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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
९५- नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा, हिरण्य-कशिपुका वध, भगवान् नृसिंहके उग्ररूपको देखकर देवताओंका भयभीत होकर भगवान् महेश्वरकी स्तुति करना, महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य
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| ४९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
पंचानबेवाँ अध्याय
नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा, हिरण्यकशिपुका वध, भगवान् नृसिंहके उग्ररूपको देखकर देवताओंका भयभीत होकर भगवान् महेश्वरकी स्तुति करना, महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>नृसिंहेन हतः पूर्वं हिरण्याक्षाग्रजः श्रुतम्।<br>कथं निष्षूदितस्तेन हिरण्यकशिपुर्वद॥ १ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] यह सुना गया है कि पूर्वकालमें हिरण्याक्षका ज्येष्ठ भ्राता हिरण्यकशिपु भगवान् नृसिंहद्वारा मारा गया था; आप [हमलोगोंको] बतायें कि उनके द्वारा उसका वध कैसे किया गया?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लाद इति विश्रुतः।<br>धर्मज्ञः सत्यसम्पन्नस्तपस्वी चाभवत्सुधीः॥ २<br><br>जन्मप्रभृति देवेशं पूजयामास चाव्ययम्।<br>सर्वज्ञं सर्वगं विष्णुं सर्वदेवभवोद्भवम्॥ ३<br><br>तमादिपुरुषं भक्त्या परब्रह्मस्वरूपिणम्।<br>ब्रह्मणोऽधिपतिं सृष्टिस्थितिसंहारकारणम्॥ ४ | सूतजी बोले— हिरण्यकशिपुका पुत्र 'प्रह्लाद' इस नामसे विख्यात था। वह धर्मज्ञ, सत्यनिष्ठ, तपस्वी तथा बुद्धिमान् था। वह जन्मसे ही अविनाशी, सर्वज्ञ, सभी देवताओंकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप, आदिपुरुष, परब्रह्मरूप, ब्रह्माके अधिपति और सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले उन देवेश्वर विष्णुकी भक्तिपूर्वक पूजा करता था॥ २-४॥ |
| सोऽपि विष्णोस्तथाभूतं दृष्ट्वा पुत्रं समाहितम्।<br>नमो नारायणायेति गोविन्देति मुहुर्मुहुः॥ ५<br><br>स्तुवन्तं प्राह दैवारिः प्रहसन्निव पापधीः।<br>न मां जानासि दुर्बुद्धे सर्वदैत्यामरेश्वरम्॥ ६<br><br>प्रह्लाद वीर दुष्पुत्र द्विजदेवार्तिकारणम्।<br>को विष्णुः पद्मजो वापि शक्रश्च वरुणोऽथ वा॥ ७<br><br>वायुः सोमस्तथेशानः पावको मम यः समः।<br>मामेवार्चय भक्त्या च त्यक्त्वा नारायणं सदा॥ ८<br><br>प्रह्लाद जीविते वाञ्छा तवैषा शृणु चास्ति चेत्।<br>श्रुत्वापि तस्य वचनं हिरण्यकशिपोः सुधीः॥ ९ | अपने पुत्रको एकाग्रचित्त होकर विष्णुकी उस प्रकारकी भक्तिमें तत्पर और बार-बार 'नमो नारायणाय, नमो गोविन्दाय'—इस प्रकार स्तुति करते हुए देखकर उस पापबुद्धि तथा देवशत्रु हिरण्यकशिपुने हँसते हुए कहा—हे दुर्बुद्धे! हे प्रह्लाद! हे वीर! हे दुष्पुत्र! सभी दैत्यों तथा देवताओंके स्वामी और ब्राह्मणों तथा देवताओंको दुःख देनेवाले मुझ [हिरण्यकशिपु]-को नहीं जानते हो। विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, वायु, चन्द्र, ईशान अथवा अग्नि—इनमें ऐसा कौन है, जो मेरे समान है; अतः तुम नारायणको पूर्णरूपसे छोड़कर सदा भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो। हे प्रह्लाद! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो, तो [ध्यान देकर] इस बातको सुन लो॥ ५-८ १/२॥ |
| प्रह्लादः पूजयामास नमो नारायणेति च।<br>नमो नारायणायेति सर्वदैत्यकुमारकान्॥ १०<br><br>अध्यापयामास च तां ब्रह्मविद्यां सुशोभनाम्।<br>दुर्लङ्घ्यां चात्मनो दृष्ट्वा शक्रादिभिरपि स्वयम्॥ ११ | उस हिरण्यकशिपुका वचन सुनकर भी बुद्धिमान् प्रह्लाद [विष्णुकी] पूजा करता रहा और 'नमो नारायणाय, नमो नारायणाय'—ऐसा उच्चारण करता रहा। उसने सभी दैत्यकुमारोंको [नारदोपदिष्ट] वह उत्तम ब्रह्मविद्या भी सिखायी। तब इन्द्र आदिके द्वारा भी दुर्लंघ्य अपनी |
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अध्याय १५] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा...महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ४९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुत्रेण लङ्घितामाज्ञां हिरण्यः प्राह दानवान्।<br>एतं नानाविधैर्वध्यं दुष्पुत्रं हन्तुमर्हथ ॥ १२ | आज्ञाको स्वयं अपने पुत्रके द्वारा उल्लंघित देखकर हिरण्यकशिपुने दानवोंसे कहा—इस वधयोग्य कुपुत्रको अनेकविध उपायोंसे मार डालो ॥ ९–१२ ॥ |
| एवमुक्तास्तदा तेन दैत्येन सुदुरात्मना।<br>निजघ्नुर्देवदेवस्य भृत्यं प्रह्लादमव्ययम् ॥ १३ | तब उस दुरात्मा दैत्यके कहनेपर वे दानव देवदेव [विष्णु]-के नाशरहित भक्त प्रह्लादको मारने लगे ॥ १३ ॥ |
| तत्र तत्प्रतिकृतं तदा सुरै-<br>दैत्यराजतनयं द्विजोत्तमाः।<br>क्षीरवारिनिधिशायिनः प्रभो-<br>र्निष्फलं त्वथ बभूव तेजसा ॥ १४ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस समय असुरोंके द्वारा दैत्यराज [हिरण्यकशिपु]-के पुत्रके प्रति किया गया समस्त उपाय क्षीरसागरमें शयन करनेवाले विष्णुके तेजसे निष्फल (व्यर्थ) हो गया ॥ १४ ॥ |
| तदाथ गर्वभिन्नस्य हिरण्यकशिपोः प्रभुः।<br>तत्रैवाविरभूद्धन्तुं नृसिंहाकृतिमास्थितः ॥ १५ | तत्पश्चात् अभिमानके मदमें चूर हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये विष्णुजी नृसिंहरूप धारण करके वहींपर प्रकट हुए और उन्होंने पुत्र [प्रह्लाद]-की ओर देखकर उसके पिता दानवाधम हिरण्यकशिपुका वध कर दिया। उन्होंने उसी क्षण अपने तीक्ष्ण सैकड़ों नाखूनोंसे उसे विदीर्ण कर दिया। इसके बाद पापोंका नाश करनेवाले वे विष्णु बान्धवोंसहित उस दैत्यका वध करके पुनः उस दैत्येन्द्रको पीसने लगे; वे उस समय प्रलयकालीन दूसरी अग्निके समान प्रतीत हो रहे थे। हे सुव्रतो! हे विप्रो! उस समय ब्रह्मलोकपर्यन्त |
