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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पदानुक्रमणी ३८७
ऊधो हमरी सौं तुम जाहु । ३०८
ऊधो हमहिं न जोग सिखैये। २६७
ऊधो हरि काहे के अंतरजामी । २८१
ऊधो हरि गुन हम चकडोर । २८४
एक गाउँ के वास वसो हौं, १३५
एक द्यौस कुंजनि मैं माई । २५६
एई सुत नंद अहीर के । २२०
ऐसी कुंवरि कहां तुम पाई । १६२
ऐसी प्रीति की बलि जाउँ । ३४५
ऐसी बात कही जनि ऊधो । २८६
ऐसी रिस मैं जो धरि पाऊँ । ७४
ऐसे आपु स्वारथी नैन । १४२
ऐसैं जनि वोलहु नंद लाला । १२४
ऐसी जोग न हम पै होइ । ३०३
ऐसी दान मांगिये नहिं जौ, १२३
ऐसौ सुनियत द्वै वैसाख । ३१२
और सकल अंगनि तैं ऊधो, २८५
कंत सिधारौ मधुसूदन पे, ३४४
कंस नृपति अक्रूर बुलाये । २११
कंस वध्यौ कुविजा कैं काज । २३२
कंस बुलाइ दूत इक लीन्हो । ८७
कन्हैया तू नहिं मोहिं डरात । ७३
कपट करि ब्रजहिं पूतना आई । ५०
कपटी नैननि तैं कोउ नाहीँ । १४४
कब देखौँ इहिं भांति कन्हाई । २४०
कब री मिले स्याम नहिं जानौँ । १६७
कबहुँ सुधि करत गुपाल हमारी । २७३
कमल-नैनि हरि करो कलेवा । ६१
कर कंपै, कंपन नहिं छूटै । ३६५
करत अचगरी नंद महर की । १२३
करत कान्ह ब्रज-घरनि अचगरी । ७१
करतल-सोभित बान धनुहियां । ३६४
करति अवसेर वृषभानु-नारी । १८०
करन दै लोगनि कौं उपहास । १३५
कर पग गहि, अँगुठा मुख मेलत । ५१
करि गए थोडे दिन की प्रीति । २३७
करिहौ मोहन कहूँ संभारि, २५८
करी गोपाल की सब होइ । ३१
कहत नंद जसुमति सौं बात । ६४
कहत स्याम श्रीमुख यह वानी । ११२
कहन लागे मोहन मैया-मैया । ५७
कहाँ रह्यो मेरी मनमोहन । २३०
कहा कहति तू मोहिं री माई । १३३
कहा तुम इतनैं हि कौं गरवानी । २०१
कहा भई धनि बावरी, १६३
कहा भयो जो घर कैं लरिका, ७५
कहा भयो मेरो गृह माटी कौ । ३४७
कहा होत जो हरि हित चित धरि, ३१६
कहा हौ ऐसे ही मरि जैहौं । २१६
कहि धौँ री वन बेलि कहूँ तैं, ११४
कहि धौँ सखी बटाऊ को हैं ? ३६६
कहिवे मैं न कछू सक राखी । ३३२
कह्यौ कान्ह सुनि जसुदा मैया । २७३
कहियो जसुमति की आसीस । ३२७
कहियो ठकुराइति हम जानी । २४२
कहि राधा हरि कैसे हैं । १६३
कहि राधा ये को है री । १८०
कहि राधिका बात अब सांची । १६६
कहै भामिनी कंत सौं, ११५
(कहौं कहा) अंगनि की सुधि बिसरि गईँ । ८५
काको काको मुख माई बातनि कौं गहिये । १५८
काग-रूप इक दनुज घरचो । ५१
कान्ह कहत दधि-दान न दैहौ ? १२५
कान्ह कह्यो वन रैनि न कीजै, १७८
कान्ह कुंवर की करहु पासनी, ५३
कान्हहिं वरजति किन नंदारानी । ६८