श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४०- कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास तथा स्वल्प भी धर्माचरणका महत्फल एवं कलियुगके अन्तमें पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति
| १७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद्दोषदर्शनम्।<br>दोषाणां दर्शनाच्चैव द्वापरे ज्ञानसम्भवः ॥ ६८ | पैदा होता है। उस विचारसे वैराग्य तथा वैराग्यसे सांसारिक क्रियाकलापोंमें दोष दिखायी देने लगते हैं और उन दोषोंके दर्शनसे द्वापरमें ज्ञान उत्पन्न हो जाता है॥ ६६—६८॥ |
| एषा रजस्तमोयुक्ता वृत्तिर्वै द्वापरे स्मृता।<br>आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते ॥ ६९<br>द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे॥ ७० | द्वापरमें रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त इस प्रकारकी वृत्ति कही गयी है। आदि सत्ययुगमें एकमात्र धर्म ही सर्वत्र रहता है, वह त्रेतामें प्रेरणासे प्रवृत्त होता है वह धर्म द्वापरमें व्याकुल होकर स्थित रहता है तथा फिर कलियुगमें नष्ट हो जाता है॥ ६९-७०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे 'चतुर्युगधर्माणां वर्णनं' नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'चतुर्युगधर्मवर्णन' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३९॥
चालीसावाँ अध्याय
कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास तथा स्वल्प भी धर्माचरणका महत्फल एवं कलियुगके अन्तमें पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति
| शक्र उवाच | इन्द्र बोले— |
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| तिष्ये मायामसूयां च वधं चैव तपस्विनाम्।<br>साधयन्ति नरास्तत्र तमसा व्याकुलेन्द्रियाः ॥ १ | [हे शिलाद!] कलियुगमें तमोगुणसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले मनुष्य माया रचेंगे, दूसरोंका दोष देखेंगे तथा तपस्वियोंका वध करेंगे॥ १॥ |
| कलौ प्रमादको रोगः सततं क्षुद्भयानि च।<br>अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः ॥ २ | कलियुगमें प्रमाद, रोग, निरन्तर क्षुधाका भय, अनावृष्टिरूप घोर भय तथा देशोंका विपर्यय (विनाश)—ये सब होंगे॥ २॥ |
| न प्रामाण्यं श्रुतेरस्ति नृणां चाधर्मसेवनम्।<br>अधार्मिकास्त्वनाचारा महाकोपाल्पचेतसः ॥ ३ | लोग वेदोंकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करेंगे तथा अधर्मका आचरण करेंगे। मनुष्य धर्मच्युत होकर अनाचारमें रत रहेंगे और महान् क्रोधी तथा मन्द बुद्धिवाले होंगे॥ ३॥ |
| अनृतं ब्रुवते लुब्धास्तिष्ये जाताश्च दुष्प्रजाः।<br>दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमैः॥ ४<br>विप्राणां कर्मदोषेण प्रजानां जायते भयम्।<br>नाधीयन्ते तदा वेदान्न यजन्ति द्विजातयः ॥ ५ | कलियुगमें प्रजाएँ मिथ्या भाषण करेंगी, लोभ-परायण होंगी तथा मलिन आचार-विचारवाली होंगी। ब्राह्मणोंके दूषित यज्ञ, दूषित पठन, दूषित आचार एवं दूषित शास्त्रोंके सेवनरूपी कर्मदोषसे प्रजाओंमें भय उत्पन्न होगा। द्विजातिगण न तो वेदोंका अध्ययन करेंगे और न तो यज्ञ-अनुष्ठान करेंगे॥ ४-५॥ |
| उत्सीदन्ति नराश्चैव क्षत्रियाश्च विशः क्रमात्।<br>शूद्राणां मन्त्रयोगेन सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह ॥ ६<br>भवतीह कलौ तस्मिन् शयनासनभोजनैः।<br>राजानः शूद्रभूयिष्ठा ब्राह्मणान् बाधयन्ति ते ॥ ७ | क्षत्रिय, वैश्य आदि सभी मनुष्य क्रमशः विनष्ट हो जायँगे। कलियुगमें ब्राह्मण लोग शूद्रोंको मन्त्रोपदेश देंगे तथा उनके साथ शयन, आसन, भोजन आदिका व्यवहार |
अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास...पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| करके उनसे सम्बन्ध बनायेंगे। राजा लोग शूद्रवत् आचरण करते हुए ब्राह्मणोंको सन्ताप देंगे॥ ६-७॥ | |
| भ्रूणहत्या वीरहत्या प्रजायन्ते प्रजासु वै।<br>शूद्राश्च ब्राह्मणाचाराः शूद्राचाराश्च ब्राह्मणाः॥ ८ | प्रजाओंमें भ्रूणहत्या तथा वीरोंकी हत्याकी प्रवृत्ति व्याप्त रहेगी। शूद्र लोग ब्राह्मणोंका आचरण करेंगे एवं ब्राह्मण शूद्रोंका आचरण करेंगे॥ ८॥ |
