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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

ज्ञान के आधार पर चल सकें! भारत में कृषि व उद्योग या ऐसे अन्य क्षेत्रों में 80
प्रतिशत उत्पादन तो आज भी परम्परागत भारतीय प्रतिभा के लोग ही करते हैं।
आवश्यक साधन व स्वतंत्रता रहेगी तो यह प्रतिभा फूले-फलेगी; परिष्कृत होगी
और इसके परिष्कृत होने पर यह भी सम्भव हो पायेगा कि पश्चिम के ज्ञान और
भारतीय बृहत् समाज के ज्ञान में कुछ संवाद और लेन-देन कायम हो सके।
बृहत् समाज के पास आवश्यक साधन व स्वतंत्रता आ जाये, पर्याप्त खुली जगह
(स्पेस) मिल जाये, तो वह आत्माभिव्यक्ति करने लगेगा। उसकी आत्माभिव्यक्तियां
ही समाज को स्वस्थ, सबल और समृद्ध बनाएंगी।
अभी के आधुनिकृत समूहों ने तो समस्त राजनैतिक सत्ता और बल का
प्रयोग इन आत्माभिव्यक्तियों को बाधित करने के लिए ही किया है। परिणाम
यह है कि भारत दो भागों में बंटा है, पर यह बंटवारा हमें सामाजिक विनाश की
ओर ही ले जाता है। एक भाग है उन आधे प्रतिशत लोगों का जो अपने सहायक
तथा सेवक वर्ग के सहारे, जो कि लगभग 15-20 प्रतिशत बैठता है, भारत के
तंत्र और साधन क्षेत्रों को नियंत्रित करते हैं। दूसरा भाग उन 80-85 प्रतिशत
लोगों का है, जो अपने अति सीमित साधनों और अवशिष्ट बल से ही जी रहे हैं।
यह सही है कि पश्चिम को इसका अभ्यास रहा है कि 90 क्या, 99
प्रतिशत तक की आबादी को एक प्रतिशत प्रभुवर्ग दासत्व में बांधकर रखे और
उन्हें मशीन जैसा मानकर काम ले। समय-समय पर पश्चिम के औजार इत्यादि
बदलते रहे हैं, लेकिन रिश्ता स्वामी और दास का ही बना रहा है। हमारे यहां तो
यह संस्कार ही नहीं रहा; इसलिए यहां के लोग जो स्वाधीनता-संग्राम के
कारण, उसके संस्कारों के प्रभाव से, सम्पन्न वर्ग के प्रति अब तक आत्मीयता
और सहनशीलता रखे हुए थे, वे अधिक समय इसे रख और सह नहीं सकेंगे।
अतः मनमाने टकराव तथा हिंसा का रास्ता खुला छोड़े रखने से अच्छा है कि
दोनों का स्पष्ट न्यायसंगत विभाजन हो जाए। पश्चिमीकृत लोग अपने पश्चिमी
किस्म के ढांचों के साथ महानगरों, आदि में रहें; परन्तु उनके साधन-स्रोत जरूर
घटाने होंगे; अभी की तरह 85-90 प्रतिशत साधनों का उपयोग केवल उन्हें ही
तो नहीं करने दिया जा सकता। लेकिन उन्हें न्यायपूर्ण साधन-स्रोतों के आधार
पर अपना जीवन चलाने की पूरी स्वतंत्रता रहे। दूसरी ओर, 80-85 प्रतिशत
लोगों को अपने साधन-स्रोतों का स्वविवेक से आत्माभिव्यक्ति के लिए प्रयोग
करने दिया जाए। उनसे गलतियां भी होंगी; पर गलतियां आधुनिक वर्ग से भी तो
कम नहीं हुई हैं।
इस तरह के न्यायसंगत बंटवारे में यह आवश्यक है कि इन लगभग
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48-50 वर्षों में हमने सरकारी और स्वैच्छिक स्तर पर जो नयी योजनाएं बनाई
हैं, संयंत्र, बांध, बिजली के प्रतिष्ठान, मकानों और वास्तुकला, आदि की विधियां
अपनाई हैं, उनकी पूरी तरह से समीक्षा हो। भारत की कृषि-व्यवस्था,
भवन-निर्माण, वन व्यवस्था, पशुपालन-व्यवस्था, वस्त्र-निर्माण व्यवस्था,
भवन-निर्माण एवं प्रबन्ध जैसे कार्य तो वृहत् समाज की ही जिम्मेदारी रहे।
उनकी शिक्षा भी उनके ही अधीन चलनी चाहिए; आधुनिकतावादियों की शिक्षा
का उन पर नियंत्रण तथा बोझ न रहे।
जितना वृहत् समाज के लोगों को बाहर का या आधुनिकीकृत वर्ग का
लेना तथा आत्मसात् करना होगा, वे कर लेंगे। आत्माभिव्यक्ति के स्वतंत्र अवसर
मिलें, तो वे आवश्यकतानुसार वाह्य ज्ञान को आत्मसात् भी करते रहेंगे। अपनी
सभ्यता, संस्कृति, विद्या-केन्द्रों का नवनिर्माण वे अपने विवेक से कर लेंगे।