| जघान च सुतं प्रेक्ष्य पितरं दानवाधमम्।<br>बिभेद तत्क्षणादेव करजैर्निशितैः शतैः ॥ १६ | |
| ततो निहत्य तं दैत्यं सबान्धवमघापहः।<br>पीडयामास दैत्येन्द्रं युगान्ताग्निरिवापरः ॥ १७ | |
| नादैस्तस्य नृसिंहस्य घोरैर्वित्रासितं जगत्।<br>आब्रह्मभुवनाद्विप्राः प्रचचाल च सुव्रताः ॥ १८ |
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४९८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सम्पूर्ण जगत् उन नृसिंहके गर्जनसे भयभीत हो गया और काँपने लगा॥ १५-१८॥ | |
| दृष्ट्वा सुरासुरमहोरगसिद्धसाध्या-<br>स्तस्मिन् क्षणे हरिविरिञ्चिमुखा नृसिंहम्।<br>धैर्यं बलं च समवाप्य ययुर्विसृज्य<br>आदिङ्मुखान्तमसुरक्षणतत्पराश्च ॥ १९ | उस समय नृसिंहको देखकर अपने प्राणकी रक्षामें तत्पर सभी देवता, दानव, नाग, सिद्ध, साध्य, ब्रह्मा-विष्णु आदि भी किसी तरह धैर्य तथा बल धारणकर उस स्थानको छोड़कर सभी दिशाओंमें भाग गये॥ १९॥ |
| ततस्तैर्गतेः सैष देवो नृसिंहः<br>सहस्राकृतिः सर्वपातसर्वबाहुः।<br>सहस्रेक्षणः सोमसूर्याग्निनेत्र-<br>स्तदा संस्थितः सर्वमावृत्य मायी॥ २० | तदनन्तर उनके चले जानेपर मायामय ये भगवान् नृसिंह हजाररूपवाले, सभी ओर पैरोंवाले, सभी ओर भुजाओंवाले, हजार नेत्रोंवाले, चन्द्र-सूर्य-अग्निरूप नेत्रोंवाले होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित हो गये॥ २०॥ |
| तं तुष्टुवुः सुरश्रेष्ठा लोकालोकाचले स्थिताः।<br>सब्रह्मकाः ससाध्याश्च सयमाः समरुद्गणाः ॥ २१ | तब लोकालोक [मर्यादा] पर्वतपर एकत्र हुए श्रेष्ठ देवता ब्रह्मा, साध्यगण, यम तथा मरुद्गणोंके साथ उनकी स्तुति करने लगे— |
| परात्परतरं ब्रह्म तत्त्वात्तत्त्वतमं भवान्।<br>ज्योतिषां तु परं ज्योतिः परमात्मा जगन्मयः ॥ २२ | आप परसे भी परतर ब्रह्म हैं, तत्त्वसे भी तत्त्वतम हैं, नक्षत्रोंकी परम ज्योति हैं, परमात्मा हैं, जगन्मय हैं, |
| स्थूलं सूक्ष्मं सुसूक्ष्मं च शब्दब्रह्ममयः शुभः।<br>वागतीतो निरालम्बो निर्द्वन्द्वो निरुपप्लवः ॥ २३ | स्थूल-सूक्ष्म तथा अत्यन्त सूक्ष्म हैं, शब्दब्रह्ममय हैं, परम पवित्र हैं, वाणीसे परे हैं, आश्रयरहित हैं, [सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि] द्वन्द्वोंसे रहित हैं और उपद्रवशून्य हैं। |
| यज्ञभुग्यज्ञमूर्तिस्त्वं यज्ञिनां फलदः प्रभुः।<br>भवान् मत्स्याकृतिः कौर्ममास्थाय जगति स्थितः ॥ २४ | आप प्रभु यज्ञभोक्ता हैं, आप यज्ञकी मूर्ति हैं, आप यज्ञकर्ताओंको फल प्रदान करनेवाले हैं, आपने मत्स्यरूप धारण किया, आप कूर्म (कच्छप)-का रूप धारण करके जगत्में स्थित हैं। |
| वाराहीं चैव तां सैंहीमास्थायेह व्यवस्थितः।<br>देवानां देवरक्षार्थं निहत्य दितिजेश्वरम् ॥ २५ | देवताओंकी रक्षाके लिये वाराह तथा नृसिंहका रूप धारणकर दैत्येन्द्रका वध करके आप इस लोकमें प्रतिष्ठित हुए। |
