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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 50 में से

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पृष्ठ 6

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स्वाधीन भारत ही संसार के भले के लिए भी सहायक सिद्ध होगा। “स्वदेशी
और भारतीयता” इन्हीं बातों पर राष्ट्रीय बहस चलाने की दृष्टि से एक प्रयास
है। हम सबके लिये यह आवश्यक है कि हम भारतीय वर्तमान को भारतीय
अतीत की धारावाहिकता में देखें तथा उसमें से भारतीय भविष्य का प्रारूप बना
उसे साकार करने में जुट जायें। अपने अतीत एवं वर्तमान पर विश्वास रखते हुए
भारत की नई पीढ़ी भविष्य का जो नया प्रारूप बनायेगी, उसमें भारतीय समाज
अपने राज्यतंत्र के साथ भी स्वस्थ संबंध बना सकेगा।
– धर्मपाल

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स्वदेशी और भारतीयता

एक

स्वदेशी की पुनर्प्रतिष्ठा के द्वारा भारत वर्ष फिर से सबल-सशक्त
तेजस्वी राष्ट्र बन कर समकालीन विश्व में स्वधर्म को निभाये, यह आकांक्षा देश
के अधिकांश लोगों की है; ऐसा मैं मानता हूँ। यद्यपि पिछले 52-54 बरसों में हम
जिस रास्ते पर चले, वह तो हमें स्वदेशी से दूर ही ले गया। ऐसी स्थिति में
स्वदेशी शील, व्यवहार और स्वधर्म की पुनः प्रतिष्ठा कैसे संभव होगी; यह
विचारणीय है।
स्वदेशी और भारतीयता की प्रतिष्ठा के लिये जहाँ प्रबल भावना का
महत्व है, वहीं उसकी प्रतिष्ठा आज कैसे संभव है, इसकी समझ और उसे
प्रतिष्ठित कर सकने की शक्ति की भी साधना आवश्यक है।

दो

स्वदेशी अत्यंत प्राचीन अवधारणा है। शायद जब से धरती पर जीवन
है, तभी से स्वदेशी का भाव और व्यवहार भी है। शायद स्वदेशी ही जीवों के
व्यवहार की सहज प्रवृत्ति है। सभी मनुष्य-समाज तथा सभी प्राणी समाज
सहज ही स्वदेशी व्यवहार करते हैं। क्योंकि, जैसी कि महात्मा गांधी ने 14
फरवरी 1916 को मद्रास में ईसाई मिशनरियों के एक सम्मेलन में दिए गए अपने
भाषण में स्वदेशी की परिभाषा की थी – “स्वदेशी वह भावना है, जिससे कि
हम आसपास के परिवेश से ही अपनी अधिकतम आवश्यकतायें पूरी करते
हैं और उनसे ही अधिकाधिक व्यवहार सम्बन्ध रखते हैं तथा स्वयं को
उनका सहज अभिन्न समझते हैं, न कि दूरस्थ लोगों और वस्तुओं से स्वयं
को जोड़ने लगते हैं। स्वदेशी की यह भावना जब होगी तब हम अपने
पूर्वजों के धर्म को ही आगे बढ़ायेंगे, न कि किसी अन्य धर्म को अपनाने
लगेंगे। अपने धर्म में जो वास्तविक कमी आ जाएगी, उसे सुधारेंगे।
राजनीति में हम स्वदेशी संस्थाओं का ही उपयोग करेंगे और उनकी कोई
सुस्पष्ट कमियां होंगी तो उन्हें दूर करेंगे। आर्थिक क्षेत्र में हम आसपास
के लोगों तथा स्वदेशी परम्परा और कौशल द्वारा उत्पादित वस्तुओं का ही
उपयोग करेंगे और उन्हें ही सक्षम तथा श्रेष्ठ बनायेंगे।”

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