आपस में स्वतंत्र तथा सम्मानजनक संवाद तथा सम्प्रेषण रहेगा ही। लेकिन
वृहत् समाज को हीन मानकर, उनका उद्धार और कल्याण करने की युक्तियां
देते हुए, राष्ट्रीय साधनों-स्रोतों पर नियंत्रण रखना हो तो हमें छोड़ना ही होगा।
ऐसे न्यायपूर्ण विभाजन, संयोजन और समन्वय द्वारा राष्ट्र में 20-30 वर्षों के
लिये दोनों हिस्सों का शक्ति पूर्ण सह अस्तित्व रह सकना संभव है, ऐसे सहअस्तित्व
की अवधि में, हमें कुछ अधिक साहस और शक्ति मिली तो हम मिलकर आगे का
भी सोच सकेंगे और ऐसे रास्ते व व्यवस्थायें बना सकेंगे जिनके द्वारा हमारा यह
टूटा-बिखरा समाज फिर से एक होकर आगे बढ़ सकेगा।
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अंग्रेजी शासन और तंत्र व्यवस्था
सन् 1750 से भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करते ही, अंग्रेजों ने
यहां अपनी जरूरत के मुताबिक व्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया था। उसमें
सबसे पहला काम तो अंग्रेज अफसरों व सैनिकों के मातहत बढ़ती हुई अंग्रेजी
सेना में भारतीयों को भर्ती करना था। दूसरा, और इससे भी अधिक महत्व का
काम था भारत के खुशहाल खेतिहरों व कारीगरों को अलग-अलग तरीकों से
अपने अधीन करना और यहां की खेती की उपज के आधे से अधिक भाग कर
(टैक्स) के रूप में बन्दूक व तलवार के जोर पर वसूल करना। इसी तरह से
कारीगरों से जबरदस्ती काम करवाना और उनके उद्योगों से बनी वस्तुओं की
कम से कम कीमत देना। आरम्भ में तो ऐसी कार्यवाही मद्रास व बंगाल के क्षेत्र
में ही रही, लेकिन सन् 1800 के बाद अंग्रेजों ने धीरे-धीरे सारे भारत में ऐसा
करना शुरू कर दिया। इसी प्रकार के बदलाव अंग्रेजों के मातहत आये हुए
भारतीय क्षेत्रों में भी होने लगे – वहां भी नये तंत्र स्थापित होने लगे।
भारतीय व्यवस्थाओं के अनुसार हर क्षेत्र की अपनी स्थानीय सैनिक
व्यवस्थाएं थीं और हर ग्राम व नगर में अपनी स्थानीय पुलिस व्यवस्था भी थी।
सेना और पुलिस स्थानीय व्यवस्थाओं के अधीन होती थी। इसी तरह से, जमीन
का हिसाब-किताब, उसकी रजिस्ट्री या उनमें आवश्यक तब्दीली करने वाले
लोग भी स्थानीय व्यवस्थाओं के मातहत रहते थे। जमीन के हिसाब-किताब से
संबंधित लोगों को दक्षिण भारत में कनकपिल्ले और उत्तर में लेखपाल, पटवारी
इत्यादि कहा जाता था। इसी तरह से गांव के स्तर पर बढ़ई, लोहार, धोबी,
कुम्हार, सिंचाई के साधनों की मरम्मत व व्यवस्था करने वाले, पंचांग और तिथि,
शुभ दिन इत्यादि बताने वाले, मंदिरों के पुजारी, देवदासी, गायक और दूसरे
कर्मचारी गांव और नगर के मोहल्लों से संबंधित होते थे। गांव में इन सब का
कृषि की उपज में हिस्सा होता था। अंग्रेजी शासन ने आते ही सेना, पुलिस,
कनकपिल्ले, सिंचाई के साधनों की मरम्मत व काम करने वालों इत्यादि को इस
व्यवस्था से पूरी तरह से अलग कर दिया। पुरानी व्यवस्था में इन लोगों को जो
मिलता था वह अब मिलना बन्द हो गया क्योंकि ब्रिटिश सरकार अब उसे कर
के रूप में लेने लगी। इनमें से कुछ लोगों को तो ब्रिटिश सरकार ने अपना नौकर
बना दिया परन्तु बाकी बेकार हो गये। अंग्रेजों से पहले भारत में, दक्षिण और
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उत्तर दोनों में, यह प्रथा थी कि किसी का अगर कुछ खो जाता था और पुलिस
अगर खोई हुई चीज को तलाश करने में सफल नहीं होती थी, तो पुलिस को
जिस व्यक्ति का सामान खोया होता था उसे हर्जाना देना पड़ता था। अंग्रेजी
व्यवस्था ने भारतीय पुलिस व्यवस्था को खत्म कर दिया और उसकी जगह नई
