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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 16/116-119
सोलहवाँ अध्याय
411
महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :-
प्रेमावेशे महाप्रभु यबे आज्ञा दिला।
रामानन्द-राय श्लोक पड़िते लागिला ॥ 116 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने प्रेममें आविष्ट होकर जब श्रीरामानन्द रायको श्लोक सुनानेके लिये आदेश दिया, तब उन्होंने यह श्लोक पढ़ा ॥ 116 ॥
गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अधरामृतकी याचना (चित्रजल्प) :-
श्रीमद्भागवत (10/31/14)में -
सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठुचुम्बितम्।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥ 117 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे वीर, तुम्हारे प्रेमको वर्धित करनेवाला, जगत्के शोकका नाश करनेवाला, स्वरयुक्त वेणुके द्वारा सुन्दररूपसे चुम्बित और चित्तसे अतिरिक्त अन्य वस्तुओंके प्रति रागको भुला देनेवाला तुम्हारा जो अधरामृत है, उसे हमें प्रदान करो॥ 117॥
अनुभाष्य-रासलीलाके समय कृष्णके अचानक अन्तर्धान होनेसे कृष्णमें ही अपने प्राणोंको अर्पित करनेवाली गोपियाँ कृष्णके विरहमें अत्यन्त कातर होकर रासस्थलीसे यमुनातटपर आकर इस प्रकार विलाप कर रही हैं-
हे वीर (दानवीर,) सुरतवर्धनं (सम्भोगेच्छां वर्धयति यत्तत्) शोकनाशनं (अप्राप्तिजन्यदुःखध्वंसकं) स्वरितवेणुना (स्वरितेन नादितेन वेणुना) सुष्ठुचुम्बितं (नादामृत-वासितं) नृणाम् इतररागविस्मारणम् (इतरेषु कृष्णेतर-विषयसुखेषु यः रागः इच्छा, तत् विस्मारयति विलोपयति इति तथा तत्) ते (तव) अधरामृतम् (अधर एव अमृतं) नः (अस्माकं) वितर (देहि)।
श्लोक-भावानुवाद-हे दानवीर, सम्भोग इच्छाको वर्धित करनेवाले, तुम्हारी अप्राप्तिसे उत्पन्न दुःखको ध्वंस करनेवाले, नादयुक्त वेणुके द्वारा नादामृतसे सुवासित, मनुष्योंको अपनेसे (कृष्णसे) अतिरिक्त विषयसुखोंकी इच्छाओंको विलुप्त कर देनेवाले अपने अधरामृतको हमें प्रदान करो ॥ 117 ॥
स्वयं महाप्रभुके द्वारा उसीके सूचक श्लोकका पाठ :-
श्लोक शुनि' महाप्रभु महातुष्ट हैला।
राधार उत्कण्ठा-श्लोक पड़िते लागिला ॥ 118 ॥
अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द रायके मुखसे श्लोक सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुए। तब वे स्वयं श्रीराधाके द्वारा उत्कण्ठाकी अवस्थामें कथित श्लोकका पाठ करने लगे ॥ 118 ॥
श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख चित्-जिह्वाके लोभको वर्धित करनेवाला श्रीकृष्ण-फेला-लवामृत :-
गोविन्दलीलामृत (8/8)में विशाखाके प्रति श्रीराधाके वचन-
व्रजातुलकुलाङ्गनेतर-रसालितृष्णाहर-
प्रदीव्यदधरामृतः सुकृतिलभ्य-फेलालवः।
सुधाजिदहिवल्लिका-सुदलवीटिका-चर्वितः
स मे मदनमोहनः सखि तनोति जिह्वा-स्पृहाम् ॥ 119 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 119 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि, जिनका अधरामृत-व्रजकी अतुलनीया कुलाङ्गनाओंके अन्यान्य रससमूहोंमें तृष्णाका हरण करनेवाला है, जिनका फेलाकण-सुकृतिसे ही प्राप्त होता है, अमृतको भी पराजित करनेवाले ताम्बुलका चर्वण करनेवाले वे मदनमोहन मेरी जिह्वाकी स्पृहाका विस्तार कर रहे हैं ॥ 119 ॥
अनुभाष्य-
हे सखि, यः व्रजातुलकुलाङ्गनेतररसालितृष्णाहरप्रदीव्यदधरामृतः (व्रजे याः अतुलाः निरुपमाः कुलाङ्गनाः ब्रजवध्वः तासाम् इतरेषु रसालिषु या तृष्णा तां हर्तुं शीलं यस्य तत् प्रदीव्यत् प्रकृष्टरूपेण सर्वोपरि शोभमानम् अधरामृतं यस्य सः) सुकृतिलभ्य-फेला-लवः (सुकृतिभिः सौभाग्यवद्भिः लभ्यः प्राप्यः फेलायाः अधरसुधायाः लवः स्वल्पांशः यस्य सः) सुधाजिदहिवल्लिका-सुदलवीटिका-चर्वितः (सुधाजित् अमृतनिन्दितं तथा अहिवल्लिका ताम्बुलवल्ली तस्यां सुदलैः शोभनपत्रैः निर्मिता याः वीटिकाः तासां चर्वितं चर्वणं यस्य सः) मदनमोहनः [स्व-फेलया] जिह्वा-स्पृहां (सेवोन्मुखी-जिह्वालोल्यं) तनोति (वर्धयति)।

