सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
स्पष्टाधिकार ६१
केपलर ने यह तीनों नियम ग्रहों के सूक्ष्म निरूपणों से सं० १६६४-१६७४
वि० (१६०६-१६१६ ई०) में बनाये थे । उसको इस बात का पता नहीं था कि किन
शक्तियों से ग्रहों में इन नियमों के अनुसार गतियाँ होती हैं। कोई ७५ वर्ष तक इन
नियमों की उपपत्ति नहीं बतलायी जा सकी । इसके पश्चात् न्यूटन ने यह सिद्ध किया
कि विश्वव्यापी गुरुत्वाकर्षण ही इन सब का कारण है। न्यूटन ने जिन तीन नियमों
के आधार पर यह सिद्ध किया है वह गति के नियम कहलाते हैं, उसी के नाम से
प्रसिद्ध हैं और यह हैं :-
पहला नियम—यदि कोई बाहरी शक्ति न लगायी जाय तो प्रत्येक वस्तु यां
तो अपनी अचल दशा में, या सीधी रेखा में समान गति से चलती हुई दशा में, रहना
चाहती है ।
दूसरा नियम—गति का परिवर्तन लगायी जाने वाली शक्ति के मानानुसार
होता है और यह परिवर्तन उस सीधी रेखा की दिशा में होता है जिस दिशा में शक्ति
लगायी जा रही हो ।
तीसरा नियम - प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, जो परिमाण में सदैव
समान, परन्तु दिशा में विरुद्ध होती है अर्थात् प्रत्येक क्रिया के समान परन्तु उसके
विरुद्ध दिशा में प्रतिक्रिया होती है ।
यह नियम स्वयम्प्रसिद्ध हैं। विशेष जानकारी के लिए गतिविज्ञान
(Dynamics) के किसी ग्रन्थ को पढ़ना चाहिये ।
केपलर के पहले और दूसरे नियमों से न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि प्रत्येक
ग्रह एक ऐसी शक्ति के कारण चल रहा है, जिसकी दिशा सूर्य की ओर है और
जिसका परिमाण सूर्य से ग्रह की दूरी के वर्ग के विलोम मानानुसार होता है। केपलर
के तीसरे नियम से न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि एक ग्रह की गति की वृद्धि दूसरे
ग्रह की गति की वृद्धि से क्या सम्बन्ध रखती है और इसीसे उसने विश्वव्यापी
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त निकाला, जो यह है :-
द्रव्य (matter) का प्रत्येक कण दूसरे कण को उस शक्ति से आकर्षित करता
है, जो उन कणों की मात्राओं के गुणनफल के अनुसार तथा उन दोनों के बीच की
दूरी के वर्ग के विलोम मानानुसार बदलती है ।
अब यह सिद्ध करना है कि यदि किसी स्थिर बिन्दु से किसी गतिमान कण
तक रेखा खींची जाय और वह समान काल में समान क्षेत्रफल बनावे तो वह कण
जिस शक्ति से चल रहा है उसकी दिशा उसी स्थिर बिन्दु की ओर है। यह बात
चलनकलन (Differential Calculus) तथा गतिविज्ञान के आधार पर संक्षेप में
६२ सूर्य-सिद्धान्त
सिद्ध हो सकती है, जो पीछे दी जायगी। इस जगह साधारण गणित के ही आधार
पर कुछ विस्तार के साथ सिद्ध की जाती है । १
मान लो कि 'स' एक स्थिर बिन्दु है और किसी वस्तु का कोई कण स के
चारों ओर घूमता हुआ क ख ग घ च बहुभुज क्षेत्र बना रहा है और क ख, ग घ,
या घ च भुज समान काल में अथवा १ पल में चलता है । यह भी मान लो कि इन
भुजों के मान भिन्न-भिन्न हैं और और जब तक कण किसी एक भुज पर रहता है
तब तक उसकी गति एकरूप (uniform) रहती है । स क ख, स ख ग, स ग घ,
स घ च त्रिभुजों के क्षेत्रफल भी समान समझ लेने चाहिये ।
अब यह प्रत्यक्ष है कि समान काल में वह कण स के चारों ओर घूमता हुआ
समान क्षेत्रफल बनाता है । गति के पहले नियम के अनुसार जब तक कण बहुभुज
चित्र २०
१. यह युक्ति Heroes of Science : Astronomers के पृष्ठ १७३—
१७५ के आधार पर है ।
स्पष्टाधिकार ६३
क्षेत्र की कोई सीधी भुज बना रहा है तब तक उस पर कोई शक्ति काम नहीं कर
रही है और वह अपनी प्राप्त शक्ति से सीधी रेखा में जा रहा है, परन्तु एक भुज से
दूसरी भुज पर जैसे ही मुड़ने लगता है वैसे ही क्षण भर के लिए कुछ न कुछ शक्ति
उस पर अवश्य लगनी चाहिये, जिससे वह अपनी पहले की सीधी चाल को बदल कर
दूसरी सीधी चाल पर आ जाय ।
जिस समय कण ख पर है उस समय की दशा पर ध्यान दो । यदि इस समय
कोई शक्ति न लगे तो दूसरे पल में वह क ख की ही सीध में ख प राह पर जायगा
और क ख प रेखा सीधी रेखा होगी तथा ख प और क ख समान होंगे क्योंकि गति
में कोई अन्तर नहीं होगा । प को ग और स से मिला दो । स ख प त्रिभुज का
आधार ख प है जो क ख के समान है और क ख की ही सीधी रेखा में है, इसलिए
रेखा-गणित के अनुसार दोनों त्रिभुज स क ख और स ख प के क्षेत्रफल समान हैं।
यह आरम्भ में ही मान लिया गया है कि स क ख, स ख ग इत्यादि त्रिभुजों के
क्षेत्रफल समान हैं। इसलिए यह सिद्ध हो गया कि स ख प और स ख ग त्रिभुज भी
परस्पर समान हैं जो एक ही आधार स ख पर हैं इसलिए रेखागणित के अनुसार
यह दोनों त्रिभुज स ख और ग प समानान्तर रेखाओं के बीच में हैं अर्थात् ग प रेखा
स ख के समानान्तर है। ख प के समानान्तर ग र रेखा खींचो जो स ख रेखा से र
बिन्दु पर मिले । तब ख प ग र समानान्तर चतुर्भुज क्षेत्र होगा। जिस समय कण ख
पर था उस समय यदि कोई शक्ति न लगी होती तो वह बिन्दु प पर पहुँचता; परन्तु
शक्ति लगने से वह ग पर पहुँचा, इसलिए प्रकट है कि ख पर कण की प्रथम गति ख
प थी और शक्ति लगने के कारण वह ख ग में बदल गयी । इसलिए गतिविज्ञान के
‘गति के समानान्तर चतुर्भुज-नियम’ (parallelogram of velocities) के अनुसार
लगी हुई शक्ति के कारण कण में ख प की गति के साथ ख र गति का संयोग हो
गया, अर्थात् ख बिन्दु पर कण में जो गति ख प दिशा की ओर थी उसमें ख र की
दिशा में ख र के समान ही दूसरी गति मिल गयी, जिससे वह कण ग बिन्दु पर
पहुँचा । इसलिए इस मिलने वाली शक्ति के कारण वह वस्तु स की ओर मुड़ी । इसी
प्रकार यह सिद्ध हो सकता है कि बहुभुज क्षेत्र के कोण बिन्दुओं ग, घ, च पर भी जो
शक्ति लगती है वह स की दिशा में ही लगती है ।