| राजवृत्तिस्थिताश्चौराश्चौराचाराश्च पार्थिवाः।<br>एकपत्न्यो न शिष्यन्ति वर्धिष्यन्त्यभिसारिकाः॥ ९ | चोर लोग राजाओंके तुल्य व्यवहार करेंगे और राजा लोग चोरों-जैसा व्यवहार करेंगे। स्त्रियाँ पातिव्रत्य धर्मका पालन नहीं करेंगी और व्यभिचारिणी स्त्रियोंका बाहुल्य होगा॥ ९॥ |
| वर्णाश्रमप्रतिष्ठा नो जायते नृषु सर्वतः।<br>तदा स्वल्पफला भूमिः क्वचिच्चापि महाफला॥ १० | मनुष्योंमें वर्ण तथा आश्रमसम्बन्धी समस्त व्यवहार समाप्त हो जायगा। उस समय पृथ्वी कहीं कम और कहीं अधिक फल देनेवाली होगी॥ १०॥ |
| अरक्षितारो हर्तारः पार्थिवाश्च शिलाशन।<br>शूद्रा वै ज्ञानिनः सर्वे ब्राह्मणैरभिवन्दिताः॥ ११ | हे शिलाद! राजागण प्रजाओंके रक्षक न होकर उनके विनाशक हो जायेंगे। सभी शूद्र ज्ञानी बनकर ब्राह्मणोंसे वन्दित होंगे॥ ११॥ |
| अक्षत्रियाश्च राजानो विप्राः शूद्रोपजीविनः।<br>आसनस्था द्विजान् दृष्ट्वा न चलन्त्यल्पबुद्धयः॥ १२<br><br>ताडयन्ति द्विजेन्द्रांश्च शूद्रा वै स्वल्पबुद्धयः।<br>आस्ये निधाय वै हस्तं कर्णं शूद्रस्य वै द्विजाः॥ १३<br><br>नीचस्येव तदा वाक्यं वदन्ति विनयेन तम्। | क्षत्रियसे इतर वर्णवाले राजा होंगे, ब्राह्मण आजीविकाके लिये शूद्रोंपर निर्भर रहेंगे और अल्प बुद्धिवाले वे शूद्र ब्राह्मणोंको देखकर अपने आसनसे नहीं उठेंगे। स्वल्प बुद्धिवाले शूद्र श्रेष्ठ द्विजोंको भी दण्डित (अपमानित) करेंगे। द्विज अपने मुखपर हाथ रखकर शूद्रके कानमें विनयपूर्वक नीच व्यक्तिके समान वाक्य बोलेंगे॥ १२-१३ १/२ ॥ |
| उच्चासनस्थान् शूद्रांश्च द्विजमध्ये द्विजर्षभ॥ १४<br><br>ज्ञात्वा न हिंसते राजा कलौ कालवशेन तु।<br>पुष्पैश्च वासितैश्चैव तथान्यैर्मङ्गलैः शुभैः॥ १५<br><br>शूद्रानभ्यर्चयन्त्यल्पश्रुतभाग्यबलान्विताः।<br>न प्रेक्षन्ते गर्विताश्च शूद्रा द्विजवरान् द्विज॥ १६ | हे द्विजश्रेष्ठ! कलियुगमें कालके वशमें होकर राजा ब्राह्मणोंके बीच उच्च आसनपर बैठे हुए शूद्रको देखकर उसे दण्डित नहीं करेंगे। वे पुष्पों, सुगन्धित पदार्थों तथा अन्य मंगल-द्रव्योंसे शूद्रोंकी पूजा करेंगे। हे द्विज! अल्प शास्त्र-ज्ञान, खोटे भाग्य एवं बलसे युक्त शूद्र लोग गर्वित होकर श्रेष्ठसे श्रेष्ठ द्विजोंकी ओर देखनातक पसन्द नहीं करेंगे॥ १४-१६॥ |
| सेवावसरमालोक्य द्वारे तिष्ठन्ति वै द्विजाः।<br>वाहनस्थान् समावृत्य शूद्रान् शूद्रोपजीविनः॥ १७<br><br>सेवन्ते ब्राह्मणास्तत्र स्तुवन्ति स्तुतिभिः कलौ।<br>तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजोत्तमाः॥ १८ | अपनी आजीविकाके लिये शूद्रोंपर आश्रित रहनेवाले ब्राह्मण सेवाका अवसर देखकर वाहनोंपर स्थित शूद्रोंको घेरकर उनके द्वारपर खड़े होकर उनकी सेवा करेंगे। कलियुगमें ब्राह्मण अनेकविध स्तुतियोंसे शूद्रोंका स्तवन करेंगे। उस समय उत्तम विप्रगण अपने तपों तथा यज्ञोंके फलका विक्रय करेंगे॥ १७-१८॥ |
| १७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यतयश्च भविष्यन्ति बहवोऽस्मिन् कलौ युगे।<br>पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं युगान्ते समुपस्थिते॥ १९ | उस कलियुगमें बहुत लोग संन्यासीका रूप धारण कर लेंगे। उस युगान्तके उपस्थित होनेपर पुरुष तो कम होंगे, किंतु स्त्रियाँ अधिक होंगी। कलियुगमें ब्राह्मण वेद-विद्या तथा वैदिक कर्मोंकी निन्दा करेंगे॥ १९½॥ |
| निन्दन्ति वेदविद्यां च द्विजाः कर्माणि वै कलौ।<br>कलौ देवो महादेवः शङ्करो नीललोहितः॥ २० | तब उस कलियुगमें नीललोहित महादेव शिव धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये अपनी विकृत आकृति अर्थात् उच्छिन्नभिन्न लिङ्गस्वरूपवाले होकर प्रकट होंगे॥ २०½॥ |
| प्रकाशते प्रतिष्ठार्थं धर्मस्य विकृताकृतिः।<br>ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनापि शङ्करम्॥ २१ | उस समय जो विप्रगण जिस किसी भी तरहसे उन विकृत वेषवाले शिवकी आराधना करेंगे, वे कलियुगके दोषोंपर विजय प्राप्तकर परमपदको प्राप्त होंगे॥ २१½॥ |
