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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

५७- बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप, ग्रह-नक्षत्रों एवं तारागणोंद्वारा ध्रुवका परिभ्रमण, ग्रहोंका स्वरूप-विस्तार तथा उनकी गतिका निरूपण

अध्याय ५७]
बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप तथा उनकी गतिका निरूपण
२४१
ततः पञ्चदशे भागे किञ्चिच्छिष्टे कलात्मके।
आधे महीनेतक पान करके वे श्रेष्ठ देवता अमावास्या
अपराह्ने पितृगणा जघन्यं पर्युपासते॥ १४
तिथिको चले जाते हैं, उसके बाद उसी अमावास्या
तिथिको पितृगण चन्द्रमाके पास स्थित होते हैं और
पिबन्ति द्विकलां कालं शिष्टा तस्य कला तु या।
शुक्लपक्षकी प्रतिपदातक बचे हुए अमृतका पान करते
निःसृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्॥ १५
हैं। अन्तिम कलाके रूपमें पन्द्रहवें भागके शेष रहनेपर
अपराह्नमें पितृगण चन्द्रमाके पास आ जाते हैं और
मासतृप्तिमवाप्याग्र्यां पीत्वा गच्छन्ति तेऽमृतम्।
उसकी जो कला बची रहती है, उसका पान दो
पितृभिः पीयमानस्य पञ्चदश्यां कला तु या॥ १६
कलावाले समय (दो घड़ी)-तक करते हैं। अमावास्या
तिथिको किरणोंसे निकले हुए स्वधामृतको पीते हैं। इस
यावत्तु क्षीयते तस्य भागः पञ्चदशस्तु सः।
प्रकार अमृत पीकर महीनेभरकी तृप्ति प्राप्त करके वे
अमावास्यां ततस्तस्या अन्तरा पूर्यते पुनः॥ १७
चले जाते हैं। प्रत्येक पक्षके आरम्भमें सोलहवें दिन
चन्द्रमाकी वृद्धि तथा क्षयका होना बताया गया है। इस
वृद्धिक्षयौ वै पक्षादौ षोडश्यां शशिनः स्मृतौ।
प्रकार पक्षमें चन्द्रमामें होनेवाली यह वृद्धि सूर्यके कारण
एवं सूर्यनिमित्तैषा पक्षवृद्धिर्निशाकरे॥ १८
होती है॥ ८-१८॥
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवर्णनं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सोमवर्णन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥
सत्तावनवाँ अध्याय
बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप, ग्रह-नक्षत्रों एवं तारागणोंद्वारा ध्रुवका परिभ्रमण,
ग्रहोंका स्वरूप-विस्तार तथा उनकी गतिका निरूपण
सूत उवाच
सूतजी बोले- [हे ऋषियो!] चन्द्रमाके पुत्र
अष्टभिश्च हयैर्युक्तः सोमपुत्रस्य वै रथः।
[बुध]-का रथ जल-अग्निमय और पिशांगवर्णवाले
वारितेजोमयश्चाथ पिशाङ्गैश्चैव शोभनैः ॥ १
सुन्दर आठ घोड़ोंसे युक्त है। दैत्योंके आचार्य बुद्धिमान्
दशभिश्चाकृशैश्शश्वैर्नानावर्णै रथः स्मृतः।
शुक्रका रथ पुष्ट, विभिन्न वर्णोंवाले तथा पृथ्वीयम दस
शुक्रस्य क्षमामयैर्युक्तो दैत्याचार्यस्य धीमतः ॥ २
घोड़ोंसे युक्त कहा गया है। मंगलका रथ सुवर्णमय, परम
अष्टाश्वश्चाथ भौमस्य रथो हैमः सुशोभनः।
सुन्दर एवं आठ घोड़ोंवाला है। बृहस्पतिका रथ सुवर्णमय
जीवस्य हैमश्चाष्टाश्वो मन्दस्यायसनिर्मितः ॥ ३
