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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

३०- शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान

अध्याय ३० ] शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान १४१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततश्चोर्ध्वं चरेदेवं यतिः शिवविमुक्तये।<br>व्रतेनानशनेनापि तोयवृत्त्यापि वा पुनः॥ ७८<br><br>पर्णवृत्त्या पयोवृत्त्या फलवृत्त्यापि वा यतिः।<br>एवं जीवनमृतो नो चेत्षण्मासाद्द्वत्सरात्तु वा॥ ७९<br><br>प्रस्थानादिकमायासं स्वदेहस्य चरेद्यतिः।<br>शिवसायुज्यमाप्नोति कर्मणाप्येवमाचरन्॥ ८०<br><br>सद्योऽपि लभते मुक्तिं भक्तियुक्तो दृढव्रतः॥ ८१<br><br>त्यागेन वा किं विधिनाप्यनेन<br>भक्तस्य रुद्रस्य शुभैर्व्रतैश्च।<br>यज्ञैश्च दानैर्विविधैश्च होमै-<br>र्लब्धैश्च शास्त्रैर्विविधैश्च वेदैः॥ ८२<br><br>श्वेतेनैवं जितो मृत्युर्भवभक्त्या महात्मना।<br>वोऽस्तु भक्तिर्महादेवे शङ्करे परमात्मनि॥ ८३पाँच आहुति देनी चाहिये॥ ७७॥<br><br>इसके पश्चात् यतिको शिवसायुज्यरूपी विमुक्तिके लिये आगेकी भी साधना करनी चाहिये। इसके लिये छः माह अथवा वर्षपर्यन्त यति अनशन करे अथवा जल पीकर या पत्ते खाकर या दूध पीकर या फल खाकर जीवन-निर्वाह करे। ऐसा करनेपर यदि मृत्यु नहीं हुई और वह जीवित रहता है, तो उसे अपने देहके प्रस्थान आदि अर्थात् स्थूल शरीरके त्यागका प्रयास करना चाहिये। ऐसा आचरण करते हुए वह यति अपने कर्मसे भी शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ ७८–८०॥<br><br>परंतु हे दृढव्रती मुनियो! शिवजीमें भक्ति रखनेवाला प्राणी शीघ्र ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है। महादेवजीके भक्तको त्याग, विधि, महान् व्रतों, यज्ञों, विविध प्रकारके दानों, होमों, विविध शास्त्रों तथा वेदोंसे क्या प्रयोजन! महान् आत्मावाले श्वेतमुनिने महादेवकी भक्तिसे ही मृत्यूतकको जीत लिया था। अतएव परमेश्वर महादेव शिवजीके प्रति आपलोग भी भक्तिपरायण हों॥ ८१–८३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवदारुवनवृत्तान्तवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवदारुवनवृत्तान्तवर्णन' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २९ ॥


तीसवाँ अध्याय

शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शैलादिरुवाच<br>एवमुक्तास्तदा तेन ब्रह्मणा ब्राह्मणर्षभाः।<br>श्वेतस्य च कथां पुण्यामपृच्छन् परमर्षयः॥ १<br><br>पितामह उवाच<br>श्वेतो नाम मुनिः श्रीमान् गतायुर्गिरिगह्वरे।<br>सक्तो ह्याभ्यर्च्य यद्भक्त्या तुष्टाव च महेश्वरम्॥ २<br>रुद्राध्यायेन पुण्येन नमस्तेत्यादिना द्विजाः।<br>ततः कालो महातेजाः कालप्राप्तं द्विजोत्तमम्॥ ३<br>नेतुं सञ्चिन्त्य विप्रेन्द्राः सान्निध्यमकरोन्मुनेः।<br>श्वेतोऽपि दृष्ट्वा तं कालं कालप्राप्तोऽपि शङ्करम्॥ ४नन्दिकेश्वर बोले— तत्पश्चात् उन ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर द्विजश्रेष्ठ महर्षियोंने उनसे श्वेतमुनिकी पुण्यप्रद कथा पूछी—॥ १॥<br><br>पितामह बोले— समाप्त आयुवाले श्वेत नामक एक श्रीयुक्त मुनि गिरिकी गुफामें शिवाराधनमें रत थे। हे द्विजो! 'नमस्ते रुद्र मन्यवे' इत्यादि रुद्राध्यायसे भक्तिपूर्वक महेश्वरकी आराधना करके श्वेतमुनिने उन्हें प्रसन्न कर लिया॥ २ ½ ॥<br><br>हे विप्रेन्द्रो! तदनन्तर द्विजोंमें श्रेष्ठ श्वेतमुनिको समाप्त आयुवाला जानकर उन्हें ले जानेके लिये महातेजस्वी काल मुनिके पास पहुँचा॥ ३ ½ ॥
१४२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पूजयामास पुण्यात्मा त्रियम्बकमनुस्मरन्।<br>त्रियम्बकं यजेदेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्॥ ५<br><br>किं करिष्यति मे मृत्युर्मृत्योर्मृत्युरहं यतः।<br>तं दृष्ट्वा सस्मितं प्राह श्वेतं लोकभयङ्करः॥ ६सन्निकट मृत्युवाले पुण्यात्मा श्वेतमुनि भी उस कालको देखकर त्रिनेत्र शिवका स्मरण करते हुए उनकी आराधना करने लगे। वे ऐसा कहते हुए ध्यानपरायण थे कि जब मैं सुखकर सम्बन्धवाले तथा जगत्का पोषण करनेवाले त्रिनेत्र शिवका यजन कर रहा हूँ, तो मृत्यु मेरा क्या कर लेगी; क्योंकि मैं तो कालका भी काल हूँ॥ ४-५ १/२ ॥
एह्येहि श्वेत चानेन विधिना किं फलं तव।<br>रुद्रो वा भगवान् विष्णुर्ब्रह्मा वा जगदीश्वरः॥ ७<br><br>कः समर्थः परित्रातुं मया ग्रस्तं द्विजोत्तम।<br>अनेन मम किं विप्र रौद्रेण विधिना प्रभोः॥ ८<br><br>नेतुं यस्योत्थितश्चाहं यमलोकं क्षणेन वै।<br>यस्माद् गतायुस्त्वं तस्मान्मुने नेतुमिहोद्यतः॥ ९उन श्वेतमुनिको देखकर लोकोंको भयभीत करनेवाला वह काल मुसकराकर उनसे बोला—हे श्वेत! अब तुम मेरी ओर आओ; इस पूजा-पाठ आदिसे तुम्हें क्या लाभ! हे द्विजवर! भगवान् विष्णु, ब्रह्मा अथवा जगदीश्वर रुद्र—इनमें भला कौन मेरे द्वारा ग्रास बनाये गये जीवको बचा सकनेमें समर्थ है? हे विप्र! यह रुद्रपूजा मुझ शक्तिमान्का क्या कर सकती है? जिस किसीको भी ले जानेके लिये मैं उठ खड़ा होता हूँ, उसे क्षणभरमें यमलोक पहुँचा देता हूँ। हे मुने! क्योंकि तुम समाप्त आयुवाले हो चुके हो, अतः तुम्हें ले जानेहेतु मैं यहाँ आया हूँ॥ ६—९॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भैरवं धर्ममिश्रितम्।<br>हा रुद्र रुद्र रुद्रेति ललाप मुनिपुङ्गवः॥ १०<br><br>तं प्राह च महादेवं कालं सम्प्रेक्ष्य वै दृशा।<br>नेत्रेण बाष्पमिश्रेण सम्भ्रान्तेन समाकुलः॥ ११उस कालका वह धर्ममिश्रित भयावह वचन सुनकर मुनिवर श्वेत 'हा रुद्र! हा रुद्र! हा रुद्र!' कहकर विलाप करने लगे और अश्रुपूरित तथा व्याकुल नेत्रोंसे एवं कातर दृष्टिसे शिवलिङ्गको निहारते हुए अत्यन्त व्यग्रचित्त होकर उस कालसे कहने लगे—॥ १०-११॥
