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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

४४- भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना एवं सभी देवोंके द्वारा नन्दि-केश्वरका अभिषेक तथा शिवनाममन्त्रकी महिमा

अध्याय ४४ ]भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना१९७
प्रावर्तत नदी पुण्या ऊचुर्जाम्बूनदीति ताम्।<br>एतत्पञ्चनदं नाम जप्येश्वरसमीपगम्॥ ४७<br><br>यः पञ्चनदमासाद्य स्नात्वा जप्येश्वरेश्वरम्।<br>पूजयेच्छिवसायुज्यं प्रयात्येव न संशयः॥ ४८दूसरी पवित्र तथा शुभ नदी उत्पन्न हुई, अतः उसे जाम्बूनदी कहा जाता है। इस प्रकार ये पाँच नदियाँ भगवान् जप्येश्वरके समीप जानेवाली हैं। जो पंचनदपर पहुँचकर इसमें स्नान करके भगवान् जप्येश्वरेश्वरकी पूजा करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४७-४८॥
अथ देवो महादेवः सर्वभूतपतिर्भवः।<br>देवीमुवाच शर्वाणीमुमां गिरिसुतामजाम्॥ ४९<br><br>देवि नन्दीश्वरं देवमभिषिञ्चामि भूतपम्।<br>गणेन्द्रं व्याहरिष्यामि किं वा त्वं मन्यसेऽव्यये॥ ५०इसके बाद सभी भूतोंके स्वामी भगवान् महादेवने हिमालयपुत्री, अजन्मा, शर्वाणी, उमा देवीसे कहा—हे देवि! मैं भूतोंके स्वामी देव नन्दीश्वरका अभिषेचन करता हूँ और उन्हें गणेन्द्र नामवाला कहूँगा, हे अव्यये! [इस विषयमें] तुम क्या सोचती हो?॥ ४९-५०॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भवानी हर्षितानना।<br>स्मयन्ती वरदं प्राह भवं भूतपतिं पतिम्॥ ५१<br><br>सर्वलोकाधिपत्यं च गणेशत्वं तथैव च।<br>दातुमर्हसि देवेश शैलादिस्तनयो मम॥ ५२उनका यह वचन सुनकर हर्षयुक्त मुखवाली भवानीने वर प्रदान करनेवाले तथा भूतोंके स्वामी अपने पति शिवसे मुसकराते हुए इस प्रकार कहा—हे देवेश! शैलादि मेरा पुत्र है, अतः आप इसे सभी लोकोंका स्वामित्व और गणेशत्व प्रदान करनेकी कृपा कीजिये॥ ५१-५२॥
ततः स भगवान् शर्वः सर्वलोकेश्वरेश्वरः।<br>सस्मार गणपान् दिव्यान् देवदेवो वृषध्वजः॥ ५३तत्पश्चात् सभी लोकेश्वरोंके भी ईश्वर, देवोंके देव, शर्व, भगवान् वृषध्वजने अपने दिव्य गणेश्वरोंका स्मरण किया॥ ५३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नन्दिकेश्वरप्रादुर्भावनन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्रो नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नन्दिकेश्वरप्रादुर्भाव तथा नन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्र' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४३॥


चौवालीसवाँ अध्याय

भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना एवं सभी देवोंके द्वारा नन्दिकेश्वरका अभिषेक तथा शिवनाममन्त्रकी महिमा

शैलादिरुवाच<br>स्मरणादेव रुद्रस्य सम्प्राप्ताश्च गणेश्वराः।<br>सर्वे सहस्रहस्ताश्च सहस्रायुधपाणयः॥ १<br><br>त्रिनेत्राश्च महात्मानस्त्रिदशैरपि वन्दिताः।<br>कोटिकालाग्निसङ्काशा जटामुकुटधारिणः॥ २<br><br>दंष्ट्राकरालवदना नित्या बुद्धाश्च निर्मलाः।<br>कोटिकोटिगणैस्तुल्यैरात्मना च गणेश्वराः।<br>असंख्याता महात्मानस्तत्राजग्मुर्मुदा युताः॥ ३**शैलादि बोले—**रुद्रके स्मरण करते ही गणेश्वर लोग उपस्थित हो गये। उन सभीकी हजार-हजार भुजाएँ थीं, उन्होंने हाथोंमें हजार अस्त्र धारण कर रखे थे, उनके तीन नेत्र थे, वे महान् गण देवताओंसे वन्दित हो रहे थे, वे करोड़ों कालाग्निके समान थे, वे जटामुकुट धारण किये हुए थे, दाढ़ोंके कारण वे विकराल मुखवाले थे, वे शाश्वत, शुद्ध तथा प्रबुद्ध थे, वे अपने ही समान करोड़ों-करोड़ों अनुचरोंसे युक्त थे—ऐसे असंख्य महात्मा गणेश्वर प्रसन्नताके साथ वहाँ आये॥ १–३॥