| कलिदोषान् विनिर्जित्य प्रयान्ति परमं पदम्।<br>श्वापदप्रबलत्वं च गवां चैव परिक्षयः॥ २२ | उस कलियुगके अन्तमें हिंसक पशुओंकी प्रबलता तथा गायोंका ह्रास होगा और उत्तम साधुओंका अभाव हो जायगा॥ २२½॥ |
| साधूनां विनिवृत्तिश्च वेद्या तस्मिन् युगक्षये।<br>तदा सूक्ष्मो महोदर्को दुर्लभो दानमूलवान्॥ २३ | उस समय दानके मूलवाला सूक्ष्म ऐश्वर्यका रूप भी दुर्लभ हो जायगा, ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रमोंकी शिथिलता हो जानेपर धर्म विनष्ट हो जायगा॥ २३½॥ |
| चातुराश्रमशैथिल्ये धर्मः प्रतिचलिष्यति।<br>अरक्षितारो हर्तारो बलिभागस्य पार्थिवाः॥ २४ | उस युगान्तमें राजा लोग प्रजाजनोंकी रक्षा न करके मात्र अपनी रक्षामें तत्पर रहेंगे और बलिभाग [कर]-के हर्ता बन जायँगे॥ २४½॥ |
| युगान्तेषु भविष्यन्ति स्वरक्षणपरायणाः।<br>अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः॥ २५<br><br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति कलौ युगे।<br>चित्रवर्षी तदा देवो यदा प्राहुर्युगक्षयम्॥ २६ | कलियुगमें समस्त प्राणी अन्न तथा कन्याओंका विक्रय करनेवाले एवं ब्राह्मण वेद बेचनेवाले होंगे और स्त्रियाँ व्यभिचारपरायण हो जायँगी। जब युगक्षय होता है, उस समय वर्षाके देवता इन्द्र कहीं-कहींपर वृष्टि करनेवाले कहे जाते हैं॥ २५-२६॥ |
| सर्वे वणिग्जनाश्चापि भविष्यन्त्यधमे युगे।<br>कुशीलचर्याः पाखण्डैर्वृथारूपैः समावृताः॥ २७ | उस अधम कलियुगमें सभी वणिक् जन भी कुत्सित आचरणवाले, दम्भ करनेवाले तथा पाखण्डी अर्थात् अवैदिक मार्गोंपर चलनेवाले होंगे॥ २७॥ |
| बहुयाजनको लोको भविष्यति परस्परम्।<br>नाव्याहृतक्रूरवाक्यो नार्जवी नानसूयकः॥ २८<br><br>न कृते प्रतिकर्ता च युगक्षीणे भविष्यति।<br>निन्दकाश्चैव पतिता युगान्तस्य च लक्षणम्॥ २९ | कलियुगमें सभी लोग ग्रामयाजक (पात्र-अपात्रका विचार किये बिना सबका यज्ञ आदि करानेवाले) हो जायँगे। कोई भी मृदु वचन बोलनेवाला, सरल स्वभाववाला, ईर्ष्यारहित तथा प्रत्युपकारी अर्थात् अपने लिये किये गये उपकारको माननेवाला नहीं होगा और सभी लोग निन्दक एवं पतित हो जायँगे। यह सब युगान्त कलियुगका लक्षण है॥ २८-२९॥ |
अध्याय ४०] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास...पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नृपशून्या वसुमती न च धान्यधनावृता।<br>मण्डलानि भविष्यन्ति देशेषु नगरेषु च॥ ३० | पृथ्वी राजाओंसे शून्य हो जायगी तथा धन-धान्यसे परिपूर्ण नहीं रहेगी। देशों और नगरोंमें बहुत-से स्थान जनशून्य हो जायँगे॥ ३०॥ |
| अल्पोदका चाल्पफला भविष्यति वसुन्धरा।<br>गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः सम्भविष्यन्त्यशासनाः॥ ३१ | पृथ्वी अल्प जलवाली तथा कम फल देनेवाली होगी। रक्षक ही भक्षक बन जायँगे एवं लोग स्वेच्छाचारी हो जायँगे॥ ३१॥ |
| हर्तारः परवित्तानां परदारप्रधर्षकाः।<br>कामात्मानो दुरात्मानो ह्यधमाः साहसप्रियाः॥ ३२<br><br>प्रनष्टचेष्टनाः पुंसो मुक्तकेशाश्च शूलिनः।<br>जनाः षोडशवर्षाश्च प्रजायन्ते युगक्षये॥ ३३ | युगान्त कलियुगमें सभी लोग दूसरोंके धनका हरण करनेवाले, परस्त्रीगमन करनेवाले, कामी, दुरात्मा, अधम, दुस्साहसी, उद्योगरहित, लज्जारहित, रोगी तथा सोलह वर्षकी परम आयुवाले होंगे॥ ३२-३३॥ |
| शुक्लदन्ताजिनाक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः।<br>शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते॥ ३४ | कलियुगके उपस्थित होनेपर शूद्रगण [निर्लज्जता-पूर्वक] दाँत दिखाते हुए गेरुआ वस्त्र तथा रुद्राक्ष धारणकर एवं मुण्डित सिरवाले होकर यतियोंके धर्मका आचरण करेंगे॥ ३४॥ |
| सस्यचौरा भविष्यन्ति दृढचैलाभिलाषिणः।<br>चौराश्चोरस्वहर्तारो हर्तुर्हर्ता तथापरः॥ ३५<br><br>योग्यकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते।<br>कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान्॥ ३६ | कलियुगमें लोग धान्यका हरण करनेवाले तथा अत्यन्त दुष्ट लोगोंके संगकी अभिलाषा करनेवाले होंगे। चोर चोरोंका धन चुरायेंगे और उनके भी धनको कोई दूसरा हरण कर ले जायगा। मनुष्यके विधिसम्मत कर्मसे विरत होकर निष्क्रिय होनेपर कीट, मूषक तथा सर्प मनुष्योंको पीड़ित करेंगे॥ ३५-३६॥ |
