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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
बैरी घर मांहि तेरे जानत सनेही मेरे,
दारा सुत वित्त तेरौ पोसि पोसि खाहिंगे ।
और ऊ कुटुम्ब लोग लूटैं चहू ओर ही तैं,
मीठी मीठी बात कहि तोसौ लपटाहिंगे ॥
सकट परैगो जब कोऊ नहि तेरौ तब,
अति ही कठिन वाकी बेर उठि जाहिंगे ।
सुन्दर कहत तानै झूठौ ही प्रपंच यह,
सुपन की नाईं सब देखत विलाहिंगे ॥९॥
वारू कै मदिर माहि बैठि रह्यौ थिर होइ,
राखत है जीवने की आसा कैऊ दिन की ।
पल पल छीजत घटत जात घरी घरी,
बिनसत वार कहा षवरि न छिनकी ॥
करत उपाइ झूठै लेन देन षान पान,
मूसा इत उत फिरै ताकि रही मिनकी ।
सुन्दर कहत मेरी मेरो करि भूलौ शठ,
चंचल चपल माया भई किन किन की ॥१०॥
अन अन्त । (९) सनेही-प्रेमी । वित्त-धन । बाकी बेर-उनके
मौक़ पर । उठि जाहिंगे-मुंह फेर लेंगे ।
(१०) बारू-बालू मिट्टी । छिन की-क्षणभर की ।
मूसा-चूहा। मिनकी-बिल्ली । शठ-दुष्ट, मूर्ख ।