सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
पृष्ठ 81, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 81
७२ ] ।। सुन्दर विलास ।।
उदर मैं नरक नरक अध द्वारनि मैं,
कुचन मैं नरक नरक भरी छाती है ।
कठ मै नरक गाल चिवुक नरक विव,
मुख मैं नरक जीभ लार हू चुआाती है ।।
नाक मैं नरक आंखि कान मैं नरक वहै,
हाथ पाव नख सिख नरक दिखाती है ।
सुन्दर कहत नारी नरक कौ कुण्ड यह,
नरक मै जाइ परै सो नरकपाती है ॥३॥
कामिनि कौ अंग अति मलिन महा अशुद्ध,
रोम रोम मलिन मलिन सब द्वार हैं ।
हाड मास मज्जा मेद चाम सौ लपेटि राखै,
ठौर ठौर रकत के भरेई भंडार है ।।
मूत्र ऊ पुरीष आत एकमेक मिलि रही,
और ऊ उदर माहि बिबिध बिकार है ।
सुन्दर कहत नारी नख सिख निद रूप,
ताहि जे सराह्रै ते तौ बडेई गवार है ॥४॥
(३) अध-नीचे के । कुच-स्तन । चिबुक-ठोडी । नरक
पाती-नरक मे गिरने वाला ।
(४) पुरीष-मल, टट्टी । उदर-पेट ।