०९ ।
८. मनुस्मृतिः ३-२६८ । ९. 'श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवोपधारयेत्' । चाणक्यराजनीतिशास्त्रे १-७ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ११ ] स्याद्वादमञ्जरी ८९
अथ न वयं सामान्येन हिंसां धर्महेतुं ब्रूमः, किन्तु विशिष्टामेव । विशिष्टा च सैव या
वेदविहिता इति चेत्, ननु तस्या धर्महेतुत्वं किं वध्यजीवानां मरणाभावेन, मरणेऽपि तेषा-
मार्त्तध्यानाभावात् सुगतिलाभेन वा ? नाद्यः पक्षः। प्राणत्यागस्य तेषां साक्षादवेक्ष्यमाणत्वात् ।
न द्वितीयः। परचेतोवृत्तीनां दुर्लक्ष्यतयार्त्तध्यानाभावस्य वाङ्मात्रत्वात् । प्रत्युत हा कष्टमस्ति न
कोऽपि कारुणिकः शरणम्, इति स्वभाषया विरसमारसत्सु तेषु वदनदैन्यनयनतरलतादीनां
लिङ्गानां दर्शनाद् दुर्ध्यानस्य स्पष्टमेव निश्चेयमानत्वात् ॥
अथैत्थमाचक्षीथाः यथा अयःपिण्डो गुरुतया मज्जनात्मकोऽपि तनुतरपत्रादिकरणेन
संस्कृतः सन् जलोपरि प्लवते, यथा च मारणात्मकमपि विषं मन्त्रादिसंस्कारविशिष्टं सद्गुणाय
जायते, यथा वा दहनस्वभावोऽप्यग्निः सत्यादिप्रभावप्रतिहतशक्तिः सन् न हि प्रदहति । एवं
मन्त्रादिविधिसंस्काराद् न खलु वेदविहिता हिंसा दोषपोषाय । न च तस्याः कुत्सितत्वं
शङ्कनीयम् । तत्कारिणां याज्ञिकानां लोके पूज्यत्वदर्शनादिति । तदेतद् न दक्षाणां क्षमते
क्षोदम् । वैधम्र्येण दृष्टान्तानामसाधकतमत्वात् । अयःपिण्डादयो हि · पत्रादिभावान्तरापन्नाः
सन्तः सलिलतरणादिक्रियासमर्थाः । न च वैदिकमन्त्रसंस्कारविधिनापि विशस्यमानानां
पशूनां काचिद् वेदनानुत्पादादिरूपा भावान्तरापत्तिः प्रतीयते । अथ तेषां वधानन्तरं देवत्वा-
मीमांसकोंका मत निर्दोष नहीं है । जो जिसके अन्वय और व्यतिरेकसे संवद्ध होता है, वह उसका कार्य होता
है, जैसे मिट्टीका पिंड और घड़ा दोनोंमें अन्वय-व्यतिरेक संबंध है, इसलिये घड़ा मिट्टीके पिंडका कार्य है ।
परन्तु जिस प्रकार मिट्टीके पिंड होनेपर ही घट होता है, वैसे ही हिंसाके होनेपर धर्म होता है, ऐसा अनुभवमें
नहीं आता । क्योंकि केवल हिंसाको धर्म माननेपर अहिंसा रूप तप, ध्यान, दान आदि धर्मके कारण नहीं कहे
जा सकते ।
शंका—हम लोग सामान्य हिंसाको धर्म नहीं मानते, किंतु विशिष्ट हिंसाको ही धर्म कहते हैं । वेदमैं
प्रतिपादित हिंसा विशिष्ट हिंसा है । समाधान—आप लोग हिंसाको धर्म क्यों कहते हैं ? वध किये जाने-