है तथा आठ घोड़ोंसे युक्त है। शनैश्चरका रथ लोहेका
बना हुआ है और वह काले वर्णवाले जलमय दस
रथ आपोमयैरश्वैर्दशभिस्तु सितेतरैः।
घोड़ोंसे युक्त है। राहु-केतुका रथ आठ घोड़ोंवाला कहा
स्वर्भानोर्भास्करारेश्च तथा चाष्टहयः स्मृतः॥ ४
गया है ॥ १-४॥
सर्वे ध्रुवनिबद्धा वै ग्रहास्ते वातरश्मिभिः।
वे सभी ग्रह वायुरश्मियोंके द्वारा ध्रुवसे बँधे हुए
एतेन भ्राम्यमाणाश्च यथायोगं व्रजन्ति वै॥५
हैं। इसके द्वारा घुमाये जाते हुए वे यथायोग चलते हैं।
यावन्त्यश्चैव ताराश्च तावन्तश्चैव रश्मयः।
जितने तारे हैं, उतनी ही [वात] रश्मियाँ हैं। वे सब
सर्वे ध्रुवनिबद्धाश्च भ्रमन्तो भ्रामयन्ति तम्॥ ६
ध्रुवसे बँधे हुए हैं और [स्वयं] घूमते हुए उस ध्रुवको

२४२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत (मूल श्लोक)हिन्दी अनुवाद
अलातचक्रवद्यान्ति वातचक्रेरितानि तु।<br>यस्माद्वहति ज्योतींषि प्रवहस्तेन स स्मृतः॥ ७घुमाते हैं। वातचक्रसे प्रेरित तारागण अंगारचक्रके समान घूमते हैं। चूँकि इन ग्रह-नक्षत्रोंका वहन वायु करता है, इसलिये उसे प्रवह कहा गया है॥ ५-७॥
नक्षत्रसूर्य्याश्च तथा ग्रहतारागणैः सह।<br>उन्मुखाभिमुखाः सर्वे चक्रभूताः श्रिता दिवि॥ ८<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चैव ध्रुवमेव प्रदक्षिणम्।<br>प्रयान्ति चेश्वरं द्रष्टुं मेढीभूतं ध्रुवं दिवि॥ ९ग्रहों तथा तारागणोंके साथ नक्षत्र तथा सूर्य सब-के-सब चक्ररूपमें उन्मुख एवं अभिमुख होकर आकाशमें स्थित हैं। ध्रुवके द्वारा नियन्त्रित वे सब ध्रुवकी प्रदक्षिणा करते हैं। वे धुरीरूप ईश्वर ध्रुवको देखनेके लिये आकाशमें भ्रमण करते हैं॥ ८-९॥
नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ १०<br>द्विगुणः सूर्य्यविस्ताराद्विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाधस्तात्प्रसर्पति॥ ११<br>उद्धृत्य पृथिवीछायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत्स्थानं तृतीयं यत्तमोमयम्॥ १२सूर्यका व्यास नौ हजार योजन कहा गया और इस प्रमाणके अनुसार उनके मण्डलका विस्तार तीन गुना है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना बताया गया है। उन दोनोंके बराबर होकर राहु नीचेसे चलता है। मण्डलाकार बनी हुई पृथ्वीछायाको लेकर राहुका तीसरा बड़ा स्थान है, जो अन्धकारमय है॥ १०-१२॥
चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनाच्च प्रमाणतः॥ १३<br>भार्गवात्पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः।<br>पादहीनौ वक्रसौरी तथायामप्रमाणतः॥ १४<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः।<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै॥ १५<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्तारान्मण्डलादपि।<br>प्रायशश्चन्द्रयोगीनि विद्यादृक्षाणि तत्त्ववित्॥ १६योजनके प्रमाणसे शुक्रका व्यास तथा मण्डल चन्द्रमाके व्यास एवं मण्डलका सोलहवाँ भाग कहा गया है। [आकारमें] बृहस्पतिको शुक्रसे एक चौथाई कम कहा गया है। विस्तारके प्रमाणसे मंगल तथा शनि बृहस्पतिसे एक चौथाई कम हैं। [अर्थात् मंगल एवं शनि विस्तारमें बृहस्पतिके तीन चौथाई हैं] बुध विस्तार तथा मण्डलमें उन दोनोंका तीन चौथाई है। तारा-नक्षत्ररूप जो पिण्ड हैं, वे विस्तार तथा मण्डलमें बुधके तुल्य हैं, तत्त्ववेत्ताको चन्द्रमासे युक्त उन नक्षत्रोंको 'ऋक्ष' नामसे जानना चाहिये॥ १३-१६॥
तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्।<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने॥ १७<br>सर्वोपरि निकृष्टानि तारकामण्डलानि तु।<br>योजनद्वयमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते॥ १८<br>उपरिष्टात्रयस्तेषां ग्रहा ये दूरसर्पिणः।<br>सौरौऽङ्गिराश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः॥ १९<br>तेभ्योऽधस्तात्तु चत्वारः पुनरन्ये महाग्रहाः।<br>सूर्यः सोमो बुधश्चैव भार्गवश्चैव शीघ्रगाः॥ २०छोटे-छोटे असंख्य तारे तथा नक्षत्र परस्पर पाँच, चार, तीन एवं दो योजनकी दूरीपर हैं। सबसे ऊपर अत्यन्त छोटे तारामण्डल हैं, जो केवल दो योजन विस्तारवाले हैं, उनसे छोटे तारे नहीं हैं। उनके ऊपर तीन ग्रह शनि, बृहस्पति तथा मंगल; जो दूरकी यात्रा करनेवाले हैं, उन्हें मन्दगतिवाला जानना चाहिये। उनके नीचे चार अन्य बड़े ग्रह सूर्य, चन्द्रमा, बुध तथा शुक्र हैं, जो तेजीसे चलनेवाले हैं॥ १७-२०॥
तावन्त्यस्तारकाः कोट्यो यावन्त्यृक्षाणि सर्वशः।<br>ध्रुवात्तु नियमाच्चैषामृक्षमार्गे व्यवस्थितिः॥ २१<br>सप्ताश्वस्यैव सूर्यस्य नीचोच्चत्वमनुक्रमात्।<br>उत्तरायणमार्गस्थो यदा पर्वसु चन्द्रमाः॥ २२तारागण उतने ही करोड़ हैं, जितने सभी ऋक्ष (नक्षत्र) हैं। ऋक्षमार्गमें उनकी भी स्थिति ध्रुवके नियन्त्रणसे ही है। सात घोड़ोंवाले सूर्यका अनुक्रमसे

अध्याय ५७ ] बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप तथा उनकी गतिका निरूपण २४३


श्लोक (संस्कृत)अर्थ (हिन्दी)
उच्चत्वाद दृश्यते शीघ्रं नातिव्यक्तैर्गभस्तिभिः।<br>तदा दक्षिणमार्गस्थो नीचां वीथीमुपाश्रितः॥ २३<br><br>भूमिरेखावृतः सूर्यः पौर्णिमावास्ययोस्तदा।<br>ददृशे च यथाकालं शीघ्रमस्तमुपैति च॥ २४<br><br>तस्मादुत्तरमार्गस्थो ह्यमावास्यां निशाकरः।<br>ददृशे दक्षिणे मार्गे नियमाद् दृश्यते न च॥ २५नीचोच्चत्व (नीचा तथा ऊँचा होना) होता रहता है। जब सूर्य उत्तरायणमार्गमें स्थित होते हैं और चन्द्रमा पूर्ण मण्डलमें होते हैं, तब सूर्य कुछ अस्पष्ट किरणोंके साथ उच्चत्वके कारण शीघ्र दिखायी पड़ते हैं। जब सूर्य दक्षिणायनमार्गमें स्थित होते हैं, तब वे नीचेवाली वीथीमें रहते हैं। पृथ्वीकी रेखाद्वारा ढँका हुआ सूर्य उससे नीचे होता है। पूर्णिमा तथा अमावास्याके दिनोंमें यथासमय दिखायी देता है; क्योंकि यह शीघ्र अस्त हो जाता है। अतः नये चन्द्रमाकी तिथि [अमावास्या]-पर चन्द्रमा उत्तरायणमें होता है। यह दक्षिण मार्गमें दिखायी नहीं पड़ता; क्योंकि नक्षत्रोंके गतियोगके कारण यह [चन्द्रमा] सूर्यके अन्धकारसे ढँका हुआ होता है॥ २१—२५ १/२ ॥