| सुभिक्षं क्षेममारोग्यं सामर्थ्यं दुर्लभं तदा।<br>कौशिकीं प्रतिपत्स्यन्ते देशान् क्षुद्भयपीडिताः॥ ३७<br><br>दुःखेनाभिप्लुतानां च परमायुः शतं तदा। | उस समय सुभिक्ष, कल्याण, नीरोगता, सामर्थ्य आदि दुर्लभ हो जायँगे। लोग क्षुधापीड़ित होकर अपने देशसे आकर कौशिकी नदीके तटपर बसेंगे। लोग दुःखित होकर सौ वर्षकी पूर्ण आयु व्यतीत करेंगे॥ ३७ १/२॥ |
| दृश्यन्ते न च दृश्यन्ते वेदाः कलियुगेऽखिलाः॥ ३८<br><br>उत्सीदन्ति तदा यज्ञा केवलाधर्मपीडिताः। | कलियुगमें सभी वेदोंका प्रचार-प्रसार कहीं दिखायी देगा और कहीं नहीं। समस्त यज्ञ अधर्मसे पीड़ित होकर विनष्ट हो जायँगे॥ ३८ १/२॥ |
| काषायिणोऽप्यनिर्ग्रन्थाः कापालीबहुलास्त्विह॥ ३९<br><br>वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणः परे।<br>वर्णाश्रमाणां ये चान्ये पाषण्डाः परिपन्थिनः॥ ४०<br><br>उत्पद्यन्ते तदा ते वै सम्प्राप्ते तु कलौ युगे। | संन्यासी शास्त्रज्ञानसे रहित होंगे तथा कापालिक बहुत-से होंगे। कुछ लोग वेद बेचेंगे, तो अन्य लोग तीर्थोंका विक्रय करेंगे। अन्य पाखण्डी लोग वर्णाश्रमधर्मके प्रतिकूल आचरण करेंगे। कलियुगके उपस्थित होनेपर इस प्रकारके लोग उत्पन्न होंगे॥ ३९-४० १/२॥ |
| अधीयन्ते तदा वेदान् शूद्रा धर्मार्थकोविदाः॥ ४१<br><br>यजन्ते चाश्वमेधेन राजानः शूद्रयोनयः।<br>स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम्॥ ४२ | धर्म तथा अर्थके पण्डित बनकर शूद्रलोग वेदोंका अध्ययन करेंगे एवं शूद्र जातिके राजा अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करेंगे। उस समय सभी प्राणी स्त्रियों, बालकों |
| १८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तथा गायोंका वध करके परस्पर नानाविध उपद्रव उत्पन्न करेंगे॥ ४१-४२^१/_२॥ | |
| उपद्रवांस्तथान्योऽन्यं साधयन्ति तदा प्रजाः।<br>दुःखप्रभूतमल्पायुर्देहोत्साहः सरोगता॥ ४३<br><br>अधर्माभिनिवेशित्वात्तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्।<br>प्रजासु ब्रह्महत्यादि तदा वै सम्प्रवर्तते॥ ४४ | उस समय अपार दुःख, अल्प आयु, शारीरिक कष्ट तथा व्याधियोंसे लोग पीड़ित होंगे। ऐसा कहा गया है कि कलियुगमें अधर्मके प्रति अत्यन्त आसक्ति होनेके कारण लोगोंका आचरण तमोगुणप्रधान होगा। उस समय प्रजाओंमें ब्रह्महत्या आदि महापापकर्म करनेकी विशेष तत्परता होगी॥ ४३-४४॥ |
| तस्मादायुर्बलं रूपं कलिं प्राप्य प्रहीयते।<br>तदा त्वल्पेन कालेन सिद्धिं गच्छन्ति मानवाः॥ ४५ | अतएव कलियुगको प्राप्तकर प्रजाओंकी आयु, बल, रूप आदिका क्षय होगा। उस समय अल्पकालके धर्माचरणसे ही मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होंगे॥ ४५॥ |
| धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते द्विजसत्तमाः।<br>श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं ये चरन्त्यनसूयकाः॥ ४६ | उस कलियुगमें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वेषरहित होकर वेदों तथा स्मृतियोंमें प्रतिपादित धर्मोंका आचरण करेंगे, वे धन्य होंगे॥ ४६॥ |
| त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः।<br>यथाक्लेशं चरन् प्राज्ञस्तदह्ना प्राप्नुते कलौ॥ ४७ | त्रेतामें वर्षभर तथा द्वापरमें मासभर धर्माचरण करनेसे जिस फलका प्राप्त होना बताया गया है, ज्ञानवान् व्यक्ति कलियुगमें वही फल यथाशक्ति एक दिन धर्माचरण करके प्राप्त कर लेता है॥ ४७॥ |
| एषा कलियुगावस्था संध्यांशं तु निबोध मे।<br>युगे युगे च हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादांस्तु सिद्धयः॥ ४८ | यह कलियुगकी दशाका वर्णन किया गया है। अब आप उसका सन्ध्यांश मुझसे जान लीजिये। युग-युगमें सिद्धियोंके तीन पादोंका ह्रास होता है॥ ४८॥ |
| युगस्वभावाः सन्ध्यास्तु तिष्ठन्तीह तु पादशः।<br>सन्ध्यास्वभावाः स्वांशेषु पादशस्ते प्रतिष्ठिताः॥ ४९ | युगके स्वभाववाली सन्ध्याएँ यहाँ पादसे न्यून होकर रहती हैं। इस प्रकार सन्ध्याके स्वभाव अपने अंशोंमें अर्थात् सन्ध्यांशोंमें एक चतुर्थांशसे न्यून होकर प्रतिष्ठित रहते हैं॥ ४९॥ |