वाले प्राणियोंका मरण नहीं होता, क्या इसलिये हिंसा धर्म है ? अथवा प्राणियोंके मरणके समय उनके परि-
णामोंमें आर्तध्यान न होनेसे उन्हें स्वर्ग प्राप्त होता है, इसलिये हिंसा धर्म है ? यदि कहो कि वेदोक्त विधिसे
प्राणियोंको मारनेपर उनका मरण नहीं होता, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि प्राणियोंका मरण प्रत्यक्ष देखनेमें
आता है । यदि कहो कि वेदोक्त विधिसे प्राणियोंके मारे जानेपर उनके आर्तध्यान नहीं होता, तो यह भी
केवल कथन मात्र है । क्योंकि 'कोई भी करुणाशील व्यक्ति हमारा रक्षक नहीं', इस हृदयद्रावक भाषासे
आक्रन्दन करते हुए प्राणियोंके मुखकी दीनता, नेत्रोंकी चंचलता आदिसे उनके दुर्ध्यानका स्पष्ट रूपसे पता
लगता है ।
शंका—जिस प्रकार भारी लोहपिंड पानीमें डूबनेवाला होनेपर भी हल्के-हल्के पत्तरोंके रूपमें
परिणत होकर जहाजके रूपमें पानीके ऊपर तैरता है; अथवा जिस तरह मंत्रके प्रभावसे, मारक विष भी
शरीरको आरोग्य प्रदान करता है; अथवा जिस तरह दहनशील अग्नि सत्य आदिके प्रभावसे दहन स्वभावको
छोड़ देती है; उसी तरह मंत्रादि विधिसे वेदोक्त हिंसा भी पापबंधका कारण नहीं होती । यह वेदोक्त हिंसा
निन्दनीय भी नहीं कही जा सकती, क्योंकि इस हिंसाके कर्त्ता याज्ञिक लोग संसारमें पूज्य दृष्टिसे देखे जाते
हैं । समाधान—यह कथन परीक्षणकी कसौटीपर ठीक नहीं उतरता । क्योंकि पूर्वपक्ष द्वारा दिये गये
दृष्टान्त, वैधर्म्यके कारण साधकतम नियमसे साध्य की सिद्धि करनेवाले नहीं होते । यहाँ लोहपिंड आदिके
दृष्टांत विषम हैं, इसलिये इन दृष्टांतोंसे साध्यकी सिद्धि नहीं होती । क्योंकि जिस प्रकार लोहपिंड पत्र आदिरूप
अवस्थान्तरको प्राप्त होकर ही जहाजके रूपमें पानीपर तैरने आदिकी क्रिया करनेमें समर्थ होता है, उस तरह
वैदिक विधिसे मंत्रोंके संस्कार द्वारा मारे जाते हुए प्राणियोंकी वेदनाकी अनुत्पत्ति रूप परिणति देखनेमें नहीं
आती । यदि आप कहें कि वेदोक्त विधिसे वध किये जानेवाले प्राणियोंको स्वर्गकी प्राप्ति रूप परिणति देखनेमें
१२
९० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
पत्तिर्भवान्तरमस्त्येवेति चेत् किमत्र प्रमाणम् । न तावत् प्रत्यक्षम् । तस्य सम्बद्धवर्तमानार्थ-
ग्राहकत्वात् । "सम्बद्धं वर्तमानं च गृह्यते चक्षुरादिना ।"१ इति वचनात् । नाप्यनुमानम् ।
तत्प्रतिबद्धलिङ्गस्यानुपलब्धेः । नाप्यागमः । तस्याद्यापि विवादास्पदत्वात् । अर्थापत्त्युपमानयो-
