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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

।। उपदेश चितावनी को अग ।। [ २६
सुन्दर कहत अब ताहि न सुरत आवे,
चेते क्यो न मूढ चित लाय हिरदानी मे ।
भूले जन दाव जात लोह को सो ताव जात,
आप जात ऐसे जैसे नाव जात पानी मे ।।३१।।
डुमिला छंद
हठ योग धरौ तन जात भिया,
हरि नाम विना मुख धूर परै ।
शठ सोक हरौ छन गात किया,
चरि चाम दिना भुष पूरि जरै ॥
भठ भोग परौ गन पात धिया,
अरि काम किना सुख भूरि मरै ।
मठ रोग करौ घन घात हिया,
परि राम तिना दुख दूरि करै ।।३२।।
(३१) ऐन-ठीक से । ज्वानी-जवानी । रक-निर्धन ।
सुरत-ध्यान । हिरदानी-हृदय ।
(३२) भिया-अरे भाई। तन जात-जीव।-जा रहा है ।
शोक-चिंता । छन गात क्रिया-शरीर क्षणभंगुर है ।
चाम-चमडी या शरीर । चरि-परिवर्तनशील है । दिना भुष-
आयु के दिन भोगकर । करि जरै-भस्म होगा । भठ भोग
परो-भोगो की भट्टी मे पडा है । गन-गण, विषय समुदाय।
खात-धिया-वृद्धि को खा रहे है । अरि काम किना-शत्रु का
मो काम कर रहे है । मठ-घर बार परिवार को । रोग