सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
६० / सुदामा-चरित
तथा श्रीकृष्ण के गुरु का नाम।
व्याख्या—सुदामा की विरक्ति को देखकर उसकी पत्नी सुबुद्धि उसे उपदेश
देती हुई कहने लगी कि संदीपन गुरु के पास जो श्रीकृष्ण आपके साथ पढ़े हैं
और जिन्हें आप अपना बालसखा मानते हैं, वे सांसारिक व्यक्ति नहीं हैं। उसका
तो यह विश्वास है कि कमल के समान नेत्र वाले, दुःखों को दूर करने वाले,
माथे पर तिलक लगाने वाले, कानों में कुण्डल धारण करने वाले, मस्तक पर
मुकुट पहने, पीले वस्त्रों को ओढ़े, गले में वैजयन्ती माला पहने, हाथ में शंख,
चक्र, गदा तथा कमल को लिए जिस चतुर्भुज मूर्ति का सबने परमात्मा के रूप
में उल्लेख किया है, श्रीकृष्ण वस्तुतः उन्हीं के अवतार हैं। वे ही आज द्वारिका-
पुरी के स्वामी हैं। वे अनाथों के नाथ हैं, अतः यदि आप द्वारिकापुरी जायेंगे तो
वे अवश्य ही हमारी निर्धनता को दूर कर देंगे।
विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण के भव्य रूप-चित्रण तथा उनके अवतार
होने की ओर संकेत किया गया है। वे विष्णु के अवतार हैं और अनाथों के
नाथ होने के कारण उन्हें दीनबन्धु कहा जाता है। परिकर, उपमा आदि अलं-
कारों के स्वाभाविक प्रयोग से इस छन्द के भाव-सौष्ठव में वृद्धि हुई है।
(१०) शब्दार्थ—सिक्षक = शिक्षक। सिगरे = सारे। पद-पंकज = चरण-
कमल। परिच्छा—परीक्षा। बावरि = पगली। भिच्छा = भिक्षा।
व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी का उपदेश सुनकर चिढ़ गये, उनका ज्ञानी
रूप प्रबल हो उठा और वे अपनी पत्नी को समझाते हुए कहने लगे कि हे
ब्राह्मणी ! जो सुदामा सारे संसार को उपदेश देता है, उसे वह क्या शिक्षा दे
रही है। जो व्यक्ति तपस्या करके स्वर्ग प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें धन-वैभव
की कोई इच्छा नहीं होती है। वह तो हरि-भक्त है। उसे धन-दौलत की आकाँक्षा
नहीं है। उसके हृदय में तो श्रीकृष्ण के चरण-कमल की चाह है, वह हजारों
बार उसकी परीक्षा लेकर देख सकती है। धन-वैभव अन्य व्यक्तियों को चाहिए;
ब्राह्मण का धन तो केवल भिक्षा ही है, उसी से वह अपना निर्वाह करता है।
सुदामा ब्राह्मण है, सामान्य गृहस्थी नहीं। फलतः उसे धन का लोभ नहीं है।
विशेष—इस सवैया छन्द में एक आदर्श ब्राह्मण की जीवन-दृष्टि पर प्रकाश
सुदामा-चरित / ६१
डाला गया है। आदर्श ब्राह्मण धन-वैभव को नहीं वरन् प्रभु-भजन को ही अपना
जीवन-लक्ष्य बनाता है। सुदामा इसी जीवन-दर्शन का प्रबल समर्थक था।
(११) शब्दार्थ — तिहुँलोकन = तीनों लोक = स्वर्ग, मर्त्य और पाताल ।
सिद्ध करो = जाओ, प्रस्थान करो (यह ब्रज का एक प्रचलित मुहावरा है।)
मति = मति, राय । दीन ह्वै बोलै = दीन भाव से बोलते हुए । पन = अवस्था ।
कन = अन्न के दाने, भीख । सो तिहुँपन क्यों कन माँगत डोले = वह तीसरी
अवस्था अर्थात् बुढ़ापे में भी क्यों भिक्षा माँगता फिरे ।
व्याख्या — सुदामा के सबल तर्क को सुनकर भी उसकी पत्नी सुबुद्धि सन्तुष्ट
न हुई और अपनी धारणा को पुष्ट करती हुई कहने लगी कि द्वारिकापति श्री-
कृष्ण तीनों लोकों के महादानी हैं। संसार उनका नाम स्मरण करके ही जीवित
है। वे दीनबन्धु हैं। हे नाथ ! मेरे विचार से आप शीघ्र ही द्वारिका के लिए
प्रस्थान कीजिए। जो प्रभु के द्वार पर जाकर अपने दुःखों के निवारण की प्रार्थना
नहीं करते हैं, उन्हें साधारण लोगों के द्वार पर जाकर, दीन बनकर भिक्षा मांगनी
पड़ती है। भगवान् श्रीकृष्ण जिनके मित्र हों, वह भला क्यों इस बुढ़ापे में द्वार-
द्वार भीख माँगता फिरे ? अर्थात् आपको द्वार-द्वार भीख नहीं माँगनी चाहिए।
श्रीकृष्ण से सहायता लेने में आपको संकोच करने की आवश्यकता नहीं है।
विशेष — इस छन्द में सुबुद्धि के तर्क उसके बुद्धि-कौशल को प्रदर्शित करते
हैं। ऐसे ही तर्कों से वह अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त करती है।
(१२) शब्दार्थ — छत्रिन = क्षत्रिय । पन = प्रण, प्रतिज्ञा, कर्त्तव्य । जुद्ध = युद्ध,
लड़ाई। जुवा = युवा । बाजि = घोड़े । वैंसे = वैश्य, व्यापारी वर्ग । सेवन-
साजन = सेवा करना । कै = अथवा, या ।
व्याख्या — सुदामा अपनी पत्नी के तर्क को काटते हुए कहने लगे कि क्षत्रियों
का धर्म सेना (हाथी, घोड़े आदि) को सजाकर युद्ध करना है। वैश्यों का व्यव-
साय, व्यापार एवं खेती करना है। शूद्रों का काम सेवा करना है। ब्राह्मणों का
धर्म पढ़ना और तप करना है। उन्हें सुख-सम्पत्ति की चाह नहीं रहती। वे
जीवन-निर्वाह के लिए भिक्षा माँगते हैं; उन्हें भिक्षा माँगने में किसी प्रकार की
लज्जा नहीं करनी चाहिए ।
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विशेष—इस छन्द में सुदामा द्वारा समाज के चारों वर्गों के धर्म की व्याख्या
की गई है। उसी के अनुसार सुदामा भिक्षा माँगकर निर्वाह करने में अपना अप-
मान नहीं समझता है।
(१३) शब्दार्थ—कोदो-सवाँ—एक तरह का सस्ता और मोटा अन्न ।
जुरतो = मिलता। मिठौती = मिठाई। सीत बितीत = सर्दियाँ कटती हैं, गुजरती
हैं। हौं = मैं। हठती = हठ करके रहती। पै तुम्हें न हठौती = तुम्हें ठेल कर
नहीं भेजती। पेलि पठौती = ठेल कर भेजती।
व्याख्या—सुदामा की आदर्शवादिता से कुछ अधीर होकर उसकी पत्नी
कहने लगी कि उसे दूध, दही एवं मिठाई की चाह नहीं है। उसे तो जीवित रहने