412 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/119–132 ]
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 119॥ तबे मोरे क्रोध करि', लज्जा, भय, धर्म छाड़ि',
छाड़ि' दिमु, कर आसि' पान।
महाप्रभुके द्वारा दोनों श्लोकोंकी व्याख्या :-
एत कहि' गौरप्रभु भावाविष्ट हञा। नहे पिमु निरन्तर, तोमाय मोर नाहिक डर,
दुइ श्लोकेर अर्थ करे प्रलाप करिया॥ 120॥ अन्ये देखों तृणेर समान॥' 126॥
वेणु और अधरामृतके सम्मिलित
अनुवाद—यह कहकर श्रीगौराङ्ग महाप्रभु भावाविष्ट बलके प्रयोगका फल :-
होकर प्रलाप करते हुए उपरोक्त दोनों श्लोकोंका अर्थ अधरामृत निज-स्वरे, सञ्चारिया सेइ बले,
करने लगे॥ 120॥ आकर्षय त्रिजगत्-जन।
आमरा धर्मे भय करि', रहि यदि धैर्य धरि',
प्रथम श्लोककी व्याख्या; तबे आमाय करे विड़म्बन॥ 127॥
श्रीकृष्णधरामृतके चिद्बलका वर्णन :-
यथा राग— नीवि खसाय गुरु-आगे, लज्जा-धर्म कराय त्यागे,
“तनु-मन कराय क्षोभ, बाड़ाय सुरत-लोभ, केशे धरि' येन लञा याय।
हर्ष-शोकादि-भार विनाशय। आनि' कथाय तोमार दासी, शुनि' लोक करे हासि,
पासराय अन्य रस, जगत् करे आत्मवश, एइ मत नारीरे नाचाय॥ 128॥
लज्जा, धर्म, धैर्य करे क्षय॥ 121॥
श्रीराधा आदिका मौन-भाव :-
नागर, शुन तोमार अधर-चरित। शुष्क बाँशेर लाठिखान, एत करे अपमान,
माताय नारीर मन, जिह्वा करे आकर्षण, एइ दशा करिल गोसाञि।
विचारिते सब विपरीत॥ 122॥ ध्रु॥ ना सहिं' कि करिते पारि, ताहे रहि मौन धरि',
आछुक नारीर काय, कहिते वासिये लाज, चोरार माके डाकि' कान्दिते नाइ॥ 129॥
तोमार अधर बड़ धृष्ट-राय।
पुरुषे करे आकर्षण, आपना पियाइते मन, द्वितीय श्लोककी व्याख्या; श्रीकृष्णके
अधरामृतके माहात्म्यका वर्णन :-
अन्यरस सब पासराय॥ 123॥ अधरेर एइ रीति, आर शुन
श्रीकृष्णके वेणुके प्रति श्रीराधाकी ईर्ष्या :- कुनीति,
सचेतन रहु दूरे, अचेतन सचेतन करे, से अधर-सने यार मेला।
तोमार अधर—बड़ बाजिकर। सेइ भक्ष्य-भोज्य-पान, हय अमृत-समान,
तोमार वेणु शुष्केन्धन, तार जन्माय इन्द्रिय-मन, नाम तार हय 'कृष्ण-फेला'॥ 130॥
तारे आपना पियाय निरन्तर॥ 124॥ से फेलार एक लव, ना पाय देवता सब,
वेणु धृष्ट-पुरुष हञा, पुरुषाधर पिया पिया, ए दम्भे केबा पातियाय?
गोपीगणे जानाय निज-पान। बहु जन्म पुण्य करे, तार 'सुकृति' नाम धरे,
'ओहे, शुन, गोपीगण, बले पिउने तोमार धन, से 'सुकृते' तार लव पाय॥ 131॥
तोमार यदि थाके अभिमान॥ 125॥ कृष्ण ये खाय ताम्बुल, कहे तार नाहि मूल,

