स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहात्मा गांधी द्वारा की गई स्वदेशी की इस परिभाषा को शायद आज
और अधिक स्पष्ट करना पड़े या शायद उसे कुछ परिवर्तित या परिमार्जित
परिष्कृत करना पड़े। जो भी हो, इस पर गहरे विचारपूर्वक निश्चय करने की
आवश्यकता है।
स्वदेशी की भावना का उपयोग 17 वीं 18 वीं शती ई. में इंग्लैंड में भी
किया गया। तब अंग्रेज व्यापारी बड़े व्यापारिक लाभ के लिए भारतीय वस्त्रों को
इंग्लैंड तथा यूरोप में ले जा रहे थे और वहाँ के बाजारों में भारतीय वस्त्र छा -
से गये थे। इंग्लैंड के बुनकरों और ऊनी तथा सन से बने वस्त्र उद्योग के अन्य
शिल्पियों ने इसका विरोध किया और अपने द्वारा स्वदेशी वस्त्रों का ही धंधा किए
जाने पर बल दिया और दबाव डाला।
भारत में 1905 ई. में स्वदेशी का एक सशक्त आंदोलन उभरा जो
बंगाल के विभाजन के विरोध में उठा था। इस स्वदेशी आंदोलन की प्रमुख
प्रेरणा स्वामी विवेकानन्द थे और इसके सर्वाधिक सक्रिय नेताओं में थे श्री
अरविंद घोष।
फिर कर्मवीर महात्मा गांधी जब जनवरी 1915 से भारतीय सार्वजनिक
जीवन में आये तब से स्वदेशी के भाव और विचार में पुनः वेग आया। लगभग
तीस-पैंतीस बरस तक स्वदेशी भारतीयों का मन्त्र बना रहा और स्वदेशी, स्वराज
तथा स्वधर्म की प्रतिष्ठा भारत के राष्ट्रीय जीवन का लक्ष्य-सा दिखने लगा।
आज यदि उस स्वदेशी के भाव और विचार को फिर जागृत करना,
संगठित करना और प्रबल बना कर राष्ट्रीय जीवन-व्यवहार का उसे स्वभाव
बनाना है तो स्वदेशी की परिभाषा और स्वरूप पर फिर से और अधिक विचार
विमर्श तथा गहराई से मनन करना होगा। समकालीन विश्व संदर्भों को जानते
तथा स्मरण रखते हुए उसकी संभावनायें देखनी समझनी तथा जाँचनी परखनी
होगी और उन शक्तियों को भी पहचानना होगा जो कि स्वदेशी और भारतीयता
की पुनर्प्रतिष्ठा कर सकेंगी या कि उसका माध्यम और वाहन बनेंगी।
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बाहर से कहाँ से क्या-क्या और कहाँ तक सीखना और लेना है यह
विचार भी स्वदेशी का अभिन्न अंग है।
यों तो संसार भर में लोग एक दूसरे से सीखते ही रहते हैं। ऐसा कहा
जाता है कि यूरोप ने छपाई की कला और प्रयोग विधि, नाविकों का कम्पास
और उसकी प्रयोग-विधि, बारूद बनाने का शास्त्र और विधि तथा कागज बनाने
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की विधि 13 वीं, 14 वीं शताब्दी में चीन से सीखी। इसी तरह चेचक का टीका
ब्रिटेन में पहली बार 1720 में तुर्की से सीख कर लाया गया। बाद में भारत से
उन्होंने चेचक के टीके की अधिक परिष्कृत और उन्नत विधि सीखी। आधुनिक
शल्य चिकित्सा का उद्गम भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान से जुड़ा है।
1790-1810 के बीच, विशेषतः पुणे क्षेत्र से, अंग्रेजों व यूरोपियों ने यह विज्ञान
सीखा।
बढ़िया लोहा और इस्पात बनाने की तकनीक भारत में प्रचलित थी।
संभवतः उससे ब्रिटेन के लोहे और इस्पात उद्योग ने 19 वीं शताब्दी में बहुत कुछ
सीखा।
जापान ने 20 वीं शती ई. के आरंभ में पश्चिमी व्यवस्थाओं, तकनीकों
और उत्पादनों का अपने ढंग से गहराई से निरीक्षण किया। ऐसा कहा जाता है
कि 1910 के लगभग जापान ने अमेरिका से बीस रेलवे इंजन खरीदे। इसमें से
शायद एक का ही उपयोग कर जापान ने उसकी विधि को सीख समझ लिया।
बताते हैं कि जब ये 20 इंजन जापान पहुँचे तो जापानियों ने उसमें से एक इंजन
को पूरी तरह से खोल डाला और उसके सब कलपुर्जे भलीभांति देख-समझ
तथा जाँच लिये और फिर उसी रूप में उन्हें जोड़ दिया।
अतः एक बार हम यदि किसी तकनीक को, जो हमें अपने अनुकूल
लगती है, आत्मसात् कर लेते हैं और उसे अपने अनुकूल ढाल लेते हैं तो फिर
कोई भी बाहरी तकनीक शायद स्वदेशी - सी ही बन जाती है। क्या स्वदेशी की
धारणा में ऐसा कुछ समायोजन करने योग्य है? जो भी हो, इस विषय में बहुत
गहराई से और बड़ी सावधानी से छानबीन कर ही किसी निश्चय पर पहुँचना
होगा।
परन्तु हमारी समकालीन प्रवृत्तियाँ तो स्वदेशी और भारतीयता की
दिशा से विपरीत दिशा में ही चलती दिख रही हैं। यह तो है कि दिल्ली में बाबा
खड़कसिंह मार्ग में हमें देश में बनी कलाकृतियाँ व देसी शिल्प वाली वस्तुयें मिल
सकती हैं। बम्बई, मद्रास, कलकत्ता जैसे शहरों में भी ऐसी जगहें हैं।
लेकिन भारत के 5 लाख से भी अधिक गांवों, कस्बों और जिला केन्द्रों
के बाजारों में तो सामान्य देसी वस्तुएँ भी दुर्लभ ही हो चली हैं। भारतीय सामग्री
से बनी, भारतीय शिल्पियों द्वारा, भारतीय शिल्प परंपरा और भारतीय
रूपाकृतियों में बनी वस्तुएँ तो हमें प्रायः अपने बाजारों में नहीं दिखतीं !
आटे की हाथ चक्की, तेल पिराई की घानी, गन्ना पिराई की हाथ
वाली मशीनें, मिट्टी के घड़े और पत्तल-दोने आदि तो अब हमारे सामाजिक
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