के लिए यदि कोदो-सवाँ जैसे मोटे अनाज और जाड़े में मोटे वस्त्र ही मिल
जाते तो वह दृढ़तापूर्वक रहती और आपसे द्वारिकापुरी जाने के लिए हठ न
करती। पर यहाँ तो स्थिति बड़ी विकट है, कभी पेट भर अन्न नहीं मिला है और
जाड़ा सिसियाते ही व्यतीत हुआ है। घर में दरिद्रता का ऐसा साम्राज्य छाया
हुआ है कि रोटी बनाने के लिए समुचित तवा और कठौती तक नहीं है। उसे
यदि यह पता न चलता कि द्वारिकापति श्रीकृष्ण जैसे महादानी आपके बाल-सखा
तथा सहपाठी हैं तो वह कभी भी आपको द्वारिका जाने के लिए बाध्य न करती।
विशेष—सुदामा के घोर दारिद्र्य को व्यंजित करने के लिए यह छन्द,
विशेषतः इसके ये शब्द—'टूटो तवा अरु फूटी कठौती' अत्यन्त मार्मिक हैं। इससे
सुदामा के घर की दयनीय स्थिति एक चित्र प्रस्तुत हो जाता है।
(१४) शब्दार्थ—जक ठानी = किसी बात की बार-बार रट लगाना। वक =
बकवाद। जाम = पहर। दैहैं लदाय = भर देंगे। लढ़ा = बैलगाड़ी। अटारी
अटा = कोठी, भव्य भवन। छानी = छप्पर। जौ पै = यदि। काहू पै = किसी से
भी। अजानी = भोली, अनजान, अज्ञात।
व्याख्या—भाग्यवादी सुदामा अपनी पत्नी को समझाते हुए कहने लगे कि
तुम्हें तो बस सब कुछ छोड़कर दिन-रात अपनी निर्धनता की ही चिंता लगी
रहती है। क्या वह यह समझती है कि उसके (सुदामा के) द्वारिकापुरी पहुँचते
ही श्रीकृष्ण उसे गाड़ियाँ भर-भर कर धन-वैभव दे देंगे। क्या उसे इस बात का
सुदामा-चरित / ६३
ज्ञान नहीं है कि जिनके भाग्य में टूटी-फूटी झोपड़ी लिखी हो, उन्हें ऊँचे भव्य
भवन नहीं मिल सकते हैं। फलतः उसकी भोली पत्नी को यह समझ लेना चाहिए
कि यदि उनके भाग्य में निर्धनता ही लिखी हुई है तो उसे कोई दूर नहीं कर
सकता है। भाग्य का लिखा कोई नहीं मिटा सकता ।
विशेष—इस छन्द में भाग्य की प्रबलता का समर्थन किया गया है । उससे
सुदामा के चारित्रिक वैशिष्ट्य का भी उद्घाटन होता है ।
(१५) शब्दार्थ—पैज = प्रतिज्ञा । बेरे = समय । जिहि बेरे = जिस समय ।
पटकोट = वस्त्रों का ढेर । चहुँ फेरे = चारों ओर । ग्राह = मगरमच्छ, घड़ियाल ।
गयंद = हाथी, यहाँ गजेन्द्र का अर्थ है । निहचै = निश्चय, विश्वास । लोचन
कोर = एक नजर भर । हेरे = देखने से ।
व्याख्या—सुदामा के भाग्यवादी विचारों से असहमत होकर उसकी पत्नी
कहने लगी कि श्रीकृष्ण सब कुछ कर सकते हैं। उनमें अलौकिक शक्ति है। जब
हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को खंभे में बाँध दिया था तब भगवान् श्रीकृष्ण
ने ही प्रकट होकर प्रह्लाद की प्रतिज्ञा को पूर्ण किया था। चीरहरण के समय
ज्यों ही द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का हृदय में ध्यान किया, त्यों ही उन्होंने
दुर्योधन की सभा में वस्त्रों का ढेर लगाकर उसकी लाज बचाई । उन्होंने ग्राह
के फंदे में फंसे हुए हाथी की रक्षा की । हे स्वामी ! उसे तो श्रीकृष्ण की कृपा का
पूर्ण विश्वास है । हमारी निर्धनता से हजार गुनी बड़ी निर्धनता भी उनकी एक
कृपा-दृष्टि से दूर हो सकती है । वे सभी कुछ करने में समर्थ हैं ।
विशेष - इस छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप का प्रतिपादन हुआ है ।
वे सर्वशक्तिमान तथा भक्तवत्सल हैं ।
(१६) शब्दार्थ—चक्कवै = चक्रवर्ती राजा । चकिसे = चकित से, हैरान से
भूप = राजा । किन्नर = एक प्रकार के देवता जो संगीत में प्रवीण होते हैं।
जच्छ = यक्ष, कुबेर के गण । लौं = तक । ठाऊँ = स्थान । तैं = तूने । बिलोक्यौँ =
देखा । लोकन के मुखिया = लोकों के स्वामी । पैठन पाऊँ = प्रवेश करने पाऊँ
व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी के बार-बार कहने पर द्वारिकापुरी जाने में
अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहने लगे कि द्वारिका पहुँच जाना तो सरल
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है, । पृथ्वी—किन्तु श्रीकृष्ण के दरबार तक पहुँचना सरल नहीं है । उनके
महल के द्वार पर अनेक चक्रवर्ती राजा चकित-से होकर खड़े रहते हैं और कई
राजा तो वहाँ इस प्रकार चुपचाप खड़े रहते हैं, मानो मार्ग भूलकर वहाँ आ
गये हों। निवासियों की तो बात क्या, बड़े-बड़े देवता, गंधर्व, किन्नर, यक्ष भी
प्रातः से सायं तक वहाँ खड़े रहते हैं, उन्हें द्वारिकापति श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं
हो पाते । उसने (सुबुद्धि) तो दरबार देखा नहीं इसलिए वह उसे वहाँ की
महिमा समझाने में असमर्थ है। उनके दरबार के अन्दर तो लोकों के स्वामी
भी नहीं जा सकते, उन्हें भी बाहर ही रुकना पड़ता है । द्वारिकाधीश के ऐसे
भव्य दरबार में दीन-हीन, निर्धन सुदामा भला कैसे प्रवेश पा सकता है ? अर्थात्
उसका वहाँ जाकर श्रीकृष्ण से मिलना सम्भव नहीं है ।
विशेष—इस छन्द में श्रीकृष्ण के भव्य दरबार की भव्य शोभा तथा महा-
नता का उद्घाटन हुआ है और उसीके माध्यम से सुदामा अपनी विवशता
व्यक्त करते हैं।
(१७) शब्दार्थ—तिमि = उसी तरह । अन्तरजामी = अन्तर्यामी, मन की
बात जानने वाले । तिहारी = तुम्हारी । सिख = शिक्षा । सुधि - खबर ।
व्याख्या—सुदामा-पत्नी श्रीकृष्ण को अन्तर्यामी बताकर अपने पति को
निस्संकोच द्वारिकापुरी जाने का आग्रह करती हुई कहती है कि भगवान् श्री-
कृष्ण अन्तर्यामी हैं। उसकी इस बात को वे मान लें। भले ही उनके द्वार पर
