सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ नारीनिंदा को अंग ॥ [ ७३
कुण्डलिया छंद
रसिकप्रिया रसमंजरी और सिंगार हि जानि ।
चतुराई करि बहुत विधि विखै बनाई आनि ॥
विषै बनाई आनि लगत विषयिन कों प्यारी ।
जागै मदन प्रचंड सराह्रैं नख सिख नारी ॥
ज्यों रोगी मिष्टान्न खाइ रोगहि विस्तारै ।
सुन्दर यह गनि होइ जु तौ रसिकप्रिया धारै ॥१५॥
रसिकप्रिया के सुनत ही उपजै बहुत विकार ।
जो या माही चित्त दे वहै होत नर ख्वार ॥
वहै होत नर ख्वार वार तौ कछुक न लागै ।
सुनत विषय की वात लहरि विष ही की जागै ॥
ज्यों कोइ ऊंधै हुतौ लही पुनि सेज विछाई ।
सुन्दर ऐसी जानि सुनत रसिकप्रिया भाई ॥१६॥
॥ इति नारीनिंदा को अंग सम्पूर्ण ॥