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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

स्पष्टाधिकार १०५
पर पहुँचेगी, मंगल भी विन्दु ३ पर अपनी कक्षा में पहुँचेगा और दिखाई पड़ेगा कि
राशि चक्र में वह २ विन्दु के पास ही ज़रा सा आगे हटा है। यहाँ मंगल कुछ दिनों
तक स्थिर सा जान पड़ेगा, क्योंकि १६ दिन के भीतर राशि चक्र में २ से ३ तक
बहुत कम गया है। जब पृथ्वी और मंगल अपनी अपनी कक्षा में विन्दु ४ पर पहुँचेंगे
तब मंगल राशि चक्र में विन्दु ४ पर अर्थात् पीछे हटा हुआ दिखाई पड़ेगा। इसी
को कहते हैं कि मंगल वक्री है यद्यपि मंगल की चाल अपनी कक्षा में वैसी ही सीधी
है। ४ विन्दु पर पृथ्वी, मंगल और सूर्य के बीच में हो जाती है, अर्थात् पृथ्वी के
दाहिने सूर्य होता है और बायें मंगल। इस प्रकार सूर्य का अन्तर ६ राशि या १८००
का हो जाता है। इसी स्थिति को कहते हैं कि मंगल सूर्य से षडभान्तर पर (In
opposition) है। जब सूर्य अस्त होता है तभी मंगल पूर्व में उदय होता है और
जब सूर्य उदय होता है तभी मंगल पश्चिम में अस्त होता है। इस स्थिति में मंगल
पृथ्वी से अत्यन्त निकट होता है, इसलिए इसका बिम्ब बहुत बड़ा दिखाई पड़ता है
और दूरबीन से देखने पर उसी समय मंगल ग्रह की बहुत सी बातें दिखाई देती हैं।
जब पृथ्वी और मंगल अपनी-अपनी कक्षा में ५ विन्दु पर होते हैं तब हम
लोगों को मंगल राशि चक्र में ५ विन्दु पर और पीछे हटा हुआ देख पड़ता है। दोनों
ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में जब ६ विन्दु पर आते हैं तब मंगल राशि चक्र में कुछ
आगे खसका हुआ ६ विन्दु पर दिखाई देता है, यहाँ भी मंगल कुछ देर के लिए स्थिर
सा जान पड़ता है, फिर आगे बढ़ता हुआ दिखाई पड़ता है।
जब पृथ्वी और मंगल के बीच में सूर्य होता है अर्थात् जब पृथ्वी ४ पर
और मंगल 'म' पर होता है तब मंगल की दूरी पृथ्वी से अत्यन्त अधिक होती है।
ऐसी स्थिति को 'मंगल की सूर्य से युति होती है', ऐसा कहते हैं। इस दशा में मंगल
का बिम्ब बहुत छोटा दीखता है।
इन दोनों चित्रों से प्रकट है कि भूकक्षा के भीतरवाले ग्रह उस समय वक्री
होते दिखाई देते हैं जब भीतरी युति होने को होती है और भीतरी युति के समय वह
वक्री ही रहते हैं। परन्तु भू कक्षा के बाहर वाले ग्रह उस समय वक्री होते हैं जब वह
सूर्य से ६ राशि अथवा १८०° के लगभग दूरी पर होते हैं और जिस समय वह ठीक
आमने सामने (In opposition) होते हैं, उस समय वक्री ही रहते हैं। भीतरी ग्रह
(Inferior planets) प्रत्येक परिक्रमा की भीतरी और बाहरी दोनों युतियों
के समय अस्त रहते हैं अर्थात् सूर्य के पास रहने के कारण सूर्य के प्रचण्ड प्रकाश में
कोरी आंख से नहीं दिखाई देते हैं परन्तु बाहरी ग्रह (Superior planets) की एक
परिक्रमा में केवल एक युति होती है, तभी यह अस्त हुए कहे जाते हैं।