सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ बचन बिवेक को अंग ॥ [ १०५
बिबिध प्रकार करि बोलत जगत सब,
घट घट मुख मख बचन अनैक है ।
सुन्दर कहत तातै बचन बिचारि लेहु,
बचन तौ उहै जामै पाइये बिवेक है ॥८॥
जैसे हस नीर कौ तजत है असार जानि,
सार जानि क्षीर कौं निरालौ करि पीजिये ।
जैसे दधि मथत मथत काढि लेत घृत,
और रही पही सब छाछि छाडि दीजिये ॥
जैसे मधु मक्षिका, सुवास कौ भूमर लेत,
तैसे ही बिचारि करि भिन्न भिन्नकीजिये ।
सुन्दर कहत तातै बचन अनेक भाँति,
बचन मैं बचन विवेक करि लीजिये ॥६॥
प्रथम ही गुरुदेव मुख तै उचार कर्यो,
वैई तौ बचन आइ लगे निज हीये हैं ।
तिनकौ बिवेक करि अन्तहकरन माहि,
अति ही अमोल नग भिन्न भिन्न कीये हैं ॥
आपु कौ दरिद्र गयौ पर उपकार हेत,
नग हि निगल कै उगलि नग दीये हैं ।
सुन्दर कहत यह वानी यौ प्रगट भई,
और कोऊ सुनि करि रक जीव जीये है ॥१०॥