श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४६- लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण
| ७३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| तस्य सर्वं प्रकर्तव्यं पुत्रोऽपि ब्रह्मविद्भवेत् ।<br>कन्यका यदि सञ्जाता पश्चात्त्तस्य महात्मनः ॥ ८७<br><br>एकपर्णा इव ज्ञेया अपर्णा इव सुव्रता ।<br>भवत्येव न सन्देहस्तस्याश्चान्वयजा अपि ॥ ८८<br><br>मुच्यन्ते नात्र सन्देहः पितरो नरकादपि ।<br>मुच्यन्ते कर्मणानेन मातृतः पितृतस्तथा ॥ ८९<br><br>कालं गते द्विजे भूमौ खनेच्चापि दहेत्तु वा ।<br>पुत्रकृत्यमशेषं च कृत्वा दोषो न विद्यते ॥ ९०<br><br>कर्मणा चोत्तरेणैव गतिरस्य न विद्यते ।<br>ब्रह्मणा कथितं सर्वं मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ९१<br><br>पुनः सनत्कुमाराय कथितं तेन धीमता ।<br>कृष्णद्वैपायनायैव कथितं ब्रह्मसूनुना ॥ ९२<br><br>प्रसादात्तस्य देवस्य वेदव्यासस्य धीमतः ।<br>ज्ञातं मया कृतं चैव नियोगादेव तस्य तु ॥ ९३<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं रहस्यं ब्रह्मसिद्धिदम् ।<br>मुनिपुत्राय दातव्यं न चाभक्ताय सुव्रताः ॥ ९४ । | इसमें सन्देह नहीं है। अपनी पत्नीसे बादमें यदि अपना पुत्र उत्पन्न हो जाय, तो उसका सम्पूर्ण संस्कार करना चाहिये; वह पुत्र भी ब्रह्मवेत्ता होता है। हे सुव्रतो! यदि बादमें उस महात्माके कन्या उत्पन्न हुई, तो उस कन्याको एकपर्णा अथवा अपर्णा (पार्वती)-के समान जानना चाहिये। उस कन्याके वंशमें उत्पन्न होनेवाले भी मुक्त हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। उस व्यक्तिके इस [जीवच्छ्राद्ध] कर्मके द्वारा उसके मातृपक्ष तथा पितृपक्षके पितर भी नरकसे मुक्त हो जाते हैं। [जीवच्छ्राद्ध कर चुके] ऐसे द्विजके मर जानेपर उसे भूमिमें गाड़ दिया जाय अथवा उसका दाह-संस्कार कर दिया जाय; पुत्रके द्वारा उसका सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कृत्य करनेसे उसे कोई दोष नहीं लगता है। मृत्युके अनन्तर उसके लिये कोई क्रिया आवश्यक नहीं है॥ ८४—९० १/२ ॥<br><br>[ सूतजीने कहा—हे ऋषियो! ] ब्रह्माजीने पुण्यात्मा मुनियोंसे यह सब कहा था; फिर उन बुद्धिमान् ब्रह्माने इसे सनत्कुमारको बताया। तदनन्तर ब्रह्मपुत्र उन सनत्कुमारने कृष्णद्वैपायन व्यासजीसे इसका कथन किया। इसके अनन्तर उन बुद्धिसम्पन्न भगवान् वेदव्यासकी कृपासे मैंने इसे जाना और उन्हींके आदेशसे ब्रह्मसिद्धि प्रदान करनेवाला यह सम्पूर्ण रहस्य मैंने आप लोगोंको बताया। हे सुव्रतो! इसे किसी मुनिपुत्रको ही प्रदान करना चाहिये, अभक्तको नहीं॥ ९१—९४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे जीवच्छ्राद्धविधिर्नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'जीवच्छ्राद्धविधि' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥
छियालीसवाँ अध्याय
लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण
| ऋषय ऊचुः<br>जीवच्छ्राद्धविधिः प्रोक्तस्त्वया सूत महामते ।<br>मूर्खाणामपि मोक्षार्थमस्माकं रोमहर्षण ॥ १<br><br>रुद्रादित्यवसूनां च शक्रादीनां च सुव्रत ।<br>प्रतिष्ठा कीदृशी शम्भोलिङ्गमूर्तेश्च शोभना ॥ २ | **ऋषिगण बोले—**हे विशाल बुद्धिवाले सूतजी, हे रोमहर्षण! आपने अज्ञानियोंके भी मोक्षके लिये हमलोगोंसे जीवच्छ्राद्धकी विधिका वर्णन किया। हे सुव्रत! रुद्र, आदित्य, वसु, इन्द्र आदि देवता तथा शिवजीकी लिङ्गमूर्तिकी सुन्दर प्रतिष्ठा किस प्रकार होती है; |