| द्विजशापच्छलेनैवमवतीर्णोऽसि लीलया।<br>न दृष्टं यत्त्वदन्यं हि भवान् सर्वं चराचरम् ॥ २६ | इसी प्रकार भृगुमुनिके शापके बहाने अपनी लीलासे आपने अवतार ग्रहण किया। आपसे पृथक् अन्य कुछ भी नहीं देखा गया है; आप चर-अचर सब कुछ हैं। |
| भवान् विष्णुर्भवान् रुद्रो भवानेव पितामहः।<br>भवानादिर्भवानन्तो भवानेव वयं विभो ॥ २७ | हे विभो! आप ही विष्णु हैं, आप ही रुद्र हैं, आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही आदि हैं, आप ही अन्त हैं और आप ही हम सब हैं। |
| भवानेव जगत्सर्वं प्रलापेन किमीश्वर।<br>मायया बहुधा संस्थमद्वितीयमयं प्रभो ॥ २८ | आप [स्वयं] सम्पूर्ण जगत् हैं; हे ईश्वर! अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन? हे प्रभो! अद्वितीय (एक) होते हुए भी [अपनी] मायासे अनेक रूपोंमें स्थित आप [प्रभु]- |
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अध्याय ९५] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा...महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ४९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्तोष्यामस्त्वां कथं भासि देवदेव मृगाधिप।<br>स्तुतोऽपि विविधैः स्तुत्यैर्भावैर्नानाविधैः प्रभुः॥ २९ | की स्तुति हम लोग कैसे करें? हे देवदेव! हे नृसिंह! आप बहुत देदीप्यमान हो रहे हैं॥ २१–२८¹/२॥ |
| न जगाम द्विजाः शान्तिं मानयन् योनिमात्मनः।<br>यो नृसिंहस्तवं भक्त्या पठेद्धार्थं विचारयेत्॥ ३०<br><br>श्रावयेद्वा द्विजान् सर्वान् विष्णुलोके महीयते।<br>तदन्तरे शिवं देवाः सेन्द्राः सब्रह्मकाः प्रभुम्॥ ३१ | हे द्विजो! विविध भावोंसे युक्त नानाविध स्तुतियोंसे प्रार्थना किये जानेपर भी वे प्रभु अपने सिंहरूपका सम्मान करते हुए शान्त नहीं हुए। जो नृसिंह-स्तुतिको भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा इसके अर्थका चिन्तन करता है अथवा सभी द्विजोंने सुनाता है, वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २९–३०¹/२॥ |
| सम्प्राप्य तुष्टुवुः सर्वं विज्ञाप्य मृगरूपिणः।<br>ततो ब्रह्मादयस्तूर्णं संस्तूय परमेश्वरम्॥ ३२<br><br>आत्मत्राणाय शरणं जग्मुः परमकारणम्।<br>मन्दरस्थं महादेवं क्रीडमानं सहोमया॥ ३३<br><br>सेवितं गणगन्धर्वैः सिद्धैरप्सरसां गणैः।<br>देवताभिः सह ब्रह्मा भीतभीतः सगद्गदम्।<br>प्रणम्य दण्डवद्भूतौ तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ३४ | तत्पश्चात् इन्द्र तथा ब्रह्मसहित सभी देवता प्रभु शिवका ध्यान करके नृसंहरूपधारी विष्णुके विषयमें सब कुछ कहकर उनकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर परमेश्वरकी स्तुति करके ब्रह्मा आदि [देवता] अपनी रक्षाके लिये मन्दर पर्वतपर स्थित, उमाके साथ विहार करते हुए और गन्धर्वों, सिद्धों-अप्सराओंसे सेवित परमकारण महादेवकी शरणमें गये। भयभीत ब्रह्माजी देवताओंके साथ दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर गद्गद वाणीमें परमेश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ३१–३४॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>नमस्ते कालकालाय नमस्ते रुद्र मन्यवे।