अनेक राजा भूले हुए-से खड़े रहते हों, बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा, देव, गन्धर्व,
किन्नर, यक्ष और लोकपाल भले ही उनके द्वार पर रोक दिये जाँय किन्तु आपके
साथ ऐसा व्यवहार नहीं हो सकता । उसे इस बात का पूर्ण विश्वास है कि यदि
वे द्वारिकापुरी जाएंगे तो श्रीकृष्ण सबको छोड़कर पहले उन्हीं की खबर लेंगे
अर्थात् उनका पूर्ण स्वागत होगा और उन्हें मिलने के लिए कोई नहीं रोकेगा।
विशेष—इस छन्द में सुदामा-पत्नी का यह तर्क अत्यन्त सार्थक तथा प्रभाव-
शाली है कि श्रीकृष्ण अन्तर्यामी हैं और सुदामा को उन तक पहुँचने और मिलने में
कोई बाधा नहीं आएगी। वस्तुतः सुबुद्धि का बुद्धि-कौशल सराहनीय है ।
(१८) शब्दार्थ—विलम्ब = देरी । सदाई = सदैव, सदा । याहि तें = इसी
सुदामा-चरित / ६५
से । भावत = अच्छी लगती है । जौ जो । निबहै = निर्वाह होगा । सुरेसहु =
इन्द्र । ठकुराई = प्रभुता, स्वामी होना ।
व्याख्या—सुदामा श्रीकृष्ण को दीनदयाल मानते हुए, उन्हीं के प्रेम तथा
भक्ति को जीवन का सर्वस्व घोषित करता है । उसके विचार से भी श्रीकृष्ण
के दरबार में पहले निर्धनों की ही सुनवाई होती है। उन्होंने द्रौपदी की लाज
बचाने में, हाथी की मगरमच्छ से रक्षा करने में और प्रह्लाद की प्रतिज्ञा पूर्ण
करने में, तनिक भी देर न की । वे वास्तव में दीनदयालु हैं, इसी से वह निर्धनता
को पसन्द करता है । उसकी यह हार्दिक इच्छा है कि जिस प्रकार अब तक
उन्होंने अपना जीवन व्यतीत किया उसी प्रकार शेष जीवन भी व्यतीत हो जाता
तो बहुत अच्छा होता । यदि भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम नहीं है तो इन्द्र देवता का
पद भी व्यर्थ है । द्वारिकापुरी जाने से धन-वैभव तो अपार मिल सकता है किन्तु
प्रभु-भक्ति में कमी आ जाने से वह सभी कुछ व्यर्थ होगा । फलतः इन्द्र देवता
के पद से निर्धनता अच्छी है, जिसके रहते हम प्रभु-भक्ति बनाए रख सकते हैं ।
विशेष—इस छन्द में श्रीकृष्ण का दीनदयालु रूप तथा सुदामा का हरि-
भक्त रूप साकार हो उठे हैं। सुदामा की निष्ठा तथा सच्चा भक्ति-भाव
स्तुत्य है ।
(१६) शब्दार्थ—हितु = हितैषी, मित्र । पट = वस्त्र । जग्य = यज्ञ । पित्रई
= बाप-दादा । विमुख -प्रतिकूल । अगरई = पहले से ही । केतौ = कितना ।
अलसात = आलस्य क्यों करते हो । विचित्रई = विचित्रता । जौ पै = जो कहीं ।
मित्रई = मित्रता । तौ पै = तो फिर । एते = इतने ।
व्याख्या—सुदामा-पत्नी अपने बुद्धि-कौशल का सदुपयोग करती हुई कहने
लगी कि उन्होंने अब तक फटे-पुराने वस्त्र पहने, टूटी-फूटी झोंपड़ी में दिन व्यतीत
किए, भिक्षा मांगकर भोजन किया और कभी इतना धन नहीं पाया कि यज्ञ
अदि करके देवता-पितरों को संतुष्ट करते, फलतः वे सदैव प्रतिकूल रहे । भग-
वान श्रीकृष्ण दीनबन्धु हैं, वे आपको दुखी देखकर दया करेंगे । वह यह बात
पहले से ही जानती है कि श्रीकृष्ण आपको बहुत कुछ देंगे, फिर भी न जाने क्यों
द्वारिकापुरी जाने में आप आलस्य कर रहे हैं । वहाँ जाने में आपको लज्जा
६६ / सुदामा-चरित
नहीं करनी चाहिए। विपत्ति पड़ने पर मित्र के पास जाना सर्वथा उचित है,
इसमें किसी प्रकार की कोई विचित्रता नहीं है। कृष्ण जैसे दयालु तथा दानी से
मित्रता होने पर भी यदि आप जीवन-भर निर्धनता में ही दिन काटें तो उनकी
मित्रता किस दिन काम आएगी अर्थात् मित्रता की कसौटी तो यही है कि वह
समय पर काम आए। इसलिए आपको अपनी मैत्री से लाभान्वित होना चाहिए।
विशेष — इस छन्द में एक ओर सुदामा के दारिद्र्य का मर्मस्पर्शी वर्णन
हुआ है। और दूसरी ओर उसकी पत्नी सुबुद्धि के बुद्धि वैभव का अति सुन्दर रूप
देखने को मिलता है। उसके तर्क अत्यन्त सटीक तथा अकाट्य हैं।
(२०) शब्दार्थ—नीकी = उचित, अच्छी। तैं = तुम। प्रीति सरसाइए =
प्रेम बढ़ाना चाहिए। जेंइए = भोजन र्क जिए। आपहु = आप भी। जेंवाइए =
भोजन कराइए। जोरि बैठत समाज भूप = राजाओं की सभा लगाकर। सकु-
चाइए = लज्जा का अनुभव करना।
व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी की बातों में अपना हित देखकर भी उनका
समर्थन नहीं करता है। उसके विचार से उसकी पत्नी ने यद्यपि उसके हित की
बात कही है कि वह धन-वैभव पाने के लिए द्वारिकाधीश के पास चला जाए
किन्तु उससे मित्रता नष्ट हो सकती है। सच्ची मित्रता तो नित्य-प्रति विकसित
होनी चाहिए। जब मित्र, मित्र से मिले हृदय प्रसन्न तथा आनन्दित होना चाहिए।
ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि यदि मित्र के घर जाकर भोजन किया।
जाए तो उसे भी अपने घर बुलाकर भोजन कराना चाहिए। दोनों के जीवन-स्तर
में समानता होनी चाहिए। श्रीकृष्ण महाराज हैं, बड़े-बड़े राजाओं का समाज
उनके पास जुटता है। अपनी इस दीन-हीन दशा में जाकर, उन्हें लज्जित करना
या स्वयं लज्जित होना समीचीन नहीं है। अपने भाग्य में ईश्वर ने जो सुख-
दुःख के दिन लिख दिये हैं वे तो काटने ही पड़ेंगे किन्तु विपत्ति पड़ने पर दुःख
के समय मित्र के द्वार पर कभी भी नहीं जाना चाहिए।
विशेष—इस छन्द में सुदामा मित्रता के लिए समानता और स्वार्थहीनता
को आवश्यक मानते हैं। अपनी इस धारणा के अनुसार द्वारिकापुरी नहीं जाना
चाहते हैं।
सुदामा-चरित / ६७
(२१) शब्दार्थ—विदित = प्रसिद्ध। चटसार = पाठशाला। कैयोवार =