केन्द्रीकृत व्यवस्था लागू की। ऐसा करते ही हर्जाने की बात तो पूरी तरह से
समाप्त ही हो गयी। उल्टे कुछ दिनों के बाद ऐसा होने लगा कि अंग्रेजी पुलिस,
जिनका कुछ खो जाता था और जो शिकायत दर्ज करवाते थे, उन्हीं के साथ
मारपीट करने लगती थी। इसके साथ-साथ ही जमीन का लगान अंग्रेजी
व्यवस्था ने तिगुना-चौगुना बढ़ा दिया और सन् 1790 के आसपास जमीन की
मिल्कियत कुछ थोड़े से लोगों को दे दी, जिन्हें जमींदार कहा गया। वैसे इंग्लैंड
में 700 वर्षों से जमींदार होते रहे थे, लेकिन ये जमींदार किसान से कुल फसल
का 50-80 प्रतिशत तक लगान के रूप में ले लेते थे, सरकार को कुल फसल का
लगभग 10 प्रतिशत देते थे। शेष अपने पास रखते थे। लेकिन बंगाल इत्यादि में
जो जमींदार अंग्रेजों ने बनाये वे किसानों से उनकी उपज का करीब 50 प्रतिशत
वसूल करते थे और उसमें से 90 प्रतिशत ब्रिटिश सरकार को कर के रूप में देते
थे। उनके अपने पास किसान से वसूल किये गए लगान का 10 प्रतिशत ही
बचता था।
किसान से लगान वसूली की दर में तिगुनी-चौगुनी वृद्धि अंग्रेजों के
जमाने में हुई। इसलिए इतना ऊँचा कर वसूल करना असंभव सा हो गया।
इसका एक और कारण भी था। भारतीय व्यवस्था में लगान, जिसकी दर वैसे
भी काफी कम थी, अनाज के रूप में ही लिया जाता था। परन्तु अंग्रेजों ने बढ़ते
हुए लगान को, अनाज के बजाय पैसे में लेना शुरू किया। पिछले 10 वर्षों की
फसल का दाम इत्यादि निकाल कर भूमिकर पैसे के रूप में निर्धारित किया
गया। अंग्रेजी व्यवस्था के आने से गरीबी में जो भारी बढ़ोत्तरी हुई और उसकी
फसल के दाम गिर गये। इसका असर भी किसान पर दोतरफा हुआ क्योंकि
उसे लगान अब फसल के बजाय पैसे में देना होता था। मन्दी के कारण फसल
की कीमत कम होने की वजह से वास्तविक लगान की दर 80 से 90 प्रतिशत
तक होने लगी, यानी किसान के पास सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत ही बचता था।
इस वजह से लगान वसूली में मुश्किलें आने लगीं। इसलिए अंग्रेजी तंत्र ने सन्
1792 में फैसला किया और जमींदार को यह हक दिया कि वह जब चाहे
खेतिहर को जमीन से बेदखल कर सकता है। इससे पहले भारत में कभी भी
खेतिहर को इस तरह से उनकी जमीन से बेदखल करने का रिवाज नहीं था।
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यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति अनुलेखन प्रस्तुत है:

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लेकिन अंग्रेजी अधिकारियों का तर्क था कि अगर इंग्लैंड में खेतिहर को वहां
का जमींदार निकाल सकता है तो भारत में ऐसा अधिकार और भी जरूरी है,
क्योंकि यहां लगान की दर इंग्लैंड से कई गुना ज्यादा है।
क्योंकि इतना बड़ा लगान वसूल करना आसान नहीं रहा होगा इसलिए
सेना की टुकड़ियों को, जिन्हें रेवेन्यू बटालियन कहा गया, उन्हें कर वसूल करने
के काम में लगाया गया। इसका परिणाम यह भी हुआ कि सन् 1805-1806
तक बंगाल-बिहार के अधिकांश जमींदार दिवालिया हो गये। इसके बाद इन
जमींदारियों की नीलामियाँ शुरू हुईं और साहूकार, फौजी ठेकेदार, राजा इत्यादि
नये जमींदार बने। यह सिलसिला अगले 40-50 वर्ष तक चलता रहा और इस
दौरान भारत की जनता की एक बड़ी संख्या भुखमरी, अकाल इत्यादि से सन्
1900 और उसके बाद तक मरती रही। कविवर श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार,
"कुल दुनिया की लड़ाइयों में सौ वर्ष के अन्दर (सन् 1793 से सन् 1900
तक) सिर्फ पचास लाख आदमी मारे गये थे पर हमारे हिन्दुस्तान के केवल
दस वर्ष में (सन् 1891 से सन् 1901 तक), भूख, अकाल के मारे एक