अब कल्पना करो कि यह बहुभुज क्षेत्र करोड़ों अत्यन्त छोटी-छोटी भुजों से
बना है और स के चारों ओर घूमने वाला कण प्रत्येक छोटी-छोटी भुज को पल के
करोड़वें भाग में चल कर पूरा करता है तो यह प्रकट है कि उस कण पर स की
दिशा में करोड़ों बार शक्ति लगेगी। इसलिए यह सिद्ध है कि कण ने प्रायः वक्र
(curved) मार्ग को स की ओर ले जाने वाली एक अनवच्छिन्न (continuon
शक्ति के कारण पूरा किया । यदि कल्पना को और बढ़ा दिया जाय और बहुभुज
क्षेत्र की भुज इतनी छोटी हो जायँ कि उनकी कोई सीमा ही न बँध सके और उनकी
संख्या असंख्य हो तब भी यह तर्क लागू हो सकता है । इसलिए यह सिद्ध होता है कि
यदि कोई कण किसी स्थिर विन्दु के चारों ओर ऐसे मार्ग पर चले कि उससे समान
काल में समान क्षेत्रफल बने तो इस कण पर जो शक्ति निरन्तर लगी हुई है वह उस
स्थिर बिन्दु की दिशा में है अर्थात् वह स्थिर बिन्दु उस कण को निरन्तर आकर्षित
किये हुए है ।
यदि स को सूर्य का केन्द्र मान लिया जाय और क, ख, ग इत्यादि को किसी
ग्रह के स्थान, तो केपलर के दूसरे नियम से सिद्ध होता है कि सूर्य के चारों ओर
घूमने वाले ग्रहों को उनकी थामने के लिए जो शक्ति काम कर रही है वह सूर्य की
ही आकर्षण शक्ति है । इसी प्रकार ग्रह भी अपने उपग्रहों को खींच रहे हैं ।
दक्षिणोत्तरयोरेवं पातो राहु स्वरंहसा ।
विक्षिप्त्येष विक्षेपं चन्द्रादीनामपक्रमात् ॥६॥
उत्तराभिमुखं पातो विक्षिप्त्यपरार्द्धगः ।
ग्रहं प्राग्भगणार्द्धस्थो याम्यायामपकर्षति ॥७॥
अनुवाद—(६) चन्द्रमा आदि ग्रहों को इनके पात या राहु क्रान्तिवृत्त से विक्षेप
के समान उत्तर या दक्षिण भी अपने वेग से हटा देते हैं । (७) जब पात ग्रह से पच्छिम
परन्तु ६ राशि या १८०° से कम दूरी पर रहता है तब उसको क्रान्तिवृत्त से उत्तर
हटा देता है और जब वह ग्रह से पूरब परन्तु ६ राशि से कम दूरी पर रहता है तब
उसको क्रान्तिवृत्त से दक्षिण हटा देता है ।
विज्ञान भाष्य—इन दोनों श्लोकों का साधारण अर्थ यह है कि ग्रह और उसके
पात के स्थानों को देखकर समझना चाहिये कि ग्रह ठीक क्रान्तिवृत्त पर है अथवा
उससे कुछ उत्तर या दक्खिन हटा हुआ है । यदि ग्रह और पात दोनों एक ही जगह
हों तो समझना चाहिये. कि ग्रह क्रान्तिवृत्त पर है। यदि ग्रह पात से आगे अर्थात्
पूरब हो परन्तु १८०° से अधिक दूर न हो तो वह क्रान्तिवृत्त से उत्तर हटा हुआ होगा
और यदि ग्रह पात से पीछे अर्थात् पच्छिम हो परन्तु १८०° से अधिक दूर न हो तो
वह क्रान्तिवृत्त से दक्षिण हटा हुआ होगा । इसका कारण राहु का आकर्षण या
अपकर्षण नहीं है वरन् यह है कि किसी ग्रह की कक्षा क्रान्तिवृत्त के समतल में नहीं
है इसलिए ग्रह सदैव क्रान्तिवृत्त पर नहीं रहता । ग्रह की कक्षा और क्रान्तिवृत्त जिन
दो विन्दुओं पर मिलते हुए जान पड़ते हैं उन्हीं को पात कहते हैं । जब ग्रह अपनी कक्षा
इन दो विन्दुओं पर रहता है तब क्रान्तिवृत्त पर देख पड़ता है अन्यथा क्रान्तिवृत्त
स्पष्टाधिकार ६५
से उत्तर या दखिन ऊपर कहे हुए के अनुसार होता है। क्रान्तिवृत्त से उत्तर या
दखिन ग्रह की जो दूरी होती है उसी को विक्षेप कहते हैं। यह उस वृत्त पर होता है
जो क्रान्तिवृत्त से समकोण बनाता हुआ कदम्ब (क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव) से होकर जाता है।
बुधभार्गवयोः शीघ्रात्तद्गत्पातो यदास्थितः ।
तच्छीघ्राकर्षणात्तौ तु विक्षेप्येते यथोक्तवत् ॥८॥
अनुवाद—(८) बुध और शुक्र के पात जब इनके शीघ्रोच्चों से उपर्युक्त (६,
७ श्लोकों में लिखे हुए) नियम के अनुसार होते हैं तब शीघ्रोच्चों में आकर्षण करके
ग्रहों को क्रान्तिवृत्त से उत्तर या दखिन उसी प्रकार हटा देते हैं ।
विज्ञान भाष्य—६, ७ श्लोकों में जो नियम बतलाया गया है वह केवल
सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, गुरु और शनि के लिए लागू है । बुध और शुक्र दो ग्रहों के स्थान
जानने के लिए यह देखना चाहिये कि इनके शीघ्रोच्च पातों से किधर और कितनी
दूर है। यदि शीघ्रोच्च पात से पूरब परन्तु १८०° से कम दूर हो तो ग्रह क्रान्तिवृत्त से
उत्तर होगा और पच्छिम परन्तु १८०° से कम दूर हो तो ग्रह क्रान्तिवृत्त से दक्षिण
होगा।
महत्वान्मण्डलस्याऽर्कः स्वल्पमेवाऽपकृष्यते ।
मण्डलाल्पतया चन्द्रस्ततो बहुपकृष्यते ॥६॥
भौमादयोल्पमूर्तित्वाच्छीघ्रमन्दोच्चसंज्ञितैः ।
दैवतैरपकृष्यन्ते सुदूरमतिवेगिताः ॥१०॥
अतो धनर्णं सुमहत्तेषां गतिवशाद्भवेत् ।
आकृष्यमाणास्तैरैवं व्योम्नि यान्त्यनिलाहताः ॥११॥
अनुवाद—(६) सूर्य का मण्डल बहुत बड़ा है इसलिए वह अपने उच्च द्वारा
बहुत कम खिंचता है। चन्द्रमा का मण्डल छोटा है इसलिए यह बहुत खिंचता है।
(१०) मंगल आदि ग्रहों के मण्डल बहुत छोटे हैं इसलिए इनके शीघ्रोच्च मन्दोच्च
देवता इनको बहुत दूर तक बड़े वेग से खींच ले जाते हैं। (११) इसलिए इनमें धन
और ऋण संस्कार इनकी गति के कारण बहुत करना पड़ता है। इस प्रकार यह ग्रह
अपने शीघ्रोच्च मन्दोच्च देवताओं से खिंचे हुए और प्रवह वायु का धक्का खाते हुए
आकाश में चलते हैं।
विज्ञान भाष्य — हमारे आचार्यों ने यह देखा कि सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा
अपने मध्यम स्थान से पूरब या पच्छिम अधिक रहता है और मंगल, बुध, गुरु, शुक्र,
शनि इत्यादि तो अपने मध्यम स्थान से कहीं अधिक पूरब या पच्छिम देख पड़ते
८६
सूर्य सिद्धान्त
{|l|l|l|l|l|l|l|}
\hline
ग्रहों के नाम & \multicolumn{3}{c|}{विषुवद्वृत्तीय X अर्द्धव्यास} & मात्रा (mass) जब कि पृथ्वी का १ माना जाय & मध्यम घनत्व जब पानी का १ माना जाय & गुरुत्वाकर्षण पृष्ठ पर जब कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण १ माना जाय