कितनी ही वार। लोचन अपार = असंख्य नेत्र, दिव्य दृष्टि वाले। सहस्रगुनी =
हजार गुनी।
व्याख्या—सुबुद्धि श्री कृष्ण के विभिन्न गुणों का उल्लेख करके अपने पति
सुदामा को उनके पास जाने की प्रेरणा देती हुई कहती है कि वे ब्राह्मणों के
भक्त हैं, संसार प्रसिद्ध दीनबन्धु अर्थात दीनों का पालन करने वाले हैं। वे
महादानी हैं और सभी की सुधि लेने वाले हैं। कई बार आप कह चुके हैं कि वे
आप के साथ एक ही पाठशाला में पढ़े हैं। यह कभी नहीं हो सकता कि असंख्य
नेत्रों वाले श्रीकृष्ण आपको न पहचानें। आप दीन हैं, वे दीनबन्धु हैं। आप
जैसा और कौन दीन-हीन होगा ? जिसे वे अपने मन में नहीं जानेंगे। श्रीकृष्ण
आपका नाम सुनकर चार गुणा प्रेम मानेंगे, किन्तु आपके द्वार पर पहुचने पर
उनकी प्रीति सौगुनी और आपको देख लेने पर सहस्रगुनी बढ़ जाएगी।
ऐसी स्थिति में आपको द्वारिकापुरी अवश्य जाना चाहिए।
विशेष—इस छन्द में श्रीकृष्ण के कृपालु, दीनबन्धु एव मित्र-वत्सल रूप
को उभारा गया है। उसी का आश्रय लेकर सुबुद्धि अपने पति सुदामा को उनके
पास भेजना चाहती है।
(२२) शब्दार्थ—चूक = भूल, कमी। मों = मुझसे। पै दहँ = अवश्य देंगे।
लायकै = लायक, योग्य। या विधि = इस प्रकार। पन द्वै = दो पन, आधी उम्र।
बिरधापन = वृद्धावस्था, बुढ़ापा। केतो = कितना। होहुँ कनवड़ो = आभारी होऊँ
कृतज्ञ होऊँ।
व्याख्या—(सुदामा ने कहा—) श्रीकृष्ण वास्तव में बड़े प्रेमी हैं। उनके
प्रेम में कोई कमी नहीं। यदि मैं उनके दर्शन करने जाऊँगा तो मुझे देखते ही वे
उठ कर (मुझे) गले से लगा लेंगे। उनके द्वार पर जाने से वे मुझे कुछ धन-सम्पत्ति
आदि भी अवश्य देंगे। (फिर भी मैं वहाँ जाना नहीं चाहता)। बाल्यावस्था
और युवावस्था मैंने गरीबी में ही बिता दी। अब वृद्धावस्था आ गयी है। अब
जीना ही कितने दिन है कि श्रीकृष्ण का अहसानमंद बनूँ।
विशेष—इस छन्द में सुदामा का स्वाभिमानी व्यक्तित्व मुखरित हो उठा
६८ / सुदामा-चरित
है। वे आत्म-सम्मान के बदले धन-वैभव नहीं चाहते हैं।
(२३) शब्दार्थ—ठाकुर = स्वामी। प्रसंग = विषय। हितू = मित्र। जिय
में == हृदय में। कहा == क्या; व्यर्थ। सिधाइए = सिधारिये; जाइये।
व्याख्या—(सुदामा की पत्नी ने कहा—) यदि दीनों पर दया करने वाले
कृष्ण के समान मित्र मिल जायें तो उनका हजार बार अहसान मानने में कोई
बुराई नहीं है। श्रीकृष्ण तीनों लोकों के स्वामी हैं। उनके दरबार में जाने में
किसी तरह की लज्जा नहीं होनी चाहिये। हे नाथ! आप इधर-उधर की सब
बातें छोड़कर मेरी बात मानें। साधारण मनुष्यों के द्वार पर जाने से क्या लाभ
है? आप द्वारिकापति श्रीकृष्ण के यहाँ जाने के लिए प्रस्थान कीजिये।
विशेष—इस सवैया छन्द में सुबुद्धि अपने बुद्धि-कौशल को प्रदर्शित करती
हुई अपने पति सुदामा को श्रीकृष्ण के पास जाने और उनसे धन-वैभव प्राप्त
करने की प्रेरणा देती है। उसका मुख्य तर्क यही है कि द्वार-द्वार भिक्षा माँगने
से तो यह कहीं उत्तम है कि महादानी श्रीकृष्ण का द्वार खटखटाया जाये।
(२४) शब्दार्थ—जाम == याम; प्रहर। जक == एक ही बात को बार-बार
कहना; जिद्द। जा == यदि; जो। जो न कहौ करिए == यदि तेरा कहा न मानें।
अपनी गति हेरे = अपनी दीन दशा देखकर। छरिया == द्वारपाल। तेरे == निकट।
चाउर = चावल।
व्याख्या—(सुदामा ने कहा—) आठो पहर तुम एक ही बात रटती हो,
द्वारिका जाइये, द्वारिका जाइये। अगर तुम्हारी बात नहीं मानता हूँ तो तुम्हें
दुःख होगा। पर अपनी दीन दशा देख कर कहीं जाने की इच्छा नहीं होती।
श्रीकृष्ण के द्वार पर द्वारपाल खड़े रहते हैं। राजा भी उनके पास नहीं पहुँच पाते
हैं। तुम इस बात पर भी तो विचार करो कि उन्हें भेंट देने के लिए मेरे पास
पाँच सुपारी और चार चावल भी नहीं हैं। फिर, मैं उनके पास जाऊँ तो कैसे?
विशेष—सुदामा अपना आत्म-सम्मान खोकर श्रीकृष्ण से धन-सम्पत्ति प्राप्त
नहीं करना चाहते हैं, किन्तु पत्नी के सबल तर्कों को काटने में असमर्थ होकर
अन्त में यह बहाना बनाते हैं कि श्रीकृष्ण को भेंट करने के लिए उसके पास न
सुपारी है और न चावल।
सुदामा-चरित / ६६
(२५) शब्दार्थ—परोसिनी = पड़ोसिन । पाव-सेर = एक पाव । हुलास =
उत्साह; प्रसन्नता ।
व्याख्या—यह सुनकर ब्राह्मणी पड़ोसिन के पास गयी और पाव-भर चावल
बड़े हुलास से ले आयी ।
(२६) शब्दार्थ—सिद्धि करी = प्रस्थान किया । गणपति = गणेशजी । दुप-
टिया = दुपट्टा । खूँट = छोर । वाली-बूट = गेहूँ की वालियाँ और हरे चने ।
व्याख्या—चावलों को दुपट्टे के कोने में बाँध कर सुदामाजी ने श्रीगणेशजी
का स्मरण करके द्वारिका के लिए प्रस्थान किया । मार्ग में (पड़े खेतों से)
वालियाँ और हरे चने माँग कर खाते हुए सुदामाजी चलते गये ।
(२७) शब्दार्थ—दूखि उठे = दर्द करने लगे । पयार = पुआल ।
व्याख्या—तीन दिनों तक चलते-चलते जब सुदामाजी के पाँव थक गये, तो
वे एक जगह घास-पुआल बिछा कर सो गये ।
(२८) शब्दार्थ — पीर = दुःख । ठाढ़ो कियो = खड़ा कर दिया ।
व्याख्या—अन्तर्यामी श्रीकृष्ण को अपने भक्त मित्र की यह दशा मालूम हो
गयी । (वे समझ गये कि यह दुर्बल ब्राह्मण पैदल द्वारिका पहुँचने का कष्ट न
सह सकेगा) अतः, उन्होंने नींद की हालत में ही सुदामा को उठा कर गोमती के
तीर पर ला रखा ।
विशेष—इस दोहा छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप का निरूपण हुआ है।
