सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
७४२ सूर्य-सिद्धान्त
विज्ञान-भाष्य - सूर्य की जो क्रान्ति होती है उतने ही अक्षांश पर वह ठीक
ऊपर होता है। क्रान्ति यदि उत्तर हो तो अक्षांश उत्तर समझना चाहिए और क्रान्ति
दक्षिण हो तो अक्षांश दक्षिण समझना चाहिए (देखो त्रि० पृ० २६१)। कौन
अक्षांश विषुवत् रेखा से कितने योजन पर होता है इसकी गणना जैसे की जाती है
वैसे ही इस श्लोक में गणना करने की रीति बतलायी गयी है। भूपरिधि का मान
योजनों में जो होता है वह ३६० अंश के समान हैं इसलिये अभीष्ट अक्षांश विषुवत्
रेखा से कितने योजन पर है यही अनुपात इसमें बतलाया गया है।
३६० अंश : क्रान्त्यंश : : भूपरिधि योजन : अभीष्ट योजन ।
६० घड़ी का दिन या ६० घड़ी की रात कहाँ होती है—
परमाप्रक्रमादेवं योजनानि विशोधयेत् ।
भूवृत्तपादाच्छेषाणि यानि स्युर्योजनानि तैः ॥६०॥
अयनान्ते विलोमेन देवासुरविभागयोः ।
नाडीषष्ट्या सकृदहर्निशाऽन्यस्मिन्सकृत्तथा ॥६१॥
अनुवाद—(६०) इसी प्रकार सूर्य की परम-क्रान्ति से योजना का मान जान
कर इसको भूपरिधि के चतुर्थ भाग से घटाने से जो आवे, विषुवत् रेखा से, उतने ही
योजन पर (६१) अयन के अन्त में अर्थात् सायन कर्क संक्रान्ति के दिन उत्तर में ६०
घड़ी का एक दिन और दक्षिण में ६० घड़ी की एक रात तथा मकर संक्रान्ति के
दिन दक्षिण में ६० घड़ी का एक दिन और उत्तर में ६० घड़ी की एक रात
होती है।
विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों का अर्थ समझने के लिए स्पष्टाधिकार के
श्लोक ६०-६१ तथा चित्र ४२, ४३ और उसके विवरण को दोहरा लेना चाहिये ।
इन चित्रों की सहायता से एक नया चित्र बनाकर यह जानना सुगम है कि जब सूर्य
की क्रान्ति परम होती है तब किस अक्षांश पर इसका अहोरात्रवृत्त क्षितिज रेखा
के बिल्कुल ऊपर हो जाता है। चित्र ४२ के ढंग पर चित्र १२७ बनाया गया है,
अन्तर केवल इतना है कि इस चित्र का केन्द्र उस स्थान को सूचित करता है जिसका
लम्बांश सूर्य की परम क्रान्ति के समान और अक्षांश उसके पूरक के समान है।
उधखविद यहाँ का यामोत्तर-वृत्त, ख खस्वस्तिक, उद क्षितिज की उत्तर दक्षिण
रेखा, विषुवन्मण्डल का एक बिन्दु और र सूर्य है जब इसकी क्रान्ति परम होती है
अर्थात् सायन कर्क संक्रान्ति का दिन का सूर्य है। उध यहाँ का अक्षांश है इसलिए
वीउ = विर । यह स्पष्ट है कि रउ इस दिन के सूर्य का अहोरात्रवृत्त है जो क्षितिज
भूगोलाध्याय ७४३
के बिल्कुल ऊपर है इसलिए इस दिन सूर्य क्षितिज के नीचे नहीं जायगा अथवा अस्त
ही न होगा और ६० घड़ी का दिन होगा। इसके विपरीत इतने ही दक्षिण अक्षांश पर
इस दिन सूर्य के अहोरात्र वृत्त का व्यास शून्य होगा अर्थात् ६० घड़ी की रात होगी
क्योंकि सूर्य वहाँ के क्षितिज रेखा पर ही ६० घड़ी तक रहेगा। जिस स्थान की यह
चर्चा है उसका अक्षांश आजकल ९०° — २३° २७' = ६६° ३३' है। क्योंकि सूर्य
की परम क्रान्ति २३° २७' के लगभग है। उत्तर वाले स्थान को आजकल उत्तरी
ध्रुव-मण्डल और दक्षिण वाले स्थान को दक्षिणी ध्रुव मण्डल कहते हैं।
चित्र १२७
जैसे सायन कर्क संक्रान्ति के दिन उत्तरी ध्रुव मंडल पर ६० घड़ी का
दिन और दक्षिणी ध्रुव मंडल पर ६० घड़ी की रात होती है वैसे ही सायन मकर
संक्रान्ति के दिन दक्षिणी ध्रुव मंडल पर ६० घड़ी का और उत्तरी ध्रुव मंडल पर
६० घड़ी की रात होती है। यह अवसर एक वर्ष में केवल एक बार आता है।
श्लोकों में अक्षांश को अंशों में न लिख कर योजनों में विषुवत् रेखा से दूरी
बतलायी गयी है।
दिन-रात का प्रमाण ६० घड़ी का कहाँ होता है—
तदन्तरेऽपि षष्ट्यन्तं क्षयवृद्धी अहर्निशोः ।
परतो विपरीतोऽयं भगोलः परिवर्तते ॥६२॥
७४४ सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद—इन अक्षांशों के बीच के देशों में अहोरात्र का प्रमाण ६० घड़ी
का होता है और इस समय के भीतर दिन और रात की वृद्धि होती है परन्तु इसके
सिवा अन्य स्थानों में यह नियम बदल जाता है क्योंकि वहां नक्षत्र-कक्षा की स्थिति
बदल जाती है।
दो महीने का दिन या रात कहाँ होती है—
ऊने भूवृत्तापादे तु द्विज्यापक्रमयोजनैः ।
धनुर्मृगस्थः सविता देवभागे न दृश्यते ॥६३॥
तथा चासुरभागे तु मिथुने कर्कटे स्थितः ।
नष्टच्छाया महीवृत्तापादे दर्शनमादिशेत् ॥६४॥
अनुवाद—(६२) दो राशियों की क्रांति के योजनों को भूपरिधि के
चतुर्थांश से घटाने पर जो आवे, विषुवत् रेखा से, उतने ही अन्तर पर उत्तर में धनु
और मकर राशि का सूर्य नहीं देख पड़ता और (६४) दक्षिण में मिथुन और कर्क
राशि का सूर्य नहीं देख पड़ता । क्योंकि जिस स्थान पर मध्याह्नकाल में छाया शून्य
होती है उस स्थान से भूपरिधि के चतुर्थांश तक सूर्य देख पड़ता है ।
विज्ञान-भाष्य—श्लोक ६४ के उत्तरार्ध का अर्थ स्वामी विज्ञानानन्द जी ने
अपनी बंगला टीका में यह किया है कि जिस स्थान में भूच्छाया नहीं है वहाँ सूर्य का
दर्शन होता है । गूढ़ार्थ प्रकाशिका संस्कृत टीका में इसका अर्थ यों किया गया है
'अभावं प्राप्ता छाया भूच्छाया तत्र तादृशे भूपरिधि चतुर्थांशे सूर्यस्य दर्शनं सदा
कथयेत्' । पं० इन्द्रनारायण द्विवेदी तथा माधव पुरोहित की हिन्दी टीका में इसका