स्त्वनुमानान्तर्गततया तद्दूषणेनैव गतार्थत्वम् ॥
अथ भवतामपि जिनायतनादिविधाने परिणामविशेषात् पृथिव्यादिजन्तुजातघातन-
मपि यथा पुण्याय कल्पते इति कल्पना, तथा अस्माकमपि किं नेष्यते । वेदोक्तविधिविधान-
रूपस्य परिणामविशेषस्य निर्विकल्पं तत्रापि भावात् । नैवम् । परिणामविशेषोऽपि स एव शुभ-
फलो, यत्रानन्योपायत्वेन यतनयाप्रकृष्टप्रतनुचैतन्यानां पृथिव्यादिजीवानां वधेऽपि स्वल्पपुण्य-
व्ययेनापरिमितसुकृतसंप्राप्तिः, न पुनरितरः । भवत्पक्षे तु सत्स्वपि तत्तच्छ्रुतिस्मृतिपुराणेति-
हासप्रतिपादितेषु स्वर्गावाप्त्युपायेषु तांस्तान् देवानुद्दिश्य प्रतिप्रतीकं कर्तनकदर्थनया कान्दि-
शीकान् कृपणपञ्चेन्द्रियान् शौणिकाधिकं मारयतां कृत्स्नसुकृतव्ययेन दुर्गतिसेवानुकूल्यतां दुर्लभः
शुभपरिणामविशेषः। एवं च यं कञ्चन पदार्थं किञ्चित्साधर्म्यद्वारेणैव दृष्टान्तीकुर्वतां भवतामति-
प्रसङ्गः सङ्गच्छते ॥
न च जिनायतनविधापनादौ पृथिव्यादिजीववधेऽपि न गुणः। तथाहि तद्दर्शनाद् गुणानु-
रागितया भव्यानां बोधिलाभः३, पूजातिशयविलोकनादिना च मनःप्रसादः, ततः समाधिः,४ ततश्च
क्रमेण निःश्रेयसप्राप्तिरिति । तथा च भगवान् पञ्चलिङ्गीकारः—
आती है, तो इस कथनमें कोई प्रमाण नहीं है । प्राणियोंकी स्वर्ग-प्राप्ति प्रत्यक्ष प्रमाणसे नहीं जानी जा
सकती, क्योंकि प्रत्यक्ष केवल चक्षु आदि इन्द्रियोंसे संबद्ध वर्तमान पदार्थको ही जानता है। कहा भी है "प्रत्यक्ष
चक्षु आदिसे संबद्ध वर्तमान पदार्थको ही जानता है ।" अनुमानसे भी प्राणियोंकी स्वर्ग-प्राप्ति सिद्ध नहीं होती,
क्योंकि 'वधके अनंतर देवत्वकी प्राप्ति' साध्यके साथ अविनाभावी हेतुकी उपलब्धि नहीं होती । आगमके
विवादास्पद होनेसे आगमसे भी इसकी सिद्धि नहीं हो सकती । अर्थापत्ति और उपमान अनुमानमें ही
गर्भित हो जाते हैं ( जैनोंकी दृष्टिमें ), इसलिये अर्थापत्ति और उपमान प्रमाणसे भी वेदोक्त रीतिसे वध किये
हुए प्राणियोंकी स्वर्ग-प्राप्ति सिद्ध नहीं की जा सकती ।
शंका—जिस प्रकार जैनमतमें पृथिवी आदि जीवोंका घात होनेपर भी परिणाम विशेषके कारण जैन
मन्दिरोंका निर्माण पुण्यरूप ही माना जाता है, उसी तरह वेदविहित हिंसा में वेदोंका विधि-विधानरूप
विशिष्ट परिणामोंका सद्भाव होनेसे वह पुण्यका कारण होती है । समाधान—यह ठीक नहीं है । क्योंकि
