सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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जोग हु जज्ञ ब्रतादि क्रिया,
तिनकौ नहिं तौ सुपिने अभिलाखै ।
सुन्दर अमृत पान कियौ तब,
तौ कहि कौन हलाहल चाखै ॥५॥
मनहर छंद
काहे की फिरत नर भटकत ठौर ठौर,
डागुलै की दौर देवी देव सब जानिये ।
योग यज्ञ जप तप तीरथ ब्रतादि दान,
तिनहू कौं फल सोऊ मिथ्याई वखानिये ॥
सकल उपाय तजि, एक राम नाम भजि,
याहि उपदेश सुनि हृदै माहि आनिये ।
नाहि तैं समुझि करि सुन्दर विश्वास धरि,
और कोऊ कहै कछु ताकी नहिं मानिये ॥६॥
पति ही सौ प्रेम होइ, पति ही सौ नेम होइ,
पति ही सौं क्षेम होइ, पति ही सौं रत है ।
पति ही है यज्ञ योग, पति ही है रस भोग,
पति ही है जप तप, पति ही कौ यत है ॥
पति ही है ज्ञान ध्यान, पति ही है पुन्य दान,
पति ही है तीर्थ न्हान, पति ही कौ मत है ।
पति बिन पति नाहिं, पति बिन गति नाहिं,
सुन्दर सकल बिधि एक पतिब्रत है ॥७॥