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सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary

श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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बारं बार बार प्रभु जपीऐ ॥
पी अंमृतु इहु मनु तनु ध्रपीऐ ॥
नाम रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ ॥
तिसु किछु अवरु नाही दृसटाइआ ॥
नामु धनु नामो रूपु रंगु ॥
नामो सुखु हरि नाम का संगु ॥
नाम रसि जो जन तृपताने ॥
मन तन नामहि नामि समाने ॥
ऊठत बैठत सोवत नाम ॥
कहु नानक जन कै सद काम ॥६॥
बोलहु जसु जिहबा दिनु राति ॥
प्रभि अपनै जन कीनी दाति ॥
करहि भगति आतम कै चाइि ॥
प्रभ अपने सिउ रहहि समाइि ॥
जो होआ होवत सो जानै ॥
प्रभ अपने का हुकमु पछानै ॥

93
तिस की महिमा कउन बखानउ ॥
तिस का गुनु कहि इेक न जानउ ॥
आठ पहर प्रभ बसहि हजूरे ॥
कहु नानक सेई जन पूरे ॥७॥
मन मेरे तिन की एट लेहि ॥
मनु तनु अपना तिन जन देहि ॥
जिनि जनि अपना प्रभू पछाता ॥
सो जनु सरब थोक का दाता ॥
तिस की सरनि सरब सुख पावहि ॥
तिस कै दरसि सभ पाप मिटावहि ॥
अवर सिआनप सगली छाडु ॥
तिसु जन की तू सेवा लागु ॥
आवनु जानु न होवी तेरा ॥
नानक तिसु जन के पूजहु सद पैरा
॥८॥१७॥
सलोकु ॥

94
सति पुरखु जिनि जानिआ सतिगुरु तिस का
नाउ ॥
तिस कै संगि सिखु उधरे नानक हरि गुन
गाउ ॥१॥
असटपदी ॥
सतिगुरु सिख की करै प्रतिपाल ॥
सेवक कउ गुरु सदा दइआल ॥
सिख की गुरु दुरमति मलु हिरै ॥
गुर बचनी हरि नामु उचरै ॥
सतिगुरु सिख के बंधन काटै ॥
गुर का सिखु बिकार ते हाटै ॥
सतिगुरु सिख कउ नाम धनु देइ ॥
गुर का सिखु वडभागी हे ॥
सतिगुरु सिख का हलतु पलतु सवारै ॥
नानक सतिगुरु सिख कउ जीअ नालि समारै
॥१॥

95
गुर कै गृहि सेवकु जो रहै ॥
गुर की आगिआ मन महि सहै ॥
आपस कउ करि कछु न जनावै ॥
हरि हरि नामु रिदै सद धिआवै ॥
मनु बेचै सतिगुर कै पासि ॥
तिसु सेवक के कारज रासि ॥
सेवा करत होइ निहकामी ॥
तिस कउ होत परापति सुआमी ॥
अपनी कृपा जिसु आपि करेइ ॥
नानक सो सेवकु गुर की मति लेइ ॥२॥
बीस बिसवे गुर का मनु मानै ॥
सो सेवकु परमेसुर की गति जानै ॥
सो सतिगुरु जिसु रिदै हरि नाउ ॥
अनिक बार गुर कउ बलि जाउ ॥
सरब निधान जीअ का दाता ॥
आठ पहर पारब्रहम रंगि राता ॥

96
ब्रहम महि जनु जन महि पारब्रहमु ॥
एकहि आपि नही कछु भरमु ॥
सहस सिआनप लड़िआ न जाईऐ ॥
नानक ऐसा गुरु बडभागी पाईऐ ॥३॥
सफल दरसनु पेखत पुनीत ॥
परसत चरन गति निरमल रीति ॥
भेटत संगि राम गुन रवे ॥
पारब्रहम की दरगह गवे ॥
सुनि करि बचन करन आघाने ॥
मनि संतोखु आतम पतीआने ॥
पूरा गुरु अख्यए जा का मंत्र ॥
अंमृत दृसटि पेखै होड़ि संत ॥
गुण बिअंत कीमति नही पाड़ि ॥
नानक जिसु भावै तिसु लड़े मिलाड़ि ॥४॥
जिहबा एक उसतति अनेक ॥
सति पुरख पूरन बिबेक ॥