मंदिरोंके निर्माण करनेमें उपायांतर न होनेके कारण, सावधानीपूर्वक प्रवृत्त होते हुए भी अत्यंत अल्प ज्ञानके
धारक पृथिवी आदि जीवोंका वध अनिवार्य है, तथा पृथिवी आदिके वध करनेपर अल्प पुण्यके नाश होनेसे
अपरिमित पुण्यकी प्राप्ति होती है । परन्तु आप लोगोंके मतमें श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहासमें यम, नियमादि-
से स्वर्गकी प्राप्तिका प्रतिपादन किया गया है, तथा उन उन देवी-देवताओंके उद्देश्यसे प्रत्येक मूर्तिके समक्ष
अपने शरीरके काटे जानेके भयसे विह्वल, निस्सहाय पंचेन्द्रिय जीवोंको कसाईसे भी अधिक क्रूरतासे मारने-
वाले पुरुषोंके समस्त पुण्यके नष्ट हो जानेके कारण दुर्गंतिको ले जानेवाले परिणामोंको शुभ परिणाम कहना
दुर्लभ है । अतएव थोड़ा-बहुत सादृश्य देखकर दृष्टांत बनानेसे आपके मतमें अतिप्रसंग उपस्थित होता है ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ११ ] स्याद्वादमञ्जरी ९१
“पुढवाइयाण जइवि हु होइ विणासो जिणालयाहिन्तो ।
तव्विसया वि सुदिट्ठिस्स नियमओ अत्थि अणुकंपा ॥१॥
एयाहिंतो बुद्धा विरया रक्खन्ति जेण पुढवाई ।
इत्तो निव्वणगया अवाहिंया आभवमिमाणं ॥२॥
रोगिसिरावेहो इव सुविज्जकिरिया व सुप्पउत्ताओ ।
परिणामसुंदरच्चिय १चिट्ठा से बाहजोगे वि ॥३॥'
इति । वैदिकवधविधाने तु न कञ्चित्पुण्यार्जनानुगुणं गुणं पश्यामः । अथ विप्रेभ्यः पुरोडाशा२-
दिप्रदानेन पुण्यानुबन्धी गुणोऽस्त्येव इति चेत् । न । पवित्रसुवर्णादिप्रदानमात्रेणैव पुण्योपार्जन-
सम्भवात् । कृपणपशुगणव्यपरोपणसमुत्थं मांसदानं केवलं निर्घृणत्वमेव व्यनक्ति । अथ न
प्रदानमात्रं पशुवधक्रियायाः फलं, किन्तु भूत्यादिकम् । यदाह श्रुतिः—“श्वेतं वायव्यमजमा-
लभेत भूतिकामः” ३इत्यादि । एतदपि व्यभिचारपिशाचग्रस्तत्वादप्रमाणमेव । भूतेश्चौपयि-
कान्तरैरपि साध्यत्वात् । अथ तत्र सत्रे हन्यमानानां छागादीनां प्रेत्यसद्गतिप्राप्तिरूपोऽस्त्ये-
वोपकार इति चेत् । वाङ्मात्रमेतत् । प्रमाणाभावात् । न हि ते निहताः पशवः सद्गतिलाभ-
मुदितमनसः कस्मैचिदागत्य तथाभूतमात्मानं कथयन्ति । अथास्त्यागमाख्यं प्रमाणम् । यथा—
“यद्यपि जिनमंदिरके निर्माणमें जमीन खोदने, ईंट तैयार करने तथा जल सिंचन आदिके कारण
पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और त्रस जीवोंका घात होता है, तो भी सम्यग्दृष्टी के पृथिवी आदि
जीवोंके प्रति दयाका भाव रहता ही है ॥१॥