१९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग

श्लोकअर्थ
गायन्तश्च द्रवन्तश्च नृत्यन्तश्च महाबलाः।<br>मुखाडम्बरवाद्यानि वादयन्तस्तथैव च॥ ४<br>रथैर्नागैर्हयैश्चैव सिंहमर्कटवाहनाः।<br>विमानेषु तथारूढा हेमचित्रेषु वै गणाः॥ ५वे महान् बलसे सम्पन्न गण गाते, दौड़ते, भागते, नाचते तथा अनेक मुखवाद्योंको बजाते हुए आये। वे रथों, हाथियों, घोड़ों, सिंहों और बन्दरोंपर सवार थे। कुछ गण स्वर्णचित्रित विमानोंपर भी आरूढ़ थे॥ ४-५॥
भेरीमृदङ्गाद्यैश्च पणवानकगोमुखैः।<br>वादित्रैर्विविधैश्चान्यैः पटहैरेकपुष्करैः॥ ६<br>भेरीमुरजसंनादैराडम्बरकडिण्डिमैः ।<br>मर्दलैर्वेणुवीणाभिर्विविधैस्तालनिःस्वनैः ॥ ७<br>दर्दुरैस्तलघातैश्च कच्छपैः पणवैरपि।<br>वाद्यमानैर्महायोग्या आजग्मुर्देवसंसदम्॥ ८महायोगसे सम्पन्न वे गणेश्वर भेरी, मृदंग, पणव, आनक, गोमुख, पटह, एकपुष्कर, मुरज, आडम्बर, डिण्डिम, मर्दल, वेणु, वीणा, दर्दुर, तलघात, कच्छप, पणव एवं अन्य प्रकारके वाद्योंको बजाते हुए तथा विविध तालध्वनियाँ करते हुए भगवान् शिवकी सभामें आये॥ ६-८॥
ते गणेशा महासत्त्वाः सर्वदेवेश्वरेश्वराः।<br>प्रणम्य देवं देवीं च इदं वचनमब्रुवन्॥ ९<br>भगवन् देवदेवेश त्र्यम्बक वृषध्वज।<br>किमर्थं च स्मृता देव आज्ञापय महाद्युते॥ १०महान् शक्तिसे युक्त तथा सभी देवेश्वरोंके ईश्वर उन गणेश्वरोंने महादेव एवं पार्वतीको प्रणाम करके यह वचन कहा—हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्र्यम्बक! हे वृषध्वज! आपने हमलोगोंका स्मरण किसलिये किया है? हे देव! हे महाद्युते! आदेश दीजिये॥ ९-१०॥
किं सागरान् शोषयामो यमं वा सह किङ्करैः।<br>हन्मो मृत्युसुतां मृत्युं पशुवद्धन्म पद्मजम्॥ ११<br>बद्ध्वेन्द्रं सह देवैश्च सह विष्णुं च वायुना।<br>आनयामः सुसङ्क्रुद्धा दैत्यान् वा सह दानवैः॥ १२<br>कस्याद्य व्यसनं घोरं करिष्यामस्तवाज्ञया।<br>कस्य वाद्योत्सवो देव सर्वकामसमृद्धये॥ १३क्या हमलोग समुद्रोंको सोख लें? क्या यमको उनके सेवकोंसहित मार डालें अथवा मृत्युपुत्री (जरा) तथा मृत्युको मार डालें अथवा पद्मयोनि ब्रह्माका पशुकी भाँति वध कर दें। क्या अत्यन्त कुपित होकर हमलोग देवताओंसहित इन्द्रको, वायुसहित विष्णुको अथवा दानवोंसहित दैत्योंको बाँधकर यहाँ ले आयें? हमलोग आपकी आज्ञासे आज किसका घोर अनर्थ कर डालें? हे देव! सभी कामनाओंकी समृद्धिके लिये आज किसका उत्सव है?॥ ११-१३॥
तांस्तथावादिनः सर्वान् गणेशान् सर्वसम्मतान्।<br>उवाच देवः सम्पूज्य कोटिकोटिशतान् प्रभुः॥ १४<br>शृणुध्वं यत्कृते यूयमिहाहूता जगद्धिताः।<br>श्रुत्वा च प्रयतात्मानः कुरुध्वं तदशङ्किताः॥ १५<br>नन्दीश्वरोऽयं पुत्रो नः सर्वेषामीश्वरेश्वरः।<br>विप्रोऽयं नायकश्चैव सेनानीर्वः समृद्धिमान्॥ १६<br>तमिमं मम सन्देशाद्यूयं सर्वेऽपि सम्मताः।<br>सेनान्यमभिषिञ्चध्वं महायोगपतिं पतिम्॥ १७भगवान् शंकरने वैसा कहनेवाले उन करोड़ों-करोड़ों सभी सर्वपूज्य गणेश्वरोंका सम्मान करके उनसे कहा—हे जगत्के हितकारको! सुनिये, जिसलिये मैंने तुमलोगोंको यहाँ बुलाया है, उसे सुन करके हे शुद्धात्माओ [गणेश्वरो]! निःशंक होकर कीजिये। यह नन्दी हमारा पुत्र है। यह सभीका ईश्वर है। यह समृद्धिशाली विप्र तुमलोगोंका नायक तथा सेनानी है। अतः मेरे आदेशसे तुम सभी लोग अपना स्वामी एवं सेनानी मानकर इस महायोगपतिका अभिषेक करो॥ १४-१७॥
एवमुक्ता भगवता गणपाः सर्व एव ते।<br>एवमस्त्विति सम्मन्त्र्य सम्भारानाहरंस्ततः॥ १८भगवान् शिवके इस प्रकार कहनेपर वे सभी

