सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
पृष्ठ 21, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ ] ।। सुन्दर विलास ।।
सुरेसुरानद हू कै आनद अच्छेव जू ॥
रैदास कबीरदास मोभादास पीपादास,
धनादास हू कै दासभाव ही की टेव जू ।
सुन्दर सकल सत प्रगट जगत मांहि,
तै से गुरु दादूदेव लागे हरि सेव जू ॥२४॥
गुरुदेव सर्वोपरि अधिक विराजमान,
गुरुदेव सब ही तै अधिक गरिष्ठ है ।
गुरुदेव दत्तात्रेय नारद शुकादि मुनि,
गुरुदेव ज्ञानघन प्रगट वसिष्ठ हैं ॥
गुरुदेव परम आनदमय देखियत,
गुरुदेव वर वरीयान हू वरिष्ठ है ।
सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ,
ऐसे गुरुदेव दादू मेरे सिर इष्ट है ॥२५॥
जोगी जैन जंगम सन्यासी वनवासी बौद्ध,
और कोऊ भेष पक्ष सब भ्रम भान्यो है ।
तापस रिषीसुर मुनीसुर कवीसुर ऊ,
: सबन को मत देखि तत पहिचान्यो है ॥
वेदसार तंत्रसार स्मृति रु पुरान सार,
ग्रन्थन को सार सोई हृदै माँहि आन्यो है,
(२५) गरिष्ठ-महान् । वरिष्ठ-श्रेष्ठ । इष्ट-आराध्य
देव । सिर-सर्वोपरि ।