जिनप्रतिमा आदिके दर्शनसे तत्त्वज्ञानको प्राप्त करनेवाले जीव पृथिवी आदि जीवोंकी रक्षा करते हैं,
मोक्षगमन करते हैं और यावज्जीवन अबाधित रहते हैं ॥२॥
जिस प्रकार किसी रोगीको अच्छा करनेके लिए रोगीकी नसका छेदना, उसे लंघन कराना, कटुक
औषधि देना आदि प्रयोग शुभ परिणामोंसे ही किये जाते हैं, उसी प्रकार पृथिवी आदिका वध करके भी जिन-
मंदिरके निर्माण करनेमें पुण्य ही होता है ॥३॥”
परन्तु वेदोक्त हिंसा में हम कोई पुण्योपार्जनका कारण नहीं देखते । यदि कहो कि वेदोक्त वधके
अवसरपर ब्राह्मणोंको पुरोडाश ( होमके बाद बचा हुआ द्रव्य ) आदि देनेसे पुण्य होता है, तो यह भी ठीक
नहीं । क्योंकि पवित्र सुवर्ण आदिके दान देनेसे ही पुण्य हो सकता है, मूक पशुओंके मांसका दान करना,
केवल निर्दयताका ही द्योतक है। यदि कहो कि वेदोक्त रीतिसे पशुवध करनेका फल केवल ब्राह्मणोंको पशुओंके
मांसका दान करना नहीं, किन्तु उससे विभूतिकी प्राप्ति होती है। क्योंकि श्रुतिमें भी कहा है, “ऐश्वर्य प्राप्त
करनेकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको वायु-देवताके लिये श्वेत बकरेका यज्ञ करना चाहिए,” आदि—यह भी
व्यभिचार-पिशाचसे ग्रस्त होनेके कारण ठीक नहीं है। क्योंकि ऐश्वर्यकी प्राप्ति अन्य उपायोंसे भी हो सकती है ।
यदि कहो कि यज्ञमें मारे जानेवाले बकरे आदि परलोकमें स्वर्ग प्राप्त करते हैं, इसलिये प्राणियोंका उपकार
होता है; यह भी ठीक नहीं । क्योंकि बकरे आदि यज्ञमें वध किये जानेके बाद स्वर्गको प्राप्त करते हैं, इसमें
कोई प्रमाण नहीं हैं। क्योंकि मरनेके बाद स्वर्गमें गये हुए पशु स्वर्गसे आकर प्रसन्न मनसे वहांके समाचारों-
को नहीं सुनाते । यदि आप कहें कि आगममें लिखा है—
१. छाया—पृथिव्यादीनां यद्यपि भवत्येव विनाशो जिनालयादिभ्यः । तद्विषयापि सुदृष्टेर्नियमतोऽस्त्यनुकम्पा ॥
एताभ्यो बुद्धा विरता रक्षन्ति येन पृथिव्यादीन् । अतो निर्वाणगता अबाधिता आभवमेषाम् ॥
रोगिशिरावेध इव सुवैद्यक्रिया इव सुप्रयुक्ता तु । परिणामसुन्दर इव चेष्टा सा बाधायोगेऽपि ॥
जिनेश्वरसूरिकृतपञ्चलिङ्गीग्रन्थे ५८-५९-६० ।
२. पुरो दाश्यते इति पुरोडाशो हुतद्रव्यावशिष्टम् । यवचूर्णनिर्मितरोटिकाविशेषः ।' ३. शतपथब्राह्मणे ।
९२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
“ओषध्यः पशवो वृक्षास्तिर्यञ्चः पक्षिणस्तथा ।
यज्ञार्थं निधनं प्राप्ताः प्राप्नुवन्त्युच्छ्रितं पुनः” ॥१