करोड़ नब्बे लाख मनुष्यों ने प्राण त्याग दिये"- (हिन्दी ग्रन्थमाला, मई सन्
1908 पृष्ठ 9 और 'भारत भारती', संवत् 1969, पृष्ठ 87)। तब मैथिलीशरण जी
26 वर्ष के थे। वे शायद राजेन्द्र प्रसाद व जवाहरलाल नेहरू की उम्र के तब रहे
होंगे, हो सकता है कि एक-दो वर्ष बड़े भी हों। इससे पहले, सन् 1870 के
आसपास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था कि अंग्रेजों ने भारतवासियों से सब
कुछ ले लिया, लेकिन उन्हें भीख मांगना अवश्य सिखा दिया है। महात्मा गांधी
जनवरी सन् 1915 में भारत लौटे थे। ऐसा लगता है कि मैथिलीशरण जी की
तरह बहुत से भारतीय गांधीजी के आने की तीव्र प्रतीक्षा कर रहे थे। जब
महात्मा गांधी 9 जनवरी, 1915 को जहाज से बम्बई पहुंचे तब उनका बहुत भव्य
स्वागत हुआ। लेकिन ऐसा स्वागत गांधीजी को कुछ अच्छा नहीं लगा। उनके
आने के तीन-चार दिनों के अन्दर भारत के कई प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों में
गांधीजी के आने को लेकर लम्बे-लम्बे संपादकीय लिखे गये - मद्रास के
'हिन्दू' में, और इलाहाबाद के 'लीडर' में भी। उन्हें पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे
कि किसी अवतार की प्रतीक्षा हो रही थी। यह वर्णन कुछ उसी तरह का है जैसा
कि गौतम बुद्ध के जन्म का वर्णन अश्वघोष के 'बुद्ध चरित' में किया गया है, कुछ
ललित विस्तार से।
अगर यह सही है कि सन् 1891 से सन् 1901 तक भारत में भुखमरी
के कारण एक करोड़ नब्बे लाख लोग मर गये तो, अंग्रेजी शासन के शुरू से
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उसके अंत तक भारत में 20-25 करोड़ जन भुखमरी से मरे होंगे, ऐसा माना जा
सकता है। इसी तरह करोड़ों की संख्या में गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़ और
दूसरे जीव-जन्तु भी मरे होंगे। वन और पेड़-पौधे तो बहुत बड़ी तादाद में नष्ट
हुए ही।
इस तरह के शोषण और अत्याचार के कारण भारतीयों में अंग्रेजों से
लड़ने की शक्ति नहीं रह गयी। वैसे तो भारत के लोग कभी भी खूँखार व लड़ाकू
नहीं रहे, न ही उन्हें न्यायालयों में जाने का चाव ही था। अंग्रेजी राज्य ने उनके
खेतों को छीन कर, उद्योगों व घरों को उजाड़ कर, उन्हें न्यायालयों की शरण
लेने के लिए एक तरह से बाध्य किया। इन न्यायालयों में असत्य का सहारा
लेना आवश्यक-सा हो गया। अंग्रेजों ने जो न्यायालय स्थापित किये उनमें अब
तक भी यह बात ज्यादा चलती रही कि भारतीय असत्य ही बोलते हैं। उन्हें
असत्य बोलना उनके वकीलों और कर्मचारियों एवं न्यायालयों ने ही सिखाया।
जैसे-जैसे न्यायालय स्थापित हुए वैसे-वैसे ही अंग्रेजी राज्य में जिलों
को चलाने के लिए दूसरे तंत्र भी स्थापित हुए। ताल्लुकों को चलाने के लिए तंत्र
बने। प्रदेशों को चलाने के लिए तंत्र बने। भारत को चलाने के लए तंत्र बने।
जितना अंग्रेजों से हो सका उतना उन्होंने भारत को कस कर रख दिया। लोगों
को हिलने-डुलने, सांस लेने तक का मौका नहीं रहा। भय और उसके साथ-साथ
गरीबी और मुफलिसी का राज्य छा गया।
फिर भी अंग्रेज कुछ भयभीत ही रहे, विशेषकर भारतीय सैनिकों से।
साधारणतः तो अंग्रेज यही मानते थे कि भारतीय सैनिक, जिनकी संख्या सन्
1820-30 में दो-तीन लाख रही होगी, उनके प्रति वफादार हैं। लेकिन उन्हें यह
भी लगता था कि कहीं अगर हवा का बहाव बदल गया और भारतीय सैनिकों
को यह लगने लगा कि अंग्रेजों का राज्य उखड़ने वाला है, तो फिर वे अंग्रेजों के
खिलाफ हो जायेंगे। इसी बीच में सन् 1829-30 के वर्षों में यह भी तय किया
गया कि अंग्रेजों और दूसरे यूरोपीय लोगों को भारत में जहाँ-तहाँ, विशेषतः
