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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
३७- नन्दीके जन्मका वृत्तान्त, ब्रह्मा तथा विष्णुका परस्पर संवाद और शिवद्वारा दोनोंपर अनुग्रह करना
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| अध्याय ३७] | नन्दीके जन्मका वृत्तान्त... शिवद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुपर अनुग्रह करना | १६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तदेव तीर्थमभवत्स्थानेश्वरमिति स्मृतम्।<br>स्थानेश्वरमनुप्राप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ७७ | वह युद्धस्थान एक तीर्थ बन गया, जो स्थानेश्वर नामसे जाना जाता है। स्थानेश्वर तीर्थका सेवन करनेसे मनुष्य शिव-सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ७७ ॥ |
| कथितस्तव सङ्क्षेपाद्विवादः क्षुब्दधीचयोः।<br>प्रभावश्च दधीचस्य भवस्य च महामुने॥ ७८ | [नन्दीश्वर बोले—] हे महामुने सनत्कुमार ! यह मैंने आपसे संक्षेपमें क्षुप-दधीचके विवाद और दधीच तथा भगवान् शिवके प्रभावका वर्णन किया है ॥ ७८ ॥ |
| य इदं कीर्तयेद्दिव्यं विवादं क्षुब्दधीचयोः।<br>जित्वापमृत्युं देहान्ते ब्रह्मलोकं प्रयाति सः॥ ७९ | जो मनुष्य क्षुप तथा दधीचके इस दिव्य विवादका पठन करता है, वह अपमृत्युको जीतकर देहका अन्त होनेके अनन्तर ब्रह्मलोकको प्रस्थान करता है ॥ ७९ ॥ |
| य इदं कीर्त्य सङ्ग्रामं प्रविशेत्तस्य सर्वदा।<br>नास्ति मृत्युभयं चैव विजयी च भविष्यति ॥ ८० | जो कोई भी इसका पाठ करके युद्ध-स्थलमें प्रवेश करता है, उसे मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं रहता है और वह संग्राममें सदा विजेता सिद्ध होता है ॥ ८० ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे क्षुपदधीचसंवादो नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'क्षुप-दधीच-संवाद' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥
सैंतीसवाँ अध्याय
नन्दीके जन्मका वृत्तान्त, ब्रह्मा तथा विष्णुका परस्पर संवाद और शिवद्वारा दोनोंपर अनुग्रह करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सनत्कुमार उवाच<br>भवान् कथमनुप्राप्तो महादेवमुमापतिम्।<br>श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं वक्तुमर्हसि मे प्रभो॥ १ | सनत्कुमार बोले— [हे नन्दीश्वर !] आपको पार्वतीपति महादेवका सान्निध्य कैसे प्राप्त हुआ? हे प्रभो! मैं इससे सम्बन्धित सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ; आप उसे बतायें ॥ १ ॥ |
| शैलादिरुवाच<br>प्रजाकामः शिलादोऽभूत्पिता मम महामुने।<br>सोऽप्यन्धः सुचिरं कालं तपस्तेपे सुदुश्चरम्॥ २ | नन्दी कहते हैं— हे महामुने ! मेरे पिता शिलादको एक बार संतानकी कामना उत्पन्न हुई और उन्होंने अन्धे होनेपर भी दीर्घकालतक कठोर तपस्या की ॥ २ ॥ |