वे अन्तर्यामी हैं; दीनबन्धु हैं। अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने वाले हैं। उसी
समय वे सोये हुए पीड़ित सुदामा को गोमती नदी के किनारे पहुँचाते हैं ।
(२९) शब्दार्थ—दरस = दर्शन । भो = हुआ । नित-निमित्त = संध्या, तर्पण,
अर्घ्य इत्यादि नित्य-कर्म ।
व्याख्या—जब सुदामा की नींद टूटी तो उन्होंने देखा कि वे गोमती के तीर
पर हैं। उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वहाँ पर उन्होंने स्नान-ध्यान, पूजन-पाठ आदि
नित्य के काम किये ।
विशेष - इस दोहा छन्द में सुदामा की कर्म-काण्डी-प्रवृत्ति का निरूपण
हुआ है ।
५० / सुदामा-चरित
(३०) शब्दार्थ—घसिकै = घिस कर। सुमिरिनी = जपमाला, जिससे मंत्रों
की संख्या गिनने का काम लिया जाता है। दिव्य = अलौकिक; अति सुन्दर।
द्वारावती = द्वारिकापुरी।
व्याख्या—सुदामाजी ने चन्दन घिस कर माथे पर तिलक लगाया। हाथ में
माला लेकर फेरी। इसके बाद द्वारिका के अलौकिक सौन्दर्य को देख मानो वे
सनाथ हो गये।
(३१) शब्दार्थ—दीठि = आँख; नजर; दृष्टि। सुवर्नमई = सुनहले; स्वर्ण-
मय। सरस = सुन्दर; बढ़ कर। भौन = भवन; प्रासाद। साधि-साधि मौन =
मौन साध कर। सुदामैं = सुदामा को। धाय = दौड़कर। पौरजन = पुरजन; नगर
के लोग। गहे पाँय = पाँव पकड़ लिये। गौन = गमन। कहाँ कीन्ह गौन हैं = कहाँ
जा रहे हैं; कहाँ चले हैं? धीरज अधीर के = दुखी को धीरज देने वाले। हरन पर
पीर के = दूसरों के कष्टों का हरण करने वाले। बलबीर = श्रीकृष्ण।
व्याख्या—द्वारिका के सुनहले महलों को देख कर सुदामाजी की आँखें
चौंधिया गयीं। वहाँ के महल एक-से-एक सुन्दर थे। बिना पूछे वहाँ कोई किसी
से बात नहीं करता था। देवताओं की तरह सभी मौन साध कर बैठे थे।
(सुदामाजी को अनजान समझ) उन्हें देख कर नगरवासियों ने दौड़ कर उनके
पाँव पकड़ लिये और पूछा—हे ब्राह्मण देवता! कृपा करके बतलाइये कि आप
कहाँ चले हैं? सुदामा ने उत्तर दिया, अधीरों को धीरज देने वाले और दुखियों
की पीड़ा तथा कष्ट को दूर करने वाले बलराम के भाई श्रीकृष्ण के महल कहाँ
हैं? (मुझे वहीं जाना है।)
विशेष—इस कवित्त में द्वारिकापुरी की अपार शोभा, उसके निवासियों का
शान्त स्वभाव, शालीनता, ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम के साथ-साथ श्रीकृष्ण
के दीनबन्धु रूप को चित्रित किया गया है। पूर्णोपमा अलंकार सौष्ठव भी द्रष्टव्य
है।
(३२) शब्दार्थ—काहू = किसी ने। कर गहि लीन्हौं आय = आकर हाथ
पकड़ लिया। दीनदयाल = दीनदयालु।
व्याख्या—दीन-हीन समझ कर एक व्यक्ति ने उनका हाथ पकड़ लिया और
सुदामा-चरित / ७१
उन्हें श्रीकृष्णजी के राजप्रसाद के द्वार पर पहुँचा दिया ।
(३३) शब्दार्थ - द्विज = ब्राह्मण । दंड-प्रनाम - दण्डवत; अभिवादन; साष्टांग
प्रणाम । भाषिए = कहिये । सकुल = वंश-परिचय सहित ।
व्याख्या - ब्राह्मण समझ कर द्वारपाल ने उन्हें प्रणाम किया और कहा -
"हे ब्राह्मण ! कृपा करके अपने नाम और कुल का परिचय दीजिये (जिससे मैं
आपके आगमन की सूचना श्रीकृष्ण तक पहुँचा दूँ) ।
(३४) शब्दार्थ- ब्रजराज = ब्रज के राजा; श्रीकृष्ण । गाथा = गाथा; वृत्तान्त ।
व्याख्या - सुदामा ने द्वारपाल से कहा, मेरा नाम सुदामा है । मैं श्रीकृष्ण
के साथ पढ़ता था। मैं ब्राह्मण-वंश का हूँ । इतना सुनकर श्रीकृष्ण सब कुछ
समझ जायेंगे ।
(३५) शब्दार्थ- चलि तहँ गयो = वहाँ चला गया । हाथ जोरि = हाथ जोड़
कर । बोल्यौ = बोला ।
व्याख्या - द्वारपाल ने श्रीकृष्ण के पास जाकर, हाथ जोड़ कर और शीश
नवा कर कहा - ।
(३६) शब्दार्थ - पगा = पगड़ी । झगा = अँगरखा; कुर्ता । तन = शरीर ।
को = कौन । जाने को आहि = न जाने कौन है । केहि = किस । बसै केहि ग्रामा
= न जाने किस गाँव में रहता है । लटी-दुपटी = पुराना फटा हुआ दुपट्टा ।
उपानह = जूता । पाँय = पाँव में । पाँय उपानह की नहिं सामा = पैरों में जूते
भी नहीं हैं। रह्यो चकि = विस्मय से चकित हो रहा है। वसुधा = धरती; स्थान;
भवन । अभिरामा = अभिराम; सुन्दर । रह्यो चकि सों वसुधा अभिरामा = यहाँ
का वैभव देख कर चकित हो रहा है । धाम = महल; मकान ।
व्याख्या - हे प्रभु ! द्वार पर एक बहुत दुबला-पतला ब्राह्मण खड़ा है ।
उसके माथे पर न पगड़ी है, न देह पर कुर्ता । न जाने कौन है, कहाँ घर है ? वह
एक फटी-पुरानी धोती पहने है। उसके पैरों से जूते भी नहीं हैं। बड़ी देर से वह
यहाँ का वैभव देखकर चकित हो रहा है । वह आपके महलों का पता पूछ रहा
है और अपना नाम 'सुदामा' बताता है ।
विशेष - इस सवैया छन्द में सुदामा की दयनीय स्थिति का अत्यन्त मर्म-
७२ / सुदामा-चरित
स्पर्शी चित्रण हुआ है । कविवर नरोत्तमदास ने उसकी दीन-हीन दशा तथा मनः-
स्थिति के उद्घाटन में अपना कवि-कौशल प्रकट किया है ।
(३७) शब्दार्थ-द्वारपालक = द्वारपाल; दरवान । छांड़े = छोड़कर । जी की
गति = हृदय की दशा । को = कौन । धाय = दौड़ कर । गहे पाँय = पैर पकड़ लिये ।
भेंटे लपटाय = गले से लिपट कर मिले । ऐसे दुख सानै कौं = दुःख में इस प्रकार
कौन सम्मिलित होता है । कुसल = कुशल । विपदा = पहिचानै को = इस विपत्ति
में तुम्हारे बिना कौन पहचान सकता है ? जैसी तुम करी = मानै को = हे दया
के सागर ! जैसा प्रेमपूर्ण व्यवहार तुमने मेरे साथ इस विपत्ति में किया वैसा
दूसरा कौन कर सकता है ?