श्वेत उवाच<br>त्वया किं काल नो नाथश्चास्ति चेद्दि वृषध्वजः।<br>लिङ्गेऽस्मिन् शङ्करो रुद्रः सर्वदेवभवोद्भवः॥ १२श्वेतमुनि बोले—हे काल! तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो; क्योंकि सभी देवताओंको उत्पन्न करनेवाले हमारे स्वामी वृषभध्वज शंकर रुद्र इस लिङ्गमें विराजमान हैं॥ १२॥
अतीव भवभक्तानां मद्विधानां महात्मनाम्।<br>विधिना किं महाबाहो गच्छ गच्छ यथागतम्॥ १३विधिके विधान शिवजीके प्रति अतिशय भक्ति रखनेवाले मुझसदृश महात्माओंका क्या कर सकता है? अतएव हे महाबाहो! आप जिस प्रकार आये थे, उसी प्रकार चले जाइये॥ १३॥
ततो निशम्य कुपितस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भयङ्करः।<br>श्रुत्वा श्वेतस्य तद्वाक्यं पाशहस्तो भयावहः॥ १४<br><br>सिंहनादं महत्कृत्वा चास्फोट्य च मुहुर्मुहुः।<br>बबन्ध च मुनिं कालः कालप्राप्तं तमाह च॥ १५तदनन्तर श्वेतमुनिका वैसा वचन सुनकर हाथमें पाश धारण किये, तीक्ष्ण दाढ़ोंवाले भयंकर कालने कुपित होकर सिंहके सदृश घोर गर्जना करते हुए तथा
अध्याय ३० ]शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान१४३

| मया बद्धोऽसि विप्रर्षे श्वेतं नेतुं यमालयम्।<br>अद्य वै देवदेवेन तव रुद्रेण किं कृतम्॥ १६<br><br>क्व शर्वस्तव भक्तिश्च क्व पूजा पूजया फलम्।<br>क्व चाहं क्व च मे भीतिः श्वेत बद्धोऽसि वै मया॥ १७<br><br>लिङ्गेऽस्मिन् संस्थितः श्वेत तव रुद्रो महेश्वरः।<br>निश्चेष्टोऽसौ महादेवः कथं पूज्यो महेश्वरः॥ १८ | पाशको बार-बार फटकारते हुए काल-प्राप्त मुनिको बाँध दिया और पुनः उनसे कहा— ॥ १४-१५॥<br>हे विप्रर्षे! तुम श्वेतको यमलोक ले जानेके निमित्त मैंने बाँध दिया है; किंतु तुम्हारे देवाधिदेव रुद्रने इस समय तुम्हारी क्या सहायता की? कहाँ शिव, कहाँ तुम्हारी भक्ति तथा पूजा, कहाँ पूजाका फल और कहाँ मैं एवं मेरा भय! हे श्वेत! अब तुम मेरे द्वारा बाँध दिये गये हो। हे श्वेत! तुम्हारा महेश्वर रुद्र जो इस लिङ्गमें स्थित है, वह महादेव तो निश्चेष्ट है; तो फिर तुम उस महेश्वरकी पूजा क्यों करते हो? ॥ १६-१८॥ |
| ततः सदाशिवः स्वयं द्विजं निहन्तुमागतम्।<br>निहन्तुमन्तकं स्मयन् स्मरारि यज्ञहा हरः॥ १९<br><br>त्वरन् विनिर्गतः परः शिवः स्वयं त्रिलोचनः।<br>त्रियम्बकोऽम्बया समं सनन्दिना गणेश्वरैः॥ २० | तत्पश्चात् मुनिका प्राण हरनेके निमित्त आये हुए कालका संहार करनेके लिये कामदेवके शत्रु, दक्ष-यज्ञके विध्वंसक तथा त्रिनेत्र सदाशिव महादेव शंकर अपने नन्दी, गणेश्वरों और पार्वतीसहित मुसकराते हुए शीघ्रतापूर्वक शिवलिङ्गसे साक्षात् प्रकट हुए॥ १९-२०॥ |
