सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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१४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ उपदेश चितावनी को अग ॥२॥
हमाल छंद
तो सही चतुर तू जान परवीन अति,
परै जनि पिंजरै मोह कूंवा ।
पाइ उत्तम जनम लाइ लै चपल मत,
गाड गोविंद गुन जीति जूवा ॥
आपु ही आपु अज्ञान नलनी बध्यौ,
विना प्रभु विमुख कै वार मूवा ।
दास सुन्दर कहै परम पद तौ लहै,
राम हरि राम हरि बोल सूवा ॥१॥
नप्स शतान कौ आपुनौ कैद करि,
क्या दुनी मै पर्या खाइ गोता ।
है गुनहगार भी गुनह ही करत है,
खाइगा मार तब फिरै रोता ॥
जिन तुझै खाक सौ अजब पैदा किया,
तू उस्से क्यों फरामोस होता ।
दास सुन्दर कहै सरम तब ही रहै,
हक्क तू हक्क तू बोल तोता ॥२॥
(१) परवीन-प्रवीण । अज्ञान नलनी-अज्ञानकी नाली,
जैसा कि तोता नाली के द्वारा पकड़ा जाता है ।
(२) नप्स मन । उस्से-उसमे । फरामोस-विमुख ।