अर्थ ही नहीं है । मैंने इसका अर्थ यों किया है कि जिस स्थान पर किसी वस्तु की
मध्याह्नकालिक छाया शून्य होती हैं उस स्थान से भूपरिधि के चतुर्थ भाग पर्यन्त तक
उस दिन सूर्य देख पड़ता है । क्योंकि जहाँ मध्याह्नकालिक छाया शून्य होती है वहीं
के ख-स्वस्तिक पर सूर्य होता है और यहीं से ९० अंश तक चारों ओर सूर्य इस समय
देख पड़ता है । इसके सिवा 'छाया' का अर्थ भूच्छाया करना ठीक नहीं, मध्याह्न
छाया ही उचित है । इसलिए 'नष्टच्छाया' का अर्थ है वह स्थान जहाँ की मध्याह्न
छाया शून्य हो ।
इन दो श्लोकों में यह बतलाया गया है कि जब सूर्य सायन धनु और मकर
राशियों में रहता है तब कहाँ दो मास की रात होती है । जब सूर्य सायन धनु में
प्रवेश करता है तब इसकी दक्षिण क्रान्ति २०° १०′ होती है (देखो पृष्ठ ३१६) और
जब तक यह धनु और मकर राशियों में रहता है तब तक इसकी दक्षिण क्रान्ति
२०° १०′ से अधिक होती है । अब देखना है कि जब सूर्य की दक्षिण क्रांति २०°१०′
भूगोलाध्याय ७४५
होती है तब यह भूपृष्ठ के किस भाग पर दिखाई पड़ सकता है। यह स्पष्ट है कि
इस समय सूर्य उस स्थान के खस्वस्तिक पर रहता है, जिसका दक्षिण अक्षांश
२०° १०' है। इसलिए इस स्थान पर मध्याह्नकालिक छाया भी शून्य होगी और
यहाँ से भूपरिधि के चतुर्थ भाग तक अर्थात् ९० अंश उत्तर दक्षिण तक सूर्य दिखाई
पड़सकता है। २०° १०' दक्षिण अक्षांश से ९० अंश उत्तर के स्थान का अक्षांश
९०° - २०° १० = ६९°५०' हुआ। इसलिए इस दिन सूर्य की किरणें यहीं तक जा
सकती हैं। इसके बाद जब तक सूर्य की दक्षिण क्रांति २०° १०' से अधिक दक्षिण
होगी तब तक वह ६९° ५०' के उत्तर अक्षांश पर नहीं देख पड़ेगा अर्थात् इस स्थान
पर दो मास की रात होगी। इसके प्रतिकूल ६९° ५०' दक्षिण अक्षांश पर दो महीने
का दिन होगा। इस स्थान का योजनात्मक अन्तर विषुवत् रेखा से क्या होगा यही
जानने का नियम इन दोनों श्लोकों में बतलाया गया है जो श्लोक ५६ में बतलाये
गये नियम के अनुसार है और जिसका व्यवहार श्लोक ६०-६१ में किया गया है।
इसी तरह जब सूर्य सायन मिथुन और कर्क राशियों में रहता है तब इसकी
उत्तर क्रान्ति २०° १०' से अधिक होती है जिससे ६९° ५०' उत्तर अक्षांश के
स्थानों पर इन दो महीने तक सूर्य बराबर देख पड़ता है इसलिए यहाँ दो मास का
दिन होता है और इतने ही दक्षिण अक्षांश पर लगातार दो महीने तक सूर्य अदृश्य
होने के कारण रात रहती है।
चार महीने का दिन या रात कहाँ होती है—
एकज्यापक्रमानीतैयोजनैः परिवर्जितैः ।
भूमिकक्ष्या चतुर्थांशे व्यक्षाच्छेषैस्तु योजनैः ॥६५॥
धनुर्मूगालिकुम्भेषु संस्थितोऽर्को न दृश्यते ।
देवभागेऽसुराणां तु वृषाद्ये मचतुष्टये ॥६६॥
अनुवाद—(६५) एक राशि की क्रान्ति के योजनों को भूपरिधि के चतुर्थांश
से घटाने पर जो आवे विषुवत् रेखा से उतने ही अन्तर पर (६६) उत्तर में धनु,
मकर, कुम्भ, और मीन राशियों का सूर्य नहीं देख पड़ता और दक्षिण में वृष, मिथुन,
कर्क और सिंह राशियों का सूर्य नहीं देख पड़ता ।
विज्ञान-भाष्य—जब सूर्य सायन धनु, मकर, कुम्भ और मीन राशियों में
रहता है तब इसकी दक्षिण क्रान्ति एक राशि की क्रान्ति से अर्थात् ११° २६' से
अधिक होती है इसलिए इन चार महीनों में सूर्य उस स्थान पर नहीं देख पड़ता
जिसका उत्तर अक्षांश ९०° - ११° २६' = ७८° ३४' है। इसका फल यह होता है
कि इन दिनों यहाँ चार महीने की रात होती है परन्तु ७८° ३४' दक्षिण अक्षांश पर
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७४६ सूर्य-सिद्धान्त
४ महीने का दिन होता है। इसी प्रकार जब सूर्य की उत्तर क्रान्ति ११° २६' से
अधिक होती है अर्थात् जब सायन वृष, मिथुन, कर्क और सिंह राशियों में रहता है
तब ७८° ३१' दक्षिण अक्षांश पर ४ महीने की रात और उत्तर अक्षांश पर ४ महीने
का दिन होता है।
श्लोकों में अक्षांश की जगह विषुवत् रेखा से योजनों में दूरी जानने की रीति
दी गई है जैसा कि पहले के श्लोक में है।
६ महीने का दिन या रात कहाँ होती है -
मेरौ मेषादिचक्रार्धं देवाः पश्यन्ति भास्करम् ।
सकृद्देवोदितं तद्वदसुराश्च तुलादिगम् ॥६७॥
अनुवाद - जब सूर्य मेष से कन्या तक ६ राशियों में रहता है तब उत्तर
ध्रुव के रहने वाले देवता लोग उसको एक ही बार उदय हुआ देखते हैं अर्थात् ६
महीने तक उसका अस्त नहीं होता और जब सूर्य तुला से मीन राशियों में रहता है
तब दक्षिण ध्रुव पर असुर लोग उसको बराबर उदय हुआ देखते हैं।
विज्ञान-भाष्य - जब सूर्य सायन मेष में प्रवेश करता है तब यह उत्तर
गोल में आता है और ६ मास तक बराबर उत्तर गोल में रहता है इसलिये उत्तर
ध्रुव पर यह इन मासों में सदा दिखाई देता है और दक्षिण ध्रुव पर अदृश्य रहता
है। इसीलिये इन ६ महीनों में देवताओं का एक दिन और असुरों की एक रात
होती है। परन्तु जब सूर्य सायन तुला में आता है तब यह दक्षिण गोल में हो जाता
है और ६ मास तक बराबर दक्षिण गोल में रहता है इसलिये इन ६ महीनों में असुर
लोग सूर्य को बराबर देखा करते हैं और यहाँ ६ महीने का दिन होता है तथा उत्तर
ध्रुव से अदृश्य होने के कारण देवताओं की ६ महीने की रात होती है।