& कोणात्मक † & मीलों में & जब कि पृथ्वी का १ माना जाय & & &
\hline
सूर्य & १६' १".१९ & ४,३२,८६० & १०६.२ & ३,२६,३६० & १.४० & २७.६१
बुध & ३".३४ & १,५०४ & ०.३८० & ०.०५५? & ५.५६? & ०.३८
शुक्र & ८".४० & ३,७८३ & ०.६५५ & ०.८०७ & ५.१४ & ०.८६
पृथ्वी & ८".८० & ३,९६३ & १.००० & १.००० & ५.५६ & १.००
मंगल & ४".६८ & २,१०८ & ०.५३२ & ०.१०८ & ३.६२ & ०.३८
गुरु & १' ३७".३६ & ४३,८५० & ११.०६ & ३१४.५० & १.३७ & २.५७
शनि & १' २४".७५ & ३८,१७० & ६.६३ & ६४.०७ & ०.६४ & १.०१
वरुण* & ३४".२८ & १५,४४० & ३.६० & १४.४० & १.३५ & ०.६५
& & & & & &
इन्द्र * & ३६".५६ & १६,४७० & ४.१५ & १६.७२ & १.२८ & ०.६७
\hline
† कोणात्मक. अर्द्ध व्यास ग्रह के बिम्बार्ध का कोणात्मक मान है जब कि द्रष्टा ग्रह से उतनी दूरी पर हो जो सूर्य से पृथ्वी की मध्यम दूरी है ।
- यह नामकरण केतकरकी ज्योतिर्गणित के अनुसार है ।
? जिस संख्या के सामने यह चिन्ह है उसका ठीक ठीक निश्चय अभी तक नहीं हो सका है ।
X ग्रहों के आकार भी पूर्ण गोल नहीं हैं उनमें भी ध्रुवों पर कुछ चपटा है जैसी हमारी पृथ्वी है इसलिए उनमें भी विषुववृत्त होते हैं ।
स्पष्टाधिकार ६७
इसलिए उन्होंने इन ग्रहों के मण्डलों को चन्द्रमा से भी छोटा समझा जैसा कि यह
प्रत्यक्ष देख पड़ते हैं, और यह निश्चय किया कि इनके मण्डल बहुत छोटे हैं इसी-
लिए इनमें शीघ्रोच्चों और मन्दोच्चों के आकर्षण का प्रभाव बहुत पड़ता है ।
परन्तु ग्रहों के मध्यम स्थान से कुछ पूरब या पच्छिम देख पड़ने के यथार्थ
कारण हैं ग्रहों की कक्षाओं के आकार । ग्रहों की कक्षाएँ दीर्घवृत्त के आकार की हैं
जिनकी च्युति (eccentricity) के परिमाण एक से नहीं हैं; इसीलिए मध्यम और
स्पष्ट स्थानों में मुख्यतः अन्तर पड़ता है, ग्रहों के मण्डलों के आकार के कारण नहीं ।
इनके आकारों का ज्ञान पिछले पृष्ठ की सारिणी से स्पष्ट होगा जो राबर्ट बाल की
'स्फेरिकल एस्ट्रानोमी' पृष्ठ ४६२ से ली गयी है । चन्द्रमा का अर्द्धव्यास १०७६
मील है ।
वक्रानुवक्रा कुटिला मन्दा मन्दतरा समा ।
तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टधा गति : ॥१२॥
तत्रातिशीघ्रा शीघ्राख्या मन्दा मन्दतरा समा ।
ऋज्वीति पञ्चधाज्ञेया या वक्रा सानुवक्रगा ॥१३॥
अनुवाद—(१२) वक्र, अनुवक्र, कुटिल, मन्द मन्दर, सम, शीघ्रतर और शीघ्र
नामक आठ प्रकार की गतियां ग्रहों में होती हैं । (१३) इनमें से अति शीघ्र शीघ्र,
मन्द, मन्दतर और सम गतियां सीधी होती हैं अर्थात् जब ग्रह में यह गतियां
होती हैं तब वह राशि-चक्र में पच्छिम से पूरब को जाता हुआ देख पड़ता है और वक्र
के साथ जो अनुवक्र और कुटिल गतियां हैं वह वक्र गति कहलाती हैं क्योकि जब ग्रह
में ऐसी गतियां होती हैं तब वह राशि-चक्र में पूरब से पच्छिम को उलटा जाता हुआ
देख पड़ता है । जब ग्रह में सीधी गतियां होती हैं तब वह मार्गी और जब वक्र गतियाँ
होती हैं तब वक्री कहलाता है ।
विज्ञान भाष्य—यह भिन्न-भिन्न गतियां ग्रह में कैसे हो जाती हैं इसका
कारण हमारे सिद्धान्तों में कहीं नहीं बतलाया गया है, क्योंकि जब तक पृथ्वी अचल
समझी जायगी तब तक इसका कारण अच्छी तरह नहीं समझाया जा सकता । हाँ यदि
पृथ्वी को भी अन्य ग्रहों की भाँति सूर्य की परिक्रमा करती हुई मान लिया जाय जो
कई प्रयोगों से सिद्ध भी हो गया है तो यह सहज ही समझा जा सकता है कि किसी
ग्रहों में यह आठ गतियां कैसे देख पड़ती हैं; यद्यपि यथार्थ में ग्रह निरंतर पच्छिम से
पूरब को जाता हुआ सूर्य की परिक्रमा कर रहा है । इस सम्बन्ध में मैंने 'विज्ञान'
भाग १३ पृष्ठ २६४-२६६ पर जो लिखा था वही यहाँ उद्धृत करता हूँ ।
७
६८ सूर्य सिद्धान्त
यदि आप मैदान में एक झंडा गाड़ दें और झंडे से ४,७,१०,१५,५२,९५,
१९२, और ३०० फर्लांग के अन्तर पर एक एक घेरा दो तीन फुट ऊँचा करवा दें;
प्रत्येक घेरे के पास एक एक घुड़सवार नियुक्त कर दें; आप स्वयं झंडे के पास खड़े हो
जायें और घुड़सवारों को आज्ञा दे दें कि प्रत्येक घुड़सवार अपने अपने घेरे के पास इस
तरह खड़ा हो जाय कि सब एक ही सीध में दिखाई पड़ें और तदनन्तर सब सवार एक
साथ ही घेरे का इस वेग से चक्कर लगाने लगें कि सबसे पास वाला एक चक्कर ८८
सेकंड में, इससे कुछ दूरवाला २२५ सेकंड में, तीसरा ३६५ सेकंड मे, चौथा ६८७
सेकंड में, पांचवां ४३३२ सेकंड में, छठा १०७५६ सेकंड में, सातवां ५१० मिनट में
और आठवां १००३ मिनट में, चक्कर पूरा करने लगे, तो जिस प्रकार यह घुड़सवार
सेकंडों में आपकी परिक्रमा करते हुए जान पड़ेंगे वैसे ही सौर-मंडल में ग्रह दिनों में
सूर्य की परिक्रमा करते हुये दिखाई पड़ते हैं। अंतर केवल इतना होगा कि सवार एक
धरातल में चक्कर लगावेंगे पर ग्रह कुछ उत्तर दखिन हट भी जाते हैं।
यदि आप झंडे के पास न खड़े होकर स्वयं झंडे से तीसरे घोड़े पर सवार
होकर पहले कहे हुये वेग से चक्कर लगाने लगें तो आपको झंडे और घुड़सवार जैसे
दिखाई पड़ेंगे वही दृश्य हम पृथ्वी निवासियों को ग्रहों के सूर्य का चक्कर लगाने में
दिखाई पड़ता है। कभी यह जान पड़ता है कि ग्रह आगे बढ़ते जा रहे हैं और कभी
जान पड़ता है कि कोई पीछे हो रहे हैं और कभी ठहरे हुये भी दिखाई पड़ते हैं।
ऊपर सवारों के उदाहरण से आपको विदित हो गया होगा कि यदि सवार
तीसरे घोड़े पर बैठ कर झंडे की परिक्रमा करे तो बाहर और भीतर दोनों ओर वाले
घोड़ों की गतियों में वही 'वक्रानुवक्रा कुटिला' तथा 'शीघ्रा शीघ्रतरा' गतियों की
विलक्षणता दिखाई देती है, जैसे पृथिवी रूपी घोड़े पर सवार पृथिवी निवासियों को
