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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पदानुक्रमणी ३६३
ब्रजवासी सब सोवत पाये । १९६ (मधुप तुम) कहो कहाँ तैं आए हौ । २७८
ब्रज मैं एक अचंभो देख्यौ । ३३५ मधुवन तुम क्यों रहत हरे । २४०
ब्रज मैं एके घरम रह्यौ । ३३३ मधुवन लोगनि को पतियाइ । २८७
ब्रज मैं को उपज्यौ यह भैया । ८२ मन तोसों किती कही समुझाइ । ३८
ब्रज मैं संभ्रम मोहिं भयौ । ३३५ मन में रह्यौ नाहिंन ठौर । ३००
ब्रजहिं बसैं आपुहिं बिसरायौ । १५५ मनहीं मन रीझति महतारी । १६०
ब्रत पूरन कियौ नंद-कुमार । १०४ महर-महरि कैं मन यह आई । ८०
ब्रह्मा जिनहिं यह आयसु दीन्हौ । १३० महरि, गारुडी कुँवर कन्हाई । १५१
ब्रह्मा बालक-बच्छ हरे । ८२ महरि तैं बड़ी कृपन है माई । ७२
भए सखि नैन सनाथ हमारे । २१८ महरि मुदित उलटाइ के, ५२
भक्त हेत अवतार धरौ । १२७ महा बिरह-बन मांझ परी । १६४
भक्ति कब करिहौ, जनम सिरानौ । ३६ माई कृष्ण-नाम जब तैं स्रवन
भजन बिनु कूकर-सूकर जैसौ । ४२ सुन्यौ है री । १६८
भली भई हरि सुरति करी । २७२ माई मेरो मन पिय सौं यौं लाग्यौ, १८६
भवन रवन सबही बिसरायौ । १०१ माई मोकौं चद लग्यौ दुख देन । २५५
भावी काहूँ सौं न टरे । ३२ माई री कैसैं बनै हरि कौ ब्रज
भुज भरि लई हिरदय लाइ । १८७ आवन । ३५२
भुजा पकरि ठाढ़े हरि कीन्हे । १७३ मातु-पिता अति त्रास दिखावति । १७४
भूखो भयौ आजु मेरौ बारौ । ७८ मातु-पिता इनके नहिं कोइ । १०८
भूलि नहीं अब मान करौ री । १८६ मातु-पिता तुम्हारे धौं नाहीँ । १११
भूलौ द्विज देखत अपनौ घर । ३४८ माधव या लगि है जग जीजत । ३५८
मथुरा जाति हौं बेचन दहियौ । ७० माधो जू कहा कहौं उनकी गति । ३३३
मथुरा तैं ये आई है । १८१ माधो जू मैं अतिही सचु पायौ । ३३४
मथुरा दिन-दिन अधिक विराजै । २२५ मान करो तुम और सवाई । १६४
मथुरा पुर मैं सोर पर्यो । २१७ मानी माई घन घन अंतर दामिनि । ११३
मथुरा मैं बस वास तुम्हारौ ? १८१ मिलि बिछुरन की वेद न न्यारी । २३८
मथुरा हर्षित आजु भई । २१७ मीठी बातनि में कहा लीजे । २८४
मधुकर आपुन होहिं विराने । ३१६ मुख पर चद दारौ वारि । १४१
मधुकर कहिए काहि सुनाइ । २८३ मुरलिया कपट चतुराई ठानी । ८८
मधुकर प्रीति किये पछितानी । ३१५ मुरलिया मोकौं लागति प्यारी । १००
मधुकर भली करी तुम आए । ३०८ मुरली कहै सु श्याम करैं री । ८८
मधुकर स्याम हमारे ईस । २८८ मुरली की सरि कौन करै । ८७
मधुकर स्याम हमारे चोर । ३०० मुरली तऊ गुपालहिं भावति । ८६
मधुकर हम न होहिं वै बेलि । २७८ मुरली-धुनि स्रवन सुनंत, ८५