अध्याय ४६ ] लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन ७३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विष्णोः शक्रस्य देवस्य ब्रह्मणश्च महात्मनः।<br>अग्नेर्यमस्य निर्ऋतेर्वरुणस्य महाद्युतेः॥ ३<br>वायोः सोमस्य यक्षस्य कुबेरस्यामितात्मनः।<br>ईशानस्य धरायाश्च श्रीप्रतिष्ठाथ वा कथम्॥ ४<br>दुर्गाशिवाप्रतिष्ठा च हैमवत्याश्च शोभना।<br>स्कन्दस्य गणराजस्य नन्दिनश्च विशेषतः॥ ५<br>तथान्येषां च देवानां गणानामपि वा पुनः।<br>प्रतिष्ठालक्षणं सर्वं विस्तराद्वक्तुमर्हसि॥ ६ | विष्णु, इन्द्रदेव, भगवान् ब्रह्मा, अग्नि, यम, निर्ऋति, महातेजस्वी वरुण, वायु, सोम, यक्ष, अमित आत्मावाले कुबेर, ईशान तथा पृथ्वीकी उत्तम प्रतिष्ठा कैसे की जाती है; दुर्गा, शिवा, हैमवती, कार्तिकेय, गणनाथ नन्दी तथा अन्य देवताओं और गणोंकी शोभन प्रतिष्ठा किस प्रकार होती है, इनकी प्रतिष्ठा-विधिका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ १-६॥ |
| भवान् सर्वार्थतत्त्वज्ञो रुद्रभक्तश्च सुव्रत।<br>कृष्णद्वैपायनस्यासि साक्षात्त्वमपरा तनुः॥ ७<br>सुमन्तुजैमिनिश्चैव पैलश्च परमर्षयः।<br>गुरुभक्तिं तथा कर्तुं समर्थो रोमहर्षणः॥ ८<br>इति व्यासस्य विपुला गाथा भागीरथीतीटे।<br>एकः समो वा भिन्नो वा शिष्यस्तस्य महाद्युतेः॥ ९<br>वैशम्पायनतुल्योऽसि व्यासशिष्येषु भूतले।<br>तस्मादस्माकमखिलं वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १० | हे सुव्रत! आप समस्त अर्थतत्त्वके ज्ञाता और रुद्रभक्त हैं। आप कृष्णद्वैपायन व्यासकी साक्षात् दूसरी मूर्ति हैं। 'सुमन्तु, जैमिनि तथा पैल परम ऋषिके रूपमें प्रतिष्ठित हैं; रोमहर्षण उन्हींके सदृश गुरुभक्ति करनेमें समर्थ हैं—इस प्रकारकी विशद वाणी गङ्गातटपर व्यासजीने स्वयं प्रकट की थी।' उन महातेजस्वीके समान अथवा उन्हींके रूपवाले आप उनके शिष्य हैं। पृथ्वीतलपर व्यासजीके शिष्योंमें आप वैशम्पायनके समान हैं, अतः इस समय आप हमलोगोंको सम्पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें॥ ७-१०॥ |
| एवमुक्त्वा स्थितेष्वेव तेषु सर्वेषु तत्र च।<br>बभूव विस्मयोऽतीव मुनीनां तस्य चाग्रतः॥ ११<br>अथान्तरिक्षे विपुला साक्षाद्देवी सरस्वती।<br>अलं मुनीनां प्रश्नोऽयमिति वाचा बभूव ह॥ १२<br>सर्वं लिङ्गमयं लोकं सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्।<br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य स्थापयेत्पूजयेच्च तत्॥ १३<br>लिङ्गस्थापनसन्मार्गनिहितस्वायतासिना ।<br>आशु ब्रह्माण्डमुद्भिद्य निर्गच्छेदविशङ्कया॥ १४ | ऐसा कहकर उन सभीके शान्त हो जानेपर मुनियों तथा उन सूतजीके समक्ष विस्मयकारी घटना हुई, अन्तरिक्षमें साक्षात् महादेवी सरस्वती इस वाणीके साथ प्रकट हुईं कि 'मुनियोंका यह प्रश्न समीचीन है, सम्पूर्ण लोक लिङ्गमय है और सब कुछ लिङ्गमें ही प्रतिष्ठित है, अतः सब कुछ छोड़कर उसीका स्थापन तथा पूजन करना चाहिये। लिङ्गस्थापनरूप पुण्यकर्ममें स्थापित अत्यन्त विस्तृत खड्गके द्वारा शीघ्र ही ब्रह्माण्डका भेदन करके [वह लिङ्गस्थापक] निःशंक भावसे मुक्त हो जाता है'॥ ११-१४॥ |
| उपेन्द्राम्भोजगर्भेन्द्रयमाम्बुधनदेश्वराः ।<br>तथान्ये च शिवं स्थाप्य लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्॥ १५<br>स्वेषु स्वेषु च पक्षेषु प्रधानास्ते यथा द्विजाः।<br>ब्रह्मा हरश्च भगवान् विष्णुर्देवी रमा धरा॥ १६<br>लक्ष्मीर्धृतिः स्मृतिः प्रज्ञा धरा दुर्गा शची तथा।<br>रुद्राश्च वसवः स्कन्दो विशाखः शाख एव च॥ १७ | हे द्विजो! लिङ्गमूर्ति महेश्वर शिवकी स्थापना करके जैसे विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, यम, वरुण तथा कुबेर ईश्वर (स्वामी) हो गये, वैसे ही अन्य लोग भी अपने-अपने पक्षोंमें प्रधान हुए हैं। ब्रह्मा, शम्भु, भगवान् विष्णु, देवी रमा, धरा, लक्ष्मी, धृति, स्मृति, प्रज्ञा, धरा, दुर्गा, शची, सभी रुद्र, सभी वसु, कार्तिकेय, विशाख, शाख, |