सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ सूरसागर सार सटीक
आवत उरग नाथे स्याम । ६३ ऊधौ कही सांची बात । २७४
आवत मोहन धेनु चराए । १३८ ऊधौ कहौ हरि कुसलात । २७५
आवहु री मिलि मंगल गावहु । ३४१ ऊधौ काहे कौं भक्त कहावत । ३०४
इक दिन नंद चलाई बात । २३३ ऊधौ कोउ नाहींन अधिकारी । ३०८
इत-उत देखत जनम गयौ । ३४ ऊधौ कोकिल कूकत कानन । ३१३
इततैं राधा जाति जमुन-तट, १७२ ऊधौ क्यौं बिसरत वह नेह । ३१७
इतनी बात अलि कहियो हरि सौं, ३२१ ऊधौ जब ब्रज पहुँचे जाइ । ३२७
इन अखियन आगैं तैं मोहन, ६८ ऊधौ जात ब्रजहिं सुने । २६६
इनकौं ब्रजहीँ क्यौं न बुलावहु । १८१ ऊधौ जू, कहियो तुम हरि सौं, ३२१
इन नैननि मोहिं बहुत सतायौ । १४२ ऊधौ जोग कहा है कीजतु । ३१४
इहिँ अंतर मधुकर इक आयौ । २७८ ऊधौ जोग जोग हम नाहीं । ३११
इहिँ उर माखन चोर गडे । २८८ ऊधौ जोग बिसरि जनि जाहु । ३०४
इहिँ डर बहुरि न गोकुल आए । ३१८ ऊधौ जो हरि हितू तुम्हारे । ३०६
इहिँ दुख तन तरफत मरि जैहैं । २५७ ऊधौ तिहारे पा लागति हौं, ३२५
इहिँ विधि पावस सदा हमारैं । ३१२ ऊधौ तुम ब्रज की दसा बिचारी । २८१
इहिँ विधि वेद-मारग सुनो । १११ ऊधौ तुम यह निश्चय जानौ । २६३
उग्रसेन कौं दियौ हरि राज । २२३ ऊधौ तुम हौ निकट के बासी । २८४
उठे कहि माधौ इतनी बात । २२७ (ऊधौ) ना हम विरहिनि ना तुम
उत नंदहिं सपनौ भयौ, २११ दास । ३०४
उती दूर तैं को आवै री । ३५१ ऊधौ पा लागति हौं कहियौ, ३२५
उनकौं ब्रज बसिबौ नहिं भावै । २५८ ऊधौ बानी कौन ठहरैगौ, २८०
उपमा नैन न एक रही । २८६ ऊधौ भली भई ब्रज आए । ३०२
उपमा हरि तनु देख लजानी । १३८ ऊधौ भलो ज्ञान समुझायौ । ३३१
उमगीं ब्रजनारि सुभग, ५४ ऊधौ मन अभिमान बढायौ । २६३
उरग लियो हरि को लपटाइ । ६१ ऊधौ मन न भए दस बीस । २८८
उलटि पग कैसैं दीन्हौ नद । २२८ ऊधौ मन नहिं हाथ हमारैं । २८८
उलटी रीति तिहारी ऊधौ, २८४ ऊधौ मन माने की बात । ३१८
ऊधौ अँखियां अति अनुरागी । २८६ ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं । ३३६
ऊधौ इक पतिया हमरी लीजे । ३२२ ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं । ३३६
ऊधौ इतनी कहियो जाइ । २६८ ऊधौ मौन साधि रहे । ३०८
ऊधौ इतनी कहियौ जाइ । ३२४ ऊधौ ले चल लै चल । ३०५
ऊधौ इतनी कहियो बात । ३२३ ऊधौ सुधि नाहीं या तन की । ३१६
ऊधौ कहा करैं लै पाती । २७७ ऊधौ सुनहु नैकु जो बात । ३१०
ऊधौ कही सु फेरि न कहिए । २८८ ऊधौ हम आजु भईं बड़ भागी । २८२