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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 45

३६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मात पिता जुवती सुत बघव,
आइ मिल्यौ इनसौ सनबधा ।
स्वारथ के अपने अपने सब,
सो यह नाहि न जानत अधा ॥
कर्म विकर्म करै तिनकै हित,
भार धरै नित आपने कधा ।
अन्त बिछोह भयौ सब सौ पुनि,
याहि तै सुन्दर है जग धधा ॥१३॥
करत करत धध कछुक न जानै अध,
आवत निकट दिन आगिलौ चपाकि दै ।
जैसे बाज तीतर कौ दाबत अचानचक,
जैसे बक मच्छगी कौ लीलत लपाकि दै ॥
जैसे मक्षिका की घात मकरी करत आइ,
जैसे साप मूपक कौ ग्रसत गपाकि दै ।
चेति रे अचेत नर सुन्दर सभारि राम,
ऐसें तोहि काल आइ लेइगौ टपाकि दै ॥१४॥
(१३) धधा-लेनदेन का व्यापार मात्र ।
(१४) चपाकि दे-चटपट । लपाकि दे-लपक कर ।
गपाकि दे-गप्प से । घात-हत्या । टपाकि दे-टप्प से ।