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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३६४ सूरसागर सार सटीक

मुरली स्याम बजावन दै री । १०० मोहिं कहतिं जुवती सब चोर । ७८
मेघनि जाए कही पुकारि । १०८ मोहिं छुवो जनि दूर रहो जू । १६३
(मेरे) कमल नैन प्राननि तैं प्यारे । २१३ यह ऋतु रूसिवे की नाहीँ । २०४
मेरे कहे मैं कोऊ नाहिं । १३३ यह कमरी कमरी करि जानति । १०१
मेरे कुँवर कान्ह बिनु सब कुछ, २३६ यह कहि के तिय धाम गई । १८६
मेरे दधि को हरि स्वाद न पायौ । १२८ यह गोकुल गोपाल उपासी । ३१२
मेरे दुख की ओर नही । ८८ यह जानति तुम नंद-महर-सुत । १२७
(मेरे) नैना बिरह की वेलि बई । २४४ यह बल केतिक जादौराइ । १७३
मेरे मन इतनी सूल रही । २५६ यह महिमा येई पे जानै । १३०
(मेरे) मोहन तुमहिं बिना नहिं जैहौँ । २२७ यह वृषभानु-सुता वह को है । १८०
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै । २८ यह सुनि के हँसि मान रही री । १७२
मेरो कह्यो सत्य करि जानो । १०५ यह सुनिके हलधर तहँ धाए । ७६
मैं अपनी सी बहुत करी री । १८५ ये दिन रूसिवे के नाहीँ । २४६
मैं अपने जिय गर्व कियौ । १८४ ये नैन मेरे ढीठ भए री । १४४
मैं अपनौ मन हरत न जान्यौ । १६८ रघुकुल प्रगटे हैं रघुवीर । ३६४
मैं दुहिहौँ मोहिं दुहन सिखावहु । ८० रहिरी मानिनी मान न कीजै । २०२
मैं परदेसिन नारि अकेली । ३६८ रही जहां सो तहां सब ठाढी । २१५
मैं ब्रजवासिन की बलिहारी । ३१८ रहु रे मधुकर मधु मतवारे । २७८
मैं वलि जाउँ कन्हैया की । १७८ राखि लेहु अब नंदकिसोर । १०७
मैं बलि जाउँ स्याम मुख छवि पर । १३७ राखो पति गिरिवर गिरिधारी । ३०
मैं बरज्यौ जमुना तट जात । ८६ राधा अतिहिं चतुर प्रवीन । १७८
मैं समुझाई अति अपनौ सो । ३३१ राधा चलहु भवनहिं जाहिँ । १६३
मैं हरि सौं हो मान कियौ री । १८६ राधा जल विहरति सखियनि सँग । १६१
मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी ? ५८ राधा डर डराति घर आई । १८०
मैया बहुत बुरो बलदाऊ । ८४ राधा तैं हरि कें रंग राँची । १७०
मैया मैं नहिं माखन खायो । ७३ राधा नँद-नदन अनुरागी । १७१
मैया मोहिं दाउ बहुत खिझायौ । ६१ राधा नैन नीर भरि आए । ३५७
मैया री, मोहिं माखन भावै । ६५ राधा परम निर्मल नारि । १६५
मैया हौं न चरैहौं गाइ । ८५ राधा विनय करति मनहीँ मन, १६१
मोकौं माई जमुना जम है रही । २४६ राधा-भवन सखी मिलि आई । १८४
मोसों कहा दुरावति राधा । १५६ राधा माधव, भेंट भई । ३६२
मोसौँ बात सुनहु ब्रज-नारी । १२६ राधा सखी देखि हरषानी । २०२
(मोहन) अपनी गैयाँ घेरि लै । ३२६ राधा सौं माखन हरि मांगत । १२८
मोहन काहे न उगिलौ माटी । ६३ राधा स्याम की प्यारी । १६५