97
काहू बोल न पहुचत प्रानी ॥
अगम अगोचर प्रभ निरबानी ॥
निराहार निरवैर सुखदाई ॥
ता की कीमति किनै न पाई ॥
अनिक भगत बंदन नित करहि ॥
चरन कमल हिरदै सिमरहि ॥
सद बलिहारी सतिगुर अपने ॥
नानक जिसु प्रसादि ऐसा प्रभु जपने ॥५॥
इहु हरि रसु पावै जनु कोइ ॥
अंमृतु पीवै अमरु सो होइ ॥
उसु पुरख का नाही कदे बिनास ॥
जा कै मनि प्रगटे गुनतास ॥
आठ पहर हरि का नामु लेइ ॥
सचु उपदेसु सेवक कउ देइ ॥
मोह माइआ कै संगि न लेपु ॥
मन महि राखै हरि हरि इकु ॥

98
अंधकार दीपक परगासे ॥
नानक भरम मोह दुख तह ते नासे ॥६॥
तपति माहि ठाढि वरताई ॥
अनदु भइआ दुख नाठे भाई ॥
जनम मरन के मिटे अंदेसे ॥
साधू के पूरन उपदेसे ॥
भउ चूका निरभउ होइ बसे ॥
सगल बिआधि मन ते खै नसे ॥
जिस का सा तिनि किरपा धारी ॥
साधसंगि जपि नामु मुरारी ॥
थिति पाई चूके भ्रम गवन ॥
सुनि नानक हरि हरि जसु स्रवन ॥७॥
निरगुनु आपि सरगुनु भी एही ॥
कला धारि जिनि सगली मोही ॥
अपने चरित प्रभि आपि बनाइ ॥
अपनी कीमति आपे पाइ ॥

99
हरि बिनु दूजा नाही कोइ ॥
सरब निरंतरि इेको सोइ ॥
एति पोति रविआ रूप रंग ॥
भए प्रगास साध कै संग ॥
रचि रचना अपनी कल धारी ॥
अनिक बार नानक बलिहारी ॥८॥१८॥
सलोकु ॥
साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली
छारु ॥
हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु
सारु ॥१॥
असटपदी ॥
संत जना मिलि करहु बीचारु ॥
इेकु सिमरि नाम आधारु ॥
अवरि उपाव सभि मीत बिसारहु ॥
चरन कमल रिद महि उरि धारहु ॥

100
करन कारन सो प्रभु समरथु ॥
दृड़ु करि गहहु नामु हरि वथु ॥
इिहु धनु संचहु होवहु भगवंत ॥
संत जना का निरमल मंत ॥
इेक आस राखहु मन माहि ॥
सरब रोग नानक मिटि जाहि ॥१॥
जिसु धन कउ चारि कुंट उठि धावहि ॥
सो धनु हरि सेवा ते पावहि ॥
जिसु सुख कउ नित बाछहि मीत ॥
सो सुखु साधू संगि परीति ॥
जिसु सोभा कउ करहि भली करनी ॥
सा सोभा भजु हरि की सरनी ॥
अनिक उपावी रोगु न जाड़ि ॥
रोगु मिटै हरि अवखधु लाड़ि ॥
सरब निधान महि हरि नामु निधानु ॥
जपि नानक दरगहि परवानु ॥२॥

101
मनु परबोधहु हरि कै नाइ ॥
दह दिसि धावत आवै ठाइ ॥
ता कउ बिघनु न लागै कोइ ॥
जा कै रिदै बसै हरि सोइ ॥
कलि ताती ठाँढा हरि नाउ ॥
सिमरि सिमरि सदा सुख पाउ ॥
भउ बिनसै पूरन होइ आस ॥
भगति भाइ आतम परगास ॥
तितु घरि जाइ बसै अबिनासी ॥
कहु नानक काटी जम फासी ॥३॥
ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥
जनमि मरै सो काचो काचा ॥
आवा गवनु मिटै प्रभ सेव ॥
आपु तिआगि सरनि गुरदेव ॥
इउ रतन जनम का होइ उधारु ॥
हरि हरि सिमरि प्रान आधारु ॥