पर्वतों पर, ठंडी जगहों पर बसाया जाये। धीरे-धीरे ऐसी बसावट शुरू भी हुई।
इससे पहले भी भारत में सैकड़ों जगह अंग्रेजी सेना की छावनियां बनी थीं। सेना
के साथ, सेना की सेवा के लिए, उनकी तुलना में पांच-दस गुना ज्यादा लोग,
सेना की सवारी और सामान ढोने के लिए एकत्रित किये जाते रहे। इनमें से,
आधे से अधिक को, उस समय की अंग्रेजों द्वारा घटाई गयी मजदूरी भी नहीं दी
जाती थी और कुछ लोगों को तो एकदम 'बेगार' में ही रखा जाता था। अफसरों
व सैनिकों के लिए वेश्यालय भी तभी बने और जैसे-जैसे छावनियों की संख्या
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बढ़ने लगी वैसे-वैसे यह सब ठिकाने भी बढ़ने लगे। सन् 1857-58 की अंग्रेजों और भारतीयों के बीच की बड़ी लड़ाई के बाद, जिसमें अन्ततः भारतीय हार ही गये, उनके सैकड़ों शहर लूटे गये और उनके पचासों लाख लोगों को वृक्षों पर लटका कर, अलग-अलग तरीकों से, मार दिया गया। इसके बाद अंग्रेजों को यह आवश्यक लगा कि भारत में बड़े पैमाने पर अंग्रेजों और यूरोपियों को बसाने का काम तेजी से आरम्भ किया जाना चाहिये। आज जो यह पहाड़ी शहर देशभर में हैं और काफी चाय व काफी के बगीचे या दूसरे बड़े व्यापारिक खेती के मैदान असम, बिहार और दक्षिण भारत इत्यादि में बने हैं, ये अधिकांशतः सन् 1860 के इसी अंग्रेजी फैसले के बाद स्थापित हुए।

इसी तरह सैनिकों की छावनियाँ भी और बढ़ाई गयी होंगी। आज शायद यह मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने भारत में जो यह विस्तृत तंत्र खड़ा किया है वह सारे देश से जल्दी जाने वाला नहीं है। यह तंत्र कैसे यहाँ से उखड़े, इसके लिए तो हमें काफी सोचना होगा। ऐसे रास्ते निकालने होंगे जिससे हम अपना तंत्र खड़ा कर सकें, जिससे कि भारत की राज्य व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, कृषि, वन, जल के साधन, बड़े और छोटे उद्योग और भारतीयों का सार्वजनिक जीवन, देश के लोगों के मन के अनुसार चल सके। इस तरह के सवाल स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में और पिछले 53 वर्षों में निश्चय ही हमारे विचारकों व राजनैतिकों के मन में उठे होंगे। सन् 1946 से सन् 1949 तक जो संवैधानिक सभा हमारे यहां बैठी, और जिसमें संविधान के बारे में काफी सोच-विचार और बातचीत हुई, उसमें भी इस तरह के प्रश्न उठे होंगे। उसके बाद भी देश की स्थिति को सामने रखकर ऐसे प्रश्न उठते ही दिखते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अखिल भारतीय कांग्रेस में भी इस तरह के प्रश्न जब तब, गांधीजी के बाद भी, उठते रहे। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने स्वयं शायद कहा था कि उनके पिता जवाहर लाल नेहरू ने बड़ी गलती की कि अंग्रेजों के बनाये तंत्र को जैसा का तैसा रहने दिया। साधारण लोग और काफी सारे समाजवादी नेता और भारतीय जनता दल के कुछ नेता भी ऐसा कहते रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व श्री नरसिंह राव ने, जो पांच वर्ष तक भारत के प्रधानमंत्री रहे, इस तरह के प्रश्नों को फिर से उठाया है, वह भी लंदन में। हम लोग इस पर सोचेंगे और बराबर आग्रह रखेंगे तो, दस-बीस वर्ष में भारत में, अंग्रेजों के बनाये तंत्र को पूर्ण रूप से बदलने का काम तो कर ही सकते हैं। जब ऐसा होगा तभी भारतीय शिक्षा, कृषि-उद्योग, पुलिस, सेवा आदि क्षेत्रों के स्वरूप को भी आज के समय के अनुरूप और प्राणवान भारतीय रूप में बनाना सम्भव होगा।

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कहाँ हैं पश्चिमीकरण की जड़ें ?