अन्य ग्रहों की गतियों में विलक्षणता दिखाई देती है। समझाने के लिये हमको दो
उदाहरण लेने होंगे—एक ऐसे ग्रह का जो पृथ्वी और सूर्य के बीच में है और दूसरा
ऐसे ग्रह का जो सूर्य और पृथ्वी के बाहर है। पहले के लिये बुध और दूसरे के लिये
मंगल २१ तथा २३ चित्रों में लिये गये हैं।
चित्र २१ में सबसे बड़ा वृत्त राशि-चक्र है, जिस पर घूमता हुआ सूर्य एक
वर्ष में एक चक्कर लगाता हुआ जान पड़ता है। जहाँ वसंत-विषुव लिखा हुआ है वहाँ
जब सूर्य दिखलाई पड़ता है तब वसंत ऋतु का आरम्भ होता है और इस दिन
दिन रात समान होते हैं। यहीं से आरम्भ करके राशिचक्र बारह भागों में बांटा
गया है। इसलिये जिस-जिस भाग पर मेष वृष इत्यादि लिखा हुआ है उसे सायन
मेष, सायन वृष समझना चाहिये । सायन मेष का आरम्भ २१, २२ मार्च को होता
स्पष्टाधिकार ६६
बसन्त विषुव
[Diagram]
चित्र २१—बुधकी मार्गी और वक्री तथा अन्य गतियां
है। सायन मेष से २३ और आगे निरयन मेष मास का आरम्भ होता है, यह १३,
१४ अप्रैल को पड़ता है। सूर्य राशि चक्र में मेष से वृष, वृष से मिथुन इत्यादि
राशियों में जाता हुआ जान पड़ता है।
राशि चक्र मे छोटा वृत्त भूकक्षा है। इसी पर पृथ्वी चलती हुई 'स' सूर्य की,
जो केन्द्र में है, एक वर्ष में एक परिक्रमा कर लेती है। सूर्य निवासियों को पृथ्वी भी
मेष से वृष, वृष से मिथुन, मिथुन से कर्क, कर्क से सिंह इत्यादि राशियों में भ्रमण
करती दिखाई देती है। इसी के भ्रमण से हम लोगों को सूर्य भ्रमण करता हुआ जान
पड़ता है। चित्र २१ में इसका भ्रमण प से आरम्भ होता हुआ दिखाया गया है और
१०० सूर्य-सिद्धान्त
२, ३, ४, इत्यादि बिन्दुओं पर घड़ी की सुइयां जिस दिशा में चलती हैं उसके
प्रतिकूल दिशा में पृथ्वी जाती है। चलने की दिशा तीर की दिशा से जानी जा
सकती है। पृथ्वी की दैनिक गति विषम होने से भूकक्षा के विन्दु असमान अंतर पर
दिखाये गये हैं।
सबसे छोटा वृत्त बुध ग्रह की कक्षा है। मान लीजिये कि बुध ब₁ से चलना
आरंभ करता है और अपनी कक्षा में २, ३, ४ इत्यादि बिन्दुओं पर घड़ी की प्रतिकूल
दिशा में तथा सूर्य निवासियों को मेष, वृष, मिथुन इत्यादि राशियों में जाता हुआ
दिखाई देता है। चित्र में ब₁ वहाँ लिखा है जहाँ बुध उस समय है जब कि पृथ्वी प₁
पर है। जब बुध बिन्दु २ पर जाता है तब पृथ्वी अपनी कक्षा में विन्दु २ पर जाती
है। जब बुध अपनी कक्षा में विन्दु २ से विन्दु ३ पर जाता है तब पृथ्वी अपनी कक्षा
में विन्दु २ में विन्दु ३ पर जाती है। इसी तरह और विन्दुओं के लिये भी समझना
चाहिये, जैसे जब बुध अपनी कक्षा में विन्दु ७ पर होता है तब पृथ्वी अपनी कक्षा
में विन्दु ७ पर रहती है, इत्यादि। यदि यह देखना हो कि पृथ्वी से बुध किस दिशा
में राशि चक्र पर दिखाई देगा तो बुध और पृथ्वी उस समय जहाँ हों, उन विन्दुओं
को मिलाकर राशि-चक्र तक ले जाइये। जहाँ यह रेखा पहुँचेगी वहीं बुध का स्थान
होगा। चित्र की सरलता के लिये पृथ्वी और बुध को मिलानेवाली रेखाएँ नहीं
दिखाई गई हैं परंतु बुध से राशि चक्र तक यह कटी रेखाओं से प्रकट की गयी हैं।
जैसे जब पृथ्वी प₁ और बुध ब₁ विन्दुओं पर होते हैं तब प₂, ब₁ का मिलाने वाली
रेखा राशि चक्र में १ विन्दु कर पहुँचती है अर्थात् पृथ्वी निवासियों को बुध राशि-
चक्र के विंदु १ पर अथवा कुंभ राशि के अन्त में दिखाई पड़ेगा। जब पृथ्वी प₂
पर पहुँचती है तब बुध ब₂ पर पहुँचता है और राशिचक्र में विन्दु २ पर अथवा
मीन राशि में दिखाई देता है और प₃ (अर्थात् जब पृथ्वी अपनी कक्षा में विन्दु ३
पर होती है) से बुध ब₃ पर होने के कारण राशिचक्र में विन्दु ३ पर मीन के अन्त में
दिखाई देगा। जब बुध अपनी कक्षा में ४ पर होगा तब पृथ्वी भी अपनी कक्षा में ४
पर होगी और पृथ्वी निवासियों को बुध राशि-चक्र में विन्दु ४ पर अर्थात् ३ से कुछ
ही आगे दिखाई पड़ेगा। जब बुध अपनी कक्षा में १ से २ तक आया तब पृथ्वी भी
१ से २ पर अपनी कक्षा में आयी और हम लोगों को बुध राशि चक्र में कुंभ से
मीन में जाता हुआ दिखाई पड़ा। जब बुध २ से ३ पर अपनी कक्षा में गया
तब पृथ्वी भी २ से ३ पर अपनी कक्षा में गयी और यहाँ के निवासियों को बुध
राशि चक्र में २ से ३ तक मीन राशि में आगे जाता हुआ दीख पड़ा। इस बार बुध
राशि चक्र मे उतना आगे नहीं बढ़ा जितना पहले बढ़ा था अर्थात् बुध की चाल
स्पष्टाधिकार १०१
पहले से मन्द पड़ गयी । ३ से ४ तक पहुँचने में बुध राशि-चक्र बहुत ही कम आगे
बढ़ा, इसलिये यदि यह कहा जाय कि बुध की चाल नहीं के समान है तो कोई अत्युक्ति
नहीं होगी । ऐसी दशा में बुध कुछ ठहरा हुआ जान पड़ता है । जब बुध अपनी कक्षा
में ४ से ५ पर जायगा, पृथ्वी भी अपनी कक्षा में ४ से ५ पर आयगी और पृथ्वी
निवासियों की बुध राशि-चक्र में उलटा ४ से ५ तक जाता हुआ दिखाई पड़ेगा अर्थात्
बुध वक्री हो गया, ऐसा जान पड़ेगा । जब बुध ५ से ६ पर अपनी कक्षा में जायगा
तब पृथ्वी भी अपनी कक्षा में ५ से ६ पर जायगी और हम लोगों को बुध राशि
चक्र में ५ से ६ तक उलटा मीन से कुम्भ राशि में जाता हुआ दिखाई पड़ेगा, परंतु
चाल बहुत तीव्र हो जायगी। यहाँ भी बुध वक्री कहा जायगा, यद्यपि वह अपनी
कक्षा में उसी क्रम से जा रहा है । जब बुध ६ से ७ तक जाता है, राशि चक्र में
६ से ७ तक उलटा जाता हुआ दिखाई पड़ता है । परन्तु अपनी कक्षा में ८ से ६
तक जाते-जाते यह राशि चक्र में ८ से ६ तक सीधा आता दिखाई देगा अर्थात् बुध
की चाल मार्गी हो जायगी, परन्तु रहेगी बहुत मन्द । अब यह स्पष्ट हो गया होगा
कि यद्यपि सूर्य के विचार से बुध और पृथ्वी दोनों एक ही दिशा में जाते हुए दिखाई
पड़ते हैं तथापि पृथ्वी निवासियों को बुध राशि चक्र में एक से ४ तक आगे बढ़ता