व्याख्या—जैसे ही कृष्ण ने द्वारपाल के मुख से सुदामा ब्राह्मण का नाम
सुना, वैसे ही सब काम-धाम छोड़ कर हाथ जोड़े और दौड़ पड़े । उस समय उनके
हृदय की दशा कैसी रही होगी, इसे बतलाया नहीं जा सकता । उन्होंने सुदामा
के पैर पकड़ लिये और उन्हें गले से लगा लिया । दुःख में इस प्रकार सम्मिलित
कौन होता है ? सुदामा की दीन दशा देखकर श्रीकृष्ण की आँखों में आँसू भर
आये । उन्होंने सुदामा से कुशल समाचार पूछा । सुदामा ने कहा, (मैं विपत्ति में
हूँ) तुम्हारे सिवा, इस विपत्ति के समय और मुझे पहचानता ही कौन ? हे दया
के सागर ! जैसा प्रेमपूर्ण व्यवहार तुमने मेरे साथ किया वैसा दूसरा और कौन
कर सकता है ? दीन-दुखियों पर ऐसी कृपा तुम्हारे सिवा और कोई नहीं कर
सकता ।
विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री के भव्य रूप का निरूपण
हुआ है । वे अपने बाल-सखा सुदामा का नाम सुनते ही बड़े उत्साह के साथ उसका
स्वागत करते हैं । उसे गले लगकर मिलते हैं, उसकी दयनीय स्थिति को देखकर
अपनी आँखों में आँसू भर उसका कुशल समाचार पूछते हैं । धन्य है यह आदर्श
मित्र-वत्सलता । स्वभावोक्ति अलंकार का सौष्ठव भी दर्शनीय है ।
(३८) शब्दार्थ—लोचन = आँख; नैन । पूरि = भरी । लोचन पूरि रहे जल
सो = आँखें आँसू से भर गयीं । दूरि तैं = दूर से ही । दुख मेट्यो = दुःख हो
गया । सुरनायक = इन्द्र । हिय माँझ = हृदय में । कलपद्रुम = नन्दनवन का वृक्ष-
सुदामा-चरित / ७३
विशेष, जो मनोवांछित फल देता है। खेट्यौ = खटका हुआ, आशंका हुई।
कम्प...सरसो = कुबेर का कलेजा काँपने लगा। परसो पग = पैर छूते ही।
जात...समेट्यौ = सोने का सुमेरु सिकुड़ने लगा। राउ = राजा। अंक भरि =
अँकवार भर कर। रमापति = विष्णु, कृष्ण।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने नेत्रों में जल भर कर जब सुदामा की ओर दूर से
देखा, तभी सुदामा के सारे दुःख दूर हो गये। जब उन्होंने सुदामा के पैर पकड़े
तब इन्द्र के मन में यह भय हुआ कि कहीं भगवान् इन्द्रासन ही सुदामा को न
दे दें। कल्पवृक्ष के मन में यह खटका हुआ कि कहीं हमें ही न भगवान् दान कर
दें। कुबेर का हृदय यह सोच कर काँप उठा कि कहीं भगवान् त्रिभुवन की सारी
सम्पत्ति सुदामा को न दे दें। सोने का पर्वत सुमेरु जैसे अपने-आप में सिकुड़ने
लगा कि कहीं उपहारस्वरूप वही न भेंट कर दिया जाय। (मगर अब देना शेष
ही क्या रह गया था) जब श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपनी भुजाओं में प्रीतिवश
भर लिया, तभी वे भिखारी से राजा हो गये।
[कवि ने परोक्ष-रूप से यहाँ यह संकेत किया हैं कि श्रीकृष्ण वास्तव में
तीनों लोकों के स्वामी हैं, इन्द्र, कुबेर आदि उनके इशारे पर चलने वाले सेवक
हैं। उनके दर्शन से ही सांसारिक कष्ट दूर हो जाते हैं और उनकी कृपा से
सारी सम्पदा प्राप्त हो जाती है।]
विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप की ओर संकेत
किया गया है। वे तीनों लोकों के स्वामी हैं, इन्द्र, कुबेर आदि उनके संकेतों पर
कार्य करते हैं, उनके दर्शन-मात्र से ही सभी सांसारिक कष्ट दूर हो जाते हैं और
वे अपार धन-वैभव प्रदान करने वाले हैं। इसके अतिरिक्त इस छन्द में चंचलाति-
शयोक्ति एवं परिकर अलंकार का भी सुन्दर प्रयोग देखा जा सकता है।
(३६) शब्दार्थ—त्रिभुवन = तीनों लोक। राय = राजा। अंतःपुर = रनि-
वास, रंगमहल। भेंटि = मिल कर। भली विधि = अच्छी तरह। त्रिभुवन-
राय = श्रीकृष्ण। दूजो = दूसरा।
व्याख्या—सुदामा से अच्छी तरह मिल-भेंट कर श्रीकृष्ण हाथ पकड़ कर
उन्हें महल के भीतर ले गये, जहाँ श्रीकृष्ण के सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं
७४ / सुदामा-चरित
जो सकता था ।
(४०) शब्दार्थ—मनिमंडित = जिसमें मणियाँ जड़ी हों । कनक = सोना ।
ता = तिस । पगधोवन को = पैर धोने के लिए ।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने सुदामा को मणि-जटित सोने की चौकी पर बैठाया
और उनके पैर धोने के लिए स्वयं ही एक परांत में पानी भर कर रखा ।
(४ ) शब्दार्थ—राज-रमनि = रानियाँ (राज-रमणि) । सोलह-सहस =
सोलह हजार । सह-सेवकन = दास-दासियों के साथ । पटरानी = प्रधान रानी ।
चितै = देखकर । हेत = प्रेम । स-मीत = सखियों के साथ ।
व्याख्या—यह देख कर आठों पटरानियाँ, सोलह हजार रानियाँ और
सहायिकाएँ चकित हो गयीं ।
(४२) शब्दार्थ—जिनके चरनन को सलिल = जिनके चरणों का जल ।
हरत जगत-संताप = संसार का दुःख दूर करता है । (यहाँ संकेत इस बात की
ओर है कि गंगा का उद्गम विष्णु के चरणों से हुआ है ।) तें = वे । आप =
स्वयं ही ।
व्याख्या—(कवि कहता है) जिन परब्रह्म—श्रीकृष्ण के चरणों का जल
(गंगाजी) संसार के कष्टों को दूर करता है, वे स्वयं आज सुदामा ब्राह्मण के
चरण धो रहे हैं ।
(४३) शब्दार्थ—बेहाल = बुरी दशा, दुखी । बेवाइन = बिवाई, पैर की
एड़ियाँ फटने की स्थिति । कंटकजाल = काँटों का छत्ता, काँटों का समूह । पुनि =
फिर । जोए = देखे । इतै = यहाँ । कितै = कहाँ । कितै दिन खोए = कहाँ इतने
दिन बिताये । करुना करिकै = करुणा से अभिभूत हो कर । करुनानिधि =
करुणा के सागर, कृष्ण । पग = पैर ।
व्याख्या—(धोने के लिए जब श्रीकृष्ण ने सुदामा के पैर उठाये तो उन्होंने
देखा कि) बिवाइयों से सुदामा के पैरों के तलुए फटे हुए हैं और उनमें सैकड़ों
