सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ३५
चेतत क्यौ न अचेतन १ ऊघ न,
काल सदा सिर ऊपरि गाजै ।
रोकि रहै गढ के सब द्वारनि,
तू तब कौन गली होइ भाजै ॥
आइ अचानक केश गहै जब,
पाकरि कै पुनि तोहि झुलाजै ।
सुन्दर कौन सहाइ करै जब,
मूडहि मूड भराभरि बाजै ॥११॥
तू अति गाफिल होइ रह्यौ शठ,
कुंजर ज्यौ कछु शक न आनै ।
माइ नही तन मै अपने बल,
मत्त भयौ विषया सुख ठानै ॥
खोसत खोसत बै दिन बीतत,
नीति अनीति कछू नहिं जानै ।
सुन्दर केहरि काल महारिपु,
दंत उपारि कुम्भस्थल भानै ॥१२॥
(१२) खोसत खासत-छीना झपटी मे । केहरि
काल-रूपी शेर । कुम्भ स्थल-मस्तक ।