सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोलाध्याय ७५३
अब रही ध्वजा की बात । ध्वजा के प्रत्येक कण में पृथ्वी का वेग रहता है ।
इसी तरह हवा में भी जो पृथ्वी का एक अंग ही है वह वेग वर्तमान रहता है इसीलिए
ध्वजा का कपड़ा पृथ्वी की गति के कारण पश्चिम की ओर उड़ता हुआ नहीं देख
पड़ता । गाड़ी, मोटर या रेलगाड़ी के बाहर ध्वजा लगी हुई हो तो वह पीछे की
ओर उड़ती हुई देख पड़ती है क्योंकि रेलगाड़ी या मोटर की गति से बाहर की हवा
का कोई लगाव नहीं रहता, यह तो हवा को चीरती हुई चलती है इसलिए यह पीछे
की ओर बढ़ती है और ध्वजा पताका इत्यादि को पीछे की ओर उड़ाती है । हां यदि
रेलगाड़ी या मोटर के सब द्वार बन्द कर दिये जाँय तो इसके भीतर की हवा का
सम्बन्ध बाहर की हवा से टूट जाता है और उसमें गाड़ी का वेग वर्तमान रहता है
इसलिए उसमें ध्वजा को पीछे उड़ाने की शक्ति नहीं रहती । इसी प्रकार पृथ्वी का
वातावरण भी ध्वजा को पीछे उड़ाने में असमर्थ होता है क्योंकि पृथ्वी वातावरण को
चीरती हुई नहीं चलती वरन् साथ लिए हुई चलती है इसलिए उसमें भी वही वेग
रहता है ।
आचार्य ब्रह्मगुप्त का यह तर्क कि पृथ्वी के घूमने से ऊँचे-ऊँचे घरों, पर्वतों
आदि कीचोटी कभी ऊपर और कभी नीचे हो जाती और जब नीचे हो जाती तो
यह अवश्य गिर पड़ते परन्तु ऐसा नहीं होता इसलिए पृथ्वी नहीं घूमती, बिल्कुल
पृथ्वी है । ऊँचाई और नीचाई की कल्पना पृथ्वी के ही विचार से की जाती है ।
पृथ्वी की ओर जो दिशा है वह नीचे की दिशा कही जाती है और इससे उल्टी
आकाश की ओर की दिशा को ऊँची दिशा कही जाती है और जो वस्तुएँ गिरती
हैं वे पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के कारण ही पृथ्वी पर गिरती हैं इसलिए यदि कोई
गोला पृथ्वी के ऊपर हवा में घुमाया जाय और उसमें कोई ऐसी वस्तु चिपका दी जाय
तो पृथ्वी की ओर होने पर पृथ्वी पर गिर पड़े तो यह बिल्कुल ठीक है । परन्तु जहाँ
पृथ्वी के ही घूमने का प्रश्न है वहाँ इसके नीचे क्या है जिसके आकर्षण से भूपृष्ठ के
ऊँचे घर या पर्वत उस ओर गिर कर चले जायँ ? पृथ्वी के चारों ओर आकाश ही
आकाश है इसलिए वह चाहे जितनी घूमे उस पर के घरों और पर्वतों की चोटी
सदैव आकाश की ही ओर रहेगी और नींव पृथ्वी की ओर इसलिए वे गिर कर
कहाँ जा सकते हैं ।
यहाँ तक तो शंकाओं का समाधान किया गया । अब उदाहरण दे कर
गणितशास्त्र के आधार पर सिद्ध किया जायगा कि पृथ्वी में गति है ।
अर्वाचीन विज्ञान से पृथ्वी के अक्ष-भ्रमण के प्रमाण—
यह साधारण अनुभव की बात है कि पहिये का वह विन्दु जो धुरी से दूर