[ 16/121-133
सोलहवाँ अध्याय
413
ताहे आर दम्भ-परिपाटी।
तार येबा उद्गार, तारे कय 'अमृत-सार',
गोपीर मुख करे 'आलबाटी' ॥ 132 ॥
एसब—तोमार कुटिनाटि, छाड़ एइ परिपाटी,
वेणुद्वारे काँहे हर प्राण।
आपनार हासि लागि', नह नारीर वधभागी,
देह' निजाधरामृत दान ॥" 133 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 121–133 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे नागर, तुम्हारे अधरके चरित्रका वर्णन कर रही हूँ, तुम सुनो। वह लोगोंके तन और मनको क्षोभित करता है, कन्दर्पके लोभकी वृद्धि करता है, हर्ष-शोक आदिके भारका विनाश करता है, अन्य रसोंको भुला देता है, जगत्‌को अपने वशमें कर लेता है, लज्जा, धर्म और धैर्यका क्षय कर देता है, नारियोंके मनको मत्त कर देता है और जिह्वाकी लालसा वर्धित कराकर उसका आकर्षण करता है, विचार करनेपर मैं उसका सबकुछ ही विपरीत देखती हूँ। हे कृष्ण,—तुम पुरुष हो, तुम्हारा अधरामृत नारियोंका मन आकर्षित करेगा,—यही नियम है; किन्तु वह पुरुषरूपी वेणुको आकर्षित करके स्वयंको पान करवाकर अन्य समस्त रसोंको भुला देता है; सचेतनकी तो बात दूर रहे, अचेतनको भी सचेतन कर देता है, अतएव तुम्हारा अधर—एक महा-जादूगर है। और भी विपरीत बात देखो,—तुम्हारा जो वेणु है, वह—सूखी लकड़ी मात्र है; तुम्हारा अधरामृत वेणुको निरन्तर स्वयंका पान करवाकर उसकी इन्द्रियों और मनको प्रस्तुत करके (चेतनवृत्तिसे युक्त करके) उसे सुख देता है। वह वेणु धृष्ट पुरुषके रूपमें स्वयं पुरुषाधरका (पुनः पुनः) पान करके अपने पीनेकी घोषणा करता है और ऐसा कहता है,—'ओहे गोपियों, तुममें यदि 'स्त्री' होनेका अभिमान हो, तो फिर पुरुषके अधरामृतरूपी अपने निज-धनका पान करो।' राधिका कह रही हैं,—“वह वेणु मेरे प्रति क्रोध करते हुए कहता है, तुम लज्जा-भयको छोड़कर इसका पान करो, तभी मैं (तुम्हारे लिये यह अधर) छोड़ दूँगा; और यदि तुम लज्जा-भयको नहीं छोड़ोगी, तब मैं ही निरन्तर पान करूँगा; कृष्ण-अधरामृतमें तुम्हारा विशेष अधिकार देखकर मुझे थोड़ा भय होता है; अन्य सभीको तो मैं तृणके समान देखता हूँ।” वह वेणु अपने स्वरमें अधरामृतका सञ्चार करके अर्थात् उसके साथ मिलकर (एकसाथ बल लगाकर) इस प्रकार त्रिजगत्‌को आकर्षित करता है। हम गोपियाँ यदि धर्मका भय करके धैर्य धारण करती हैं, तब फिर हमारा उपहास करता है; यहाँ तक कि हमारा लज्जा-धर्म छुड़वाकर हमारे गुरुजनोंके सामने ही हमारी नीवि अर्थात् हमारे कमरके नाड़ेको नीचे खिसका देता है,—हमें जैसे केशोंसे पकड़कर ले जाता है,—हमें तुम्हारी दासी बना देता है; लोग इसे सुनकर हास्य किया करते हैं (इस प्रकार गोपियोंको अपनी इच्छानुसार चलाता है)। वेणु सूखी बाँसकी लकड़ी मात्र होनेपर भी (प्रभुरूपमें) हमारा अपमान करके हमारी ऐसी दशा कर देता है। हम इसे सहन करनेके अतिरिक्त और कर भी क्या सकती हैं? चोरको दण्ड देनेपर उसकी माँ जिस प्रकार (रक्षा अथवा निरपेक्ष विचारके लिये अन्य व्यक्तियोंको) बुलाकर चीत्कार करते हुए रो नहीं सकती (अर्थात् उसके लिये अन्य लोगोंको बुलाकर रोना उचित नहीं है,) मैं भी उसी प्रकार मौन धारण करके रहती हूँ,—अधरकी ऐसी ही रीति है। अधरके साथ जिसका मिलन है, उसकी कुनीतिका पुनः श्रवण करो;—उस अधरसे स्पर्श हुआ भक्ष्य [दाँतके द्वारा खण्डित होनेवाले चना आदि], भोज्य [चावल आदि] और पीनेवाले द्रव्य अमृतके समान होनेके कारण 'कृष्णफेला' नाम धारण करते हैं। देवता आराधना करके भी उस फेलाका एक-कण भी प्राप्त नहीं कर पाते। उसपर, फेलाका ऐसा दम्भ है कि उसपर साधारण लोग विश्वास नहीं कर सकते; क्योंकि, बहुत जन्मोंके पुण्योंके फलस्वरूप जो भक्ति-उन्मुखी सुकृति प्राप्त होती है, उसी 'सुकृति'के बलसे ही सेवक

