सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
पृष्ठ 58, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 58
॥ तृष्णा को अंग ॥ [ ४६
अथ तृष्णा को अंग ॥५॥
इन्दव छन्द
नैनन की पल ही पल मैं,
छिन आध घरी घटिका जु गई है ।
याम गयौ युग याम गयौ,
पुनि साझ गई तब भोर भई है ॥
आज गई अरु काल्हि गई,
परसौ तरसौ कछु और ठई है ।
सुन्दर ऐसे ही आयु गई,
तृष्णा दिन ही दिन होत नई है ॥१॥
दुर्मिला छंद
कन ही कन कौ बिललात फिरै,
शठ जाचत है जन ही जन कौ ।
तन ही तन कौ अति सोच करै,
नर खात रहै अन ही अन कौ ॥
मन ही मन की तृष्णा न मिटी,
पुनि धावत है धन ही धन कौ ।
छिन ही छिन सुन्दर आयु घटी,
कबहू न गयौ बन ही बन कौ ॥२॥
(१) घटिका-घडी । याम-पहर । युग-दो । (२) कन-
कण, अन्न के दाने । अन-अन्न ।