संग्रह पर लौटें


श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
५८- ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों, नक्षत्रों, जलों आदिके अधिपतिके रूपमें सूर्य, चन्द्रमा, वरुण आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण
पृष्ठ 246स्थायी लिंक
| २४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| एवं सङ्क्षिप्य कथितं ग्रहाणां गमनं द्विजाः।<br>भास्करप्रमुखानां च यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ३७<br><br>ग्रहाधिपत्ये भगवान् ब्रह्मणा पद्मयोनिना।<br>अभिषिक्तः सहस्रांशू रुद्रेण तु यथा गुहः॥ ३८<br><br>तस्माद् ग्रहार्थना कार्या अग्नौ चोद्यं यथाविधि।<br>आदित्यग्रहपीडायां सद्भिः कार्यार्थसिद्धये॥ ३९ | होती हैं, किंतु उनका यह योग एक-दूसरेके साथ बिना संकर (मिश्रण)-के ही होता है—ऐसा विद्वानोंको जानना चाहिये॥ ३२–३६॥<br><br>हे द्विजो! इस प्रकार मैंने जैसा देखा तथा सुना है, उसके अनुसार संक्षेपमें सूर्य आदि ग्रहोंकी गतिका वर्णन किया। पद्मयोनि ब्रह्माने ग्रहोंके अधिपतिके रूपमें हजार किरणोंवाले भगवान् सूर्यको अभिषिक्त किया है। जैसे रुद्रने कार्तिकेयको अभिषिक्त किया है। अतः सज्जनोंको [अपने] कार्यकी सिद्धिके लिये सूर्य ग्रहकी पीड़ाके समय कहे गये विधानके अनुसार यथाविधि अग्निमें ग्रहर्चन करना चाहिये॥ ३७–३९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ज्योतिषचक्रे ग्रहचारकथनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ज्योतिषचक्रमें ग्रहचारकथन' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५७॥
अट्टावनवाँ अध्याय
ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों, नक्षत्रों, जलों आदिके अधिपतिके रूपमें सूर्य, चन्द्रमा, वरुण आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण
| ऋषय ऊचुः<br>अभ्यषिञ्चत्कथं ब्रह्मा चाधिपत्ये प्रजापतिः।<br>देवदैत्यमुखान् सर्वान् सर्वात्मा वद साम्प्रतम्॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] सर्वात्मा प्रजापति ब्रह्माजीने सभी प्रमुख देवताओं तथा दैत्योंको अधिपतिके रूपमें किस प्रकार अभिषिक्त किया, इस समय [हमलोगोंको] बताइये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>ग्रहाधिपत्ये भगवानभ्यषिञ्चद्दिवाकरम्।<br>ऋक्षाणामोषधीनां च सोमं ब्रह्मा प्रजापतिः॥ २ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] भगवान् ब्रह्माने ग्रहोंके अधिपतिके रूपमें सूर्यका और नक्षत्रों तथा औषधियोंके अधिपतिके रूपमें चन्द्रमाका अभिषेक किया॥ २॥ |
| अपां च वरुणं देवं धनानां यक्षपुङ्गवम्।<br>आदित्यानां तथा विष्णुं वसूनां पावकं तथा॥ ३<br><br>प्रजापतीनां दक्षं च मरुतां शक्रमेव च।<br>दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादं दैत्यपुङ्गवम्॥ ४<br><br>धर्मं पितॄणामधिपं निर्ऋतिं पिशिताशिनाम्।<br>रुद्रं पशूनां भूतानां नन्दिनां गणनायकम्॥ ५<br><br>वीराणां वीरभद्रं च पिशाचानां भयङ्करम्।<br>मातॄणां चैव चामुण्डां सर्वदेवनमस्कृताम्॥ ६ | उन पितामहने वरुणदेवको जलोंका अधिपति, यक्षोंमें श्रेष्ठ कुबेरको धनोंका अधिपति, विष्णुको आदित्योंका अधिपति, अग्निको वसुओंका अधिपति, दक्षको प्रजापतियोंका अधिपति, इन्द्रको मरुतोंका अधिपति, दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादको दैत्यों तथा दानवोंका अधिपति, धर्मको पितरोंका अधिपति, निर्ऋतिको राक्षसोंका अधिपति, रुद्रको पशुओंका अधिपति, गणोंके नायक नन्दीको भूतोंका अधिपति, भयंकर वीरभद्रको वीर पिशाचोंका अधिपति, सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत चामुण्डाको |
