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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 5, कुल 50 में से

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दुनिया किन नियमों से चलती है, यह अंतिम तौर पर तो नहीं कहा जा सकता,
परन्तु यह निश्चित है कि हर समाज की अपनी विश्वदृष्टि होती है। इनमें कोई
एक सही है, शेष सब गलत हैं, यह मान पाने का कोई साक्ष्य नहीं है। अंग्रेजों की
पराधीनता को भोग चुकी पीढ़ी को यूरोप की दिशा ही शायद अकेली ठीक
दिशा लगी हो, परन्तु आज ऐसा कोई बोझ नहीं होना चाहिए।
संपूर्ण मानवीय समाज एक है, उनकी नियति एक है, यह प्रतिपादन
अपने में शायद ठीक हो। परन्तु इस प्रतिपादन के अर्थ भी हर समाज में
अलग-अलग होते हैं। आधुनिक पश्चिमी समाज के मुताबिक मानवीय समाज
की एकता का अर्थ मानव-समूहों की एवं उनकी क्रियाशीलताओं पुरुषार्थों की
एकरूपता से लिया जाता है। भारतीय परम्परा के अनुसार एकता की इस
मान्यता का रूप यह रहा है कि यह जगत-धर्म में प्रतिष्ठित है। जो व्यक्ति और
समाज धर्ममय आचरण करेंगे, वे श्रेयस को प्राप्त होंगे। जो धर्म-च्युत होंगे,
सत्य, ऋत तथा आत्मसंयम का उल्लंघन करेंगे, वे तत्काल प्रबल दिखाई देने
पर भी व्यापक कालप्रवाह में शीघ्र ही क्षय के शिकार हो जायेंगे। इस स्तर पर
मानवीय समाज और संपूर्ण विश्व एक है। एकता की इस मान्यता में आधुनिक
एकरूपता का कोई स्थान नहीं है। वस्तुतः नामों और रूपों की विविधता मानव
समाज की एकता की परम्परागत भारतीय मान्यता का अभिन्न अंग है।
एकता के प्रति भारतीय परम्परागत मान्यताओं को देखते हुए तथा
देश के भविष्य के बारे में नवचिंतन करते हुए हमें देश को विकसित विश्व के
साथ एकरूप कर देने के मोह को छोड़ना होगा। हम अपने देश के उस रूप के
बारे में ही सोचें, जो हमारे लिए श्रेयस्कर हो। अपने इतिहास को, अपने
लोक-मानस और अपनी परम्परा को जानना, उसकी स्मृतियां जीवंत रखना
आवश्यक है। अपनी परम्परा, अपनी संस्कृति के स्वरूप, आधार तथा व्यवहार
को हम सदा स्मरण रखें। भारतीय दृष्टि से संसार के विभिन्न समाजों के बारे में
भी आवश्यक जानकारी जुटायें, उन समाजों के स्वरूप-आधार तथा व्यवहार
के बारे में अपने लिए आवश्यक ज्ञान प्राप्त करें। अपने बारे में और संसार के
बारे में इस दृष्टि से जानकारियों - खोजों को समेट कर ही हम अपने लिए
रास्ता, सोच और बना पायेंगे तथा उस पर चल सकेंगे।
नई पीढ़ी अपने में नया विश्वास रखते हुए पिछली पीढ़ी के भारतीय
परम्पराओं के प्रति संकोच से भी उबर पायेगी और भारतीय इतिहास, परम्पराओं,
भारतीय समाज के स्वरूप, आधार और व्यवहार- रूपों का समुचित विवेचन
कर विकास की धारा को जनमानस के साथ जोड़ पायेगी, ऐसी आशा की जा
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सकती है।
अपनी विश्व दृष्टि के अनुरूप परम्परा से, हजारों वर्षों से भारतीय
लोक-मानस गतिशील रहा है। हर समाज के जीवन में उत्तार-चढ़ाव आते हैं।
कुछ शताब्दियों पहले शायद हमारे समाज में भी कुछ बिगाड़ आया। शायद
समाज की विविध संस्थाओं के आपसी रिश्ते कुछ कमजोर हुए और
परिणामस्वरूप यह समाज भी कमजोर हुआ। इसी बीच भारत में अंग्रेज आये
और उनके आने से भारतीय समाज की विविध संरचनाएँ टूटीं। समाज का
राजनैतिक संस्थाओं से रिश्ता टूटा। राज्यतंत्र का एक दूषित रूप समाज पर
थोपा गया; जो समाज से शक्ति प्राप्त करने वाला और उसे शक्तिशाली बनाने
में अपना योगदान देने वाला नहीं रहा। अपितु जो समाज को अस्वस्थ, कमजोर
बनाने वाला रहा और इस तरह यह राज्यतंत्र स्वयं भी अस्वस्थ रहा।
ऐसे अस्वस्थ राज्यतंत्र की प्रतिष्ठा भारतीय समाज की तात्कालिक
पराजय का फल थी। भारतीय समाज की इस हार के चलते हुए हम शायद
अपने पूर्ण अतीत के बारे में संकुचित हो गये। हमें ऐसा लगने लगा कि सुरक्षा के
लिए सभी परम्परागत बुद्धि-रूपों को त्यागना होगा, लोकमानस पर उनका
प्रभाव समाप्त करना होगा। परन्तु किसी समाज की कोई भी हार की स्थिति
स्थायी तो नहीं हो सकती। आशा की जा सकती है कि नई पीढ़ी अतीत का
समुचित विवेचन कर पायेगी। अतीत की स्मृति के बिना तो कोई सर्जना नहीं
होती है। स्मृति-भ्रंश का अर्थ है बुद्धिनाश।
अब जब देश समुचित सुरक्षित है, देश में आधुनिकतावाद की तरफ
बढ़ने या अपनी कोई नई दिशा निर्धारित कर उस तरफ चलने, दोनों के लिए ही
पर्याप्त साधन एवं क्षमताएं हैं, तब हम मिलकर सोच सकते हैं कि हमारा स्वधर्म
क्या है? हमारे पूर्वजों का शील और सौंदर्य क्या रहा है? हमारी शक्ति तथा
निर्बलता का स्वरूप क्या है?
अपने देश के समस्त नागरिकों के भले के लिए और भारत के पड़ोसियों,
बंधु देशों के भले के लिए हमें श्रेयस्कर पथ को जानना-पहचानना और अपनाना
है। भारतीय संस्कृति एक बड़ी संस्कृति है। स्थिति और आकार की दृष्टि से भी
भारत बड़ा देश, बड़ा समाज है। हमें इन सभी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का
विचार करते हुए अपना मार्ग खोजना-बनाना है। हम स्वयं अभयपूर्वक स्वधर्म
को पहचानेंगे और अपनायेंगे तो हमारे बंधु देशों में भी इसका प्रतिसंवेदन होगा।
स्व-विवेक से खोजे-पहचाने-बनाये गए स्व-पथ पर स्व-शक्ति से
चल रहा और इस प्रकार अपने पड़ोसियों में अभय का सहज संचार कर रहा
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