हुआ जान पड़ता है और ४ से ७ तक पीछे हटता हुआ जान पड़ता है। जब आगे बढ़ता
है तब मार्गी कहलाता है और पीछे हटता है तब वक्री हो जाता है । जब मार्गी रहता
है तब भी इसकी चाल एक सी नहीं दीखती वरन् कभी बहुत शीघ्र बढ़ती हुई जान
पड़ती है, कभी मन्द पड़ जाती है और कभी ठहरी सी जान पड़ती है। और जब
वक्री होता है तब भी चाल द्रुत, द्रुततर, मंद, मंदतर तथा स्थिर सी जान पड़ती है ।
यहाँ एक बात और जानने योग्य है। जब पृथ्वी प¹ पर होती है और बुध
ब¹ पर तब सूर्य और पृथ्वी को मिलाने वाली रेखा मकर के अन्त पर पहुँचती है
अर्थात् सूर्य मकर में दिखाई देता है, परन्तु बुध कुम्भ के अन्त में। इसलिए बुध सूर्य
के पूरब रहता है और सूर्यास्त के बाद पच्छिम में दिखाई देता है । प² से सूर्य कुम्भ
राशि के आदि में दिखाई पड़ता है और बुध मीन के आदि में, प³ से सूर्य कुम्भ में
कुछ और आगे बढ़ा हुआ जान पड़ता है, परन्तु बुध मीन के अन्त तक पहुँचा हुआ
दिखाई पड़ता है और इसी के पास सूर्य और बुध का अन्तर सबसे अधिक होता है ।
ऐसी दशा में यदि पृथ्वी और बुध को मिलाने वाली रेखा बढ़ायी जाय तो वह बुध
की कक्षा को स्पर्श करती हुई जायगी, और पृथ्वी और सूर्य को मिलाने वाली रेखा
से जो कोण बनायेगी वह सबसे बड़ा होगा । इसी को सूर्य और बुध का महत्तम
अन्तर (Greatest elongation) कहते हैं और यह अन्तर सूर्य के पूर्व की ओर होता
है । महत्तम अन्तर के कुछ दिन पीछे ही बुध की गति वक्री हो जाती है और अन्तर
१०२ सूर्य-सिद्धान्त
घटने लगता है और घटते-घटते बुध पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है अर्थात्
अन्तर शून्य हो जाता है। ऐसी दशा में बुध सूर्य के साथ उदय और अस्त होता है।
इसी को बुध की भीतरी युति (Inferior conjunction) कहते हैं। जब सूर्य से बुध
का अन्तर १२° के लगभग हो जाता है तब सूर्य के निकट होने से उसके प्रकाश के
कारण कोरी आंख से बुध नहीं दिखाई पड़ता। इसलिए कहा जाता है कि बुध का
अस्त पच्छिम में हो जाता है क्योंकि बुध पच्छिम में ही दीखते-दीखते छिप जाता है।
भीतरी युति के समय से कुछ पहिले वक्री होने पर बुध दाहिने हाथ की ओर जाता है
और सूर्य बायें हाथ की ओर, इसलिये सूर्य से बुध बहुत ही शीघ्र हटता है अर्थात्
पच्छिम में अस्त होने के बाद थोड़े ही दिनों में वह सूर्य से पच्छिम चला आता है
और सूर्योदय के पहले ही उदय होकर पूर्व में दिखाई देने लगता है, तब कहते हैं कि
बुध का पूर्व में उदय हो गया। जब बुध १२° सूर्य से पच्छिम हो जाता है तब फिर
दिखाई पड़ने लगता है। तभी उसका उदय मानते हैं, गति भी वक्री से कुछ ही दिनों
में मार्गी होने लगती है।
इस प्रकार मार्गी होने के पीछे बुध क्रमशः सूर्य से दूर होता जाता है और
जब वह अपनी कक्षा में बिन्दु ७ और ८ के बीच में जाता है तब भी सूर्य से इसका
अन्तर महत्तम हो जाता है। फिर बुध सूर्य के पास होता जाता है और डेढ़ महीने
में सूर्य के इतना पास हो जाता है कि आंख से दिखाई नहीं पड़ता। सूर्य-सिद्धान्त के
अनुसार जब अन्तर १४° का रह जाता है तब अस्त होना मानते हैं। जब बुध और
सूर्य का अन्तर शून्य हो जाता है तब दोनों एकसाथ क्षितिज के ऊपर आते हैं।
ऐसी दशा में बुध और सूर्य की बाहरी युति (Superior conjunction) होती है।
बाहरी युति के समय बुध मार्गी रहता है।
बाहरी युति के समय बुध और सूर्य दोनों बायीं ओर को जाते हुए दिखाई
पड़ते हैं, इसलिये बुध को सूर्य से दूर होने में अधिक दिन लगते हैं अर्थात् जब बुध
पूर्व में अस्त होता है तब पच्छिम के अस्त काल से अधिक काल तक अस्त रहता है
और पच्छिम में देर में उदय होता है।
यह लिखा गया है कि पच्छिम में बुध तब अस्त होता है जब सूर्य और बुध
का अन्तर १२° से कम हो जाता है और पूर्व में अस्त तब होता है जब दोनों का
अन्तर १४° से कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि भीतरी युति के समय बुध
पृथ्वी से बहुत पास रहता है इसलिये उसका बिम्ब बड़ा दिखाई पड़ता है और जब
तक सूर्य से १२° की दूरी तक नहीं हो जाता तब तक दिखाई पड़ता है। परन्तु
बाहरी युति के समय बुध सूर्य से भी दूर हो जाता है इसलिये उसका बिम्ब छोटा
स्पष्टाधिकार १०३
दिखाई पड़ता है और जब उसकी दूरी १४° रहती है तभी छिप जाता है । शुक्र भी
भीतरी युति के समय सबसे बड़ा दीखता है और बाहरी युति के समय सबसे छोटा ।
इससे सिद्ध हो गया होगा कि ग्रह अस्त होने के पीछे कहीं चले नहीं जाते वरन्
सूर्य के इतने पास हो जाते हैं कि आंख से दिखाई नहीं पड़ते । हाँ दूरबीन से यह
सूर्य के चाहे जितने पास हों दिखाई पड़ सकते हैं।
बुध और शुक्र दोनों ग्रहों की कक्षाएँ पृथ्वी की कक्षा के भीतर हैं इसलिए
जो बात बुध के लिए कही गयी है वह शुक्र के लिए भी लागू है । अन्तर केवल इतना
है कि शुक्र की कक्षा बुध की कक्षा से बड़ी है इसलिए भीतरी युति के समय शुक्र
पृथ्वी से अत्यन्त निकट हो जाता है। दूरबीन से देखने पर बुध और शुक्र दोनों में
उसी प्रकार कलायें दिखाई पड़ती हैं जैसी चन्द्रमा में बाहरी युति के समय दोनों ग्रह
पूर्ण गोल दीखते हैं, क्योंकि उस समय पूरा प्रकाशित बिम्ब हमारे सामने रहता है।
जब ग्रह कुछ बगल में हो जाता है तब पूरा प्रकाशित भाग हम लोगों को नहीं दीखता,
दिन-दिन बिम्ब कुछ खंडित होता जाता है। परन्तु प्रकाश अधिक मिलता है, क्योकि
दूरी कम होती जाती है इसलिए खंडित ग्रह भी पास होने के कारण अधिक प्रकाश
देता है। भीतरी युति के समय ग्रह का प्रकाशित भाग सूर्य की ओर होता है इसलिए
हमको ग्रह से ज़रा भी प्रकाश नहीं मिलता और वह एक काले धब्बे की तरह दूरबीन