पृष्ठ 247स्थायी लिंक
| अध्याय ५८ ] | ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण | २४५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रुद्राणां देवदेवेशं नीललोहितमीश्वरम्।<br>विघ्नानां व्योमजं देवं गजास्यं तु विनायकम्॥ ७<br>स्त्रीणां देवीमुमादेवीं वचसां च सरस्वतीम्।<br>विष्णुं मायाविनां चैव स्वात्मानं जगतां तथा॥ ८<br>हिमवन्तं गिरीणां तु नदीनां चैव जाह्नवीम्।<br>समुद्राणां च सर्वेषामधिपं पयसां निधिम्॥ ९<br>वृक्षाणां चैव चाश्वत्थं प्लक्षं च प्रपितामहः॥ १० | मातृगणोंका अधिपति, देवदेवेश ईश्वर नीललोहितको रुद्रोंका अधिपति, व्योमसे उत्पन्न तथा हाथीके समान मुखवाले विनायकको विघ्नोंका अधिपति, देवी उमाको स्त्रियोंका अधिपति, देवी सरस्वतीको वाणीका अधिपति, विष्णुको मायावियोंका अधिपति, स्वयं अपनेको सम्पूर्ण जगत्का अधिपति, हिमालयको पर्वतोंका अधिपति, गंगाको नदियोंका अधिपति, जलनिधि (महासागर)-को सभी समुद्रोंका अधिपति और अश्वत्थ तथा प्लक्षको वृक्षोंका अधिपति बनाया॥ ३-१०॥ |
| गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मीशं पुनश्चित्ररथं चकार।<br>नागाधिपं वासुकिमुग्रवीर्यं<br>सर्पाधिपं तक्षकमग्रवीर्यम्॥ ११ | उन्होंने चित्ररथको गन्धर्वों-विद्याधरों तथा किन्नरोंका अधिपति, उग्र तेजवाले वासुकिको नागोंका अधिपति और उग्र वीर्यवाले तक्षकको सर्पोंका अधिपति बनाया॥ ११॥ |
| दिग्वारणानामधिपं चकार<br>गजेन्द्रमैरावतमुग्रवीर्यम् ।<br>सुपर्णमीशं पततामथाश्व-<br>राजानमुच्चैःश्रवसं चकार॥ १२ | उन्होंने उग्र पराक्रमवाले गजेन्द्र ऐरावतको दिग्गजोंका स्वामी, गरुड़को पक्षियोंका स्वामी और उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका स्वामी बनाया॥ १२॥ |
| सिंहं मृगाणां वृषभं गवां च<br>मृगाधिपानां शरभं चकार।<br>सेनाधिपानां गुहमप्रमेयं<br>श्रुतिस्मृतीनां लकुलीशमीशम्॥ १३ | उन्होंने सिंहको मृगोंका स्वामी, वृषभको गौओंका स्वामी, शरभको सिंहोंका स्वामी, अतुलनीय गुह (कार्तिकेय)-को सेनाधिपोंका स्वामी और लकुलीशको श्रुतियों तथा स्मृतियोंका स्वामी बनाया॥ १३॥ |
| अभ्यषिञ्चत्सुधर्माणं तथा शङ्खपदं दिशाम्।<br>केतुमन्तं क्रमेणैव हेमरोमाणमेव च॥ १४<br>पृथिव्यां पृथुमीशानं सर्वेषां तु महेश्वरम्।<br>चतुर्मूर्तिषु सर्वज्ञं शङ्करं वृषभध्वजम्॥ १५ | उन्होंने सुधर्मा, शंखपद, केतुमान् तथा हेमरोमको क्रमशः सभी दिशाओंके अधिपति रूपमें अभिषिक्त किया। उन्होंने पृथुको पृथ्वीका स्वामी, महेश्वरको सबका स्वामी और सब कुछ जाननेवाले वृषभध्वज शंकरको चारों (विश्व, प्राज्ञ, तैजस, तुरीय) मूर्तियोंका स्वामी बनाया॥ १४-१५॥ |
| प्रसादाद्गगवाञ्छम्भोश्चाभ्यषिञ्चद्यथाक्रमम्।<br>पुराभिषिच्य पुण्यात्मा रराज भुवनेश्वरः॥ १६ | इस प्रकार भगवान् ब्रह्माने शम्भुकी कृपासे पूर्वकालमें [इन सभीको] क्रमसे अभिषिक्त किया। इन्हें अभिषिक्त करके लोकोंके स्वामी पुण्यात्मा ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हो गये॥ १६॥ |
| एतद्वो विस्तरेणैव कथितं मुनिपुङ्गवाः।<br>अभिषिक्तास्ततस्वेते विशिष्टा विश्वयोनिना॥ १७ | हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने आपलोगोंको यह विस्तारसे बता दिया; विश्वको उत्पन्न करनेवाले ब्रह्माने [इसी तरहसे] विशिष्ट गुणोंसे युक्त इन सबको अभिषिक्त किया था॥ १७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्याद्याभिषेककथनं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्य आदिका अभिषेककथन' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