सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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३० ] ।। सुन्दर विलास ।।
गुरु ग्यान गहै अति होइ सुखी,
मन मोह तजै सब काज सरै ।
धुर ध्यान रहै पति खोइ मुखी,
रन लोह बजै तब लाज परै ॥
सुरतान उहै हति दोइ 'रुखी,
तन.छोह सजै अब आज मरै ।
पुरथान लहै मति धोइ दुखी,
जन वोह रजै जब राज करै ॥३३॥
इति उपदेश चितावनी को अग
सम्पूर्ण
करो-व्याधि समझो । घन-घात हिया-हृदय पर गहरी चोट
करो ।
(३३) धुर-दृढ । पति-सासारिक प्रतिष्ठा । खोइ-
याग कर । मुखी-गुरुमुखी है । रन लोह बजै-विघ्न बाधाओ
ने युद्ध करे । तन छोह तजे-देह का मोह छोड दे । अब
नाज मरे-मरने जीनेदी चिन्ता न करे । पुरथान लहै-परम
पद प्राप्त करे । मति धोइ-बुद्धि को शुद्ध करे ।