414 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/121-140 ]
कृष्णफेलाके लव अथवा कणको प्राप्त करते हैं।
कृष्णके द्वारा चबाये गये ताम्बुल (पान)-प्रसादके
उद्गारको 'अमृतसार' कहते हैं; गोपियोंका मुख—उसे
रखनेकी आलवाटी अर्थात् पीकदानीके समान है।
अतएव हे श्याम, तुम अपनी इस कुटीनाटीकी
परिपाटीका (कुशलताका) परित्याग करो; वेणुके द्वारा
गोपियोंके प्राणोंका नाश मत करो; तुम हँसते-हँसते
नारियोंके वधके भागीदार मत बनो, हमें अपना
अधरामृत दान करो।
'आपणार हासि लागि',—प्रथम अर्थ यह है कि
नारीके वधके भागीदार होनेके कारण आपकी ही निन्दा
होगी, वैसा नहीं करके अपना अधरामृत दो; दूसरा
अर्थ यह है कि अपने कौतुकके लिये नारीका वध मत
करो ॥ 121-133 ॥
अनुभाष्य—'भार विनाशय',—पाठान्तरमें 'भाव विलास्य'
और 'भाव-विनाशय'। 'धृष्ट-राय',—प्रगल्भ अथवा उद्धत-
प्रधान। 'नीवि',—कटिबन्ध, वस्त्रको बाँधनेवाला नाड़ा;
'खसाय',—खोल देता है। 'मेला',—मिलन। 'पातिआय',—प्रतीति
होती है। 'आलबाटी',—लारकी कटोरी, पीकदानी।
'कुटिनाटि',—कपटता; 'परिपाटी',—कारीगिरि, निपुणता,
कुशलता ॥ 121-133 ॥
महाप्रभुकी उत्कण्ठा :—
कहिते कहिते प्रभुर मन फिरि' गेल।
क्रोध मन शान्त हैल, उत्कण्ठा बाड़िल ॥ 134 ॥
अनुवाद—इस प्रकार कहते-कहते श्रीगौरहरिका
मन बदल गया। उनके मनका क्रोध शान्त हो गया
और उत्कण्ठा बढ़ गयी॥ 134 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण-अधरामृतकी
परम-महिमाका कीर्तन :—
“परम दुर्लभ एइ कृष्णाधरामृत।
ताहा येइ पाय, तार सफल जीवित ॥ 135 ॥
योग्य हञा केह करिते ना पाय पान।
तथापि से निर्लज्ज, वृथा धरे प्राण ॥ 136 ॥
अयोग्य हञा ताहा केह सदा पान करे।
योग्य जन नाहि पाय, लोभे मात्र मरे ॥ 137 ॥
ताते जानि,—कोन तपस्यार आछे बल।
अयोग्येरे देओयाय कृष्णाधरामृत-फल ॥ 138 ॥
महाप्रभुके आदेशसे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :—
कह राम राय, किछु शुनिते हय मन।”
भाव जानि' पड़े राय गोपीर वचन ॥ 139 ॥
अनुवाद—महाप्रभु आगे कहने लगे,—“श्रीकृष्णका
अधरामृत परम दुर्लभ है, उसे जो प्राप्त करता है,
उसीका जन्म सफल है। यदि कोई व्यक्ति योग्य होनेपर
भी उस अधरामृतको पान नहीं कर पाता, तो वह
निर्लज्ज व्यर्थ ही अपने प्राणोंको धारण करता है। और
ऐसे भी व्यक्ति हैं जो अयोग्य होनेपर भी उस
अधरामृतका सदैव पान करते हैं। कुछ योग्य व्यक्ति
उसे नहीं पाकर उसकी लालसामें ही मरते हैं। इससे
यह जाना जाता है कि अयोग्य दिखलायी देनेवालेमें भी
किसी तपस्याका बल है, जो उसे कृष्ण-अधरामृतरूपी
फल प्रदान कराता है। हे रामानन्द राय! मेरा कुछ
श्रवण करनेका मन है।” महाप्रभुके भावको जानकर
श्रीरायने गोपियोंके वचनका पाठ किया॥ 135-139॥
गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अधरके
स्पर्शसे सुखी वेणुकी प्रशंसा :—
श्रीमद्भागवत (10/21/9) में—
गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु-
र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्।
भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं हृदिन्यो
हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः॥ 140 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—[किसी एक गोपीने अन्य गोपियोंसे
कहा,—] हे गोपियों, इस वेणुने क्या सुकृति की थी कि