काँटे चुभे हुए हैं । (पैरों की इस दुर्दशा से श्रीकृष्ण ने सुदामा के कष्टों का अनु-
मान कर लिया) । उन्होंने रो कर कहा—हे मित्र, तुमने बहुत दुःख पाया है ।
न मालूम तुम कहाँ भटकते रहे । तुम यहाँ क्यों नहीं आये? सुदामा की दीनदशा
सुदामा-चरित / ७५
देख कर करुणा से अभिभूत हो श्रीकृष्ण इतना रोये कि परात का पानी छूने की
आवश्यकता ही न पड़ी, आँखों से बही हुई जल-धारा से ही उन्होंने सुदामा के
पैर धो डाले ।
विशेष — यह सवैया 'सुदामाचरित' के मार्मिक छन्दों में से एक है । इसमें
सुदामा के दारिद्र्य का हृदय-विदारक चित्रण और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का
मर्म-स्पर्शी निरूपण हुआ है । अनुप्रास अलंकार का अति स्वाभाविक प्रयोग
भावों को प्रभावशाली बनाने में बड़ा उपयोगी रहा है ।
(४४) शब्दार्थ—पट-पीत = पीत पट, पीताम्बर, पीला वस्त्र । सतिभामा
= सत्यभामा (श्रीकृष्ण की एक पटरानी) ।
व्याख्या—सुदामा के पैर धो कर श्रीकृष्ण ने अपने पीताम्बर से उन्हें पोंछा
और सत्यभामा से कहा—तुम जा कर इनके लिए भोजन तैयार करो ।
(४५) शब्दार्थ—तंदुल = चावल । तिय = स्त्री । दीन्हें हते = दिये थे ।
आगे धरियो जाय = जा कर भेंटना । विभव = वैभव, ऐश्वर्य ।
व्याख्या—इस प्रकार जब सुदामा निश्चिंत हुए तो उन्हें याद आया कि
उनकी पत्नी ने श्रीकृष्ण को भेंट देने के लिए चावल दिये थे । पर यहाँ का
राजसी ठाट-बाट देख कर उन्हें वह भेंट देने में संकोच हो रहा था ।
(४६) शब्दार्थ—रीति = ढंग, पद्धति, मनोदशा । सुहृद = मित्र । प्रगट =
प्रकट, प्रत्यक्ष ।
व्याख्या—भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्यामी है । भक्त सुदामा के मन का संकोच
उन्होंने जान लिया । अपने मित्र सुदामा ब्राह्मण से प्रत्यक्ष रूप में उन्होंने इस
प्रकार अपना प्रेम प्रकट किया—
(४७) शब्दार्थ—कछु = कुछ । काहे न देत = क्यों नहीं देते ? पोटरी =
गठरी । चाँपि रहे = दबा रहे हो, छिपाये हो । काँख = बगल । हेत = हेतु,
कारण ।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने विनोद करते हुए कहा, भाभी ने मेरे लिए जो कुछ
भेंट दी है उसे देते क्यों नहीं ? पोटली को काँख में क्यों दबा रखा है ?
(४८) शब्दार्थ—आगे = पहले । गुरु-मातु = गुरु की पत्नी । ते = तिसको ।
७६ / सुदामा-चरित
चाबि = खा गये। 'चना गुरु-मातु... नहिं दीने = यहाँ श्रीकृष्ण और सुदामा के
विद्यार्थी-जीवन की एक घटना की ओर संकेत है। दोनों सन्दीपन गुरु के पास
पढ़ते थे। एक दिन गुरु-पत्नी ने दोनों को लकड़ी लाने के लिए जंगल भेजा।
सुदामा को उन्होंने कुछ चने दे कर कहा कि भूख लगने पर तुम और कृष्ण
दोनों चबा लेना। संयोगवश वन में आँधी-पानी का सामना करना पड़ा। कृष्ण-
सुदामा भटक कर एक-दूसरे से अलग हो गये। भूख लगने पर सुदामा ने चने
चबा लिये, पर कृष्ण को यह न बतलाया कि गुरु-पत्नी ने चने दिये थे।
लौटने पर कृष्ण को यह बात मालूम हुई। बानि = आदत। प्रवीने = प्रवीण,
चतुर। सुधा-रस-भीने = अमृत-रस से वेष्टित। अजौ = आज भी। तैसेई...
कीनै = भाभी के इन चावलों के साथ वैसे ही करोगे क्या ?
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने हँस कर कहा, चोरी करने में तुम चतुर हो। (याद
है न) एक बार गुरु-माता ने चने दिये थे और तुम हमें न दे कर सब चट कर
गये थे। (और आज भी तुम वही कर रहे हो) भाभी के दिये हुए, सुधा रस से
भीगे, चावलों की पोटली बगल में छिपाये बैठे हो। (देखता हूँ) तुम्हारी चोरी की
पुरानी आदत नहीं गयी।
विशेष—इस सवैया छन्द में हास्य-व्यंग्य की छटा दर्शनीय है। श्रीकृष्ण
अपने बालसखा की झेंप दूर करने के लिए बाल्यकाल की उस घटना की ओर
संकेत करते हैं, जिससे उसका उत्साह बढ़े। सुदामा ने गुरु-माता द्वारा दिए चने
सारे स्वयं खा लिए और श्रीकृष्ण को उनका हिस्सा नहीं दिया। इस घटना
की याद दिलाकर वे उन चावलों को माँगते हैं, जिन्हें सुदामा संकोचवश देने
में सकुचा रहा था। इससे श्रीकृष्ण की आत्मीयता, आदर्श-मैत्री तथा विनोदी-
प्रकृति का आभास मिलता है।
(४६) शब्दार्थ—संकुचत = संकोच करते हुए। चितवत = देखते हुए।
जीरन = जीर्ण, पुराना। तेहि ठौर = उसी जगह। बिखरि गए = छितरा गये,
फैल गये।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण द्वारा पिछली चोरी का भेद खोला जाता देख कर)
सुदामा ने बड़े संकोच से, श्रीकृष्ण की ओर देखते हुए पोटली को खोलना शुरू
सुदामा-चरित / ७७
किया। किन्तु कपड़ा इतना पुराना था कि गाँठ खोलते समय फट गया और
चावल बिखर गये।
विशेष—इस दोहा छन्द में सुदामा के दारिद्र्य का अत्यन्त मर्मस्पर्शी
चित्रण हुआ है। 'जीरन पट फटि छुटि परे' के द्वारा कवि सुदामा की दीन-हीन
दशा का एक और हृदय-विदारक बिम्ब प्रस्तुत करता है।
(५०) शब्दार्थ—चबत—चबाने के साथ ही। चबाउ—कानाफूसी करना,
गुप्त मंत्रणा। चतुरानन—ब्रह्मा। त्रिपुरारि—शिव।
व्याख्या—शीघ्र ही कृष्ण ने (बिखरे हुए चावलों को समेट कर) एक अंजुलि
भर चावल मुँह में डाल लिया। श्रीकृष्ण को इस प्रकार चावल चबाते देखकर
ब्रह्मा और शिव आपस में तरह-तरह की बातें करने लगे।
(५१) शब्दार्थ—कमला—लक्ष्मी। मोसो—मुझसे। कहा—क्या। मन
आँको—मन उकता गया; मन फिर गया। मोसो...आँको ?—क्या मुझसे
भगवान का मन फिर गया ? रिद्धि—ऋद्धि; समृद्धि। सिद्धि—सफलता। रिद्धि-