ज्योतिषां गतियोगेन सूर्यस्य तमसा वृतः।<br>समानकालास्तमयौ विषुवत्सु समोदयौ॥ २६<br><br>उत्तरासु च वीथीषु व्यन्तरास्तमनोदयौ।<br>पौर्णिमावास्ययोर्ज्ञेयौ ज्योतिष्चक्रानुवर्तिनौ॥ २७<br><br>दक्षिणायनमार्गस्थौ यदा चरति रश्मिवान्।<br>ग्रहाणां चैव सर्वेषां सूर्योऽधस्तात्प्रसर्पति॥ २८<br><br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति॥ २९<br><br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः।<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः॥ ३०<br><br>तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं तस्मात्सप्तर्षिमण्डलम्।<br>ऋषीणां चैव सप्तानां ध्रुवस्योर्ध्वं व्यवस्थितिः॥ ३१<br><br>तं विष्णुलोकं परमं ज्ञात्वा मुच्येत किल्बिषात्।सूर्य तथा चन्द्रमा विषुवत् स्थानोंपर समान कालमें अस्त एवं उदय होते हैं। उत्तरायणमें पूर्णिमा तथा अमावास्या तिथियोंपर ज्योतिष्चक्रका अनुसरण करनेवाले इन दोनोंको बिना किसी अन्तरके उदय तथा अस्त होनेवाला जानना चाहिये। जब सूर्य दक्षिणायनमार्गमें स्थित होकर चलता है, तब वह सभी ग्रहोंके नीचेसे गुजरता है, उस समय चन्द्रमा अपने मण्डलको विस्तृत करके उस [सूर्य]-के ऊपर चलते हैं और सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है। नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल, मंगलसे ऊपर बृहस्पति, उस बृहस्पतिसे ऊपर शनि और उससे ऊपर सप्तर्षिमण्डल विद्यमान है। सात ऋषियोंके ऊपर ध्रुवकी स्थिति है। उस परम विष्णुलोकको जानकर मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है॥ २६—३१ १/२ ॥
द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च॥ ३२<br><br>ग्रहनक्षत्रतारासु उपरिष्टाद्यथाक्रमम्।<br>ग्रहाश्च चन्द्रसूर्यौ च युतौ दिव्येन तेजसा॥ ३३<br><br>नित्यमृक्षेषु युज्यन्ते गच्छन्तोऽहर्निशं क्रमात्।<br>ग्रहनक्षत्रसूर्यास्ते नीचोच्चऋजुसंस्थिताः॥ ३४<br><br>समागमे च भेदे च पश्यन्ति युगपत्प्रजाः।<br>ऋतवः षट् स्मृताः सर्वे समागच्छन्ति पञ्चधा॥ ३५<br><br>परस्परास्थिता ह्येते युज्यन्ते च परस्परम्।<br>असङ्करेण विज्ञेयस्तेषां योगस्तु वै बुधैः॥ ३६दो सौ हजार योजन दूरीपर ग्रह-नक्षत्र-तारोंसे ऊपर यथाक्रम सभी ग्रह और दिव्य तेजसे युक्त चन्द्रमा-सूर्य दिन-रात भ्रमण करते हुए सदा नक्षत्रोंसे जुड़े रहते हैं। वे ग्रह, नक्षत्र तथा सूर्य कभी नीचे, कभी ऊँचे एवं कभी सीधी रेखामें स्थित रहते हैं। समागम तथा भेद दोनों स्थितियोंमें वे प्रजाओंको एक साथ देखते हैं। ऋतुएँ छः कही गयी हैं, वे सब पाँच प्रकारसे आती हैं। एक-दूसरेपर आश्रित होनेके कारण ये परस्पर जुड़ी