सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ सूरसागर सार सटीक
काहु के कुल तनन विचारत । २० खेलन कैं मिस कुँवरि राधिका, १४८
काहे कौं कहि गए आइहैं, १८६ खेलन कौं मैं जाउँ नहीं ? १६०
काहे कौं गोपीनाथ कहावत । २६३ खेलन दूरि जात कत कान्हा । ६२
काहे कौं पर घर छिनु-छिनु जाति । १६० गई वृषभानु-सुता अपने घर । १४७
काहे कौं पिय पियहिं रटति हो, २५५ गए स्याम ग्वालिन घर सूनैं । ७०
काहे कौं रोकत मारग सूधौ । ३०६ गए स्याम तिहिं ग्वालिन कैं घर । ६५
काहैं न मुरली सौं हरि जोरैं । ९७ गन गंधर्व देखि सिहात । १३०
काहैं पीठि दई हरि मोसौँ । २४२ गरव भयौ ब्रजनारि कौं, ११४
किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए । ३३ गरुड़-त्रास तैं जौ ह्यां आयौ । ९३
किधौं घन गरजत नहिं उन देसनि । २५१ गहरु जनि लावहु गोकुल जाइ । २६६
कियो जिहिं काज तप गोप-नारी । ११३ गह्यो कर स्याम भुज मल्ल अपने
कियो सुर-काज गृह चले ताकैँ । २२४ धाइ, २२१
किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत । ५५ गिरि जनि गिरै स्याम के कर तैं । १०८
कुवरी पूरव तप करि राख्यो । २२४ गिरि पर बरषन लागे बादर । १०६
कुबिजा नहिं तुम देखी है । २३१ गिरिवर स्याम की अनुहारि । १०५
कुल की कानि कहाँ लगि करिहौं । १७४ गुप्त मते की बात कहौं, ३०५
कुल की लाज अकाज कियौ । १७३ गुरु-गृह हम जब वन कौं जात । ३४५
केहिं मारग मैं जाउँ सखी री, ११६ गुरु बिनु ऐसी कौन करै ? २३
कैसे हैं नंद-सुवन कन्हाई । १५८ गोकुलनाथ विराजत डोल । २१०
कैसैं मिले पिय स्याम संघाती । ३४८ गोकुल प्रकट भए हरि आइ । ४८
कैसैं री यह हरि करिहैं । २३१ गोपालराइ दधि माँगत अरु रोटी । ५७
कोउ ब्रज वांचत नाहींन पाती । २७७ गोपालराइ निरतत फन-प्रति ऐसे । ६३
कोउ माई आवत हे तनु स्याम । २७१ गोपालराइ हौँ न चरन तजि जैहौँ । २२६
कोउ माई वरजै री या चंदहिं । २५४ गोपालहिं पावैं धौँ किहिं देस । २४१
कोउ माई लैहै री गोपालहिं । १३२ गोपालहिं माखन खान दै । ६६
कोऊ सुनत न बात हमारी । ३३२ गोपी कहति धन्य हम नारी । १२६
कोकिल हरि को बोल सुनाउ । २५२ गोपी सुनहु हरि संदेस । २७५
कोटि करौ तनु प्रकृति न जाइ । २३२ गोपी सुनहु हरि संदेस । २६६
को माता को पिता हमारैं । १२७ ग्वारनि कही ऐसी जाइ । २३०
कृपा सिंधु हरि कृपा करो हो । ११७ ग्वारिनि जब देखे नंद-नंदन । १२५
खंजन नैन सुरँग रस माते । २०३ घट भरि दियो स्याम उठाइ । १२१
खेलत मैं को काको गुसैयाँ । ६२ घर घर इहै सब्द पर्यो । २७१
खेलत स्याम, सखा लिए संग । ८८ घरनि-घरनि ब्रज होति बधाई । १०८
खेलत हरि निकसे ब्रज खोरी । १४६ घरहिं जाति मन हरष बढ़ायो । १५६