सायन कर्क या मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य ठीक ऊपर कहाँ देख पड़ता है
और यहाँ क्या विशेषता है--
भूमण्डलात् पञ्चदशे भागे दैवे तथाऽसुरे ।
उपरिष्टाद्व्रजत्यर्कः सौम्य याम्यायनान्तगः ॥६८॥
तदन्तरालयोश्छाया याम्योदक् संभवत्यपि ।
मेरोरभिमुख यातः परतश्च स्वभागयोः ॥६६॥
अनुवाद - (६८) विषुवत् रेखा से भूपरिधि के १५वें भाग की दूरी पर
स्थित उत्तर या दक्षिण के स्थान के ठीक ऊपर उत्तरायण या दक्षिणायन के अन्तकाल
का सूर्य भ्रमण करता है। (६६) इन्हीं रेखाओं के बीच में मध्याह्नकालिक छाया
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दक्षिण या उत्तर हो सकती है । इनके बाहर के स्थानों में मध्याह्न छाया अपने-अपने
विभाग के मेरु की ओर रहती है ।
विज्ञान-भाष्य — उत्तरायण का अन्त सायन कर्क संक्रान्ति काल में होता है
जिस समय सूर्य की उत्तर क्रान्ति परम के समान होती है जो सूर्य-सिद्धान्त के मत से २४
(चित्र नं० १२८)
अंश है । इसलिये इस दिन २४ उत्तर अक्षांश पर सूर्य मध्याह्न काल में ठीक ऊपर
होता है और मध्याह्नकालिक छाया शून्य होती है। इसी प्रकार दक्षिणायन के
अन्त में सूर्य की दक्षिण क्रान्ति २४° होती है । इसलिये इस दिन २४ दक्षिण अक्षांश
पर सूर्य ठीक ऊपर होता है परन्तु भूपृष्ठ का २४ अंश सारी भूपरिधि का १५वां
भाग है । आजकल यह २३ अंश २७ कला के लगभग है । इसलिये २३°२७′ उत्तर
अक्षांश के देशों पर सायन कर्क संक्रान्ति के दिन मध्याह्न काल में सूर्य ठीक ऊपर
होता है और इतने ही दक्षिण अक्षांश पर सायन मकर संक्रान्ति के दिन मध्याह्न काल
में सूर्य ठीक ऊपर होता है, २३°२७′ उत्तर अक्षांश रेखा को इसलिये कर्क रेखा
और २३°२७′ दक्षिण अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहते हैं। इन दोनों अक्षांशों के
बीच के भूभाग को उष्ण कटिबन्ध कहते हैं क्योंकि यहाँ सूर्य के बारहों महीने ऊपर
रहने से बड़ी गरमी पड़ती है।
इसी भूभाग में प्रत्येक स्थान के मध्याह्न काल की छाया उत्तर या दक्षिण
हो सकती है क्योंकि यहाँ के किसी स्थान का अक्षांश सूर्य की परम क्रान्ति से कम
७४८ सूर्य-सिद्धान्त
होगा इसलिये जब किसी स्थान का अक्षांश और सूर्य की क्रान्ति एक ही दिशा में
है और सूर्य की क्रान्ति कम है तो मध्याह्न छाया उसी दिशा के ध्रुव की ओर होगी
परन्तु यदि क्रान्ति अधिक है तो छाया की दिशा उल्टी होगी (देखो त्रिप्रश्नाधिकार
चित्र ५५, ५६)। परन्तु कर्क रेखा के उत्तर के देशों में मध्याह्न-छाया की दिशा
सदा उत्तर की ओर होगी और मकर रेखा के दक्षिण के देशों में मध्याह्नछाया सदा
दक्षिण की ओर होगी ।
चित्र १२७ में गोल रेखा के भीतर जो क्षेत्र है वह भूपृष्ठ का गोलार्ध प्रकट
करता है। उ और द क्रम से उत्तर और दक्षिण ध्रुव हैं। रो ल य विषुवत् रेखा है।
य यमकोटि, ल लंका और रो रोमक नगर है। सिद्धपुरी इस गोलार्ध पर नहीं
दिखायी जा सकती क्योंकि यह लंका के समसूत्र में दूसरे गोलार्ध में है। विषुवत्
रेखा से २३°२७' उत्तर कर्क रेखा और दक्षिण मकर रेखा हैं। ये रेखाएँ विषुवत्
रेखा के समानान्तर हैं। इन्हीं दोनों रेखाओं के बीच वाले भूभाग पर मध्याह्न-छाया
उत्तर या दक्षिण हो सकती है। विषुवत् रेखा ६६ ३३' उत्तर और दक्षिण तथा
उसके समानान्तर उत्तरी ध्रुव मंडल और दक्षिणी ध्रुव मंडल हैं। इन्हीं रेखाओं
पर दिन का प्रमाण वर्ष में एक बार ६० घड़ी या २४ घंटे का होता है और रात्रि
का प्रमाण भी एक बार इतना ही होता है जैसा कि ६०-६१ श्लोकों में बतलाया
गया है। इन्हीं रेखाओं के बीच के भूभाग में अहोरात्र का प्रमाण ६० घड़ी का
होता है। इनके बाहर के भूभाग में दिन रात्रि का प्रमाण विचित्र होता है। उत्तरी
ध्रुव मंडल के और उत्तर विषुवत् रेखा से ६६°५०' दूर जो समानान्तर रेखा है
उस पर वर्ष में एक बार-बार २ मास का दिन तथा दो मास की रात होती है।
इसके भी उत्तर विषुवत् से ७८°३१' दूर जो रेखा है वहाँ ४ महीने का दिन और
४ महीने की रात होती है। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव मंडल में भी होता है। उत्तरी
ध्रुवों पर ६ महीने का दिन और ६ महीने की रात होती है।
विषुवत् रेखा के चार नगरों में सूर्योदय सूर्यास्त कब होता है—
भद्राश्वोपरिगः कुर्याद् भारते तूदयं रविः ।
राज्यर्धं केतुमालाख्ये कुरुष्वस्तमयं तथा ।।७०।।
भारतादिषु वर्षेषु तद्वदेव परिभ्रमात्
मध्योदयार्धरात्रास्तकालात् कुर्यात्प्रदक्षिणम् ।।७१।।
अनुवाद—(७०) जब भद्राश्व वर्ष के यमकोटि नगरों में सूर्य ठीक ऊपर
होता है तब भारतवर्ष के लंका नगर में उसका उदय होता है, केतुमाल देश के रोमक
नगर में अर्धरात्रि होती है और कुरुदेश के सिद्धपुरी नगर में उसका अस्त होता
भूगोलाध्याय ७४६
रहता है। (७१) इसी प्रकार भारतवर्ष आदि देशों में क्रम से मध्याह्न, उदय,
अर्धरात्रि और अस्तकाल होता है।
विज्ञान-भाष्य—इन चार नगरों का परस्पर सम्बन्ध ३८--४० श्लोकों में
बतलाया जा चुका है। यहाँ इनके समयों का सम्बन्ध बतलाया गया है। जब
यमकोटि में मध्याह्न होता है तब लंका में जो उससे ९० अंश पच्छिम है सूर्योदय
होता है, रोमक में जो लंका से ९० अंश पच्छिम है मध्य रात्रि होती है और सिद्ध