[ 16/140-149 सोलहवाँ अध्याय 415
यह गोपियोंको प्राप्त होनेवाले कृष्णकी अधरसुधाका
भोग कर रहा है? आर्य व्यक्ति जिस प्रकार (किसी
भगवद्भक्त) श्रेष्ठ सन्तानका (जन्म देखकर उसके लिये
आनन्दमें अश्रु विसर्जित) करता है, उसी प्रकार यह
वेणु जिन (सब नदियोंके) जलसे पुष्ट हुआ है, (वे
सब नदियाँ अपने-अपने ऊपरी भागमें स्थित विकसित
कमलसमूहरूपी रोमसमूहके द्वारा प्रसन्न हो रही हैं) एवं
जिस वृक्षसे इसका जन्म हुआ है, उसी जातिके समस्त
वृक्ष ही आनन्दवशतः मधुधारारूपी अश्रु बहा रहे
हैं॥ 140॥
अनुभाष्य—व्रजमें शरत्कालके उपस्थित होनेपर
श्रीकृष्णके द्वारा वनमें गोचारण करते हुए वंशीकी ध्वनि
करनेपर गोपियाँ कृष्णसङ्गके लिये कामातुर होकर
कृष्णकी मनोहर गुणावलीका गान करके इधर-उधर
भ्रमण करते करते कृष्णके वेणुके सौभाग्यका वर्णन
कर रही हैं—
अन्या अन्या ऊचुः—हे गोप्यः, अयं वेणुः किं कुशलं
(पुण्यम्) आचरत् (अनुष्ठितवान्) स्म, यत् (यस्मात्) गोपिकानाम्
(एव भोग्यां सतीमपि) दामोदराधरासुधां (कृष्णाधरामृतं) स्वयं
(स्वातन्त्र्येण) अवशिष्टरसं (केवलमवशिष्टरसमात्रं यथा भवति,
तथा) भुङ्क्ते; ह्रदिन्यः (यासां पयसा पुष्टः ताः मातृतुल्याः
नद्यः) हृष्यत्त्वचः (जात-रोमहर्षाः विकसितकमलवन-मिषेण
रोमाञ्चिताः) [लक्ष्यन्ते]; आर्याः (कुलवृद्धाः) यथा [स्ववंशे
भगवत्सेवकं दृष्ट्वा पुलकिताः सन्तः अश्रु मुञ्चन्ति, तद्वत्]
तरवः (येषां वंशे स जातः ते) अश्रु (मधुधारा-मिषेण
आनन्दाश्रु) मुमुचुः।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140॥
महाप्रभुके द्वारा भावावेशमें प्रलाप-व्याख्या :-
एइ श्लोक शुनि' प्रभु भावाविष्ट हञा।
उत्कण्ठाते अर्थ करे प्रलाप करिया॥ 141॥
अनुवाद—इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु भावाविष्ट
हो गये और उत्कण्ठित होकर प्रलाप करते हुए उस
श्लोकका अर्थ प्रकाशित करने लगे॥ 141॥
श्लोकका अर्थ; वेणुके द्वारा श्रीकृष्णके
अधरामृतके पानके सौभाग्यको देखकर
गोपियोंमें ईर्ष्या तथापि स्तुतिपूर्ण वचन (चित्रजल्प) :-
“अहो, व्रजेन्द्रनन्दन, व्रजेर कोन कन्यागण,
अवश्य करिब परिणय।
से-सम्बन्धे गोपीगण, यारे जाने निजधन,
से सुधा अन्येर लभ्य नय॥ 142॥
गोपीगण, कह सब करिया विचारे।
कोन तीर्थ, कोन तप, कोन सिद्धमन्त्र-जप,
एइ वेणु कैल जन्मान्तरे??143॥ ध्रु॥
हेन कृष्णाधर-सुधा, ये कैल अमृत मुदा,
यार आशाय गोपी धरे प्राण।
एइ वेणु अयोग्य अति, स्थावर 'पुरुषजाति',
सेइ सुधा सदा करे पान॥ 144॥
यार धन, ना कहे तारे, पान करे बलात्कारे,
पिते तारे डाकिया जानाय।
तार तपस्यार फल, देख इहार भाग्य-बल,
इहार उच्छिष्ट महाजने खाय॥ 145॥
मानसगङ्गा, कालिन्दी, भुवन-पावनी नदी,
कृष्ण यदि ताते करे स्नान।
वेणु-झुटाधर-रस, हञा लोभे परवश,
सेइकाले हर्षे करे पान॥ 146॥
एत नदी रहु दूरे, वृक्ष सब तार तीरे,
तप करे पर-उपकारी।
नदीर शेष-रस पाञा, मूलद्वारे आकर्षिया,
केने पिये, बुझिते ना पारि॥ 147॥
निजाङ्कुरे पुलकित, पुष्पे हास्य विकसित,
मधु-मिषे बहे अश्रुधार।
वेणुरे मानि' निज जाति, आर्येर येन पुत्र-नाति,
'वैष्णव' हैले आनन्द-विकार॥ 148॥
वेणुर तप जानि यबे, सेइ तप करि तबे,
ए-अयोग्य, आमरा-योग्या नारी।
याहा ना पाञा दुःखे मरि, अयोग्य पिये सइते नारि,