अध्याय ४४ ] भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना १९९


श्लोकअर्थ
तस्य सर्वाश्रयं दिव्यं जाम्बूनदमयं शुभम्।<br>आसनं मेरुसङ्काशं मनोहरमुपाहरन्॥ १९<br><br>नैकस्तम्भमयं चापि चामीकरवरप्रभम्।<br>मुक्तादामावलम्बं च मणिरत्नावभासितम्॥ २०<br><br>स्तम्भैश्च वैडूर्यमयैः किङ्किणीजालसंवृतम्।<br>चारुरत्नकसंयुक्तं मण्डपं विश्वतोमुखम्॥ २१<br><br>कृत्वा विन्यस्य तन्मध्ये तदासनवरं शुभम्।<br>तस्याग्रतः पादपीठं नीलवज्रावभासितम्॥ २२<br><br>चक्रुः पादप्रतिष्ठार्थं कलशौ चास्य पार्श्वगौ।<br>सम्पूर्णौ परमाम्भोभिररविन्दावृताननौ॥ २३<br><br>कलशानां सहस्रं तु सौवर्णं राजतं तथा।<br>ताम्रजं मृण्मयं चैव सर्वतीर्थाम्बुपूरितम्॥ २४गणेश्वर 'ऐसा ही होगा'—यह कहकर आपसमें परामर्श करके सामग्रियाँ एकत्र करने लगे॥ १८॥<br><br>वे स्वर्णनिर्मित, दिव्य, सुन्दर, मेरुसदृश तथा मनोहर सिंहासन ले आये। उन्होंने अनेक स्तम्भोंवाले, उत्तम स्वर्णकी प्रभासे युक्त, लटकती हुई मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित, मणियों एवं रत्नोंसे जटिल, वैडूर्यमणिके स्तम्भोंवाले, किंकिणियोंसे सुशोभित, सुन्दर रत्नोंसे समन्वित तथा सभी ओर मुखवाले एक मण्डपका निर्माण करके उसके मध्यमें उस सुन्दर आसनको स्थापितकर पादप्रतिष्ठाके लिये उसके आगे नीलवज्रसे जटिल एक पादपीठ रखा। उसके दोनों ओर उन्होंने दो कलश रखे, जो सुगन्धित जलसे भरे हुए थे तथा उनके मुख कमलपुष्पोंसे ढँके हुए थे। सोने, चाँदी, ताँबे और मिट्टीके हजारों कलश वहाँ रखे थे, जो सभी तीर्थोंके जलसे परिपूर्ण थे॥ १९–२४॥
वासोयुगं तथा दिव्यं गन्धं दिव्यं तथैव च।<br>केयूरे कुण्डले चैव मुकुटं हारमेव च॥ २५<br><br>छत्रं शतशलाकं च बालव्यजनमेव च।<br>दत्तं महात्मना तेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना॥ २६महात्मा परमेष्ठी ब्रह्माने दिव्य वस्त्रयुगल, दिव्य गन्ध, केयूर, कुण्डल, मुकुट, हार, सौ शलाकाओं (तीलियों)-वाला छत्र और एक बालव्यजन प्रदान किया॥ २५–२६॥