| ससर्ज जीवितं क्षणाद्द्रवं निरीक्ष्य वै भयात्।<br>पपात चाशु वै बली मुनेस्तु सन्निधौ द्विजाः॥ २१<br><br>ननाद चोर्ध्वमुच्चधीर्निरीक्ष्य चान्तकान्तकम्।<br>निरीक्षणेन वै मृतं भवस्य विप्रपुङ्गवाः॥ २२ | हे द्विजो! शिवजीको देखते ही उसी क्षण भयके कारण वह बलवान् काल श्वेतमुनिके पास शीघ्र ही गिर पड़ा और कालका भी अन्त करनेवाले शिवजीको देखकर जोरसे चिल्लाया। हे उत्तम विप्रो! मृतप्राय उस कालको शिवजीने अपने कृपावलोकनसे जीवन प्रदान कर दिया॥ २१-२२॥ |
| विनेदुरुच्चमीश्वराः सुरेश्वरा महेश्वरम्।<br>प्रणेमुरम्बिकामुमां मुनीश्वरास्तु हर्षिताः॥ २३<br><br>ससर्जुरस्य मूर्ध्नि वै मुनेर्भवस्य खेचराः।<br>सुशोभनं सुशीतलं सुपुष्पवर्षमम्बरात्॥ २४ | सभी महान् देवतागण तथा मुनिवृन्द महेश्वर एवं माता पार्वतीको प्रणाम करने लगे और हर्षित होकर उच्च स्वरमें ‘जय हो-जय हो’ ऐसा बोलने लगे। नभोमण्डलमें स्थित देवसमुदाय इन श्वेतमुनि तथा शंकरजीके सिरपर आकाशसे अत्यन्त सुन्दर, शीतल तथा सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा करने लगे॥ २३-२४॥ |
| अहो निरीक्ष्य चान्तकं मृतं तदा सुविस्मितः।<br>शिलाशनात्मजोऽव्ययं शिवं प्रणम्य शङ्करम्॥ २५<br><br>उवाच बालधीर्मृतः प्रसीद चेति वै मुने।<br>महेश्वरं महेश्वरस्य चानुगो गणेश्वरः॥ २६ | तत्पश्चात् शिलादके पुत्र तथा शिवजीके अनुचर गणेश्वर नन्दीजी कालको मरा हुआ देखकर अत्यन्त विस्मित हुए और उन्होंने अविनाशी महेश्वर शिवको प्रणामकर उनसे कहा कि यह अल्पबुद्धि काल मर चुका है; अब आप इस काल और मुनि—दोनोंपर अनुग्रह कीजिये॥ २५-२६॥ |
| ततो विवेश भगवाननुगृह्य द्विजोत्तमम्।<br>क्षणाद् गूढशरीरं हि ध्वस्तं दृष्ट्वान्तकं क्षणात्॥ २७ | तत्पश्चात् क्षणभरमें ही मृत होकर पृथ्वीपर गिरे कालको देखकर उसके तथा द्विजश्रेष्ठ श्वेत—दोनोंके |

१४४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
ऊपर अनुग्रह करके भगवान् शंकर तत्काल गुप्त शरीरमें समाविष्ट हो गये॥ २७॥
तस्मान्मृत्युञ्जयं चैव भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजाः।<br>मुक्तिदं भुक्तिदं चैव सर्वेषामपि शङ्करम्॥ २८अतएव हे द्विजो! सभीको मोक्ष तथा भोग प्रदान करनेवाले मृत्युंजय महादेवकी भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये॥ २८॥
बहुना किं प्रलापेन संन्यस्याभ्यर्च्य वै भवम्।<br>भक्त्या चापरया तस्मिन् विशोका वै भविष्यथ॥ २९[हे मुनियो!] अधिक क्या कहूँ; संन्यासधर्मका पालन करते हुए परम श्रद्धाके साथ उन महादेवकी आराधना करनेसे तुम सब सन्तापरहित हो जाओगे॥ २९॥