में दिखाई पड़ता है । शुक्र की कलायें चित्र २२ में दिखाई गई हैं।
चित्र २३ में राशि-चक्र का केवल वह भाग दिखाया गया है जहाँ मंगल वक्री
और फिर मार्गी होता हुआ जान पड़ता है । स सूर्य केन्द्र में है । पृथ्वी अपनी कक्षा
में और मंगल अपनी कक्षा में सूर्य की परिक्रमा इस प्रकार करते हैं कि वह राशि
चक्र में मेष से वृष, वृष से मिथुन में जाते हुये (सूर्य से) दिखाई देते हैं । सूर्य में स्थित
मनुष्य को कोई ग्रह वक्री होते हुये नहीं दीख सकते; उसे सब ग्रह एक ही तरफ से
परिक्रमा करते हुये देख पड़ते हैं । हाँ पृथ्वी निवासियों को मंगल मार्गी, शीघ्रगामी,
मन्दगामी, स्थिर तथा वक्री, मन्द गामी, फिर मार्गी दिखाई पड़ता है । मंगल की
एक परिक्रमा ६८६ दिन में पूरी होती है इसलिए १०° की परिक्रमा वह ६८६ × १० / ३६०
दिन वा १६ दिन में कर लेता है और इतने समय में पृथ्वी १६° के लगभग चलती
है, क्योंकि पृथ्वी की एक परिक्रमा ३६५ दिन में पूरी होती है अर्थात् १ दिन में प्रायः
१° परिक्रमा होती है ।
मान लीजिये पृथ्वी अपनी कक्षा में विन्दु १ पर है और मंगल भी अपनी
कक्षा में विन्दु १ पर है तब पृथ्वी निवासियों को मंगल राशि चक्र में १ विन्दु पर
१०४ सूर्य-सिद्धान्त
चित्र २९—शुक्र की कलाएँ
चित्र २३'—मंगलकी भिन्न भिन्न गति
दिखाई देगा । जब पृथ्वी १६ दिन में अपनी कक्षा के विन्दु २ पर पहुँचती है, मंगल
भी १०° चलकर अपनी कक्षा में विन्दु २ पर पहुँचेगा और हम लोगों को दिखाई
पड़ेगा कि वह राशि चक्र में विन्दु २ पर है । जब पृथ्वी अगले १६ दिन में विन्दु ३
स्पष्टाधिकार १०५
पर पहुँचेगी, मंगल भी विन्दु ३ पर अपनी कक्षा में पहुँचेगा और दिखाई पड़ेगा कि
राशि चक्र में वह २ विन्दु के पास ही ज़रा सा आगे हटा है। यहाँ मंगल कुछ दिनों
तक स्थिर सा जान पड़ेगा, क्योंकि १६ दिन के भीतर राशि चक्र में २ से ३ तक
बहुत कम गया है। जब पृथ्वी और मंगल अपनी अपनी कक्षा में विन्दु ४ पर पहुँचेंगे
तब मंगल राशि चक्र में विन्दु ४ पर अर्थात् पीछे हटा हुआ दिखाई पड़ेगा। इसी
को कहते हैं कि मंगल वक्री है यद्यपि मंगल की चाल अपनी कक्षा में वैसी ही सीधी
है। ४ विन्दु पर पृथ्वी, मंगल और सूर्य के बीच में हो जाती है, अर्थात् पृथ्वी के
दाहिने सूर्य होता है और बायें मंगल। इस प्रकार सूर्य का अन्तर ६ राशि या १८००
का हो जाता है। इसी स्थिति को कहते हैं कि मंगल सूर्य से षडभान्तर पर (In
opposition) है। जब सूर्य अस्त होता है तभी मंगल पूर्व में उदय होता है और
जब सूर्य उदय होता है तभी मंगल पश्चिम में अस्त होता है। इस स्थिति में मंगल
पृथ्वी से अत्यन्त निकट होता है, इसलिए इसका बिम्ब बहुत बड़ा दिखाई पड़ता है
और दूरबीन से देखने पर उसी समय मंगल ग्रह की बहुत सी बातें दिखाई देती हैं।
जब पृथ्वी और मंगल अपनी-अपनी कक्षा में ५ विन्दु पर होते हैं तब हम
लोगों को मंगल राशि चक्र में ५ विन्दु पर और पीछे हटा हुआ देख पड़ता है। दोनों
ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में जब ६ विन्दु पर आते हैं तब मंगल राशि चक्र में कुछ
आगे खसका हुआ ६ विन्दु पर दिखाई देता है, यहाँ भी मंगल कुछ देर के लिए स्थिर
सा जान पड़ता है, फिर आगे बढ़ता हुआ दिखाई पड़ता है।
जब पृथ्वी और मंगल के बीच में सूर्य होता है अर्थात् जब पृथ्वी ४ पर
और मंगल 'म' पर होता है तब मंगल की दूरी पृथ्वी से अत्यन्त अधिक होती है।
ऐसी स्थिति को 'मंगल की सूर्य से युति होती है', ऐसा कहते हैं। इस दशा में मंगल
का बिम्ब बहुत छोटा दीखता है।
इन दोनों चित्रों से प्रकट है कि भूकक्षा के भीतरवाले ग्रह उस समय वक्री
होते दिखाई देते हैं जब भीतरी युति होने को होती है और भीतरी युति के समय वह
वक्री ही रहते हैं। परन्तु भू कक्षा के बाहर वाले ग्रह उस समय वक्री होते हैं जब वह
सूर्य से ६ राशि अथवा १८०° के लगभग दूरी पर होते हैं और जिस समय वह ठीक
आमने सामने (In opposition) होते हैं, उस समय वक्री ही रहते हैं। भीतरी ग्रह
(Inferior planets) प्रत्येक परिक्रमा की भीतरी और बाहरी दोनों युतियों
के समय अस्त रहते हैं अर्थात् सूर्य के पास रहने के कारण सूर्य के प्रचण्ड प्रकाश में
कोरी आंख से नहीं दिखाई देते हैं परन्तु बाहरी ग्रह (Superior planets) की एक
परिक्रमा में केवल एक युति होती है, तभी यह अस्त हुए कहे जाते हैं।
१०६ सूर्यसिद्धान्त
इस प्रकार यह प्रकट है कि पृथ्वी को चलती हुई मान लेने से ग्रहों की विलक्षण
गतियों का समझना बड़ा ही सहज है। यदि पृथ्वी अचला मानी जाय तो यह किसी
प्रकार नहीं समझाया जा सकता कि ग्रहों की वक्री गति क्यों होती है ।
तत्तद्गतिवशन्नित्यं यथा दृक्तुल्यतां ग्रहाः ।
प्रयान्ति तत्प्रवक्ष्यामि स्फुटीकरणमादरात् ॥१४॥
अनुवाद-(१४) इन इन गतियों के वश होकर ग्रह जिस प्रकार दृक्तुल्यता
को प्राप्त होते हैं अर्थात् वेध के स्थान में पहुँचकर प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं वही स्पष्ट
करने के (उसी को गणित से जानने के) नियम आदर के साथ कहता हूँ ।
विज्ञान भाष्य - यह श्लोक बड़े महत्व का है। इससे सिद्ध होता है कि हमारे
पुराने आचार्य ग्रहों के स्पष्ट स्थान इसीलिए निकालते थे जिससे गणित और प्रत्यक्ष
वेध में कोई अंतर न पड़े। इसके लिए स्पष्टाधिकार में सूक्ष्म से सूक्ष्म नियम बनाये
गये । परन्तु जैसा कि मध्यमाधिकार के ६वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में मैं बतला
चुका हूँ कि चाहे यंत्र स्थूल हों चाहे सूक्ष्म, इनसे बेध करने में कुछ न कुछ प्रयोगात्मक
अशुद्धि (Experimental error) रह ही जाती है इसलिए काल पाकर कुछ भेद
पड़ जाता है, जिससे समय-समय पर संशोधन करना पड़ता है। इसी को 'बीज'