| तपतस्तस्य तपसा सन्तुष्टो वज्रधृक् प्रभुः।<br>शिलादमाह तुष्टोऽस्मि वरयस्व वरानिति ॥ ३ | तपस्यामें रत उन मेरे पिताके तपसे प्रसन्न होकर वज्रधारी इन्द्रने शिलादसे कहा—मैं तुमपर अति प्रसन्न हूँ; अतएव वर माँगो ॥ ३ ॥ |
| ततः प्रणम्य देवेशं सहस्राक्षं सहामरैः।<br>प्रोवाच मुनिशार्दूल कृताञ्जलिपुटो हरिम्॥ ४ | तब देवताओंसमेत सहस्रनेत्र देवेन्द्रको प्रणाम करके मुनिश्रेष्ठ शिलादने दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा ॥ ४ ॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् देवतारिघ्न सहस्राक्ष वरप्रद।<br>अयोनिजं मृत्युहीनं पुत्रमिच्छामि सुव्रत॥ ५ | शिलाद बोले— हे भगवन् ! हे असुर-दलन ! हे सहस्रनयन ! हे वरप्रद ! हे सुव्रत ! मैं अयोनिज तथा अमर पुत्र चाहता हूँ ॥ ५ ॥ |
| शक्र उवाच<br>पुत्रं दास्यामि विप्रर्षे योनिजं मृत्युसंयुतम्।<br>अन्यथा ते न दास्यामि मृत्युहीना न सन्ति वै॥ ६ | इन्द्र बोले— हे विप्रवर ! मैं तुम्हें योनिज तथा मरणधर्मा पुत्रका वर दे सकता हूँ; क्योंकि मरणहीन तो |
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| १६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न दास्यति सुतं तेऽत्र मृत्युहीनमयोनिजम्।<br>पितामहोऽपि भगवान् किमुतान्ये महामुने॥ ७ | कोई भी नहीं है॥ ६॥<br>हे महामुने! अयोनिज तथा मृत्युसे हीन पुत्र तो तुम्हें भगवान् ब्रह्मा भी नहीं दे सकते; अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या?॥ ७॥ |
| सोऽपि देवः स्वयं ब्रह्मा मृत्युहीनो न चेश्वरः।<br>योनिजश्च महातेजाश्चाण्डजः पद्मसम्भवः॥ ८<br><br>महेश्वराङ्गजश्चैव भवान्यास्तनयः प्रभुः।<br>तस्याप्यायुः समाख्यातं परार्धद्वयसम्मितम्॥ ९<br><br>कोटिकोटिसहस्राणि अहर्भूतानि यानि वै।<br>समतीतानि कल्पानां तावच्छेषाः परत्र ये॥ १० | साक्षात् वे परमेश्वर ब्रह्मदेव भी मृत्युहीन नहीं हैं। महान् तेजस्वी ब्रह्मा भी योनिज है; क्योंकि उनकी भी उत्पत्ति अण्ड तथा कमलसे हुई है। वे प्रभु ब्रह्मा महेश्वर एवं भवानीके पुत्र हैं। उनकी भी आयु दो परार्धके बराबर कही गयी है। प्रथम परार्धमें हजारों करोड़ कल्प भी ब्रह्माके दिनके रूपमें व्यतीत हो चुके हैं और द्वितीय परार्धमें उतने ही कल्प शेष हैं॥ ८-१०॥ |
| तस्मादयोनिजे पुत्रे मृत्युहीने प्रयत्नतः।<br>परित्यजाशां विप्रेन्द्र गृहाणात्मसमं सुतम्॥ ११ | अतएव हे विप्रेन्द्र! अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्रकी आशा प्रयत्नपूर्वक छोड़ दीजिये और अपने तुल्य पुत्र ग्रहण कीजिये॥ ११॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पिता मे लोकविश्रुतः।<br>शिलाद इति पुण्यात्मा पुनः प्राह शचीपतिम्॥ १२ | नन्दीश्वर बोले—उनका वह वचन सुनकर शिलाद नामसे लोक-विख्यात मेरे पुण्यात्मा पिताने शचीपति इन्द्रसे पुनः कहा॥ १२॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन्नण्डयोनित्वं पद्मयोनित्वमेव च।<br>महेश्वराङ्गयोनित्वं श्रुतं वै ब्रह्मणो मया॥ १३<br><br>पुरा महेन्द्र दायादाद् गदतश्चास्य पूर्वजात्।