सिद्धि—समृद्धि और सफ़लता देने वाली देवियां हैं। ये गणेशजी की पत्नी या
अनुचरी हैं। निधि—कुबेर के रत्न - पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द
कुन्द, नील और खर्व। बम्हना—ब्राह्मण। धौंको—न जाने कौन है ? झौंकी—
फाँका। बकसै जनि—कहीं दान न कर दें। कुबेर—धन के देवता, देवताओं के
कोषाध्यक्ष, उत्तर दिशा के स्वामी।
व्याख्या—जब कृष्ण ने चावल की दूसरी फंकी ली तो लक्ष्मी काँप उठीं। वे
मन में सोचने लगीं, क्या अब भगवान् का मन मुझसे फिर गया ? (क्यों वे मुझे
इस गरीब ब्राह्मण को दे देना चाहते हैं)। ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ और निधियाँ भी
काँप उठीं और सोचने लगीं कि यह ब्राह्मण कौन है (जिसे भगवान् सब कुछ दे
देना चाहते हैं)। इन्द्र को भय होने लगा कि भगवान् गरीब ब्राह्मण पर प्रसन्न
होकर उसे इन्द्रासन ही न दे दें। सोने का सुमेरु डर गया कि भगवान् कहीं उसे
ही दान में न दे दें। धनाधीश कुबेर चौंक पड़े कि आज क्या भगवान् खजाना
ही खाली कर देंगे।
विशेष—इस सवैया छन्द में अद्भुत रस का सुन्दर परिपाक हुआ है।
७८ / सुदामा-चरित
श्रीकृष्ण जब अपने मित्र सुदामा की स्नेह-भेंट चावलों को खाने लगते हैं तो लक्ष्मी,
ऋद्धि, सिद्धि, इन्द्र, कुबेर आदि सभी चिंतित हो उठते हैं। उनकी चिंता
का कवि ने अति स्वाभाविक निरूपण किया है। अतिशयोक्ति अलंकार के प्रयोग
से भावोत्कर्ष में अच्छी सहायता मिली है।
(५२) शब्दार्थ— हूल = घबड़ाहट; पीड़ा। हियरा में = हृदय में। कानन =
कानों में। टेर = पुकार, आवाज। भेंटत सुदामैं···आघात ही— (१) सुदामा
ने भेंटस्वरूप जो चावल दिया उसे चाव से खाते हुए कृष्ण नहीं अघाते हैं।
(२) कृष्ण सुदामा से मिलते हैं और चावल चबा कर अघाते नहीं हैं। सोर
भयौ = हल्ला मच गया। ठाढ़ी = खड़ी-खड़ी। थरहरैं = काँपती हैं। तहीं = उसी
जगह। नाक लोक— स्वर्ग लोक। नाग लोक— पाताल लोक। ओक-ओक— घर
घर। थोक-थोक = समूह के समूह, टोली की टोली। गातहीं = शरीर। हालो
परो = हल्ला मच गया। थोकन में = झुंड और समूह में। लालो परो लोकन
मैं = लोकों में त्रास छा गया; अकाल पड़ गया। चालो परो चक्रन में— (१)
जन्म के दरिद्र सुदामा का आज भाग्य पलट रहा है; वह रंक से राजा होने जा
रहा है। इससे कालचक्र भी चलायमान हो गया। (२) चारों ओर उथल-पुथल
मच गई।
व्याख्या—कानों-कानों में यह बात फैल गई कि श्रीकृष्ण ने सुदामा जैसे
दीन का बहुत आदर-सत्कार किया और वे अब उससे भेंटस्वरूप मिले। साधारण
चावल ऐसी रुचि से चबा रहे हैं कि अघाते ही नहीं। सबके हृदय में एक घबरा-
हट-सी हुई। नरोत्तमदास कहते हैं कि समृद्धि और सफलता की अधिष्ठात्री
ऋद्धि-सिद्धियों में कोलहल सा मच गया। (अपने पति भगवान् की यह
अप्रत्याशित विरक्ति देखकर) लक्ष्मीजी वहीं खड़ी-खड़ी काँपने लगीं। स्वर्ग में
पाताल में, घर-घर में, झुण्ड-झुण्ड में इस अनहोनी घटना की खबर फैल गई।
इस संवाद से सबके मुख सूख गए और सब काँपने लगे। श्रीकृष्ण के चावल
चबाते ही देव-समूह में हल्ला मच गया कि अब क्या होगा? लोक-लोक में अकाल
पड़ गया (क्योंकि अधिकांश समृद्धि भगवान् ने सुदामा को दे दी)। श्रीकृष्ण की
यह लीला देखकर कालचक्र भी विचलित हो उठा। (जिस सुदामा के भाग्य में
सुदामा-चरित / ७६
इतनी दरिद्रता लिखी थी, वह दो मुट्ठी चावल खिलाकर आज अपार सम्पत्ति
का मालिक होने जा रहा है, अतः अपनी परवशता पर काल का विचलित हो
उठना स्वाभाविक ही है।)
विशेष—इस कवित्त में भावानुकूल भाषा का प्रयोग, कहावतों तथा अनु-
प्रासों का सौष्ठव भाव को प्रभावोत्पादक बनाने में अत्यन्त उपयोगी रहा है।
इसमें भाव एवं कला का एक साथ सौन्दर्य द्रष्टव्य है।
(५३) शब्दार्थ—भौन—भवन। पकवान—पूरी कचौड़ी आदि। निधि—
खजाना। सुषमा—सुन्दरता। अभिलाषत—चाहते हैं। दाख—मुनक्का, अंगूर
न चाखत—चखते तक नहीं। सिंधु छमा के—क्षमा के सागर, श्रीकृष्ण। सेर-
पावक—लगभग पाव भर। समा—साँवाँ; एक प्रकार का चावल। कंत रमा
के = लक्ष्मी-पति; विष्णु; कृष्ण।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण को सुदामा के साधारण चावलों को चबाते देखकर
लोग आपस में कहने लगे) सौन्दर्य के भण्डार, श्रीकृष्ण के महल तरह-तरह की
मिठाइयों और पकवानों से भरे पड़े हैं। साँझ-सवेरे उनके माता-पिता बड़े दुलार
से उनसे मिठाई-पकवान खाने का आग्रह करते हैं। पर क्षमा के सागर श्रीकृष्ण
अंगूर भी नहीं चखते। (कहने का तात्पर्य यह है कि मेवा-मिठाई में भी श्रीकृष्ण
की रुचि नहीं।) प्रीति की रीति को क्या कहा जाय; एक दुखिया ब्राह्मण एक पाव
साँवाँ जैसे मोटा चावल लाया है, (मेवा-मिठाई में भी रुचि नहीं लेने वाले)
श्रीकृष्ण उन मोटे चावलों को बड़े प्रेम से बैठे चबा रहे हैं।
विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का निरूपण हुआ
है। वे नाना प्रकार के पकवान छोड़कर मित्र के द्वारा भेंट किए गए चावल
जिस प्रेम-भाव से चबाते हैं, उसमें मैत्री-आदर्श का चरमोत्कर्ष देखा जा सकता
हैं। विषम अलंकार का प्रयोग भी भावों को प्रभावोत्पादक बनाने में बड़ा उप-
योगी रहा है।
(५४) शब्दार्थ—रुकुमिनि=रुक्मणी कृष्ण की आठ पटरानियों में एक।
अनचाह=अनिच्छा; उदासीनता।
व्याख्या—(दो मुट्ठी चावल खाने के बाद) श्रीकृष्ण ज्योंही तीसरी मुट्ठी