416 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/142-149 ]
ताहा लागि' तपस्या विचारि॥" 149॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142-149 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कोई गोपी अन्य गोपियोंसे कह
रही है,—'देखो, व्रजेन्द्रनन्दनकी यह कैसी आश्चर्यमय
लीला है। यह अवश्य ही ब्रजकी कन्याओंसे विवाह
करेगा, अतएव गोपियाँ जानती हैं कि कृष्णका
अधरामृत—उन्हींका निजधन है एवं वह अधरामृत
अन्योंका प्राप्य नहीं है।' हे गोपीगण, विचार करके देखो
कि कृष्णके इस वेणुने अपने किसी अन्य जन्ममें
अवश्य ही कोई तीर्थाटन, कोई तप अथवा किसी
सिद्धमन्त्रका जप किया था, जिसके द्वारा उसने इस
प्रकार कृष्णकी अधरसुधाको, — जिसके लिये गोपियाँ
प्राण धारण कर रही हैं, उसे—अपनी ‘अमृत मुद्रा
(धन)’ बना लिया है। यह वेणु—अतिशय अयोग्य है,
स्थावर वंशमें उत्पन्न हुआ है; उसपर भी 'पुरुषजाति'का
होकर कृष्णकी अधरसुधाका सर्वदा पान किया करता
है। यह गोपियोंका अपना धन होनेपर भी वेणु उन्हें
नहीं बतलाकर उसे बलपूर्वक पान करता है एवं
गोपियोंको उच्च स्वरसे पान करते हुए आह्वान करता
है। पुनः, इस वेणुकी तपस्याका फल और भाग्यका
बल देखो, — इसका उच्छिष्ट महाजन तक खा रहे हैं,
कृष्ण जब भुवनपावनी कलिन्द-नन्दिनी और मानसगङ्गामें
स्नान करते हैं, तब वे (यमुना एवं मानस-गङ्गारूपी
महाजन) लोभके वशीभूत होकर वेणुके उच्छिष्ट
अधररसका प्रसन्नतापूर्वक पान करती हैं। नदीकी बात
दूर रहे, उस नदीके तटपर लगे तापस [जिसके बेरसे
औषधीय तेल बनता है]—जैसे परोपकारी वृक्ष भी
किसलिये जड़के द्वारा नदीके उपभुक्त बचे हुए रसको
आकर्षित करके पान करते हैं, मैं उसे नहीं समझ पा
रही हूँ। वे सब वृक्ष अपने-अपने अङ्कुरसे पुलकित
और पुष्प-विकासके रूपमें हास्यसे विकसित होकर
'मधुमिषे' अर्थात् मधुके छलसे अश्रुधाराको बहाते हैं;
ऐसा लगता है, आर्यपुरुष अपने पुत्र-पौत्रके वैष्णव
होनेपर जिस प्रकार आनन्द-विकारको प्राप्त करते हैं,
वृक्षगण स्व-वंशीय वृक्षजातिरूपी वेणुको वैसा मानकर
कार्य कर रहे हैं। अब बात यह है कि, वेणु—अत्यन्त
अयोग्य है, किन्तु हम—योग्य नारियाँ हैं; वेणुने ऐसी
कौन-सी तपस्या की है, उसे जाननेपर हम भी वैसी
ही तपस्या करेंगी। हमारे मनकी बात यह है कि
अयोग्य वेणुको कृष्ण-अधरामृतका पान करते देखकर
हम दुःखसे मर रही हैं; इसलिये ही वेणुकी तपस्याका

[ 16/142-151 सोलहवाँ अध्याय 417

विचार कर रही हैं।
'महाजने',—मानस-गङ्गा और यमुना; ये पुण्य-नदियाँ होनेके कारण 'महाजन' हैं।
पवित्र नदी होनेपर भी यह—नदी है, इसलिये उसके द्वारा यही कार्य (अर्थात् वेणुके उच्छिष्ट कृष्णके अधरामृतके रसका पान) सम्भव हो सकता है।
'ए अयोग्य',—यह वेणु स्थावर-वस्तु है, इसलिये कृष्णके अधरामृतको प्राप्त करनेके अयोग्य है॥ 142-149॥

सोलहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।

अनुभाष्य—किसी-किसीके मतानुसार, 'ये कैल अमृतमुदा',—अमृतको भी जो स्वमाधुर्यके बलसे आच्छादन (पराजित) करता है। 'मधु-मिषे',—मधुधाराके छलसे (श्रीधरस्वामि-टीका देखें) ॥ 144-148 ॥

सोलहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।

महाप्रभुका गोपीभावमें श्रीकृष्ण-प्रेमोन्माद :—
एतेक विलाप करि', प्रेमावेशे गौरहरि,
सङ्गे लञा स्वरूप-रामराय।
कभु नाचे, कभु गाय, भावावेशे मूर्च्छा याय,
एइरूपे रात्रि-दिन याय ॥ 150 ॥

अनुवाद—श्रीगौरहरिने इस प्रकार प्रेमावेशमें विलाप किया। महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराम force श्रीरामानन्द रायको साथमें लेकर कभी नृत्य करते, कभी गीत गाते और कभी भावावेशमें मूर्च्छित हो जाते। इस प्रकार महाप्रभुके दिन-रात व्यतीत होते ॥ 150 ॥

स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्रीचरण,
शिरे धरि' करि यार आश।
चैतन्यचरितामृत, अमृत हैते परामृत,
गाय दीनहीन कृष्णदास ॥ 151 ॥

इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे
कालिदासप्रसाद-विरहोन्माद-प्रलापो नाम षोड़शः परिच्छेदः।

अनुवाद—मैं, दीनहीन कृष्णदास, कृपाकी अभिलाषा करते हुए श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके श्रीचरणोंको अपने सिरपर धारण करके अमृतसे भी अत्यधिक श्रेष्ठ अमृत श्रीचैतन्यचरितामृतका गान कर रहा हूँ॥ 151 ॥

श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें
कालिदासप्रसाद-विरहोन्माद-प्रलाप नामक सोलहवें
अध्यायका अनुवाद समाप्त।

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सतरहवाँ अध्याय
कथासार—अनेक प्रकारके प्रेमोन्मादके बीचमें रात्रिमें
द्वारको नहीं खोल करके तीन प्राचीरोंको लाँघकर
महाप्रभु तैलङ्गी-गायोंके बीचमें कछुएके आकारमें भूमिपर
पड़े मिले थे, यही इस अध्यायमें वर्णित हुआ है।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
गुरुके मुखसे श्रौतपन्थायें श्रीगौरकी
अप्राकृत-लीलाका वर्णन :-
लिख्यते श्रीलगौरेन्दोरत्यद्भुतमलौकिकम् ।।
यैर्दृष्टं तन्मुखाच्छ्रुत्वा दिव्योन्माद-विचेष्टितम् ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौराङ्गके अतिशय अद्भुत
अलौकिक दिव्योन्मादकी चेष्टा जिन्होंने (अपने नेत्रोंसे)
देखी है, मैं उनके मुखसे श्रवण करके ही लिख रहा
हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
यैः (सौभाग्यवद्भिर्द्दामोदर-रघुनाथ-प्रमुखैः अन्तरङ्गैः भक्तैः)
श्रीलगौरेन्दोः (गौरचन्द्रस्य) अद्भुतम् (अश्रुतचरम्) अलौकिकम्
(अदृष्टचरं) दिव्योन्माद-विचेष्टितं (महाभावोन्मत्तेहितं) दृष्टं
(प्रत्यक्षीकृतं) तन्मुखात् (तेषां श्रीगुरूणां कीर्त्तनकारिणां श्रीमुखादेव)
तत् श्रुत्वा [मया] लिख्यते।
श्लोक-भावानुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी महाभावमें उन्मत्त
चेष्टा, जो पहले कभी सुनी और देखी नहीं गयी, उसे
महाप्रभुके जिन प्रमुख अन्तरङ्ग भक्त सौभाग्यवान्
श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने प्रत्यक्ष
देखा है, उन श्रीगुरुओंके श्रीमुखसे वर्णित उस लीलाको
श्रवण करके मैं लिख रहा हूँ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभुकी जय
हो और समस्त गौरभक्तोंकी जय हो॥ 2 ॥
महाप्रभुका उन्माद और प्रलाप :-
एइमत महाप्रभु रात्रि-दिवसे।
उन्मादेर चेष्टा प्रलाप करे प्रेमावेशे ॥ 3 ॥
अनुवाद—इसी प्रकार महाप्रभुकी रात-दिन चेष्टाएँ
उन्मत्तकी भाँति होतीं और वे प्रेमके आवेशमें प्रलाप
करते ॥ 3 ॥
महाप्रभुके तत्कालीन नित्यसङ्गी :-
एकदिन प्रभु स्वरूप-रामानन्द-सङ्गे।
अर्द्धरात्रि गोञाइला कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 4 ॥
अनुवाद—एकदिन महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर और
श्रीरामानन्द रायके साथ आनन्दपूर्वक कृष्णलीलाके
आस्वादनमें आधी रात व्यतीत कर दी॥ 4 ॥
भाव-उपयोगी गानके द्वारा श्रीस्वरूपकी महाप्रभु-सेवा :-
यबे येइ भाव प्रभु करये उदय।
भावानुरूप गीत गाय स्वरूप-महाशय ॥ 5 ॥
अनुवाद—महाप्रभुमें जब जिस प्रकारका भाव उदित
होता, तब श्रीस्वरूप दामोदर उनके भावके अनुरूप गीत
गाते ॥ 5 ॥
महाप्रभुके प्रिय ग्रन्थसे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :-
विद्यापति, चण्डीदास, श्रीगीतगोविन्द ।
भावानुरूप श्लोक पड़ेन राय-रामानन्द ॥ 6 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द राय भी महाप्रभुके भावोंके
अनुरूप श्रीविद्यापति, श्रीचण्डीदास और श्रीगीतगोविन्दके
श्लोक पढ़ते ॥ 6 ॥