संस्कार कहते हैं । उदाहरण के लिए मान लीजिये कि कोई घड़ी प्रति दिन एक सेकंड
मंद होती हो तो ६० दिन में वह १ मिनट और १ वर्ष में ६ मिनट पीछे हो जायगी ।
परन्तु व्यवहार में यही कहा जायगा कि घड़ी बहुत शुद्ध है; क्योंकि ६० दिन में १
मिनट का अंतर या प्रतिदिन एक सेकंड का अंतर नहीं के समान है। यदि यह अंतर
सदैव होता जाय और घड़ी में संशोधन न किया जाय तो कई वर्षों में इतना अंतर
पड़ जायगा कि उसको भी नहीं के समान समझना असम्भव होगा और संशोधन
करना ही पड़ेगा । जैसे घड़ी में प्रतिदिन १ सेकंड का अंतर कुछ काल में बड़ा भारी
रूप धारण कर सकता है उसी प्रकार सूर्य चन्द्रमा इत्यादि ग्रहों के भगणकालों में १
पल का भी अंतर सैकड़ों वर्षों में बहुत बड़ा हो जाता है। इसीलिए बीज संस्कार
करना पड़ता है । बीच-बीच में संशोधन करने की प्रथा हमारे प्राचीन आचार्यों को
मान्य थी, जिनके अवतरण मैं नीचे दूंगा; परन्तु कुछ दिनों से इस विषय पर मतभेद
हो गया है। एक पक्ष कहता है कि आर्ष ग्रन्थों पर किसी प्रकार की टीका टिप्पणी
करने का अथवा संशोधन करने का अधिकार नहीं है, उनमें जो कुछ है उसको वैसा
ही मानना चाहिये । दूसरा पक्ष कहता है कि संशोधन करना सर्वथा उचित है । नीचे
दोनों पक्षों के तर्क मुझे जहाँ तक मिले हैं दिये जाते हैं : -
स्पष्टाधिकार १०७
प्रयाग निवासी पंडित इन्द्रनारायण द्विवेदी ज्योतिष भूषण, इसी श्लोक के
अनुवाद के साथ साथ यह टिप्पणी देते हैं—
"यहाँ अनेक लोग "दृक्तुल्यतः" से दृश्य गणना का अर्थ लगाते हैं; किन्तु यह
उनका भ्रम है। पूर्वापर के देखने से स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि दृक्तुल्यतां का अर्थ
यहाँ जिस गणना का वर्णन करते हैं उसके अनुसार अदृश्य दृष्टि से अपने स्पष्ट किये
हुए स्थान पर दिखाई देना है अन्यथा इस गणना के अनुसार कभी भी दृश्य ग्रह सिद्ध
नहीं हो सकते थे क्योंकि जितने संस्कार दृश्य ग्रहों के लिए आज निकाले गये हैं ये
ही सदा होने चाहिये ये यह गोल विद्या के जानने वालों को ज्ञात ही है"१
इस अवतरण का भांवार्थ कदाचित यह है कि ग्रहों का स्पष्ट स्थान निकालने
के लिए जो नियम इस ग्रन्थ में बतलाये गये हैं उनके अनुसार ग्रहों का स्थान वही नहीं
निकलता जो प्रत्यक्ष वेध से देखा जाता है। इसलिए दृक्तुल्यता का अर्थ प्रत्यक्ष वेध
नहीं है वरन् वह अदृश्य वेध है जिसे ऋषियों ने अपने योगबल के द्वारा जाना था ।
इस पक्ष के ज्योतिषाचार्य पं० गिरिजाप्रसाद जी द्विवेदी जो आजकल लखनऊ
के नवल किशोर विद्यालय के प्रधानाध्यापक हैं अपने सिद्धान्त शिरोमणि गोलाध्याय
के 'प्रभा भाषा भाष्य' २ पृष्ठ ६, ७ में बहुत स्पष्ट शब्दों में यों लिखते हैं :—
"...दृष्टादृष्टभेदेन गणितस्य द्वैविध्यं तावच्चतुरस्रम् । तत्र 'अदृष्टफलसिद्धयर्थं
यथाकार्द्युक्तिः कुरु । गणितं यद्धि दृष्टार्थं तद्दृष्ट्युद्भवतः सदा' ।। तथा अदृष्टफल
सिद्धयर्थं निर्बीजार्कोक्तमेवहि ।' इति तत्वविवेकीय कमलाकरोक्त्या महर्षि दर्शित
पथानुसारिण एवं स्फुटाः खेटाः फलादेशायोपयुज्यन्ते नतु सांप्रतिकोपलब्ध संस्कार
संस्कृताः । निर्बीजार्कोक्तिमित्युक्त्या तन्निरासात् । फलविषयेऽनार्षगणिताङ्गीकारे बहुत्र
श्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठानसमयादिषु विप्लवः संजायते । तस्माद्धर्माभिमानिभिः सुधीभिः
सकलं परीक्ष्य निष्कण्टकः पन्था अनुसरणीयः । तत्तत्संस्कारोत्पन्नाः खेटास्तु केवलं ग्रह-
णोदयास्तादि दृष्टगणितएवोपयुज्यन्ते । दृष्टगणिताभिमानिनोऽदृष्टगणितोन्मूलनाय
बहुधा विवदन्ते । परमुभयो स्वीकारेणैव निर्बाहो नत्वन्यतरस्याङ्गीकारेणेत्यन्यत्र
विस्तरः ।
"दृष्ट और अदृष्ट के भेद से गणित दो प्रकार का है । दृष्ट जो आँखों से
देखा जाय, जैसे ग्रहण, उदयास्त, युति और श्रृङ्गोन्नति आदि । और अदृष्ट जो देखने
में न आवे, जैसे तिथियोग आदि । ग्रहण आदि के देखने से ही उसका फल होता है ।
और व्रत उपवास आदि का फल बिना देखे ही होता है। फल का आदेश केवल ऋषियों
१. प्रयाग के हिन्दी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित सूर्य सिद्धान्त पृष्ठ ३५ ।
२. लखनऊ से नवल किशोर प्रेस में १६११ ई० में प्रकाशित ।
१०८ सूर्य सिद्धान्त
के अनुभवसिद्ध वाक्यों से होता है । जो कुछ ग्रहों की स्थिति के अनुसार फल लिखा
उपलब्ध होगा, मनुष्य वही जान सकेगा । इस फल की कल्पना ऋषियों के सिवा कोई
नहीं कर और जान सकता ।
“आर्ष ग्रन्थों में जो ग्रह स्पष्ट बनाने की रीति है उसी रीति से स्पष्ट किये
ग्रह फलादेश में उपयुक्त हैं। क्योंकि उन्हीं स्पष्ट ग्रहों के आधार पर श्रौत और स्मार्त
कर्मों के समय 'बंटे हैं। इसलिए उसी गणित से जो तिथि आदि सिद्ध हों उन्हीं से
धर्म व्यवस्था और उसका आचरण करना उचित है ।
“सांप्रत में यूरोप के विद्वानों ने सूक्ष्म यन्त्र द्वारा बहुत से नवीन संस्कार
निश्चित किये हैं और उनका ग्रहों में उपयोग लाकर सूक्ष्म-स्पष्ट ग्रह सिद्ध करते हैं ।
इस स्पष्ट विधि को लेकर अंग्रेजी गणित विद्या विशारद आजकल कई एक पञ्चाङ्गों
में ग्रह स्पष्ट सिद्ध करके उनसे तिथि आदि का साधन करते हैं और उसी के अनुसार
धर्म व्यवस्था करते हैं। परन्तु यह सर्वथा अनुचित और धर्म में बाधा डालना है ।
क्योंकि आर्ष गणित के अनुसार जब एकादशी आदि का उपवास आदि सिद्ध होगा उस
काल में इस नवीन सूक्ष्म गणित से उसका सिद्ध होना असम्भव होगा। इस प्रकार
ऋषियों के वचन में बाधा डालने से धर्म का विप्लव होगा । ऋषियों के वाक्य उन्हीं
की रीति पर चलने से घट सकेंगे । इससे स्पष्ट है कि धर्म व्यवस्था के लिए ऋषिप्रोक्त
गणित का ही आश्रय उचित है ।