पुरी में जो रोमक से ९० अंश पच्छिम है सूर्यास्त होता है। इसी प्रकार जब लंका
में मध्याह्न होता है तब रोमक में सूर्योदय सिद्धपुरी में अर्द्ध रात्रि और यमकोटि में
सूर्यास्त होता है।
ध्रुवतारा और नक्षत्र चक्र का परस्पर अन्तर—
ध्रुवोन्नतिर्भचक्रस्य नतिर्मेरुं प्रयास्यतः ।
निरक्षाभिमुखं यातुर्विपरीते नतोन्नते ॥७२॥
अनुवाद—ध्रुवों की ओर चलने से ध्रुवतारा का उन्नतांश और नक्षत्र
चक्र का नतांश बढ़ता जाता है परन्तु विषुवत् रेखा की ओर चलने से इसका उलटा
होता है अर्थात् ध्रुवतारा का नतांश तथा नक्षत्र चक्र का उन्नतांश बढ़ता है।
विज्ञान-भाष्य—नक्षत्र चक्र विषुवन्मण्डल के पास है इसलिए विषुवत् रेखा
पर नक्षत्र चक्र ठीक ऊपर देख पड़ता है और ध्रुव तारे क्षितिज पर देख पड़ते हैं।
यहाँ से ध्रुवों की ओर चलने में ध्रुवों का उन्नतांश बढ़ता जाता है और विषुवन्मण्डल
का उन्नतांश उतना ही घटता जाता अथवा नतांश बढ़ता जाता है। ध्रुवों पर ध्रुव
तारे का उन्नतांश ९० और विषुवन्मण्डल का उन्नतांश शून्य अथवा नतांश ९० होता
है क्योंकि ध्रुवों पर से विषुवन्मण्डल क्षितिज में हो जाता है। इसके विपरीत विषुवत्
रेखा की ओर चलने में ध्रुव तारे का नतांश बढ़ता और नक्षत्र चक्र का उन्नतांश
बढ़ता है।
नक्षत्र चक्र की गति का कारण—
भचक्रं ध्रुवयोर्बद्धम् आक्षिप्तं प्रवहार्निलैः ।
पर्यत्यजस्रं तद्बद्धा ग्रहकक्षा यथाक्रमम् ॥७३॥
अनुवाद—दोनों ध्रुव तारों से बँधा हुआ और प्रवाह वायु का धक्का खाता
हुआ नक्षत्र-चक्र निरन्तर घूमा करता है। इसी से क्रमानुसार बँधी हुई ग्रहकक्षाएँ भी
इसी के साथ घूमती हैं।
७५० सूर्य-सिद्धान्त
विज्ञान-भाष्य—सूर्य, चन्द्र, ग्रह, तारे सभी पूर्व क्षितिज पर उदय होकर
ऊपर उठते हैं, पच्छिम की ओर घूमते हुए अस्त हो जाते हैं और २४ घंटे में फिर
पूर्व क्षितिज पर आकर उदय होते हैं। इसका कारण प्राचीन काल में यह समझा
जाता था कि सारा आकाश-चक्र दोनों आकाशीय ध्रुवों में बँधा हुआ प्रवह वायु के
द्वारा घूम रहा है और ग्रहों की कक्षाएँ भी उसी आकाश-चक्र में बँधी हुई पूरब से
पच्छिम को घूम रही हैं। इस मत के समर्थक भारतवर्ष के कुछ पण्डित अब भी देखे
जाते हैं और वाद विवाद करने के लिये तैयार रहते हैं। परन्तु अब अकाट्य प्रमाणों
से सिद्ध हो गया है कि आकाश-चक्र की इस गति का कारण प्रवह वायु नहीं है वरन्
स्वयम् पृथ्वी की गति है। एक गति से पृथ्वी अपने अक्ष पर २४ घंटे में एक बार
पच्छिम से पूरब को घूम जाती है, इस दैनिक गति को पृथ्वो का अक्ष-भ्रमण कहते
हैं। इसी से आकाश के सभी पिंड पूरब से पच्छिम को घूमते हुए जान पड़ते हैं।
इसी से दिन रात की उत्पत्ति होती है। दूसरी गति से पृथ्वी एक वर्ष में सूर्य की
परिक्रमा कर लेती है जिससे ऋतुओं की उत्पत्ति होती है और आकाश में सूर्य
पच्छिम से पूरब को चलता हुआ एक वर्ष में पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ देख
पड़ता है। इस गति को पृथ्वी की वार्षिक गति कहते हैं। यह दोनों गतियाँ पृथ्वी में
एकसाथ होती हैं जैसे ऊपर फेंकी हुई गेंद अपने अक्ष पर नाचती भी जाती है और
अपने स्थान को बदलती भी जाती है अथवा लड़कों के खेलने की फिरकी नाचती
हुई अपने स्थान को भी बदलती जाती है।
हमारे प्राचीन धर्म ग्रन्थों में पृथ्वी को अचला माना गया है इसलिए पृथ्वी
की गति की बात सनातन धर्म के कुछ पण्डितों को मान्य नहीं है परन्तु वाद विवाद
में वे वही तर्क उपस्थित करते हैं जिसे आचार्य वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त आदि पेश करते
थे। इसलिये पहले यह विचार किया जायगा कि वे तर्क कहाँ तक गणित शास्त्र के
अनुकूल हैं। इसके बाद अनेक गणित और भौतिक विज्ञान के प्रमाणों से सिद्ध किया
जायगा कि पृथ्वी में दैनिक और वार्षिक दो गतियाँ हैं और इन्हीं के कारण नक्षत्र-
चक्र दिन में एक बार पूरब से पच्छिम को घूमता हुआ देख पड़ता है और ऋतु आदि
का परिवर्तन होता है तथा ग्रहों की चाल विचित्र प्रकार की देख पड़ती है। आचार्य
वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त ने पृथ्वी की गति का खण्डन जिन युक्तियों से किया था
वे यह१ हैं। यहाँ यह बतला देना आवश्यक जान पड़ता है कि हमारे यहाँ के
आचार्य आर्यभट अपने आर्यभटीय ग्रंथ में पृथ्वी का चलना मानते हैं और इसका
१. भ्रमति भ्रमस्थितेव क्षितिरित्यपरेत्वदन्ति नोडुगणः ।
यद्येवं श्येनाद्यान खात्पुनः स्वनिलयमुपेयुः ॥६॥
भूगोलाध्याय ७५१
समर्थन इस उदाहरण १ से करते हैं कि जैसे चलती हुई नाव पर बैठे हुए मनुष्य
को नाव स्थिर और किनारे के पेड़, घर आदि उलटी दिशा में चलते हुई दिखाई
पड़ते हैं इसी तरह नक्षत्र-चक्र अचल होने पर भी घूमनेवाली पृथ्वी पर के रहने
मनुष्यों को पच्छिम की तरफ घूमता हुआ देख पड़ता है परन्तु परम्परा विरुद्ध समझ
कर किसी ने नहीं माना और वराहमिहिर आदि ने ये तर्क उपस्थित किये थे ।
आचार्य वराहमिहिर का एक तर्क यह है कि यदि पृथिवी ही पूरब की ओर
घूमती है तो जो पक्षी अपने घोंसले छोड़ कर आकाश में उड़ जाते हैं वे फिर घोंसले
तक क्यों पहुँच जाते हैं क्योंकि पृथिवी के घूमने के कारण पृथिवी में लगा हुआ घोंसला
