सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ | १३
सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ,
ऐसे गुरुदेव दादू मेरे मन मान्यो है ॥२६॥
जीते हैं जु काम क्रोध लोभ मोह दूरि किए,
और सब गुननि को मद जिन भान्यो है ।
उपजै न ताप कोऊ सीतल सुभाव जाको,
सबही में समता संतोप उर आन्यो है ॥
काहू सों न राग दोप देत सबही कौ पोष,
जीवत ही पायौ मोक्ष एक ब्रह्म जान्यो है ।
सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ,
ऐसो गुरुदेव दादू मेरे मन मान्यो है ॥२७॥
॥ इति श्री गुरुदेव कौ अंग सम्पूर्ण ॥

(२६) तत-तत्त्व । रिषीसुर-ऋषीश्वर । मुनीसुर-
मुनीश्वर । कवीसूर-कवीश्वर ।
(२७) भान्यो है-दूर कर दिया । दोप-द्वेष । मोक्ष ।
पोष-पोषण ।