इत्यादि । नैवम् । तस्य पौरुषेयापौरुषेयविकल्पाभ्यां निराकरिष्यमाणत्वात् ॥
न च श्रौतेन विधिना पशुविशसनविधायिनां स्वर्गावाप्तिरुपकार इति वाच्यम् । यदि
हि हिंसयाऽपि स्वर्गप्राप्तिः स्यात्, तर्हि बाढं पिहिता नरकपुरप्रतोल्यः । शौनिकादीनामपि
स्वर्गप्राप्तिप्रसङ्गात् । तथा च पठन्ति परमार्थाः—२
“यूपं छित्त्वा पशून् हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम् ।
यद्येवं गम्यते स्वर्गे नरके केन गम्यते” ॥
किञ्च, अपरिचितास्पष्टचैतन्यानुपकारिपशुहिंसनेनापि यदि त्रिदिवपदवीप्राप्तिः, तदा
परिचितस्पष्टचैतन्यपरमोपकारिमातापवित्रादिव्यापादनेन यज्ञकारिणामधिकतरपदप्राप्तिः प्रस-
ज्यते । अथ “अचिन्त्यो हि मणिमन्त्रौषधीनां प्रभावः” इति वचनाद् वैदिकमन्त्राणामचिन्त्य-
प्रभावत्वात् तत्संस्कृतपशुवधे संभवत्येव स्वर्गप्राप्तिः, इति चेत् । न । इह लोके विवाहगर्भाधान-
जातकर्मादिषु तन्मन्त्राणां व्यभिचारोपलम्भाद् अदृष्टे स्वर्गादावपि तद्व्यभिचारोऽनुमीयते ।
दृश्यन्ते हि वेदोक्तमन्त्रसंस्कारविशिष्टेभ्योऽपि विवाहादिभ्योऽनन्तरं वैधव्याल्पायुष्कतादारि-
द्र्याद्युपद्रवविधुराः परःशताः । अपरे च मन्त्रसंस्कारं विना कृतेभ्योऽपि तेभ्योऽनन्तरं तद्विपरीताः ।
अथ तत्र क्रियावैगुण्यं विसंवादहेतुः, इति चेत् । न । संशयानिवृत्तेः । किं तत्र क्रियावैगुण्यात्
फले विसंवादः, किं वा मन्त्राणामसामर्थ्याद्, इति न निश्चयः । तेषां फलेनाविनाभावासिद्धेः ॥
“ओषधि, पशु, वृक्ष, तिर्यंच और पक्षी यज्ञमें निधनको प्राप्त होकर उच्च गतिको प्राप्त करते हैं ।”
इत्यादि ।
अतएव, आगमसे इसकी प्रमाणता सिद्ध होती है; यह भी ठीक नहीं । क्योंकि 'आगम पौरुषेय है या
अपौरुषेय' ? इन विकल्पोंके द्वारा आपके द्वारा मान्य आगमका आगे निराकरण किया जायेगा । ( देखिये इसी
कारिकाकी व्याख्या) ।
वेदोक्त विधिसे पशुओंको मारनेसे स्वर्गकी प्राप्ति रूप उपकार होता है, यह कथन सत्य नहीं है ।
क्योंकि यदि हिंसासे स्वर्गकी प्राप्ति होने लगे तो नरकद्वारके मुख्य मार्गको बन्द ही कर देना होगा, और
संसारके सभी कसाई स्वर्गमें पहुँच जायेंगे । सांख्य लोगोंने कहा भी है—
“यदि यूप ( यज्ञमें पशुओंको बाँधनेकी लकड़ी ) को काट करके, पशुओंका वध करके, और रक्तसे
पृथ्वीका सिंचन करके स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है, तो फिर नरक जानेके लिए कौन-सा मार्ग बचेगा ?”