| एवं सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके।<br>तेषां शास्ता ह्यसाधूनां भूतानां निधनोत्थितः॥ ५० | इस प्रकार युगान्तमें सन्ध्यांशकालके उपस्थित होनेपर दुष्ट प्राणियोंके संहारके लिये उनका एक महान् शासक आविर्भूत होगा॥ ५०॥ |
| गोत्रेऽस्मिन् वै चन्द्रमसो नाम्ना प्रमितिरुच्यते।<br>मानवस्य तु सोऽंशेन पूर्वं स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ५१ | पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें जो प्रमिति नामसे विख्यात रहे हैं, वे मनुपुत्रके अंशसे इस कलियुगके समाप्तिकालमें चन्द्रमाके गोत्रमें सोमशर्मा नामक ब्राह्मणके रूपमें उत्पन्न होंगे॥ ५१॥ |
| समाः सविंशतिः पूर्णा पर्यटन् वै वसुन्धराम्।<br>अनुकर्षन् स वै सेनां सवाजिरथकुञ्जराम्॥ ५२<br><br>प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>स तदा तैः परिवृतो म्लेच्छान् हन्ति सहस्रशः॥ ५३ | शस्त्रधारी ब्राह्मणोंसे निरन्तर परिवृत वे हाथी, घोड़े तथा रथसे युक्त विशाल सेना साथमें लेकर पूरे बीस वर्षतक पृथ्वीपर घूम-घूमकर सैकड़ों और हजारों बार म्लेच्छोंका वध करेंगे॥ ५२-५३॥ |
अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स हत्वा सर्वशश्चैव राज्ञस्तान् शूद्रयोनिजान्।<br>पाखण्डांस्तु ततः सर्वान्निःशेषं कृतवान् प्रभुः॥ ५४ | परम ऐश्वर्यसम्पन्न वे ब्राह्मणपुत्र शूद्रयोनिमें उत्पन्न उन सभी पाखण्डी राजाओंको मारकर पृथ्वीको उनसे पूर्णतः विहीन कर देंगे॥ ५४॥ |
| नात्यर्थं धार्मिका ये च तान् सर्वान् हन्ति सर्वतः।<br>वर्णव्यत्यासजाताश्च ये च ताननुजीविनः॥ ५५ | अधर्मका आचरण करनेवाले, वर्णव्यवस्थाके प्रतिकूल चलनेवाले तथा इनके जो अनुजीवी हैं, उन सभीको वे मार डालेंगे॥ ५५॥ |
| प्रवृत्तचक्रो बलवान् म्लेच्छानामन्तकृत् तु।<br>अधृष्यः सर्वभूतानां चचाराथ वसुन्धराम्॥ ५६ | सभी प्राणियोंके लिये अजेय, म्लेच्छोंके संहारक, अत्यन्त बलशाली तथा प्रवृत्त-आज्ञामण्डलवाले वे समग्र भूमण्डलपर विचरण करेंगे॥ ५६॥ |
| मानवस्य तु सोऽशेन देवस्येह विजज्ञिवान्।<br>पूर्वजन्मनि विष्णोस्तु प्रमितिर्नाम वीर्यवान्॥ ५७<br><br>गोत्रतो वै चन्द्रमसः पूर्णे कलियुगे प्रभुः।<br>द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रक्रान्तो विंशतिः समाः॥ ५८<br><br>विनिघ्नन् सर्वभूतानि शतशोऽथ सहस्रशः।<br>कृत्वा बीजावशेषां तु पृथिवीं क्रूरकर्मणः॥ ५९<br><br>परस्परनिमित्तेन कोपेनाकस्मिकेन तु।<br>स साधयित्वा वृषलान् प्रायस्तानधार्मिकान्॥ ६०<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्थितिं प्राप्तः सहानुगः।<br>ततो व्यतीते काले तु सामात्यः सह सैनिकः॥ ६१ | पूर्वजन्ममें वीर्यवान् प्रमिति नामवाले वे इस कलिमें मनुपुत्र विष्णुदेवके अंशसे सोम-गोत्रमें कलियुगे पूर्ण होनेपर उत्पन्न होंगे। बीस वर्षतक पराक्रम प्रदर्शित करनेवाले वे सैकड़ों-हजारों विधर्मी प्राणियोंको नष्ट करते हुए पृथ्वीको क्रूरकर्मा जनोंसे शून्यप्राय-सा करके आकस्मिक तथा पारस्परिक समुत्पादित कोपके द्वारा उन अधार्मिक वृषलप्राय जनोंको मारकर बत्तीसवें वर्षके उदित होते ही मन्त्रियों, सहचरों तथा सैनिकोंसहित गंगा-यमुनाके मध्य स्वयंको संस्थापित कर लेंगे॥ ५७–६१॥ |
| उत्साद्य पार्थिवान् सर्वान् म्लेच्छांश्चैव सहस्रशः।<br>तत्र सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके॥ ६२<br><br>स्थितास्त्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित्।<br>अप्रग्रहास्ततस्ता वै लोभाविष्टास्तु कृत्स्नशः॥ ६३ | धर्मच्युत सभी पार्थिवों तथा हजारों म्लेच्छोंको नष्ट करके उस कलियुगमें सन्ध्यांशके समुपस्थित होनेपर यत्र-तत्र थोड़ी ही प्रजाएँ बची रहेंगी। वे आत्मनियन्त्रण खोकर तथा पूर्ण रूपसे लोभके वशीभूत होकर एक-दूसरेसे कृत्रिम नम्रता प्रदर्शित करती हुई उन्हें विश्वासमें लेकर उनकी हिंसा कर डालेंगी॥ ६२–६३ १/२॥ |
