सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ६६
(२५) शब्दार्थ—परोसिनी = पड़ोसिन । पाव-सेर = एक पाव । हुलास =
उत्साह; प्रसन्नता ।
व्याख्या—यह सुनकर ब्राह्मणी पड़ोसिन के पास गयी और पाव-भर चावल
बड़े हुलास से ले आयी ।
(२६) शब्दार्थ—सिद्धि करी = प्रस्थान किया । गणपति = गणेशजी । दुप-
टिया = दुपट्टा । खूँट = छोर । वाली-बूट = गेहूँ की वालियाँ और हरे चने ।
व्याख्या—चावलों को दुपट्टे के कोने में बाँध कर सुदामाजी ने श्रीगणेशजी
का स्मरण करके द्वारिका के लिए प्रस्थान किया । मार्ग में (पड़े खेतों से)
वालियाँ और हरे चने माँग कर खाते हुए सुदामाजी चलते गये ।
(२७) शब्दार्थ—दूखि उठे = दर्द करने लगे । पयार = पुआल ।
व्याख्या—तीन दिनों तक चलते-चलते जब सुदामाजी के पाँव थक गये, तो
वे एक जगह घास-पुआल बिछा कर सो गये ।
(२८) शब्दार्थ — पीर = दुःख । ठाढ़ो कियो = खड़ा कर दिया ।
व्याख्या—अन्तर्यामी श्रीकृष्ण को अपने भक्त मित्र की यह दशा मालूम हो
गयी । (वे समझ गये कि यह दुर्बल ब्राह्मण पैदल द्वारिका पहुँचने का कष्ट न
सह सकेगा) अतः, उन्होंने नींद की हालत में ही सुदामा को उठा कर गोमती के
तीर पर ला रखा ।
विशेष—इस दोहा छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप का निरूपण हुआ है।
वे अन्तर्यामी हैं; दीनबन्धु हैं। अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने वाले हैं। उसी
समय वे सोये हुए पीड़ित सुदामा को गोमती नदी के किनारे पहुँचाते हैं ।
(२९) शब्दार्थ—दरस = दर्शन । भो = हुआ । नित-निमित्त = संध्या, तर्पण,
अर्घ्य इत्यादि नित्य-कर्म ।
व्याख्या—जब सुदामा की नींद टूटी तो उन्होंने देखा कि वे गोमती के तीर
पर हैं। उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वहाँ पर उन्होंने स्नान-ध्यान, पूजन-पाठ आदि
नित्य के काम किये ।
विशेष - इस दोहा छन्द में सुदामा की कर्म-काण्डी-प्रवृत्ति का निरूपण
हुआ है ।