<br>नमः शिवाय रुद्राय शङ्कराय शिवाय ते॥ ३५<br><br>उग्रोऽसि सर्वभूतानां नियन्तासि शिवोऽसि नः।<br>नमः शिवाय शर्वाय शङ्करायार्तिहारिणे॥ ३६ | ब्रह्माजी बोले—[हे शिव!] आप कालान्तकको नमस्कार है। हे रुद्र! आप क्रोधरूपको नमस्कार है। आप मोक्षरूप रुद्र, शंकर तथा शिवको नमस्कार है। आप उग्र हैं, सभी प्राणियोंके नियन्ता हैं और हम भक्तोंके लिये कल्याणकारक हैं। दुःखका नाश करनेवाले शिव, शर्व तथा शंकरको नमस्कार है॥ ३५–३६॥ |
| मयस्कराय विश्वाय विष्णवे ब्रह्मणे नमः।<br>अन्तकाय नमस्तुभ्यमुमायाः पतये नमः॥ ३७<br><br>हिरण्यबाहवे साक्षाद्धिरण्यरूपतये नमः।<br>शर्वाय सर्वरूपाय पुरुषाय नमो नमः॥ ३८<br><br>सदसद्व्यक्तिहीनाय महतः कारणाय ते।<br>नित्याय विश्वरूपाय जायमानाय ते नमः॥ ३९<br><br>जाताय बहुधा लोके प्रभूताय नमो नमः।<br>रुद्राय नीलरुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे॥ ४० | आप सुखकर, विश्वरूप, विष्णु, ब्रह्माको नमस्कार है। आप अन्तक (संहारकर्ता)-को नमस्कार है; उमापतिको नमस्कार है। सुवर्णमय बाहुवाले तथा साक्षात् हिरण्यपतिको बार-बार नमस्कार है; शर्व, सर्वरूप तथा पुरुषको बार-बार नमस्कार है। सत्-असत्रूपसे रहित और महत्तत्त्वके उत्पादक आपको नमस्कार है; आप नित्य, विश्वरूप तथा उत्पन्न होनेवालेको नमस्कार है। संसारमें अनेक रूपोंमें अवतार लेनेवाले और प्रभूतको नमस्कार है; आप रुद्र, नीलरुद्र, कद्रुद्र नामक मन्त्ररूप तथा प्रचेताको नमस्कार है॥ ३७–४०॥ |
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५०० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| कालाय कालरूपाय नमः कालाङ्गहारिणे।<br>मीढुष्टमाय देवाय शितिकण्ठाय ते नमः॥ ४१<br><br>महीयसे नमस्तुभ्यं हन्त्रे देवारिणां सदा।<br>ताराय च सुताराय तारणाय नमो नमः॥ ४२<br><br>हरिकेशाय देवाय शम्भवे परमात्मने।<br>देवानां शम्भवे तुभ्यं भूतानां शम्भवे नमः॥ ४३ | आप काल तथा कालरूपको नमस्कार है; आप कालविनाशक, मीढुष्टम तथा भगवान् शितिकण्ठको नमस्कार है। आप महान्को तथा सदा देवशत्रुओंके संहार-कर्ताको नमस्कार है; तार (प्रणवरूप), सुतार तथा उद्धारकर्ताको नमस्कार है। हरितवर्णके केशवाले, परमात्मस्वरूप, देवताओंके कल्याणकारक तथा [समस्त] प्राणियोंके कल्याणकारक आप भगवान् शम्भुको नमस्कार है॥ ४१-४३॥ |