<br>नारदाद्वै महाबाहो कथमत्राशु नो वद॥ १४<br><br>दाक्षायणी सा दक्षोऽपि देवः पद्मोद्भवत्मजः।<br>पौत्री कनकगर्भस्य कथं तस्याः सुतो विभुः॥ १५ | शिलाद बोले—हे भगवन्! हे महेन्द्र! मैंने पूर्वकालमें इन ब्रह्माके पूर्वोत्पन्न नारद नामक पुत्रद्वारा ऐसा कहते हुए सुन रखा है कि ये ब्रह्मा अण्ड, कमल और शिवजीके अंगसे उत्पन्न हैं; तो हे महाबाहो! मुझे आप शीघ्र बताइये कि ऐसा कैसे है? दक्षप्रजापति तो पद्मयोनि ब्रह्माजीके पुत्र हैं। इस प्रकार दक्षकी पुत्री हिरण्यगर्भ ब्रह्माकी पौत्री हुई; तो फिर वे प्रभु ब्रह्मा उन दाक्षायणीके पुत्र कैसे हुए?॥ १३-१५॥ |
| शक्र उवाच<br>स्थाने संशयितुं विप्र तव वक्ष्यामि कारणम्।<br>कल्पे तत्पुरुषे वृत्तं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ १६<br><br>ससर्ज सकलं ध्यात्वा ब्रह्माणं परमेश्वरः।<br>जनार्दनो जगन्नाथः कल्पे वै मेघवाहने॥ १७<br><br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु मेघो भूत्वावहद्धरम्।<br>नारायणो महादेवं बहुमानेन सादरम्॥ १८ | इन्द्र बोले—हे विप्र! इस स्थितिमें आपका संदेह करना युक्तिपूर्ण है; किंतु मैं आपको इसका कारण बता रहा हूँ। तत्पुरुष नामक कल्पमें परमेष्ठी शिवकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई और उन परमेश्वरने ध्यान करके कलायुक्त ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। जनार्दन जगत्पति नारायण विष्णुभगवान् मेघवाहन कल्पमें हजार दिव्य वर्षोंतक मेघ बनकर अत्यन्त सम्मान तथा आदरके साथ महादेव शिवके वाहन बने रहे॥ १६-१८॥ |
| दृष्ट्वा भावं महादेवो हरेः स्वात्मनि शङ्करः।<br>प्रददौ तस्य सकलं स्रष्टुं वै ब्रह्मणा सह॥ १९ | महादेव शिवने अपनेमें भगवान् विष्णुकी भक्ति देखकर उन्हें ब्रह्माजीसहित सम्पूर्ण जगत् रचनेकी आज्ञा दी॥ १९॥ |
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| अध्याय ३७ ] | नन्दीके जन्मका वृत्तान्त···शिवद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुपर अनुग्रह करना | १६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तदा तं कल्पमाहुर्वै मेघवाहनसंज्ञया।<br>हिरण्यगर्भस्तं दृष्ट्वा तस्य देहोद्भवस्तदा॥ २०<br>जनार्दनसुतः प्राह तपसा प्राप्य शङ्करम्।<br>तव वामाङ्गजो विष्णुर्र्दक्षिणाङ्गभवो ह्यहम्॥ २१ | तभीसे उस कल्पको 'मेघवाहन' नामसे कहा जाता है। उन विष्णुको देखकर उन्हींके देहसे उत्पन्न जनार्दनपुत्र हिरण्यगर्भ ब्रह्माने अपनी तपस्यासे शंकरजीको प्राप्तकर उनसे कहा- ॥ २०^{१}/_२ ॥<br>विष्णु आपके वाम अंगसे उत्पन्न हैं तथा मैं आपके दायें अंगसे उत्पन्न हूँ; फिर भी उन विष्णुने मेरे साथ सम्पूर्ण जगत्की रचना की॥ २१^{१}/_२ ॥ |
