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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ | ९७
ने रैं तौ कुपेच पर्यो गाठि अति पूरि गई,
ब्रह्मा आइ छोरै पगो तौ छूटन न जबहू ।
तेल सौं भिजोड करि नोलग लपेटि राखै,
कूकुर की पूंछ सूधी होइ नहीं तबहू ॥
मानू देत सीप बहु कीरी की भिनत जाउ,
कहत कहत दिन बीत गयो सबहू ।
सुन्दर अज्ञान ऐसो छाड्यो नही अभिमान,
निकसन प्रान लग देत्यो नहि कवहू ॥७॥
वालू माहि तेल नहि निकसत काहू विधि,
पाथर न भीजै बहु वरषन घन है ।
पानी के मथे तं कहु घीव नहि पाइयत,
कूकस कें कूटै नहि निकसत कन है ॥
शून्य कूं मूठी भरे तै हाथ न परत कछु,
ऊसर के वाहै कहा उपजत अन्न है ।
उपदेश औषध कवन विधि लाग ताहि,
सुन्दर असाध्य रोग भयौ जाकै मन है ॥८॥
(७) कुपेच-दुर्बुद्धि । छोरे-छुटावे सुलझावे । कीरीकी-
कीडी के समान ।
(८) घन-ब दल । कूकस-भूसा । कन-कण, अन्न के
दाने । शून्य-सूना आकाश । ऊसर-खारडे की जमीन ।