| शम्भवे हैमवत्याश्च मन्यवे रुद्ररूपिणे।<br>कपर्दिने नमस्तुभ्यं कालकण्ठाय ते नमः॥ ४४<br><br>हिरण्याय महेशाय श्रीकण्ठाय नमो नमः।<br>भस्मदिग्धशरीराय दण्डमुण्डीश्वराय च॥ ४५<br><br>नमो ह्रस्वाय दीर्घाय वामनाय नमो नमः।<br>नम उग्रत्रिशूलाय उग्राय च नमो नमः॥ ४६<br><br>भीमाय भीमरूपाय भीमकर्मरताय ते।<br>अग्रेवधाय वै भूत्वा नमो दूरेवधाय च॥ ४७ | आप पार्वतीके कल्याणकारक, यज्ञरूप, रुद्ररूप तथा कपर्दीको नमस्कार है; आप कालकण्ठको नमस्कार है। सुवर्णमय वर्णवाले महेशको तथा श्रीकण्ठको नमस्कार है। भस्मसे लिप्त शरीरवाले तथा दण्ड मुण्डीश्वरको नमस्कार है। ह्रस्व (लघु), दीर्घ तथा वामनको नमस्कार है। भयानक त्रिशूल धारण करनेवाले तथा उग्र स्वभाववालेको बार-बार नमस्कार है। आप भयंकर स्वरूपवाले तथा भयानक कर्ममें रत रहनेवाले भीमको नमस्कार है। सबसे आगे होकर [शत्रुओंका] वध करनेवाले और दूर स्थानसे भी वध करनेवाले [शिव]-को नमस्कार है॥ ४४-४७॥ |
| धन्विने शूलिने तुभ्यं गदिने हलिने नमः।<br>चक्रिणे वर्मिणे नित्यं दैत्यानां कर्मभेदिने॥ ४८<br><br>सद्याय सद्यरूपाय सद्योजाताय ते नमः।<br>वामाय वामरूपाय वामनेत्राय ते नमः॥ ४९<br><br>अघोररूपाय विकटाय विकटशरीराय ते नमः।<br>पुरुषरूपाय पुरुषैकतत्पुरुषाय वै नमः॥ ५०<br><br>पुरुषार्थप्रदानाय पतये परमेष्ठिने।<br>ईशानाय नमस्तुभ्यमीश्वराय नमो नमः॥ ५१<br><br>ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय नमः साक्षाच्छिवाय ते। | आप धनुर्धारी, शूलधारी, गदाधारी, हलधारी, चक्रधारी, कवचधारी तथा [गजाननरूपसे] सदा दैत्योंके कर्मका नाश करनेवाले [शिव]-को नमस्कार है। आप सद्यमन्त्ररूप, सद्यरूप, सद्योजात अवतार स्वरूपको नमस्कार है। वाम-मन्त्ररूप, सुन्दररूपवाले तथा सुन्दर नेत्रवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। अघोरमन्त्ररूप, विकट रूपवाले तथा विकट शरीरवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। पुरुषरूपवाले तथा पुरुषोंमें एकमात्र तत्पुरुष (उत्तम पुरुष) आपको नमस्कार है। पुरुषार्थ प्रदान करनेवाले, सबके स्वामी, परमेष्ठी तथा ईशानमन्त्ररूप आप शिवको नमस्कार है। आप ईश्वरको बार-बार नमस्कार है। ब्रह्मरूपवाले तथा साक्षात् सगुण शिवरूपवाले आप ब्रह्मको नमस्कार है॥ ४८-५१ १/२॥ |
| सर्वविष्णुर्नृसिंहस्य रूपमास्थाय विश्वकृत्॥ ५२ | विश्वकी सृष्टि करनेवाले तथा सर्वरूप प्रभु विष्णु नृसिंहका रूप धारण करके जगत्के कल्याणके |
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अध्याय ९५ ] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा...महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ५०१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हिरण्यकशिपुं हत्वा करजैर्निशितैः स्वयम्।<br>दैत्येन्द्रैर्बहुभिः सार्धं हितार्थं जगतां प्रभुः॥ ५३<br><br>सैंहीं समानयन् योनिं बाधते निखिलं जगत्।<br>यत्कृत्यमत्र देवेश तत्कुरुष्व भवानिह॥ ५४ | लिये अनेक प्रमुख दैत्योंसहित हिरण्यकशिपुको अपने तीक्ष्ण नखोंसे स्वयं मारकर सिंहरूपका सम्मान करते हुए सम्पूर्ण जगत्को सन्तस्त कर रहे हैं; हे देवेश! अब इस विषयमें जो उचित कार्य हो, उसे आप करें॥ ५२–५४॥ |