तथा, यदि अपरिचित और अस्पष्ट चेतनायुक्त तथा किसी प्रकारका उपकार न करनेवाले मूक प्राणियों-
के वधसे भी स्वर्गकी प्राप्ति होना सम्भव है, तो परिचित और स्पष्ट चेतनायुक्त तथा महान् उपकार करनेवाले
अपने माता-पिताके वध करनेसे याज्ञिक लोगोंको स्वर्गसे भी अधिक फल मिलना चाहिए । यदि आप कहें कि
“मणि, मन्त्र और ओषधका प्रभाव अचिंत्य होता है,” इसलिए वैदिक मन्त्रोंका भी अचिंत्य प्रभाव है, अतएव
मन्त्रोंसे संस्कृत पशुओंका वध करनेसे पशुओंको स्वर्ग मिलता है, तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि इस लोकमें
विवाह, गर्भाधान और जातकर्म आदिमें उन मंत्रोंका व्यभिचार पाया जाता है, तथा अदृष्ट स्वर्ग आदिमें
उस व्यभिचारका अनुमान किया जाता है । देखा जाता है कि वैदिक विधिके अनुसार विवाह आदिके किये
जानेपर भी स्त्रियां विधवा हो जाती हैं, तथा सैकड़ों मनुष्य अल्पायु, दरिद्रता आदि उपद्रवोंसे पीड़ित रहते हैं ।
तथा, विवाह आदिके वैदिक मंत्र-विधिसे सम्पादित न होनेपर भी अनेक स्त्री-पुरुष आनन्दसे जीवन यापन
करते हैं, इसलिए वैदिक मन्त्रोंसे संस्कृत वध किये जानेवाले पशुओंको स्वर्गकी प्राप्ति स्वीकार करना ठीक
नहीं है । यदि आप कहें कि मन्त्र अपना पूरा असर दिखाते हैं, लेकिन यदि मन्त्रोंकी ठीक-ठीक विधि नहीं
१. मनुस्मृतौ ५-४० । २. सांख्याः ।
अथ यथा युष्मन्मते “आरोग्गवोहिलाभं समाहिवरमुत्तमं दिंतु”१ इत्यादीनां वाक्यानां
लोकान्तर एव फलमिष्यते, एवमस्मदभिमतवेदवाक्यानामपि नेह जन्मनि फलमिति किं न
प्रतिपद्यते । अतश्च विवाहादौ नोपालम्भावकाशः, इति चेत् । अहो वचनवैचित्री । यथा
वर्तमानजन्मनि विवाहादिषु प्रयुक्तैर्मन्त्रसंस्कारैरागामिनि जन्मनि तत्फलम्, एवं द्वितीयादि-
जन्मान्तरेष्वपि विवाहादीनामेव प्रवृत्तिधर्माणां पुण्यहेतुत्वाङ्गीकारेऽनन्तभवानुसन्धानं प्रस-
ज्यते । एवं च न कदाचन संसारस्य परिसमाप्तिः । तथा च न कस्यचिदपवर्गप्राप्तिः । इति
प्राप्तं भवदभिमतवेदस्यापर्यवसितसंसारवल्लरीमूलकन्दत्वम् । आरोग्यादिप्रार्थना तु असत्या-
ऽमृषा२ भाषा परिणामविशुद्धिकारणत्वादू न दोषाय । तत्र हि भावारोग्यादिकमेव विवक्षितम्,
तच्च चातुर्गतिकसंसारलक्षणभावरोगपरिक्षयस्वरूपत्वाद् उत्तमफलम् । तद्विषया च प्रार्थना
कथमिव विवेकिनामनादरणीया । न च तज्जन्यपरिणामविशुद्धेस्तत्फलं न प्राप्यते । सर्ववादिनां
भावशुद्धेरपवर्गफलसम्पादनेऽविप्रतिपत्तेरिति ॥
की जाय, तो मन्त्रोंका असर नहीं रहता, यह कथन भी ठीक नहीं । इससे संशयकी निवृत्ति नहीं होती ।
क्योंकि मन्त्रोंकी विधिमें वैगुण्य होनेसे मन्त्रोंका प्रभाव नष्ट हो जाता है, अथवा स्वयं मन्त्रोंमें ही प्रभाव
दिखानेको असमर्थता है, यह कैसे निश्चय हो ? मन्त्रोंके फलसे अविनाभावकी सिद्धि नहीं होती ।