तो बहुत दूर पूरब में हो जाता और पक्षी आकाश में रह जाने से बहुत पीछे रह
जाता । दूसरा तर्क उन्होंने यह किया कि यदि पृथिवी पूरब की ओर घूमती तो पताका
झण्डा आदि सर्वदा पच्छिम की ओर उड़ते देख पड़ते क्योंकि यह साधारण
अनुभव की बात है कि यदि कोई मनुष्य रूमाल हाथ में लटका कर दौड़े तो उसके वेग
के कारण रूमाल पीछे की ओर उड़ने लगता है। और यदि यह कहा जाय कि
पृथिवी बहुत मंद गति से घूमती है इसलिये पताका आदि पच्छिम को उड़ते हुए नहीं
देख पड़ते तो इतनी मन्द चाल से पृथिवी दिन भर में एक चक्कर कैसे कर लेती है ।
चिड़ियों के अपने घोंसले तक पहुँच जाने का कारण यह है कि जब चिड़िया
आकाश में उड़ जाती है तब भी भूभ्रमण का जो वेग उस घोंसले में रहता है वह
उतना ही आकाश में भी बना रहता है, इसलिए जिस वेग से घोंसला पूर्व की ओर
घूमता जाता है उसी वेग से चिड़िया भी घूमती जाती है, हाँ उसको जान नहीं पड़ता ।
साथ ही साथ वह अपनी गति भी उत्पन्न कर सकती है जिससे वह घोंसले से दूर
जहाँ चाहे जाती है। जैसे रेलगाड़ी पर चढ़ा हुआ आदमी उस वेग का अनुभव
नहीं करता जिससे गाड़ी स्वयम् चल रही है, पर उसमें वह वेग वर्तमान रहता
अन्यच्च भवेद्भू मेरह्ना भ्रमरंहसा ध्वजादीनाम् ।
नित्यं पश्चात् प्रेरणमथाल्पगा स्यात्कथं भ्रमति ॥७॥
पंच सिद्धान्तिका अध्याय १३
प्राणेनैति कलां भूर्यदि तर्हि क तो ब्रजेत कमध्वानम् ।
आवर्त्तनमुर्ध्याश्चेन्न पतन्ति समुच्छ्रयाः कस्मात् ॥१७॥
ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त, तन्त्र परीक्षाध्याय
१. अनुलोम गतिर्नौस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत् ।
अचलानिभानि तद्वत्सम पश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥६॥
आर्यभटीय, गोलपाद
७५२ सूर्य-सिद्धान्त
है। इस वेग के रहते हुए भी वह अपनी इच्छा-शक्ति से डब्बे में इधर-उधर चल
फिर सकता है, उछल कूद सकता है, गेंद खेल सकता है। क्योंकि गाड़ी में रखी हुई
जितनी वस्तुएँ हैं सबमें गाड़ी का वेग वर्तमान रहता है इसलिए यह वेग सबमें
समान रूप से रहने के कारण मालूम नहीं होता। इसका पता भी सहज ही लगाया
जा सकता है। यदि बहुत तीव्र चलती हुई गाड़ी में बैठ कर एक कंकड़ बाहर की
ओर सीधा फेंका जाय तो जब तक वह पृथ्वी को नहीं छू लेता तब तक गाड़ी के
साथ ही साथ आगे बढ़ता हुआ देख पड़ता है। यह बात उस समय और भी स्पष्ट
देख पड़ती है जब कंकड़ उस समय फेंका जाय जिस समय गाड़ी किसी नदी के पुल
पर चलने लगे क्योंकि ऐसी दशा में कंकड़ को धरातल तक पहुँचने में कुछ देर लगेगी
इसलिए वह देर तक गाड़ी के साथ आगे बढ़ता हुआ देख पड़ेगा और उस जगह
नहीं गिरेगा जिस जगह लक्ष्य करके फेंका जाय वरन् आगे बढ़ कर ठीक अपने ही
सीध में गिरेगा। इससे जाना जा सकता है कि जब कोई वस्तु किसी वेग से चलती
हुई गाड़ी, वायुयान आदि से अलग होती है तब भी उसमें वह वेग वर्तमान रहता
जो गाड़ी में था और जब तक वह वस्तु किसी दूसरे वस्तु पर ठहर नहीं जाती तब
तक उसका वेग नष्ट नहीं होता, इसी कारण यदि चलती हुई गाड़ी से कोई कूदता
है तो वह गाड़ी के वेग के कारण आगे बढ़ कर गिर जाता है।
इस बात की दूसरी परीक्षा इस प्रकार की जा सकती है। यह तो सभी को
मालूम है कि यदि कोई गरुई चीज़ कुछ ऊँचाई से छोड़ दी जाय तो वह अपने ठीक
नीचे पृथ्वी पर गिरती है। बड़ी रेलगाड़ी के डब्बे की ऊँचाई फ़र्श से १० फुट के
लगभग होती है। इसलिए यदि छत के पास से पत्थर का टुकड़ा नीचे गिराया जाय
तो फ़र्श पर पहुँचने में उसे ६, १० फुट चलना पड़ेगा और इसमें उसे पौन सेकंड
के लगभग लगेगा। इतनी देर में यदि गाड़ी ३० मील प्रति घंटे की चाल से चलती
हो तो ३३ फुट आगे बढ़ जाती है। इसलिए यदि वराहमिहिर का तर्क ठीक हो तो
पत्थर के उस स्थान पर नहीं गिरना चाहिये जो उस स्थान से ठीक नीचे है जहाँ से
पत्थर गिराया जाता है वरन् ३३ फुट पीछे गिरना चाहिये। परन्तु ऐसा देख नहीं पड़ता।
देखने में वह वहीं गिरता है जिसके ठीक ऊपर से गिराया जाता है। इसका कारण
यह है कि पत्थर जिस समय छत से गिराया जाता है उस समय उसमें गाड़ी की जो
गति वर्तमान रहती है वह गिरने के समय भी वर्तमान रहती है इसलिए चीज गिरते
रहने के साथ-साथ गाड़ी के साथ आगे भी बढ़ता जाता है और ठीक वहीं गिरता है
जिसके ऊपर से गिराया जाता है। सर्कस के खेल में दौड़ते हुए घोड़े की पीठ पर से
ऊपर से ऊपर उछल जाना और फिर उसी की पीठ पर आ जाना इसी नियम का
परिणाम है।
भूगोलाध्याय ७५३
अब रही ध्वजा की बात । ध्वजा के प्रत्येक कण में पृथ्वी का वेग रहता है ।
इसी तरह हवा में भी जो पृथ्वी का एक अंग ही है वह वेग वर्तमान रहता है इसीलिए
ध्वजा का कपड़ा पृथ्वी की गति के कारण पश्चिम की ओर उड़ता हुआ नहीं देख
पड़ता । गाड़ी, मोटर या रेलगाड़ी के बाहर ध्वजा लगी हुई हो तो वह पीछे की
ओर उड़ती हुई देख पड़ती है क्योंकि रेलगाड़ी या मोटर की गति से बाहर की हवा
का कोई लगाव नहीं रहता, यह तो हवा को चीरती हुई चलती है इसलिए यह पीछे
की ओर बढ़ती है और ध्वजा पताका इत्यादि को पीछे की ओर उड़ाती है । हां यदि
रेलगाड़ी या मोटर के सब द्वार बन्द कर दिये जाँय तो इसके भीतर की हवा का