| उग्रोऽसि सर्वदुष्टानां नियन्तासि शिवोऽसि नः।<br>कालकूटादिवपुषा त्राहि नः शरणागतान्॥ ५५<br><br>शुक्रं तु वृत्तं विश्वेश क्रीडा वै केवलं वयम्।<br>तवोन्मेषनिमेषाभ्यामस्माकं प्रलयोदयौ॥ ५६<br><br>उन्मीलये त्वयि ब्रह्मन् विनाशोऽस्ति न ते शिव।<br>सन्तप्ताः स्मो वयं देव हरिणामिततेजसा॥ ५७<br><br>सर्वलोकहितायैनं तत्त्वं संहर्तुमिच्छसि। | आप उग्र हैं, सभी दुष्टोंको नियन्त्रणमें रखनेवाले हैं और हम लोगोंके लिये कल्याणकारक हैं। कालकूट आदि शरीरसे हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये। हे विश्वेश! आपका आचरण शुद्ध है और हम लोग आपके क्रीड़ामात्र हैं। आपके उन्मेष तथा निमेषसे हम लोगोंके प्रलय तथा उदय होते हैं। हे ब्रह्मन्! हे शिव! आपके उन्मीलन करनेपर भी आपका विनाश नहीं होता है। हे देव! अमित तेजवाले नृसिंहरूपधारी विष्णुके द्वारा हमलोग सन्तप्त हो रहे हैं; अतः सभी लोकोंके हितके लिये आप इस [नृसिंहरूप]–को समाप्त करनेका विचार करें॥ ५५–५७१/२॥ |
| सूत उवाच<br>विज्ञापितस्तथा देवः प्रहसन् प्राह तान् सुरान्॥ ५८<br><br>अभयं च ददौ तेषां हनिष्यामीति तं प्रभुः।<br>सोऽपि शक्रः सुरैः सार्धं प्रणिपत्य यथागतम्॥ ५९ | सूतजी बोले— इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर प्रभु महादेवने उन देवताओंको अभयदान दिया और मुसकराते हुए उनसे कहा—'मैं उनका संहार करूँगा।' इसके बाद शिवको प्रणाम करके इन्द्र सभी देवताओंके साथ जैसे आये थे, वैसे ही चले गये और भगवान् ब्रह्मा तथा अन्य श्रेष्ठ देवता भी चले गये॥ ५८-५९१/२॥ |
| जगाम भगवान् ब्रह्मा तथान्ये च सुरोत्तमाः।<br>अथोत्थाय महादेवः शारभं रूपमास्थितः॥ ६०<br><br>ययौ प्रान्ते नृसिंहस्य गर्वितस्य मृगाशिनः।<br>अपहृत्य तदा प्राणान् शरभः सुरपूजितः॥ ६१<br><br>सिंहात्ततो नरो भूत्वा जगाम च यथाक्रमम्।<br>एवं स्तुतस्तदा देवैर्जगाम स यथाक्रमम्॥ ६२ | तदनन्तर [वहाँसे] उठकर शरभका रूप धारणकर महादेवजी असुरभक्षक गर्वयुक्त नृसिंहके पास पहुँचे। तब प्राणोंका हरण करके वे शरभरूपधारी शिव देवताओंद्वारा पूजित हुए। तत्पश्चात् नृसिंहरूपसे मानवरूप होकर वे विष्णु [वहाँसे] चले गये। इस प्रकार उस समय देवताओंसे स्तुत होकर शिवजी भी [अपने स्थानको] चले गये॥ ६०–६२॥ |
| यः पठेच्छृणुयाद्वापि संस्तवं शार्वमुत्तमम्।<br>रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रेण सह मोदते॥ ६३ | जो [व्यक्ति] शिवजीकी इस उत्तम स्तुतिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह रुद्रलोक प्राप्त करके [भगवान्] रुद्रके साथ आनन्दित रहता है॥ ६३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नृसिंहलीलावर्णनं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः॥ ९५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नृसिंहलीलावर्णन' नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९५॥