शैलादिरुवाच<br>एवमुक्तास्तदा तेन ब्रह्मणा ब्रह्मवादिनः।<br>प्रसीद भक्तिर्देवेशे भवेद्रुद्रे पिनाकिनि॥ ३०<br><br>केन वा तपसा देव यज्ञेनाप्यथ केन वा।<br>व्रतैर्वा भगवद्भक्ता भविष्यन्ति द्विजातयः॥ ३१नन्दीश्वर बोले—[हे सनत्कुमारजी!] तत्पश्चात् उन ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर ब्रह्मवेत्ता मुनिगण बोले—हे देव! आप प्रसन्न हों और हमें बतायें कि किस तपस्या, किस यज्ञ अथवा किन व्रतोंसे पिनाकधारी देवेश्वर रुद्रके प्रति हमलोगोंमें भक्ति उत्पन्न होगी तथा हम द्विजगण शिवभक्त हो सकेंगे?॥ ३०-३१॥
पितामह उवाच<br>न दानेन मुनिश्रेष्ठास्तपसा च न विद्यया।<br>यज्ञैर्होमैर्व्रतैर्वेदैर्योगशास्त्रैर्निरोधनैः ॥ ३२<br><br>प्रसादेनैव सा भक्तिः शिवे परमकारणे।ब्रह्माजी बोले—हे मुनिवरो! दान, तप, विद्या, यज्ञ, होम, व्रत, वेदाध्ययन, शास्त्रपारायण, योगसाधन तथा इन्द्रिय-नियन्त्रण आदि उपायोंसे शिव-भक्ति सम्भव नहीं है। केवल उनकी कृपासे ही जगत्‌के परम कारण महादेवके प्रति वह भक्ति उत्पन्न होती है॥ ३२ १/२॥
अथ तस्य वचः श्रुत्वा सर्वे ते परमर्षयः॥ ३३<br><br>सदारतनयाः श्रान्ताः प्रणेमुश्च पितामहम्।इसके बाद उन ब्रह्माका वचन सुनकर परिश्रान्त हुए उन सभी श्रेष्ठ ऋषियोंने स्त्री तथा पुत्रोंसहित ब्रह्माजीको प्रणाम किया॥ ३३ १/२॥
तस्मात्पाशुपती भक्तिर्धर्मकामार्थसिद्धिदा॥ ३४<br><br>मुनेर्विजयदा चैव सर्वमृत्युजयप्रदा।<br>दधीचस्तु पुरा भक्त्या हरिं जित्वामरैर्विभुम्॥ ३५<br><br>क्षुपं जघान पादेन वज्रास्थित्वं च लब्धवान्।<br>मयापि निर्जितो मृत्युर्महादेवस्य कीर्तनात्॥ ३६<br><br>श्वेतेनापि गतेनास्यं मृत्योर्मुनिवरेण तु।<br>महादेवप्रसादेन जितो मृत्युर्यथा मया॥ ३७अतएव [हे सनत्कुमार!] यह शैवी भक्ति धर्म, काम, अर्थ तथा सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली है और सभी प्रकारकी मृत्युसे विजय दिलानेवाली है। यह शिव-भक्ति मुनि दधीचके लिये विजयदायिनी सिद्ध हुई थी। पूर्व कालमें दधीचमुनिने शिवकी भक्तिसे ही देवताओंसहित सर्वशक्तिमान् विष्णुको जीतकर अपने चरणसे राजा क्षुपपर प्रहार किया और अपनी हड्डियोंमें वज्रत्व प्राप्त कर लिया था। महादेवकी आराधनासे मैंने भी मृत्युपर विजय प्राप्त कर ली है और जिस प्रकार मैंने मृत्युको जीता है, उसी प्रकार मृत्युके मुखमें गये हुए मुनिवर श्वेतने भी शिवजीकी कृपासे मृत्युको जीत लिया था॥ ३४—३७॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवाराधनमहिमवर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवाराधनमहिमवर्णन' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३०॥