सम्बन्ध बाहर की हवा से टूट जाता है और उसमें गाड़ी का वेग वर्तमान रहता है
इसलिए उसमें ध्वजा को पीछे उड़ाने की शक्ति नहीं रहती । इसी प्रकार पृथ्वी का
वातावरण भी ध्वजा को पीछे उड़ाने में असमर्थ होता है क्योंकि पृथ्वी वातावरण को
चीरती हुई नहीं चलती वरन् साथ लिए हुई चलती है इसलिए उसमें भी वही वेग
रहता है ।
आचार्य ब्रह्मगुप्त का यह तर्क कि पृथ्वी के घूमने से ऊँचे-ऊँचे घरों, पर्वतों
आदि कीचोटी कभी ऊपर और कभी नीचे हो जाती और जब नीचे हो जाती तो
यह अवश्य गिर पड़ते परन्तु ऐसा नहीं होता इसलिए पृथ्वी नहीं घूमती, बिल्कुल
पृथ्वी है । ऊँचाई और नीचाई की कल्पना पृथ्वी के ही विचार से की जाती है ।
पृथ्वी की ओर जो दिशा है वह नीचे की दिशा कही जाती है और इससे उल्टी
आकाश की ओर की दिशा को ऊँची दिशा कही जाती है और जो वस्तुएँ गिरती
हैं वे पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के कारण ही पृथ्वी पर गिरती हैं इसलिए यदि कोई
गोला पृथ्वी के ऊपर हवा में घुमाया जाय और उसमें कोई ऐसी वस्तु चिपका दी जाय
तो पृथ्वी की ओर होने पर पृथ्वी पर गिर पड़े तो यह बिल्कुल ठीक है । परन्तु जहाँ
पृथ्वी के ही घूमने का प्रश्न है वहाँ इसके नीचे क्या है जिसके आकर्षण से भूपृष्ठ के
ऊँचे घर या पर्वत उस ओर गिर कर चले जायँ ? पृथ्वी के चारों ओर आकाश ही
आकाश है इसलिए वह चाहे जितनी घूमे उस पर के घरों और पर्वतों की चोटी
सदैव आकाश की ही ओर रहेगी और नींव पृथ्वी की ओर इसलिए वे गिर कर
कहाँ जा सकते हैं ।
यहाँ तक तो शंकाओं का समाधान किया गया । अब उदाहरण दे कर
गणितशास्त्र के आधार पर सिद्ध किया जायगा कि पृथ्वी में गति है ।
अर्वाचीन विज्ञान से पृथ्वी के अक्ष-भ्रमण के प्रमाण—
यह साधारण अनुभव की बात है कि पहिये का वह विन्दु जो धुरी से दूर
७५४ सूर्य-सिद्धान्त
है धुरी के पास वाले बिन्दु से अधिक चलता है और पहिये के किनारे पर जो
बिन्दु है उसमें उन सब बिन्दुओं से अधिक वेग रहता है जो बीच में होते हैं। यदि
पृथ्वी ऐसे अक्ष पर घूमती हुई मानी जाय जिसका एक सिरा उत्तरी ध्रुव पर और
दूसरा दक्षिणी ध्रुव पर हो तो यह स्पष्ट है कि किसी ऊँचे पेड़, मकान या मीनार
की चोटी उसके आधार की अपेक्षा पृथ्वी के अक्ष से अधिक दूरी पर है इसलिये चोटी
की गति उसके आधार की गति से अधिक होगी। इसलिए यदि कोई वस्तु किसी
ऊँचे मीनार की चोटी से गिरायी जाय तो वह अधिक वेग के कारण ठीक नीचे न
गिर कर कुछ पूरब की ओर बढ़कर गिरेगी क्योंकि उसके ठीक नीचे वाले विन्दु
चित्र नं० १२६
की चाल उससे मन्द है। मान लो स एक मीनार की चोटी है जहाँ से वस्तु नीचे
गिरायी जाती है और प मीनार का मूल है जो स के ठीक नीचे है इसलिये लम्ब
रेखा स प बढ़ाने पर पृथ्वी के केन्द्र क पर पहुँचेगी। यदि मान लिया जाय कि
जितनी देर में वस्तु पृथ्वी तल पर पहुँचती है मीनार की चोटी स से सा तक घूम
गयी तो मीनार का मूल प से पा तक पहुँचेगा क्योंकि चोटी और मूल को मिलाने
बाली रेखा पृथ्वी के केन्द्र को सदैव जायगी। यह स्पष्ट है कि प पा, स सा से कम
है। यह भी स्पष्ट है कि प की भ्रमण गति स की भ्रमण गति से कम है। परन्तु
जो वस्तु स बिन्दु से गिरायी जायगी उसकी गति स की गति के समान होगी इस-
लिये वह गिरते हुए भी अपनी ऊपर वाली गति को धारण किये रहेगी इसलिये
भूगोलाध्याय ७५५
वह पा पर न गिर कर पि पर गिरेगी जहां प पि, स सा के समान है अर्थात् वह
वस्तु लम्ब रेखा से कुछ पूरब की ओर बढ़कर गिरेगी ।
इसलिये यदि परीक्षा करके यह सिद्ध किया जाय के कि ऊपर से गिरी हुई
वस्तु पृथ्वी पर पहुँचते-पहुँचते यथार्थ में कुछ पूरब की ओर बढ़ जाती है तब यह
कल्पना भी ठीक मानी जा सकती है कि पृथ्वी पूरब की ओर भ्रमण करती है ।
परन्तु यह परीक्षा कठिन है क्योंकि इतना ऊँचा स्थान नहीं बनाया जा सकता कि
उसकी चोटी और मूल की भ्रमण गतियों में इतना अन्तर हो कि वह साफ साफ देख
पड़े क्योंकि पृथ्वी की त्रिज्या ४००० मील के लगभग है और मीनार की चोटी १०००
फुट भी नहीं हो सकती । बोलोन और हेमबर्ग में इस सम्बन्ध में जितनी परीक्षाएँ
की गयीं उनसे सिद्ध हुआ कि २५० फुट की ऊँचाई से गिरी हुई वस्तु लम्ब रेखा से
तिहाई इंच पूरब बढ़ जाती है । गणना करके यह देखा जा सकता है कि जितनी देर
में कोई वस्तु २५० फुट नीचे गिरती है उतनी देर में चोटी और मूल की अथवा
स और प बिन्दुओं की गतियों का अन्तर भी उतना ही होता है । इसलिये इससे सिद्ध
होता है कि पृथ्वी में भ्रमण गति है । इस प्रयोग की पूरी गणना यहाँ नहीं दी जा
सकती क्योंकि बिना उच्च गणित की जानकारी के वह समझ में आ नहीं सकता ।
इसलिये यहाँ केवल सारमात्र दिया गया है ।
इस प्रयोग की कल्पना पहले पहले न्यूटन ने की थी । पृष्ठ ७५४ पर जो चित्र
दिया गया है वह विषुवत् रेखा पर स्थित देशों के लिये उपयुक्त है । अन्य स्थानों के
लिये इसकी गणना में कुछ परिवर्तन करना पड़ता है क्योंकि विषुवत् रेखा से अन्य
स्थानों में गिरनेवाली वस्तु में दो गतियाँ हो जाती हैं जिनकी दिशाएँ भिन्न होती हैं ।
एक गति तो पृथ्वी के दैनिक भ्रमण की होती है जो गिरने वाली वस्तु को मीनार की