वैसे तो भारत पिछले 20-30 वर्षों से विश्वशक्तियों के बढ़ते दबाव में है। भारत के गांव के प्राथमिक स्कूल भी उनके आदेश व सहायता से चलने लगे हैं। बसों का किराया बढ़े यह भी उनके आदेश से होने लगा है। सड़कें कैसी हों, कितनी चौड़ी हों इसके आदेश भी बाहर से आने लगे हैं। यहाँ तक कि सेवाग्राम आश्रम जैसे स्थान भी चौड़ी-चौड़ी सड़कों से घिरने लगे हैं। जबकि ऐसे स्थानों और स्थलों की शांति व पवित्रता के लिये यह आवश्यक था कि उनके आसपास अधिक मोटर गाड़ियां व दूसरे वाहन न चलें। विदेशों में हमारा सामान ज्यादा से ज्यादा जाये इसमें फँस कर पिछले पचास बरसों में हम अपनी हस्तकला उद्योग का विनाश ही कर चुके हैं। और कुछ महीनों से खादी ग्रामोद्योग आयोग इसमें लगा है कि हम खादी से अमरीकी जीन्स कपड़ा डैनिम और उससे जीन्स बनवायें और उन्हें विदेशों में भेजें।

हमारी खेती में तो बड़े पैमाने पर बगैर सोचे समझे विदेशीकरण हो चुका है। हमारे गांवों के कृषि व ग्रामोद्योग के उजड़ने का एक बड़ा कारण यह हमारी बेसमझी की नकल है। ये ही बेसमझी हमें आधुनिकता को समझने से भी दूर रखती है --- चाहे वो तकनीकी के प्रश्न हों, व्यवस्था के या हमारी अपनी दिशा के। भारत की मानसिकता, उसकी प्राथमिकतायें, उसकी प्राकृतिक उपलब्धियां हमारे आज के देश चलाने वाले लोग समझ नहीं सके हैं। जैसे दो हजार बरस से यूरोप, व उसके बाद अरब लोग मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय व्यापार व लूटमार पर जीवन चलाते थे। उसे ही हमने बेसमझी में मान लिया है कि बाकी विश्व का भी वही तरीका है। लेकिन हमारे यहाँ तो हमारी आवश्यकताओं की सभी वस्तुएं साधारणतः प्रचुर मात्रा में पैदा होती थी, बनती थी, हमें उनका व्यवस्थित उपयोग आता था, उनमें से मुख्य खाना, कपड़ा, रहने की जगह, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति जीवन हमारे यहाँ के सब लोगों को उपलब्ध रहा है, यह हम भूल गये दिखते हैं। इस तरह की भूलें तो हमारे यहाँ पिछले पचास बरस से शुरू हुई, और अब तो हम सब पढ़े लिखे, अच्छे खाते पीते, किसी भी दल व सम्प्रदाय व वाद के हों, इन भूलों को सत्य वाक्य जैसे मानने लगे हैं। हममें वैसे पराये के लिये कोई प्रेम व निष्ठा नहीं पैदा हुई लेकिन यह जरूर हो गया है कि हमें अपने और पराये (व्यक्ति, व्यवस्था, तकनीक, विज्ञान) में जो भेद होते हैं वह

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समझ में नहीं आते। स्वदेशी के प्रचार में जो लोग आज लगे हैं उनमें से अधिकांश
को भी नहीं।
यह ऊपर जो कहा गया है वह अधिकांशतः तो हमारे 200-250 बरस
की दासता का परिणाम है, और पिछले 50 बरस में हमारे ऊपर जो बाहर का
बढ़ता दबाव है उससे इसका भारतव्यापी विस्तार हुआ है। हम समझ कर और
लगकर प्रयत्न करते तो उसमें से निकल आते। लेकिन इन 30-40-50 बरसों
की हमारी सोच और कार्य हमारे पर और एक नई विपत्ति ले आये हैं। देखने में
जो विपत्ति आई है वह वैसे तो 12-14 बरस पुरानी ही है लेकिन उसका आरंभ
व जड़ें तो यह जो हमारा संविधान है जिसको हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से
सीखा और उधार लिया, उसमें है।
अंग्रेजों ने 300-400 बरस पहले क्रोमवेल के मध्य सत्रहवीं शती के