102
अनिक उपाव न छूटनहारे ॥
सिंम्रिति सासत बेद बीचारे ॥
हरि की भगति करहु मनु लाइ ॥
मनि बंछत नानक फल पाइ ॥४॥
संगि न चालसि तेरै धना ॥
तूं किआ लपटावहि मूरख मना ॥
सुत मीत कुटंब अरु बनिता ॥
इन ते कहहु तुम कवन सनाथा ॥
राज रंग माइआ बिसथार ॥
इन ते कहहु कवन छुटकार ॥
असु हसती रथ असवारी ॥
झूठा डंफु झूठु पासारी ॥
जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना ॥
नामु बिसारि नानक पछुताना ॥५॥
गुर की मति तूं लेहि इिआने ॥
भगति बिना बहु डूबे सिआने ॥

103
हरि की भगति करहु मन मीत ॥
निरमल होइ तुमारो चीत ॥
चरन कमल रखहु मन माहि ॥
जनम जनम के किलबिख जाहि ॥
आपि जपहु अवरा नामु जपावहु ॥
सुनत कहत रहत गति पावहु ॥
सार भूत सति हरि को नाउ ॥
सहजि सुभाइ नानक गुन गाउ ॥६॥
गुन गावत तेरी उतरसि मैलु ॥
बिनसि जाइ हउमै बिखु फैलु ॥
होहि अचिंतु बसै सुख नालि ॥
सासि ग्रासि हरि नामु समालि ॥
छाडि सिआनप सगली मना ॥
साधसंगि पावहि सचु धना ॥
हरि पूंजी संचि करहु बिउहारु ॥
ईहा सुखु दरगह जैकारु ॥

104
सरब निरंतरि इको देखु ॥
कहु नानक जा कै मसतकि लेखु ॥७॥
इको जपि इको सालाहि ॥
इकु सिमरि इको मन आहि ॥
इकस के गुन गाउ अनन्त ॥
मनि तनि जापि इक भगवंत ॥
इको इकु इकु हरि आपि ॥
पूरन पूरि रहिआ प्रभु बिआपि ॥
अनिक बिसथार इक ते भए ॥
इकु अराधि पराछत गए ॥
मन तन अंतरि इकु प्रभु राता ॥
गुर प्रसादि नानक इकु जाता ॥८॥१६॥
सलोकु ॥
फिरत फिरत प्रभ आइआ परिआ तउ
सरनाइ ॥

105
नानक की प्रभ बेनती अपनी भगती लाइ
॥१॥
असटपदी ॥
जाचक जनु जाचै प्रभ दानु ॥
करि किरपा देवहु हरि नामु ॥
साध जना की मागउ धूरि ॥
पारब्रहम मेरी सरधा पूरि ॥
सदा सदा प्रभ के गुन गावउ ॥
सासि सासि प्रभ तुमहि धिआवउ ॥
चरन कमल सिउ लागै प्रीति ॥
भगति करउ प्रभ की नित नीति ॥
इेक एट इेको आधारु ॥
नानकु मागै नामु प्रभ सारु ॥१॥
प्रभ की दृसटि महा सुखु होइ ॥
हरि रसु पावै बिरला कोइ ॥
जिन चाखिआ से जन तृपताने ॥

106
पूरन पुरख नही डोलाने ॥
सुभर भरे प्रेम रस रंगि ॥
उपजै चाउ साध कै संगि ॥
परे सरनि आन सभ तिआगि ॥
अंतरि प्रगास अनदिनु लिव लागि ॥
बडभागी जपिआ प्रभु सोइ़ ॥
नानक नामि रते सुखु होइ़ ॥२॥
सेवक की मनसा पूरी भई ॥
सतिगुर ते निरमल मति लई ॥
जन कउ प्रभु होइए दइआलु ॥
सेवकु कीनो सदा निहालु ॥
बंधन काटि मुकति जनु भइआ ॥
जनम मरन दूखु भ्रमु गइआ ॥
इछ पुनी सरधा सभ पूरी ॥
रवि रहिआ सद संगि हजूरी ॥
जिस का सा तिनि लीआ मिलाइ़ ॥