चोटी से प्राप्त होती है और पृथ्वी के अक्ष के समकोण तल पर होती है और दूसरी
गति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण होती है जिससे वस्तु पृथ्वी के केन्द्र की ओर
गिरती है । इसलिये वस्तु लम्ब दिशा से पूरब की ओर तो बढ़ जाती है, साथ ही
साथ कुछ दक्षिण या उत्तर भी हो जाती है । गिरते समय वस्तु पर हवा की रगड़
का भी कुछ प्रभाव पड़ता है परन्तु इन सब बातों के होते हुए भी मूल सिद्धान्त में
कोई अन्तर नहीं होता ।
यह प्रयोग कोयले की गहरी खानों में भी किया जाता है क्योंकि यहाँ गिरने
के लिये गहराई अधिक मिल सकती है । ५०० फुट की ऊँचाई से गिरायी हुई वस्तु
लम्ब दिशा से १ इञ्च के लगभग पूरब बढ़ जाती है । यह कई प्रयोगों का मध्यमान
है, गणना से भी यही बात सिद्ध होती है ।
७५६ सूर्य-सिद्धान्त
(२) परन्तु इससे भी सहज और स्पष्ट प्रयोग फूको (Foucault) का लोलक-
प्रयोग (Pendulum experiment) है । गणित शास्त्र से यह सिद्ध है कि यदि कोई
लोलक केवल गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के स्पन्दन करे या झूले तो इसका स्पन्दन तल
(झूलने की दिशा) वही बना रहेगा और इस तल की दिशा पर लोलक के आधार की
गति का प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि ऐसी दूसरी कोई शक्ति नहीं है जो इसे इस तल
से विचलित कर सके । यह सहज ही देखा जा सकता है कि यदि एक भारी लोलक
एक पतले तार से लटका कर घड़ियों के लोलक की तरह झुलाया जाय और यदि
वह आधार जिसमें लोलक लटकाया जाता है घुमाया जाय तो इसके घूमने से लोलक
के स्पन्दन-तल में कोई अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि जिस तार या डोरे में लोलक बंधा
रहता है उसका जरा सा ऐंठ जाना अधिक सहज है न कि भारी लोलक का ही अपने
स्पन्दन तल को बदलना जब कि वह पहले ही से एक तल में झूल रहा है । इसलिये
यह सिद्ध है कि यदि पृथ्वी अचल हो तो लोलक के स्पन्दन की दिशा भी आसपास
की वस्तुओं तथा आधार के विचार से अचल रहेगी और यदि इसमें भ्रमणगति होगी
तो लोलक के स्पन्दन तल की अपेक्षा भूतल की दिशाओं में परिवर्तन हो जायगा और
लोलक का स्पन्दन तल ही बदलता हुआ देख पड़ेगा । इसलिये इस लोलक-प्रयोग से
पृथ्वी की भ्रमण गति का ही पता नहीं लगेगा वरन् इसकी दिशा का भी पता लगेगा ।
फूको ने यह प्रयोग सन् १८५१ ई० या १६०८ वि० में पेरिस में किया था ।
उसने अपने लोलक को पैन्थियन नामक विशाल भवन के गुम्बज से लटकाया ।
इसका तार २०० फुट लम्बा था और गोले की तोल १ मन के लगभग (८० पौंड)
थी । जिस समय लोलक झूलता था गोले के नीचे निकली हुई सुई अपने झूलने का
चिह्न बालू तल पर बनाती जाती थी और यह देख पड़ता था कि बालू का तल
अपसव्य दिशा में अर्थात् दहिने से बायें पच्छिम से पूरब घूमता जाता था ।
इस प्रयोग में दो बातों की बड़ी सावधानी रखनी पड़ती है । लोलक का तार
जितना ही लम्बा हो उतनी ही अधिक देर तक यह झूलता रहेगा नहीं तो अपनी
तीव्र गति से हवा की रगड़ खा कर जल्द रुक जायगा । दूसरे इसका गोला जितना
ही भारी हो अच्छा है क्योंकि इससे लटकाने के दोषों का तथा हवा की रगड़ का
प्रभाव बहुत कम पड़ जाता है ।
इस प्रयोग को बहुत सफलतापूर्वक करने का उद्योग अमेरिका के एक
विज्ञानवेत्ता रसेल डेबलू फोर्टर ने १ किया है । इन्होंने पियानो बाजा के लगभग १२
१. देखो जुलाई सन् १६२८ ई० के सायंरिफिक अमेरिकन Scientific
American पृष्ठ १४, १५ ।
भूगोलाध्याय ७५७
चित्र नं० १३०
फुट लम्बे तार से ढलवे लोहे का कोई ४० पौंड या २० सेर का गोला छत की धरन
से लटकाया । यह देखा गया है कि लोलक की गति धीरे धीरे मंद पड़ जाती है परन्तु
यदि इनका लोलक लम्ब दिशा से तीन फुट तक खींच कर झुलाया जाय तो आधे
घंटे के बाद भी वह लम्ब रेखा से २ फुट इधर उधर झूलता रहता है ।
७५८ सूर्य्य-सिद्धान्त
हां, इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जिस छत में लोलक लटकाया
जाय उसमें किसी प्रकार का स्पन्दन न हो और कमरे की हवा में किसी प्रकार का
झोंका न हो । लोलक लटकने पर प्रायः घूमता रहता है जिससे डोरे या तार में
ऐंठन पड़ जाती है । इससे लोलक में एक दूसरी गति उत्पन्न हो जाती है । इसलिये
इसे रोकने के लिये इन्होंने तार को एक पीतल के हुक में लटकाया जिसका आकार
प्रश्नवाचक चिह्न की तरह था और हुक की नोक एक छिछली प्याली में थांभ दी
गयी जो धरन पर अच्छी तरह कसी हुई थी । प्याली का नतोदर तल अच्छी तरह
चिकना कर दिया था ।
लोलक को झुलाने के पहले बिल्कुल निश्चल रखना चाहिये । इसलिये गोले
में एक डोरा बांध कर डोरे को इतना खींच कर दीवाल में बांध देना चाहिये कि गोला
धरण-बिन्दु की लम्ब रेखा से २, ३ फुट हट जाय । अब यदि डोरे को जला दिया
जाय तो गोला हिलने लगेगा और बराबर एक ही तल में झूलता रहेगा । यदि ऐसा
न किया जाय तो गोला एक लम्बे दीर्घवृत्त में झूलने लगता है और यदि आरंभ में
जरा सी भी गड़बड़ हो तो कुछ देर में बहुत बड़ा रूप धारण कर लेता है ।
लोलक के झूलने की दिशा चाहे जो हो परन्तु यदि आरम्भ उत्तर दक्षिण
दिशा से किया जाय तो अच्छा है । गोले के नीचे जो सुई निकली हुई हो वह मेज के
इतने पास हो कि उस पर रखी हुई कागज की तख्ती के छूने से तनिक ही बची