शङ्खहाराङ्गगौरेण पृष्ठेनापि विराजितम्।<br>व्यजनं चन्द्रशुभ्रं च हेमदण्डं सुचामरम्॥ २७<br><br>ऐरावतः सुप्रतीको गजावेतौ सुपूजितौ।<br>मुकुटं काञ्चनं चैव निर्मितं विश्वकर्मणा॥ २८<br><br>कुण्डले चामले दिव्ये वज्रं चैव वरायुधम्।<br>जाम्बूनदमयं सूत्रं केयूरद्वयमेव च॥ २९<br><br>सम्भाराणि तथान्यानि विविधानि बहून्यपि।<br>समन्तान्निन्युरव्यग्रा गणपा देवसम्मताः॥ ३०शंख तथा मोतियोंकी मालाके समान गौरवर्णवाले दण्डसे सुशोभित और चन्द्रमाके समान शुभ्र व्यजन, स्वर्णका दण्ड (मूठ) लगा हुआ चामर, भलीभाँति पूजित ऐरावत तथा सुप्रतीक—ये दो हाथी, विश्वकर्माके द्वारा बनाया हुआ एक सोनेका मुकुट, दो स्वच्छ तथा दिव्य कुण्डल, श्रेष्ठ आयुध वज्र, सोनेका सूत्र तथा दो केयूर वहाँ रखे गये। देवताओंके द्वारा पूजित उन गणेश्वरोंने चारों ओर अनेक प्रकारकी अन्य आवश्यक सामग्रियोंको सावधान होकर वहाँ उपस्थित कर दिया॥ २७–३०॥
ततो देवाश्च सेन्द्राश्च नारायणमुखास्तथा।<br>मुनयो भगवान् ब्रह्मा नवब्रह्माण एव च॥ ३१<br><br>देवैश्च लोकाः सर्वे ते ततो जग्मुर्मुदा युताः।<br>तेष्वागतेषु सर्वेषु भगवान् परमेश्वरः॥ ३२तदनन्तर इन्द्रसहित विष्णु आदि देवता, मुनिगण, भगवान् ब्रह्मा, नवब्रह्माण*, देवताओंसहित सभी लोकपाल प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गये। उन सभीके वहाँ आ जानेपर भगवान् परमेश्वरने समस्त संस्कारविधि सम्पन्न करानेके

* मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—ये नौ ऋषि ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न होनेके कारण तथा ब्रह्मवादी और ब्रह्मात्मक होनेसे 'नवब्रह्माण' कहलाते हैं। (लिङ्गपु० पू० ७०। १८१–१८३)