| मया सह जगत्सर्वं तथाप्यसृजदच्युतः।<br>जगन्मयोऽवहद्यस्मान्मेघो भूत्वा दिवानिशम्॥ २२<br>भवन्तमवहद्विष्णुर्देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>नारायणादपि विभो भक्तोऽहं तव शङ्कर॥ २३<br>प्रसीद देहि मे सर्वं सर्वात्मत्वं तव प्रभो।<br>तदाथ लब्ध्वा भगवान् भवात्सर्वात्मतां क्षणात्॥ २४ | यद्यपि जगन्मय विष्णुने मेघ बनकर आप देवदेव जगद्गुरु महेश्वरका दिन-रात वहन किया है; फिर भी हे विभो! हे शंकर! मैं उन नारायणसे भी बढ़कर आपका भक्त हूँ। अतएव हे प्रभो! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये और मुझे अपना सर्वात्मत्व प्रदान कीजिये॥ २२-२३^{१}/_२ ॥<br>तत्पश्चात् महादेवजीसे सर्वात्मत्वकी प्राप्ति करके ब्रह्माजीने शीघ्रतापूर्वक क्षीरसागर पहुँचकर वहाँ एकार्णवमें पुरुषोत्तम विष्णुको भीषण अन्धकारमें मानसनिर्मित, स्वर्णरत्न-खचित, दुर्जनोंद्वारा दुष्प्राप्य तथा सनक आदि पुण्यात्माओंद्वारा अगोचर शुभ्र एवं दिव्य भवनमें देखा॥ २४-२६॥ |
| त्वरमाणोऽथ सङ्गम्य ददर्श पुरुषोत्तमम्।<br>एकार्णवालये शुभ्रे त्वन्धकारे सुदारुणे॥ २५<br>हेमरत्नचिते दिव्ये मनसा च विनिर्मिते।<br>दुष्प्राप्ये दुर्जनैः पुण्यैः सनकाद्यैरगोचरे॥ २६<br>जगदावासहृदयं ददर्श पुरुषं त्वजः।<br>अनन्तभोगशय्यायां शायिनं पङ्कजेक्षणम्॥ २७ | |
| शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं चतुर्भुजम्।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं शशिमण्डलसन्निभम्॥ २८<br>श्रीवत्सलक्षणं देवं प्रसन्नास्यं जनार्दनम्।<br>रमामृदुकराम्भोजस्पर्शरक्तपदाम्बुजम् ॥ २९<br>परमात्मानमीशानं तमसा कालरूपिणम्।<br>रजसा सर्वलोकानां सर्गलीलाप्रवर्तकम्॥ ३०<br>सत्त्वेन सर्वभूतानां स्थापकं परमेश्वरम्।<br>सर्वात्मानं महात्मानं परमात्मानमीश्वरम्॥ ३१<br>क्षीरार्णवेऽमृतमये शायिनं योगनिद्रया।<br>तं दृष्ट्वा प्राह वै ब्रह्मा भगवन्तं जनार्दनम्॥ ३२ | ब्रह्माजीने जगत्को अपने हृदयमें धारण करनेवाले, चारों भुजाओंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले, सभी आभूषणोंसे युक्त, चन्द्र-मण्डलतुल्य आभावाले, अपने वक्षःस्थलपर 'श्री' चिह्न धारण करनेवाले, तमोगुणसे युक्त होनेपर कालरूप, रजोगुणसे युक्त होनेपर सभी लोकोंकी सृजन-लीलाके प्रवर्तक, सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर सभी प्राणियोंके स्थापक, कमलनयन, प्रसन्नमुख, जनार्दन, परमपुरुष, परमात्मा, ईशान, सर्वात्मा, महात्मा, देवरूप ईश्वर विष्णुको उस अमृतमय क्षीरसागरमें अनन्त शेषनागकी शय्यापर योगनिद्रामें सोये हुए देखा; उस समय उनके रक्त-कमल-सदृश चरणोंको लक्ष्मीजी अपने अरविन्द-तुल्य कोमल हाथोंसे दबा रही थीं॥ २७-३१^{१}/_२ ॥ |
| ग्रसामि त्वां प्रसादेन यथापूर्वं भवानहम्।<br>स्मयमानस्तु भगवान् प्रतिबुध्य पितामहम्॥ ३३ | भगवान् जनार्दनको देखकर ब्रह्माजीने उनसे कहा कि जिस प्रकार पहले आपने मुझे ग्रस लिया था, उसी प्रकार शिवजीकी कृपासे अब मैं आपको ग्रसूँगा॥ ३२^{१}/_२ ॥ |
| उदैक्षत महाबाहुः स्मितमीषच्चकार सः।<br>विवेश चाण्डजं तं तु ग्रस्तस्तेन महात्मना॥ ३४ | भगवान् विष्णुने उठकर विस्मयपूर्ण भावसे ऊपर दृष्टि करके ब्रह्माजीको देखा और उन महाबाहुने थोड़ा |