रहे । गोला झुलाने के बाद कागज की तख्ती पर एक सीधी रेखा पेंसिल से खींच
कर तख्ती को मेज पर इस प्रकार सरका दो कि सुई छू न जाय और खींची हुई
रेखा सुई के झूलने के तल से ठीक मिल जाय । अब तख्ती की रेखा के दक्षिणी
किनारे को ध्यान से देखना चाहिये । दो ही तीन मिनट में तख्ती की रेखा का
दक्षिणी सिरा पच्छिम से पूरब को अर्थात् अपसव्य दिशा में या घड़ी की विरुद्ध दिशा
में घूमता हुआ देख पड़ेगा । कारण यह कि तख्ती पृथ्वी के साथ पच्छिम से पूरब
को घूमती रहती है । यह प्रयोग यदि विषुवत् रेखा से दक्षिण के देशों में किया जाय
तो तख्ती की रेखा घड़ी की अनुकूल दिशा में घूमती हुई देख पड़ेगी ।
अब देखना है कि प्रयोग का परिणाम गणना से कहाँ तक मिलता है ।
यदि किसी प्रकार यह सम्भव हो कि लोलक उत्तरी ध्रुव पर लटकाया जाय
तो लोलक की लम्ब-रेखा और पृथ्वी का अक्ष एक ही दिशा में होंगे । इसलिए जैसे-
जैसे पृथ्वी पच्छिम से पूरब की ओर घूमती जायगी इसके साथ दर्शक के खड़ा
होने का तल भी पच्छिम से पूरब को घूमेगा और लोलक का स्पन्दन तल पूरब से
पच्छिम की ओर हटता हुआ जान पड़ेगा क्योंकि दर्शक पृथ्वी के घूमने को नहीं देख
भूगोलाध्याय ७५६
सकता । इसलिए लोलक का स्पन्दन-तल उलटी दिशा में २३ घंटे ५६ मिनट ४
सेंकेड में एक चक्कर लगा लेने की गति से घूमता हुआ देख पड़ेगा ।
( चित्र नं० १३१ )
७६० सूर्य-सिद्धान्त
यह सम्भव नहीं कि एक बार का झुलाया हुआ लोलक लगातार २४ घंटे
तक झूलता रहे । परन्तु जितनी देर तक वह झूलता रहेगा उतनी ही देर में इसका
स्पन्दन-तल इतना घूमा हुआ देख पड़ेगा कि उससे अनुपात द्वारा सहज ही जाना जा
सकता है कि एक चक्कर लगाने का समय क्या हो सकता है ।
पोर्टर ने अपने लोलक को इस प्रकार लटकाया था । एक पीतल का हुक
जिसकी मोटाई दे इञ्च थी एक फौलाद की प्याली में रखा गया है जिसमें
ऐंठन न पड़े । (देखो चित्र १३१)
यदि विषुवत् रेखा पर लोलक झुलाया जाय तो इसकी नोक से बनी हुई
लकीर एक दूसरे के ऊपर होगी क्योंकि यहाँ इसके दोनों किनारों की पच्छिम से
पूरब वाली गति समान है इसलिए लोलक का स्पन्दन-तल घूमता हुआ नहीं देख
पड़ेगा वरन् एक ही लकीर पर चलता रहेगा ।
परन्तु विषुवत् रेखा से भिन्न स्थानों में यह बात नहीं होगी क्योंकि लोलक के
ठीक नीचे के धरातल के उस भाग में जो विषुवत् रेखा के पास है पृथ्वी के घूमने
की गति उससे अधिक है जो ध्रुव के पास है इसलिए इसका परिणाम यह होगा कि
लोलक की नोक से जो लकीर बालू पर बनेगी उसका वह किनारा जो विषुवत् रेखा
की ओर है ध्रुव की ओर वाले किनारे से अधिक वेग से घूमने के कारण पूरब की
वि
स
अ
९०-अ
धा ध
क
प
वी
( चित्र नं० १३२ )
भूगोलाध्याय ७६१
ओर हटता हुआ और ध्रुव की ओर वाले किनारे का चक्कर लगाता हुआ देख पड़ेगा
परन्तु यह चक्कर २३ घंटे ५६ मिनट ४ सेंकेड से अधिक समय में पूरा होगा जैसा
कि नीचे की गणना से सिद्ध है ।
कल्पना करो कि परीक्षा के स्थान स का उत्तरी अक्षांश अ है । वि वी विषुवत्
रेखा, क पृथ्वी का केन्द्र, ध धा पृथ्वी का अक्ष और ध उत्तरी ध्रुव है। ध धा
अक्ष पर घूमने वाला पृथ्वी का कोणीय वेग व गति-विज्ञान के अनुसार दो भागों में
बाँटा जा सकता है, जिसका एक भाग क स पर और दूसरा भाग क प पर घूमता
हुआ समझा जा सकता है ।
वेग का यह भाग जो क स पर है व कोटिज्या (६०°-अ) अथवा व ज्या अ
के समान होगा और जो भाग कप पर है वह व कोज्या अ के समान होगा ।
परन्तु कप पर घूमने वाला वेग क स के समानान्तर होगा इसलिए इसका प्रभाव
लोलक पर वैसा ही पड़ेगा जैसा विषुवत् रेखा पर पड़ता है अर्थात् इसके कारण
लोलक से बनने वाली लकीर की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं होगा परन्तु क स पर
घूमने वाला वेग झूलते हुए लोलक की सुई से बनी हुई लकोर की दिशा में परिवर्तन
करेगा जिससे लकीर का दक्षिणी सिरा पच्छिम से पूरब की ओर खसकता हुआ
देख पड़ेगा और जान पड़ेगा मानों लोलक का स्पन्दन तल ही पूरब से पच्छिम की
ओर घूम रहा है क्योंकि पहली लकीर से दूसरी लकीर पच्छिम की ओर बनती चली
जायगी।
अब यह देखना है कि कितनी देर में लोलक का स्पन्दनतल यदि लगातार
झूलता रहा तो एक चक्कर लगा लेगा। यह मान लिया गया है कि पृथ्वी के अक्ष पर
घूमता हुआ वेग व है और स स्थान पर इसका खण्ड वेग व ज्या अ है इसलिए यह
जानना सहज है कि जब व वेग से एक चक्कर २४ घंटे में पूरा होता है तब व ज्या अ
वेग से एक चक्कर अधिक समय में पूरा होगा इसलिए लोलक से बनी हुई लकीरों
का पूरा चक्कर $\frac{व\times २४ घंटा}{व ज्या अ} = \frac{२४ घंटा}{ज्या अ}$ समय में पूरा होगा। जहाँ अ स्थान का
अक्षांश है। यदि प्रयाग में यह प्रयोग किया जाय तो एक चक्कर $\frac{२४ घंटा}{ज्या २५^\circ २५'} =$
$\frac{२४ घंटा}{.४२६२} =$ ५५ घंटा ५५ मिनट या मोटे हिसाब से ५६ घंटे में होगा । इसलिये
यदि आधे घंटे भी लोलक झूलता रहे तो स्पन्दनतल की दिशा में पर्याप्त परिवर्तन
देख पड़ेगा क्योंकि जब ५६ घण्टे में पूरा चक्कर होता है तब आधे घण्टे में
$\frac{१}{२} \times ३६० \times \frac{१}{५६}अंश = \frac{४५}{१४} = ३ अंश १३कला के लगभग परिवर्तन हो जायगा ।$
२१