| उपहिंसन्ति चान्योन्यं प्रणिपत्य परस्परम्।<br>अराजके युगवशात्संशये समुपस्थिते॥ ६४<br><br>प्रजास्ता वै ततः सर्वाः परस्परभयार्दिताः।<br>व्याकुलाश्च परिभ्रान्तास्त्यक्त्वा दारान् गृहाणि च॥ ६५ | युगके प्रभावके कारण अराजकताकी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे सभी प्रजाएँ परस्पर भयसे ग्रस्त होकर व्याकुल तथा भ्रमित हो जायेंगी। लोग अत्यन्त दुःखित एवं करुणाशून्य होकर अपनी पत्नियों तथा घरोंको छोड़कर अपने प्राणोंकी भी परवाह न करनेवाले होंगे॥ ६४–६५ १/२॥ |
| स्वान् प्राणाननपेक्षन्तो निष्कारुण्याः सुदुःखिताः।<br>नष्टे श्रौते स्मार्तधर्मे परस्परहतास्तदा॥ ६६ | श्रौत तथा स्मार्तधर्मके नष्ट हो जानेपर सभी प्रजाएँ मर्यादाहीन, अत्यन्त क्रूर, स्नेहरहित तथा निर्लज्ज होकर एक-दूसरेकी हिंसा करानेमें तत्पर रहेंगी॥ ६६ १/२॥ |
| निर्मर्यादा निराक्रान्ता निःस्नेहा निरपत्रपाः।<br>नष्टे धर्मे प्रतिहताः ह्रस्वकाः पञ्चविंशकाः॥ ६७ | धर्मके नष्ट हो जानेपर पतनको प्राप्त हुए लोग लघु आकारवाले तथा पच्चीस वर्षकी आयुवाले होंगे। |
| १८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हित्वा पुत्रांश्च दारांश्च विवादव्याकुलेन्द्रियाः।<br>अनावृष्टिहताश्चैव वार्त्तामुत्सृज्य दूरतः॥ ६८ | आपसी कलहसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले लोग अपनी पत्नियों एवं पुत्रोंका त्यागतक कर देंगे॥ ६७ १/२ ॥ |
| प्रत्यन्तानुपसेवन्ते हित्वा जनपदान् स्वकान्।<br>सरित्सागरकूपांस्ते सेवन्ते पर्वतांस्तथा॥ ६९ | वृष्टि न होनेके कारण दुःखित प्रजाएँ कृषिकर्मका पूर्ण रूपसे त्याग करके अपने-अपने देशोंको छोड़कर म्लेच्छ देशों, नदी, समुद्र, कुएँ, पर्वत आदि स्थानोंपर शरण लेंगी॥ ६८-६९॥ |
| मधुमांसैर्मूलफलैर्वर्तयन्ति सुदुःखिताः।<br>चीरपत्राजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः॥ ७० | प्रजाएँ अत्यन्त दुःखित होकर मधु, मांस, कन्दमूल तथा फलोंपर जीवन-निर्वाह करेंगी। वे परिग्रहरहित एवं निष्क्रिय होकर वृक्षोंकी छाल तथा उनके पत्ते वस्त्ररूपमें धारण करेंगी॥ ७०॥ |
| वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः सङ्कटं घोरमास्थिताः।<br>एवं कष्टमनुप्राप्ता अल्पशेषाः प्रजास्तदा॥ ७१ | वर्ण तथा आश्रमव्यवस्थासे भ्रष्ट हुए लोग घोर कष्टमें पड़ जायँगे और इस प्रकार भीषण दुःख आ जानेके कारण थोड़ी ही प्रजा बच पायेगी॥ ७१॥ |
| जराव्याधिक्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमानसाः।<br>विचारणा तु निर्वेदात्साम्यावस्था विचारणा॥ ७२ | बुढ़ापा, रोग तथा क्षुधासे पीड़ित लोगोंके मनमें उस दुःखसे निर्वेद उत्पन्न होगा। पुनः उस निर्वेदसे साम्यावस्थावाली विचारणा, विचारणासे साम्यावस्थात्मक बोध |
| साम्यावस्थात्मको बोधः सम्बोधाद्धर्मशीलता।<br>अरूपशमयुक्तास्तु कलिशिष्टा हि वै स्वयम्॥ ७३ | और अन्तमें उस बोधसे धर्माचरणके प्रति प्रवृत्ति जाग्रत् होगी। कलियुगकी बची हुई वे प्रजाएँ स्वयं शक्ति-सामर्थ्यके अभावमें शान्तियुक्त हो जायँगी॥ ७२-७३॥ |
| अहोरात्रात्तदा तासां युगं तु परिवर्तते।<br>चित्तसम्मोहनं कृत्वा तासां वै सुप्तमत्तवत्॥ ७४ | इसके बाद सुप्त तथा मत्तकी भाँति उन प्रजाओंका चित्त-सम्मोहन करके एक दिन-रातमें ही कलियुग परिवर्तित हो जायगा और इस प्रकार कालधर्मके अनुसार कलियुगको दबाकर सत्ययुग प्रवृत्त हो जायगा॥ ७४ १/२ ॥ |
| भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्तत।<br>प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै॥ ७५ | तदनन्तर उस सत्ययुगके प्रवृत्त होनेपर कलियुगकी बची हुई प्रजाओंमें सत्ययुगके आचार-विचार उत्पन्न होंगे॥ ७५ १/२ ॥ |
| उत्पन्नाः कलिशिष्टास्तु प्रजाः कार्तयुगास्तदा।<br>तिष्ठन्ति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विचरन्ति च॥ ७६ | इस लोकमें उस समय जो सप्तसिद्ध¹ लोग रहते हैं, वे अदृश्य रूपमें सप्तर्षियों²के साथ व्यवस्थित होकर विचरण करते हैं॥ ७६ १/२ ॥ |
| सप्तसप्तर्षिभिश्चैव तत्र ते तु व्यवस्थिताः।<br>ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थं ये स्मृता इह॥ ७७ | जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बीजके लिये कहे गये हैं, वे सब कलियुगमें उत्पन्न होनेवालोंके साथ उस समय विशेषता-रहित होकर रहते थे॥ ७७ १/२ ॥ |