२००श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
लिये पितामह ब्रह्माको आदेश दिया॥ ३१-३२ १/२॥
सर्वकार्यविधिं कर्तुमादिदेश पितामहम्।<br>पितामहोऽपि भगवान् नियोगादेव तस्य तु॥ ३३<br><br>चकार सर्वं भगवानभिषेकं समाहितः।<br>अर्चयित्वा ततो ब्रह्मा स्वयमेवाभ्यषेचयत्॥ ३४<br><br>ततो विष्णुस्ततः शक्रो लोकपालास्तथैव च।<br>अभ्यषिञ्चन्त विधिवद् गणेन्द्रं शिवशासनात्॥ ३५तब उनका आदेश पाते ही भगवान् ब्रह्माने भी ध्यानपूर्वक सम्पूर्ण अभिषेक-कर्म सम्पन्न कराया। तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने पूजन करके स्वयं उनका अभिषेक किया। इसके बाद शिवके आदेशसे विष्णुने, फिर इन्द्रने और लोकपालोंने गणेन्द्रका विधिपूर्वक अभिषेक किया॥ ३३-३५॥
ऋषयस्तुष्टुवुश्चैव पितामहपुरोगमाः।<br>स्तुतवत्सु ततस्तेषु विष्णुः सर्वजगत्पतिः॥ ३६<br><br>शिरस्यञ्जलिमादाय तुष्टाव च समाहितः।<br>प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा जयशब्दं चकार च॥ ३७तदनन्तर ऋषियों तथा पितामह आदिने उनकी स्तुति की। तब उन सभीके स्तुति कर लेनेपर समस्त जगत्के स्वामी विष्णुने सिरपर अंजलि बाँधकर एकाग्र-चित्त होकर उनकी स्तुति की और हाथ जोड़े हुए झुककर जय-जयकार किया। तत्पश्चात् सभी गणेश्वरों, देवताओं और असुरोंने भी क्रमसे सम्पूर्ण कृत्य किया॥ ३६-३७ १/२॥
ततो गणाधिपाः सर्वे ततो देवास्ततोऽसुराः।<br>एवं स्तुतश्चाभिषिक्तो देवैः सब्रह्मकैस्तदा॥ ३८<br><br>उद्वाहश्च कृतस्तत्र नियोगात्परमेष्ठिनः।<br>मरुतां च सुता देवी सुयशाख्या बभूव या॥ ३९<br><br>लब्धं शशिप्रभं छत्रं तया तत्र विभूषितम्।<br>चामरे चामरासक्तहस्ताग्रैः स्त्रीगणैर्युता॥ ४०<br><br>सिंहासनं च परमं तया चाधिष्ठितं मया।<br>अलङ्कृता महालक्ष्म्या मुकुटाद्यैः सुभूषणैः॥ ४१इस प्रकार ब्रह्मसहित सभी देवताओंके द्वारा उनका अभिषेक तथा स्तवन हो जानेके बाद परमेष्ठीकी आज्ञासे उन्होंने विवाह किया। सुयशा नामक जो मरुतोंकी पुत्री थी, वह उनकी भार्या हुई। उस सुयशाको चन्द्रमाके समान प्रभायुक्त और विशेष शोभासम्पन्न एक छत्र भेंट किया गया। हाथोंमें चामर लिये हुए स्त्रियोंसे युक्त उस सुयशाको दो चामर भी प्रदान किये गये। मेरे साथ उसने भी एक अत्यन्त सुन्दर सिंहासन ग्रहण किया। भगवती महालक्ष्मीने मुकुट आदि सुन्दर आभूषणोंसे उसे अलंकृत किया॥ ३८-४१॥
लब्धो हारश्च परमो देव्याः कण्ठगतस्तथा।<br>वृषेन्द्रश्च सितो नागः सिंहः सिंहध्वजस्तथा॥ ४२<br><br>रथश्च हेमच्छत्रं च चन्द्रबिम्बसमप्रभम्।<br>अद्यापि सदृशः कश्चिन्मया नास्ति विभुः क्वचित्॥ ४३उसे देवीके गलेका अति सुन्दर हार भी प्राप्त हुआ। वृषेन्द्र, श्वेत हाथी, सिंह, सिंहध्वज, रथ और चन्द्रमण्डलके समान प्रभाववाला स्वर्णछत्र भी भेंट किया गया। अब मेरे समान कहीं भी कोई प्रभु नहीं था॥ ४२-४३॥
सान्वयं च गृहीत्वेशस्तथा सम्बन्धिबान्धवैः।<br>आरुह्य वृषमीशानो मया देव्या गतः शिवः॥ ४४मुझको परिवारसहित लेकर सम्बन्धियों तथा बान्धवोंको भी साथ लेकर देवीके साथ भगवान् महेश्वर वृषभपर आरूढ़ हो चल पड़े॥ ४४॥
तदा देवीं भवं दृष्ट्वा मया च प्रार्थयन् गणैः।<br>मुनिदेवर्षयः सिद्धा आज्ञां पाशुपतीं द्विजाः॥ ४५तब मेरे तथा गणोंके साथ शिव एवं पार्वतीको देखकर मुनियों, देवर्षियों, सिद्धों और द्विजोंने शिवकी आज्ञाहेतु प्रार्थना की॥ ४५॥
अथाज्ञां प्रददौ तेषामर्हाणामाज्ञया विभोः।<br>नन्दिको नगजाभर्तुस्तेषां पाशुपतीं शुभाम्॥ ४६तत्पश्चात् हिमालयकी पुत्रीके पति प्रभु शिवकी