शंका—जिस प्रकार जैनमतमें “आरोग्य, सम्यक्त्व तथा समाधिको प्रदान करो” इत्यादि स्तुतियोंसे
दूसरे लोकमें फल प्राप्ति कही जाती है, उसी तरह हमारे माने हुए वेद-वाक्योंका और विवाह आदि मन्त्रोंका
भी परलोकमें ही फल मिलता है। समाधान—यदि आप लोग इस जन्ममें विवाह आदिमें प्रयुक्त मन्त्रोंका
फल आगामी भवमें स्वीकार करते हैं, तो यह आपके वचनोंकी विचित्रता है, और इस तरह तो दूसरे, तीसरे
आदि अनेक भवोंमें मन्त्रके संस्कारोंका फल मान लेनेसे अनन्त भवोंकी उत्पत्ति माननी होगी, और इस तरह
कभी संसारका अन्त न होनेसे किसीको भी मोक्ष न मिलेगा । इस प्रकार आपके द्वारा मान्य वेदको अनन्त
संसारवल्लरीका मूल मानना होगा । तथा, हम लोग जो आरोग्यलाभ आदिकी प्रार्थना करते हैं, वह
असत्यअमृषा (व्यवहार) भाषा द्वारा परिणामोंकी विशुद्धि करनेके लिए है, दोषके लिए नहीं ।
(असत्यअमृषा भाषा आमन्त्रणी, आज्ञापनी, याचनी, प्रच्छनी, प्रज्ञापनी, प्रत्याख्यानी, इच्छानुकूलिका,
अनभिगृहीता, अभिगृहीता, संदेहकारिणी, व्याकृता, अव्याकृताके भेदसे बारह प्रकारकी बताई गयी है । ( १ )
'हे देव, यहाँ आओ', इस प्रकारके वचनोंको आमन्त्रणी भाषा कहते हैं । ( २ ) 'तुम यह करो' इस प्रकारके
आज्ञासूचक वचन कहना, आज्ञापनी भाषा है । ( ३ ) 'यह दो' इस प्रकार याचनाके सूचक वचन बोलना,
याचनी भाषा है । ( ४ ) अज्ञात अर्थको पूछना, प्रच्छनी भाषा है। ( ५ ) 'जीव हिंसासे निवृत्त होकर
चिरायुका उपभोग करते हैं' इस प्रकार शिष्योंके उपदेशसूचक वचनोंका कहना, प्रज्ञापनी भाषा है। ( ६ )
माँगनेवालेको निषेध करनेवाले वचनोंका बोलना प्रत्याख्यानी भाषा है । ( ७ ) किसी कार्यमें अपनी अनुमति
देनेको इच्छानुकूलिका भाषा कहते हैं । ( ८ ) 'बहुतसे कार्योंमें जो तुम्हें अच्छा लगे वह करो' इस प्रकारके
वचनोंको अनभिगृहीता भाषा कहते हैं । ( ९ ) 'बहुतसे कार्योंमें अमुक कार्य करना चाहिए, और अमुक
नहीं', इस प्रकार निश्चित वचनोंके बोलनेको अभिगृहीता भाषा कहते हैं । ( १० ) संशय उत्पन्न करनेवाली
भाषाको संदेहकारिणी भाषा कहते हैं; जैसे 'सैंधव' कहनेपर सिंघा नमक और घोड़ा दोनों पदार्थोंमें संशय उत्पन्न
होता है । ( ११ ) जिससे स्पष्ट अर्थका ज्ञान हो, वह व्याकृता भाषा है । (१२) गम्भीर अथवा अस्पष्ट अर्थको
बतानेवाले वचनोंको अव्याकृता भाषा कहते हैं । गोम्मटसार आदि दिगम्बर ग्रन्थोंमें असत्यअमृषा भाषाके नौ
१. छाया—आरोग्यं बोधिलाभं सामाधिवरमुत्तमं ददतु । आवश्यक २४-६ ।
२. आमन्त्रणी, आज्ञापनी, याचनी, प्रच्छनी, प्रज्ञापनी, प्रत्याख्यानी, इच्छानुकूलिका, अनभिगृहीता,
अभिगृहीता, संदेहकारिणी, व्याकृता, अव्याकृता इति द्वादशविधा असत्याऽमृषाभाषा लोकप्रकाशे
तृतीयसर्गे योगाधिकारे ।