| कलिजैः सह ते सर्वे निर्विशेषास्तदाभवन्।<br>तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयन्तीत्तरेऽपि च॥ ७८ | वर्णाश्रमके आचारवाला जो श्रौत तथा स्मार्त दो |
¹ १. मन्त्रज्ञ, मन्त्रविद्, प्राज्ञ, मन्त्रराट्, सिद्धपूजित, सिद्धवत् और परमसिद्ध—ये सात सप्तसिद्ध कहे गये हैं। (लिङ्गपुराण पू० ८२।५१)
² २. कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, वसिष्ठ तथा जमदग्नि—ये सप्तर्षि कहे गये हैं।
| अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति | १८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतं स्मार्तं द्विधा तु यम्।<br>ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्धन्ते वै प्रजाः कृते ॥ ७९ | प्रकारका धर्म होता है; उस धर्मको उन लोगोंके लिये सप्तर्षि एवं सप्तसिद्ध लोग उपदेश करते हैं। इस प्रकार उन लोगोंके कर्मनिष्ठ हो जानेपर कृतयुगमें प्रजाएँ बढ़ने लगती हैं॥ ७८-७९॥ |
| श्रौतस्मार्तकृतानां च धर्मे सप्तर्षिदर्शिते।<br>केचिद्धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठन्तीह युगक्षये ॥ ८० | उन सप्तर्षियोंके द्वारा श्रौत-स्मार्तसम्बन्धी धर्मोंका उपदेश करनेसे कुछ लोग युगके क्षयके समय इस पृथ्वीलोकमें धर्मकी व्यवस्थाके लिये रह जाते हैं॥ ८०॥ |
| मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति मुनयस्तु वै।<br>यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्विह ततः क्षितौ ॥ ८१<br>वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु सम्भवः।<br>तथा कार्त्तयुगानां तु कलिजेष्विह सम्भवः ॥ ८२ | वे मुनिगण मन्वन्तरोंके अधिकारोंमें स्थित रहते हैं। जिस प्रकार इस पृथ्वीपर दावानलसे वनोंके तृण आदिके जल जानेपर बादमें प्रथम वृष्टिसे उनके मूलोंमें पुनः अंकुरण होता है; उसी प्रकार कलियुगमें उत्पन्न हुए लोगोंसे ही कृतयुगके प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है॥ ८१-८२॥ |
| एवं युगाद्युगस्येह सन्तानं तु परस्परम्।<br>वर्तते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वन्तरक्षयः ॥ ८३ | इस प्रकार अव्यवच्छिन्न रूपसे इस लोकमें मन्वन्तरके क्षयतक एक युगके कुछ संतान दूसरे युगमें विद्यमान रहते हैं॥ ८३॥ |
| सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च।<br>युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादान् क्रमेण तु॥ ८४ | प्रत्येक चतुर्युगीमें सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ तथा काम—ये सभी क्रमसे तीन-तीन पादोंके ह्रासको प्राप्त होते हैं, अर्थात् प्रत्येक युगके अन्ततक इनके एक-एक पादका ह्रास होता जाता है॥ ८४॥ |
| ससन्ध्यांशेषु हीयन्ते युगानां धर्मसिद्धयः।<br>इत्येषा प्रतिसिद्धिवैं कीर्त्तितैषा क्रमेण तु॥ ८५ | इसी प्रकार युगके सन्ध्यांशमें प्रत्येक युगकी धर्म सिद्धियोंका भी ह्रास होता है। इस तरह मैंने क्रमसे प्रत्येक सिद्धिका वर्णन कर दिया॥ ८५॥ |
| चतुर्युगानां सर्वेषामनेनैव तु साधनम्।<br>एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्राद्गुणीकृता॥ ८६ | इसी प्रकार सभी चारों युगोंकी स्थिति बनती है। चारों युगोंकी एक आवृत्तिका जो एक हजार गुना है; वही ब्रह्माजीका एक दिन कहा गया है और उतनी ही बड़ी उनकी एक रात कही जाती है॥ ८६ १/२॥ |
| ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता।<br>अनार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात्॥ ८७ | ज्यों-ज्यों युगका क्षय होता है, प्राणियोंमें जड़ता-भाव तथा स्वभावकी सरलताका अभाव बढ़ता जाता है। यही सभी युगोंका लक्षण कहा गया है॥ ८७ १/२॥ |
| एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम्।<br>एषां चतुर्युगाणां च गुणिता ह्येकसप्ततिः॥ ८८<br>क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरन्तरमुच्यते।<br>चतुर्युगे यथैकस्मिन् भवतीह यदा तु यत्॥ ८९ | क्रमसे एक चतुर्युगका इकहत्तर (७१ ६/१४) बार आवर्तन एक मन्वन्तर कहा जाता है। जो व्यवहार इस चतुर्युगमें घटित होता है, वही क्रमशः दूसरे चतुर्युगोंमें भी होता है॥ ८८-८९ १/२॥ |
| तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वै यथाक्रमम्।<br>सर्गे सर्गे यथा भेदा उत्पद्यन्ते तथैव तु॥ ९०<br>पञ्चविंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकास्तथा।<br>तथा कल्पा युगैः सार्धं भवन्ति सह लक्षणैः॥ ९१ | प्रत्येक सर्गमें पचीस प्रकारके भेदोंवाले जो तत्त्व होते |
| १८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मन्वन्तराणां सर्वेषामेतदेव तु लक्षणम्॥ ९२ । <br><br> यथा युगानां परिवर्तनानि <br> चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात्। <br> तथा तु सन्तिष्ठति जीवलोकः <br> क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः॥ ९३ | हैं; वे ही जैसे सदा उत्पन्न होते हैं और इससे कम या अधिक नहीं। उसी प्रकार युगोंके साथ-साथ लक्षणोंसहित कल्प भी होते हैं। सभी मन्वन्तरोंका भी यही लक्षण है॥ ९०–९२॥ <br> युगोंके स्वभावके अनुसार जिस प्रकार चिरकालसे प्रवृत्त होनेवाले युगोंमें परिवर्तन होता है, उसी प्रकार युगोंके अनुरूप क्षय तथा उदयसे यह जीवलोक भी संस्थित रहता है और इसमें भी युगोंके अनुरूप परिवर्तन होता रहता है॥ ९३॥ |
| इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः। <br> अतीतानागतानां हि सर्वमन्वन्तरेषु वै॥ ९४ | इस प्रकार सभी मन्वन्तरोंमें बीते हुए तथा आनेवाले युगोंके लक्षण संक्षेपमें कहे गये हैं॥ ९४॥ |
| मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च। <br> व्याख्यातानि न सन्देहः कल्पः कल्पेन चैव हि॥ ९५ | इसी तरह एक मन्वन्तरसे सभी मन्वन्तरोंकी व्याख्या की गयी है। एक कल्पके लक्षणोंसे सभी कल्पोंके लक्षण समझ लेना चाहिये। इस विषयमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है॥ ९५॥ |
| अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता। <br> मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह॥ ९६ | उसी भाँति ज्ञानी पुरुषको इस लोकमें बीते हुए तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंके विषयमें कल्पना कर लेनी चाहिये॥ ९६॥ |
| तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवन्त्युत। <br> देवा ह्यष्टविधा ये च ये च मन्वन्तरेश्वराः॥ ९७ <br><br> ऋषयो मनवश्चैव सर्वे तुल्यप्रयोजनाः। <br> एवं वर्णाश्रमाणां तु प्रविभागो युगे युगे॥ ९८ | जो आठ प्रकारके देवता*, मन्वन्तरोंके स्वामी, ऋषिगण, मनुगण आदि हैं, वे सब तुल्य अभिमान-नाम-रूपवाले हुआ करते हैं; साथ ही उन सभीका समान प्रकारका प्रयोजन भी होता है॥ ९७½॥ |
| युगस्वभावश्च तथा विधत्ते वै तदा प्रभुः। <br> वर्णाश्रमविभागांश्च युगानि युगसिद्धयः॥ ९९ <br><br> युगानां परिमाणं ते कथितं हि प्रसङ्गतः। <br> वदामि देवि पुत्रत्वं पद्मयोनेः समासतः॥ १०० | इस प्रकार मैंने युग, उनके धर्म, वर्णाश्रमोंके विभाग, युगोंकी सिद्धियाँ, युगोंके परिमाण जिन्हें युग-युगमें परमात्मा धारण करते हैं—इन सबके विषयमें आपसे प्रसंगके अनुसार कह दिया। अब मैं आपसे पद्मयोन ब्रह्माजीके देवीके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेके विषयमें संक्षेपमें कह रहा हूँ॥ ९८–१००॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुर्युगपरिमाणं नाम चत्वारिंश्शोऽध्यायः ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'चतुर्युगपरिमाण' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४०॥
* यहाँ गणदेवताओंका वर्ग आठ प्रकारका बताया गया है, किंतु अमरकोष (१।१।१०) तथा वाचस्पतिकोषमें गणदेवताओंके नौ वर्ग कहे गये हैं और एक-एक वर्गमें परिगणित देवताओंकी संख्याको इस प्रकार बताया गया है—
आदित्या द्वादशप्रोक्ता विश्वेदेवा दशस्मृताः। वसवश्चाष्ट संख्याताः षट्त्रिंशत् तुषिता मताः॥
आभास्वराश्चतुष्षष्टिर्वाताः पञ्चाशदूनकाः। महाराजिकानामानो द्वे शते विंशतिस्तथा॥
साध्या द्वादशविख्याता रुद्राश्चैकादशस्मृताः।
अर्थात् आदित्य १२, विश्वेदेव १०, वसु ८, तुषित ३६, आभास्वर ६४, मरुत् ४९, महाराजिक २२०, साध्य १२ और रुद्र ११ होते हैं।