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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 458 में से

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पृष्ठ 142

९० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
पत्तिर्भवान्तरमस्त्येवेति चेत् किमत्र प्रमाणम् । न तावत् प्रत्यक्षम् । तस्य सम्बद्धवर्तमानार्थ-
ग्राहकत्वात् । "सम्बद्धं वर्तमानं च गृह्यते चक्षुरादिना ।"१ इति वचनात् । नाप्यनुमानम् ।
तत्प्रतिबद्धलिङ्गस्यानुपलब्धेः । नाप्यागमः । तस्याद्यापि विवादास्पदत्वात् । अर्थापत्त्युपमानयो-
स्त्वनुमानान्तर्गततया तद्दूषणेनैव गतार्थत्वम् ॥
अथ भवतामपि जिनायतनादिविधाने परिणामविशेषात् पृथिव्यादिजन्तुजातघातन-
मपि यथा पुण्याय कल्पते इति कल्पना, तथा अस्माकमपि किं नेष्यते । वेदोक्तविधिविधान-
रूपस्य परिणामविशेषस्य निर्विकल्पं तत्रापि भावात् । नैवम् । परिणामविशेषोऽपि स एव शुभ-
फलो, यत्रानन्योपायत्वेन यतनयाप्रकृष्टप्रतनुचैतन्यानां पृथिव्यादिजीवानां वधेऽपि स्वल्पपुण्य-
व्ययेनापरिमितसुकृतसंप्राप्तिः, न पुनरितरः । भवत्पक्षे तु सत्स्वपि तत्तच्छ्रुतिस्मृतिपुराणेति-
हासप्रतिपादितेषु स्वर्गावाप्त्युपायेषु तांस्तान् देवानुद्दिश्य प्रतिप्रतीकं कर्तनकदर्थनया कान्दि-
शीकान् कृपणपञ्चेन्द्रियान् शौणिकाधिकं मारयतां कृत्स्नसुकृतव्ययेन दुर्गतिसेवानुकूल्यतां दुर्लभः
शुभपरिणामविशेषः। एवं च यं कञ्चन पदार्थं किञ्चित्साधर्म्यद्वारेणैव दृष्टान्तीकुर्वतां भवतामति-
प्रसङ्गः सङ्गच्छते ॥
न च जिनायतनविधापनादौ पृथिव्यादिजीववधेऽपि न गुणः। तथाहि तद्दर्शनाद् गुणानु-
रागितया भव्यानां बोधिलाभः३, पूजातिशयविलोकनादिना च मनःप्रसादः, ततः समाधिः,४ ततश्च
क्रमेण निःश्रेयसप्राप्तिरिति । तथा च भगवान् पञ्चलिङ्गीकारः—
आती है, तो इस कथनमें कोई प्रमाण नहीं है । प्राणियोंकी स्वर्ग-प्राप्ति प्रत्यक्ष प्रमाणसे नहीं जानी जा
सकती, क्योंकि प्रत्यक्ष केवल चक्षु आदि इन्द्रियोंसे संबद्ध वर्तमान पदार्थको ही जानता है। कहा भी है "प्रत्यक्ष
चक्षु आदिसे संबद्ध वर्तमान पदार्थको ही जानता है ।" अनुमानसे भी प्राणियोंकी स्वर्ग-प्राप्ति सिद्ध नहीं होती,
क्योंकि 'वधके अनंतर देवत्वकी प्राप्ति' साध्यके साथ अविनाभावी हेतुकी उपलब्धि नहीं होती । आगमके
विवादास्पद होनेसे आगमसे भी इसकी सिद्धि नहीं हो सकती । अर्थापत्ति और उपमान अनुमानमें ही
गर्भित हो जाते हैं ( जैनोंकी दृष्टिमें ), इसलिये अर्थापत्ति और उपमान प्रमाणसे भी वेदोक्त रीतिसे वध किये
हुए प्राणियोंकी स्वर्ग-प्राप्ति सिद्ध नहीं की जा सकती ।
शंका—जिस प्रकार जैनमतमें पृथिवी आदि जीवोंका घात होनेपर भी परिणाम विशेषके कारण जैन
मन्दिरोंका निर्माण पुण्यरूप ही माना जाता है, उसी तरह वेदविहित हिंसा में वेदोंका विधि-विधानरूप
विशिष्ट परिणामोंका सद्भाव होनेसे वह पुण्यका कारण होती है । समाधान—यह ठीक नहीं है । क्योंकि
मंदिरोंके निर्माण करनेमें उपायांतर न होनेके कारण, सावधानीपूर्वक प्रवृत्त होते हुए भी अत्यंत अल्प ज्ञानके
धारक पृथिवी आदि जीवोंका वध अनिवार्य है, तथा पृथिवी आदिके वध करनेपर अल्प पुण्यके नाश होनेसे
अपरिमित पुण्यकी प्राप्ति होती है । परन्तु आप लोगोंके मतमें श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहासमें यम, नियमादि-
से स्वर्गकी प्राप्तिका प्रतिपादन किया गया है, तथा उन उन देवी-देवताओंके उद्देश्यसे प्रत्येक मूर्तिके समक्ष
अपने शरीरके काटे जानेके भयसे विह्वल, निस्सहाय पंचेन्द्रिय जीवोंको कसाईसे भी अधिक क्रूरतासे मारने-
वाले पुरुषोंके समस्त पुण्यके नष्ट हो जानेके कारण दुर्गंतिको ले जानेवाले परिणामोंको शुभ परिणाम कहना
दुर्लभ है । अतएव थोड़ा-बहुत सादृश्य देखकर दृष्टांत बनानेसे आपके मतमें अतिप्रसंग उपस्थित होता है ।