समय से अपने यहां दो दलों को लेकर राज्यव्यवस्था बनानी शुरू की। वह
कमोबेश अभी भी अंग्रेजों के यहाँ चलती है। समय चलते चलते कोई और नया
दल बनता है – जैसे कि 18 वीं सदी के अन्त में ब्रिटिश लेबर पार्टी बनी, तो
पुरानों में से एक दल क्षीण पड़ जाता है जैसे कि विग व लिबरल क्षीण हुए।
लेकिन ब्रिटेन एक छोटा देश है, उत्तर प्रदेश से भी क्षेत्रफल में छोटा और आबादी
में तो आधा ही। दूसरे, राजनैतिक दल ही ब्रिटेन के लोगों के मुख्य संरक्षक व
सहारा नहीं हैं। ब्रिटेन में पचासों ईसाई सम्प्रदाय हैं जिनसे अलग अलग लोग,
पूरे मुहल्ले व गाँव भी सम्बंधित हैं। फिर वहाँ के पुराने धनवान और शक्तिशाली
लोगों की क्लबें हैं, जहाँ देश की स्थिति पर विचार होता रहता है और अक्सर
बड़े-बड़े फैसले भी ऐसे स्थानों पर होते हैं। यह जरूर है कि यह दो व तीन
राजनैतिक दलों का बारी बारी से सरकार चलाने का तरीका ब्रिटेन से अमरीका,
यूरोप व जापान तक गया है। लेकिन अमरीका इत्यादि में इस तरीके को अपनी
तरह से समझा गया है, खपाया गया है, और जहाँ वह नहीं खप पाया जैसे
दक्षिण अमरीका व अफ्रीका के देशों में, वहाँ जब तब डिक्टेटरशिप चलती ही है।
पिछले पचास बरस में हमारी राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक स्थिति
दक्षिण अमरीका व अफ्रीका के देशों जैसी होने लगी है। भारत की लोक सभा व
राज्यसभा, और प्रदेशों की विधानसभायें भी कंकाल जैसे होती जा रही हैं।
हमारा 'स्टील फ्रेम' कहा जाने वाला अंग्रेजों का दिया तंत्र व ढांचा भी अब
शक्तिहीन ही है, उसके बस का अब लोगों को बराबर भयभीत कर लेना नहीं है
जो कि ब्रिटिश समय में उसका मुख्य काम था, लेकिन लोगों के रास्ते में बाधायें
कायम करना तो अभी तक जारी है ही। इस राजनीतिक व्यवस्था और शासन
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तंत्र की एक बड़ी देन है कि उसने देश के लोगों को बांट दिया है, परिवार-परिवार
में व्यक्तियों को बांट दिया है, मोहल्लों-मोहल्लों में, गांव-गांव में। जिससे
भारत के 10 से 15 प्रतिशत लोग तो सरकारी व्यवस्था के खंबे बन गये हैं, और
बाकी 85 से 90 प्रतिशत निरूत्साहित, कंगाल और साधनहीन। देश का
मुहल्ला-मुहल्ला, गाँव-गाँव, नगर-नगर बंट चुका दिखता है। बंटना तो अंग्रेजों
के समय में ही आरंभ हो गया था, लेकिन हम उसे अब पूरा करने में लगे दिखते
हैं।
इस तरह के टूटने की एक भयंकर शुरूआत दिल्ली के सांसदों और
विधान सभा के सदस्यों को लेकर ही शुरू हुई। बहाना रहा कि दो, चार, छः
सदस्य जिन्हें आयाराम-गयाराम नाम दिया गया, एक राजनैतिक दल छोड़कर
दूसरे दल में जाते रहते हैं, और दलबदल होता रहता है, और इसमें धन व पद
का लालच भी काम करता है। यह दलबदल कोई नई बात नहीं है। हजारों वर्षों
से यह जहाँ तहाँ होता ही रहता है। इसके अलग-अलग इलाज भी होंगे। ब्रिटेन
में तो जो पार्लियामेंट के सदस्य अपने दल के साथ मत नहीं देते, उन्हें दल से
नहीं निकाला जाता, लेकिन उनका सामाजिक बहिष्कार जैसा होता है, लेकिन
हमारे विद्वान राजनितिकों व उनके सलाहकारों ने तय किया कि जो सदस्य हर
तरह से साथ नहीं देता, उसको न केवल दल से ही निकाल दिया जाये बल्कि
