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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

१०४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
काक अरु गदर्भ ऊंटहू जब बोलत हैं,
तिनके तो वचन सुहात नहिं पीव की ।
कोकिला ऊ मागे पुनि सूवा जब बोलत हैं,
तब कोऊ कान दै सुनत रव गीत की ॥
ताहि तें सुवचन विवेक करि बोलियत,
गोहि थार यार बकि तोलियै न पोल को ।
सुन्दर समुझि के बोल को उचार करि,
नाहिं तर चुप ह्वै पहरि बैठि मौन की ॥६॥
प्रथम हिये विचारि, सीम सो न दीजै डारि,
नाहिंनं सुवचन सम्भारि करि बोलिये ।
जाने न कुहेत हेत भावै तैसी कहि देत
कहिये तो तब जब मन माहिं तोलिये ॥
सबही की लागै दुख कोऊ नहिं पावै सुख,
बोलिके वृथा ही तान छानी नहीं छानिये ।
सुन्दर समुझि करि कहिये सरस बात,
तब ही तो बदन कपाट गहि खोलिये ॥७॥
वचन ऐसैं बोलत हैं पसु जैसे,
तिनके तो बोलिवे मैं ढग हू न एक है ।
कोऊ राति दिवस बकत ही रहत ऐसें,
जैसी विधि कूप मैं वकत मानो भेक है ॥