“नवीन वेधसिद्ध संस्कारों को ही प्राचीन ग्रन्थों में ‘बीज’ नाम से लिखा है ।
और वेध से प्राचीनों ने इसका साधन भी किया है । परन्तु इस बीज को ग्रहणादि
दृष्टगणित के ठीक समय ज्ञान के लिए उपयुक्त किया है। अदृष्ट गणित में, आजकल
की तरह नहीं घुसेड़ा । इसलिए आजकल के यूरोप के नये संस्कार केवल दृष्ट गणित
में उपयुक्त हैं। उसमें इसका उपयोग लेने से कोई बाधा नहीं है । क्योंकि इसकी
व्यवस्था ही इसी प्रकार से आचार्यों ने की है ।
जैसा —‘अदृष्ट फल सिद्ध्यर्थं निर्बीजाकेक्तिमेवहि ।
गणितं यद्धि दृष्टार्थं तद्दृष्ट्युद्भवतः सदा ॥’
अर्थात् अदृष्ट गणित के लिए केवल निर्बीज, सूर्योक्ति, सूर्य सिद्धान्त के गणित
का आश्रय करना चाहिये और दृष्ट गणित के लिए जिससे ठीक आकाश और गणित
का संवाद हो उसी से सदा गणित करना चाहिये ।
“इस प्रकार निष्पक्षपात और धर्मबुद्धि से यह सिद्ध होता है कि प्रत्येक
विचारशील पुरुषों को, दृष्ट और अदृष्ट गणित उक्त नियमों के अनुसार मानना
स्पष्टाधिकार १०६
चाहिये । केवल दृष्टमात्र को ही चार्वाकों की तरह सर्वत्र मानना महा अनुचित और
सत्य का अपलाप करना है ।"
इस लम्बे अवतरण में प्रमाण के लिए संस्कृत का जो श्लोक दिया हुआ है वह
आचार्य कमलाकर के सिद्धान्त-तत्वविवेक का है जो शक १५८० तथा विक्रमीय
१७१५ में लिखा गया था। इस ग्रन्थ में आचार्य कमलाकरजी ने सूर्य सिद्धान्त का
कहीं-कहीं अनुचित पक्ष किया है जिसका प्रमाण म० म० सुधाकर द्विवेदी के शब्दों
में यह है :-
"अत्र यावच्छक्यं सूर्य्यसिद्धान्तमत मण्डनं भास्कर मुनीश्वरादीनां खंडनं च कृतं
ग्रन्थ कृता । बहुत्र परदूषणाभिलाषेणान्यथैव भास्कर कृतोद्यान्तर कर्मादि खण्डनमस्य
गोले गणितेचाद्वितीय पण्डितस्यानेक कल्पनाकुशलस्य न शोभते ।"१
इस पक्ष में और भी कोई प्राचीन मत है या नहीं इसका मुझे ज्ञान नहीं ।
यदि कोई महानुभाव बतलाने की कृपा करेंगे तो मैं बड़ा अनुगृहीत हूँगा और धन्यवाद-
पूर्वक स्वीकार करूँगा। इस पर यह भी जानने की अभिलाषा है कि आचार्य
कमलाकरजी के इस नियमों को कि 'निर्बीजोक्त' ग्रह स्पष्ट ही धर्म के कामों में
व्यवहार करना चाहिये किसी ने स्वीकार भी किया है या नहीं क्योंकि इनके पहले से
ही सैकड़ों वर्षों से मकरंद सारिणी और ग्रहलाघव इत्यादि ज्योतिष के करण ग्रन्थ
ही पंचांगादि बनाने के लिए व्यवहार में आते हैं, जिनमें 'बीज संस्कार' किया गया
है। इसके कुछ प्रमाण नीचे दिये जाते हैं :-
(१) "ज्योतिष के करण ग्रन्थ कई हैं; परन्तु पठनपाठन में जितना ग्रहलाघव
का प्रचार है उतना औरों का नहीं। उसके आधार पर कई देशों में पञ्चाङ्ग बनते हैं
और उनके अनुसार सब लोग बेखटके श्रौत स्मार्त कर्म करते हैं। यह सौर पक्षीय
करण ग्रन्थ है। यद्यपि इसमें ग्रन्थकर्ता ने आर्य पक्ष और ब्रह्मपक्ष का भी किसी अंश
में आश्रयण किया है। इस समय ही नहीं बहुत प्राचीन काल से सौरपक्ष का ही
प्राधान्य चला आता है। आर्य ब्रह्मपक्ष का गणित तो आचार्य बराह मिहिर
(शक ४२७) के समय में ही गड़बड़ हो चुका था । कहीं-कहीं ब्रह्मपक्षीय पंचांग भी
प्रचलित हैं। जैसे जोधपुर का चंड नामक ज्योतिषी का चलाया 'चंडू' पंचांग परन्तु
अनार्षमूलक होने से मान्य नहीं है ।"२
१. गणक तरंगिणी पृष्ठ ६८
२. उल्लिखित पं० गिरिजाप्रसाद द्विवेदी द्वारा १६८० वि० के कार्तिक की
'माधुरी' पृष्ठ ५०५ में लिखा गया ।
११० सूर्य-सिद्धान्त
मकरंद सारिणी में बीज संस्कार के विषय में यह अवतरण प्रमाण है ।
(२) “…कलिगतस्य सहस्रांशों १००० शादि ४ । ४२ । ४६ शनि बीज
धनं ॥ एतद्यंशे १ । ३५ । १५ सहितं जातं बुधोच्च धनं ६ । १७ । १ शनिबीज
व्यंशेन रहितं जातं ३ । ८ । ३१ ऋणंगुरोः शनिबीजं शुक्रोच्च ऋणं ४। ४२ । ४६ बीज
संस्कृतं बुधोच्चं …”१
प्रसिद्ध ज्योतिषी शंकर बालकृष्ण दीक्षित अपने मराठी भारतीय ज्योतिः
शास्त्र पृष्ठ १८४ तथा २५७ में लिखते हैं :-
(३) “मकरंदग्रंथां। सूर्यसिद्धान्तोक्त ग्रहादिकांस बीज संस्कार आहे”...;
“मकरंदकारानें सूर्यसिद्धांतास बीजसंस्कारदिलाआहे, त्या विषयीं पूर्वी लिहिलेंच आहे”
इन अवतरणों से सिद्ध है कि सैकड़ों वर्षों से मकरंदसारिणी अथवा ग्रहलाघव
के अनुसार जितने पंचांग बनते हैं सबमें बीज संस्कार के अनुसार संशोधन रहता है ।
इसलिए कमलाकर जी की उक्ति व्यवहार में कभी नहीं मानी गयी, ऐसा मेरा
विचार है ।
कमलाकर जी ने आचार्य वशिष्ठ के इस श्लोक को "इत्थं माण्डव्य संक्षेपा-
दुक्तं शास्त्रमयोदितं । विस्रस्ती रविचन्द्राद्यैर्भविष्यति युगे युगे” के ‘विस्रस्ती’ पद को
‘विस्तृती’ कहकर श्लोक का अर्थ कुछ और कर दिया है परन्तु यह सर्वथा अवैज्ञानिक,
भ्रमजनक तथा प्राचीन वैज्ञानिक पद्धति के विरुद्ध है और केवल अपने पक्ष को पुष्ट
करने के लिए लिखा गया है ।
अब मैं दूसरे पक्ष के समर्थन में जो कुछ प्रायः डेढ़ हजार वर्षों से कहा गया
है वह लिख रहा हूँ, जिससे सिद्ध होगा कि हमारे प्राचीन ज्योतिषी ज्योतिष के आर्ष
ग्रन्थों को किस दृष्टि से देखते रहे हैं और इनको समय-समय पर संशोधन करने के
पक्ष में कौन-कौन सी युक्तियाँ लिख गये हैं ।
जिस समय सूर्यांश पुरुष मयासुर को सूर्य-सिद्धान्त का उपदेश देने लगे उस
समय कहा था,
‘शास्त्रमाद्यं तदेवेदं यत्पूर्वं प्राह भास्करः ।
युगानां परिवर्तैन कालभेदोत्र केवलं ॥”
यह मध्यमाधिकार का ६वां श्लोक है; जिसकी व्याख्या की जा चुकी है ।
फिर जब ऋषियों ने मयासुर से ज्योतिष का उपदेश ग्रहण किया था तब
पहले मयासुर ने जो कुछ सूर्यांश पुरुष से सीखा था वह सब कह कर अन्त में बीजोप-
नयनाध्याय का उपदेश २१ श्लोकों में दिया जिसका कारण यह बतलाया था,
१. मकरंद सारिणी पृष्ठ ३६, बंबई की छपी ।