उसका फौरन ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी समाप्त कर दिया जाये। वैसे जो
सदस्य सांसद या विधायक बनता है वह अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है, न कि
किसी दल का भृत्य। उसको डांट – फटकार व हुक्म देने का अगर किसी को
अधिकार है तो उसके क्षेत्र को न कि किसी राजनीतिक दल को। दल में वो
स्वायत्त ही आया है, और दल ठीक-ठाक चलता है, न्याय करता है तो वो
साधारणतः उसमें रहेगा ही। उसका किसी कारणवश विचार या ध्येय बदलता
है तो वो तो उसका क्षेत्र ही संभाल सकता है।
लेकिन हमने तो ब्रिटिश राज्य के शुरू से ही यहां के समाज और लोगों
के रास्ते में रुकावटें डालना ही सीखा है, या कानूनों के छिद्र बंद करना।
रुकावटें डालने या छिद्र बंद करने का परिणाम यह हुआ कि यह देश फिर से
क्रमशः आलस्य से भर गया और यहाँ की परस्परिकता ओझल – सी हो गयी।
वैसे तो आज का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ढांचा
इन 200–150 वर्षों में, या और पहले से ही, जर्जर होता गया है, लेकिन पिछले
8–10 बरसों से भारत का जो बेहाल हुआ है उसका मुख्य कारण सांसदों को
दल का भृत्य व कैदी जैसा बना देना है। वैसे भारत का संविधान और उसकी
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संसद, विधान सभायें इत्यादि तो मूलतः दोबारा बनानी ही होंगी, लेकिन जब तक
यह सब नया ढांचा बने तब तक कुछ कदम तो उठाने ही पड़ेंगे। उनमें एक कदम
तो सांसद इत्यादि को स्वतंत्र कर देना और उनको उनके क्षेत्रों से जोड़ देना
होगा। दूसरा कदम, यह आवश्यक है कि संसद, विधानसभा इत्यादि जितने
वर्षों के लिये चुनी जाये, उतने वर्ष अवश्य चले। सरकार की किसी विषय पर
बात नहीं मानी जाय तो ऐसा होना हर समय उसकी हार नहीं मानी जानी
चाहिये। बात नहीं माने जाने का मतलब है कि वह अपना रास्ता बदले। उससे
फिर भी काम न चले तो उसी संसद व विधानसभा में से दूसरी व तीसरी सरकार
बन जाय। देश को साधारणतः व्यवस्थित रखना और प्रजा को अभय जैसा रहे,
यह संविधान का, संसद का, विधानसभाओं का और राजनीतिक गिरोहों का
प्रथम काम है।
अखिल भारतीय राजनीतिक गिरोहों का या दूसरे वैज्ञानिक, आर्थिक,
व्यावसायिक गिरोहों का दबदबा व झूठी प्रतिष्ठा जितनी भी कम हो उतना देश
के लिये अच्छा है। क्षेत्रों की देखभाल तो प्रदेश ही कर सकेंगे और प्रदेश मिलकर
ही भारत को संभाल सकेंगे, सुव्यवस्थित रख सकेंगे, समृद्धि दे सकेंगे और विश्व
के परिप्रेक्ष्य में शक्तिशाली और बराबर का रख सकेंगे। भारतीय केंद्र व्यवस्था
से यह कभी होने का नहीं है, यह तो एक प्रवंचना है। केंद्र तो प्रदेशों का संघ ही
चला सकेगा, और ऐसा संघ ही तय कर सकेगा कि केन्द्र को कौन - कौन काम
सौंपे जायें, क्या-क्या साधन उसे उपलब्ध कराये जायें।
प्रदेशों में भी आज की राजनीतिक व अन्य संस्कृति उसे दिशा देती है
व और दूसरी सभ्यताओं से कैसा संबंध बनाये, यह बताती है। यह अवश्य है कि
हमें शक्तिशाली होने की आवश्यकता है। लेकिन शक्ति तो कई तरह से बनती
है, केवल हावी व लुटेरे लोगों के रास्ते से ही नहीं। इस पर ध्यान देना हमारे
विद्वानों व मनीषियों का काम है।

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