107

नानक भगती नामि समाइ ॥३॥
सो किउ बिसरै जि घाल न भानै ॥
सो किउ बिसरै जि कीआ जानै ॥
सो किउ बिसरै जिनि सभु किछु दीआ ॥
सो किउ बिसरै जि जीवन जीआ ॥
सो किउ बिसरै जि अगनि महि राखै ॥
गुर प्रसादि को बिरला लाखै ॥
सो किउ बिसरै जि बिखु ते काढै ॥
जनम जनम का टूटा गाढै ॥
गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ ॥
प्रभु अपना नानक जन धिआइआ ॥४॥
साजन संत करहु इहु कामु ॥
आन तिआगि जपहु हरि नामु ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुख पावहु ॥
आपि जपहु अवरह नामु जपावहु ॥
भगति भाइ तरीऐ संसारु ॥

108
बिनु भगती तनु होसी छारु ॥
सरब कलिआण सूख निधि नामु ॥
बूडत जात पाइे बिस्रामु ॥
सगल दूख का होवत नासु ॥
नानक नामु जपहु गुनतासु ॥५॥
उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥
मन तन अंतरि इिही सुआउ ॥
नेत्रहु पेखि दरसु सुखु होइि ॥
मनु बिगसै साध चरन धोइि ॥
भगत जना कै मनि तनि रंगु ॥
बिरला कोऊ पावै संगु ॥
इेक बसतु दीजै करि मइिआ ॥
गुर प्रसादि नामु जपि लइिआ ॥
ता की उपमा कही न जाइि ॥
नानक रहिआ सरब समाइि ॥६॥
प्रभ बखसंद दीन दइिआल ॥

५. अष्टपदी १७-२४: सत्य स्वरूप, सन्त ओट व उपसंहार

109
भगति वछल सदा किरपाल ॥
अनाथ नाथ गोबिंद गुपाल ॥
सरब घटा करत प्रतिपाल ॥
आदि पुरख कारण करतार ॥
भगत जना के प्रान अधार ॥
जो जो जपै सु होइ पुनीत ॥
भगति भाइ लावै मन हीत ॥
हम निरगुनीआर नीच अजान ॥
नानक तुमरी सरनि पुरख भगवान ॥७॥
सरब बैकुंठ मुकति मोख पाड़े ॥
इेक निमख हरि के गुन गाड़े ॥
अनिक राज भोग बडिआई ॥
हरि के नाम की कथा मनि भाई ॥
बहु भोजन कापर संगीत ॥
रसना जपती हरि हरि नीत ॥
भली सु करनी सोभा धनवंत ॥

110
हिरदै बसे पूरन गुर मंत ॥
साधसंगि प्रभ देहु निवास ॥
सरब सूख नानक परगास ॥८॥२०॥
सलोकु ॥
सरगुन निरगुन निरंकार सुन्न समाधी आपि
॥
आपन कीआ नानका आपे ही फिरि जापि
॥१॥
असटपदी ॥
जब अकारु इहु कछु न दृसटेता ॥
पाप पुन्न तब कह ते होता ॥
जब धारी आपन सुन्न समाधि ॥
तब बैर बिरोध किसु संगि कमाति ॥
जब इस का बरनु चिहनु न जापत ॥
तब हरख सोग कहु किसहि बिआपत ॥
जब आपन आप आपि पारब्रहम ॥

111
तब मोह कहा किसु होवत भरम ॥
आपन खेलु आपि वरतीजा ॥
नानक करनैहारु न दूजा ॥१॥
जब होवत प्रभ केवल धनी ॥
तब बंध मुकति कहु किस कउ गनी ॥
जब इेकहि हरि अगम अपार ॥
तब नरक सुरग कहु कउन अउतार ॥
जब निरगुन प्रभ सहज सुभाड़ि ॥
तब सिव सकति कहहु कितु ठाड़ि ॥
जब आपहि आपि अपनी जोति धरै ॥
तब कवन निडरु कवन कत डरै ॥
आपन चलित आपि करनैहार ॥
नानक ठाकुर अगम अपार ॥२॥
अबिनासी सुख आपन आसन ॥
तह जनम मरन कहु कहा बिनासन ॥
जब पूरन करता प्रभु सोइ ॥