420 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/7-16 ]
स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्लोकका
पाठ और विलापमयी उक्ति :-
मध्ये मध्ये आपने प्रभु श्लोक पड़िया।
श्लोकेर अर्थ करेन प्रभु विलाप करिया ॥ 7 ॥
अनुवाद—बीच-बीचमें स्वयं महाप्रभु भी श्लोक
पढ़ते और विलाप करते हुए श्लोकके अर्थको
प्रकाशित करते ॥ 7 ॥
महाप्रभुके शयनके बाद दोनोंका प्रस्थान :-
एइमते नानाभावे अर्द्धरात्रि हैल।
गोसाञिरे शयन कराइ' दुँहे घरे गेल ॥ 8 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुके अनेक प्रकारके
भावोंमें आधी रात बीत गयी। महाप्रभुको शय्यापर
लिटाकर श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द राय भी
अपने-अपने वासस्थानपर चले गये ॥ 8 ॥
महाप्रभुके द्वारा उच्च नाम-सङ्कीर्तन :-
गम्भीरार द्वारे गोविन्द करिला शयन।
अर्द्धरात्रित्रे प्रभु करेन उच्चसङ्कीर्त्तन ॥ 9 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द गम्भीराके (महाप्रभुके कमरेके)
द्वारपर लेट गये। तब आधी रातमें महाप्रभु उच्च स्वरसे
सङ्कीर्तन करने लगे ॥ 9 ॥
महाप्रभुका दिव्योन्माद :-
आचम्बिते शुनेन प्रभु कृष्णवेणु-गान।
भावावेशे प्रभु ताँहा करिला प्रयाण ॥ 10 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने अकस्मात् श्रीकृष्णका वेणुगान
सुना। तब भावावेशमें उन्होंने जहाँ श्रीकृष्ण वेणुगान
कर रहे थे, उस स्थानकी ओर गमन किया ॥ 10 ॥
तिनद्वारे कपाट ऐछे आछे त' लागिया।
भावावेशे प्रभु गेला बाहिर हञा ॥ 11 ॥
अनुवाद—गम्भीराके तीनों द्वारोंके कपाट बन्द थे,
किन्तु भावावेशमें महाप्रभु बाहर निकलकर चले गये ॥ 11 ॥
सिंहद्वार-दक्षिणे आछे तैलङ्गी-गाभीगण।
ताँहा याइ' पड़िला प्रभु हञा अचेतन ॥ 12 ॥
अनुवाद—सिंहद्वारके दक्षिणमें तैलङ्गी (तेलगु प्रदेश
की) गायें थी, महाप्रभु वहाँ भावावेशमें अचेतन होकर
उन गायोंके बीचमें गिर पड़े ॥ 12 ॥
महाप्रभुके शब्दको नहीं सुनकर सभीके
द्वारा महाप्रभुको ढूँढ़ना और उनकी प्राप्ति :-
एथा गोविन्द प्रभुर शब्द ना पाञा।
स्वरूपे बोलाइल कपाट खुलिया ॥ 13 ॥
अनुवाद—इधर श्रीगोविन्दने महाप्रभुका कोई भी
शब्द नहीं सुनकर द्वार खोला। महाप्रभुको भीतर नहीं
देखकर श्रीगोविन्दने श्रीस्वरूप दामोदरको बुलवाया ॥ 13 ॥
तबे स्वरूप-गोसाञि सङ्गे लञा भक्तगण।
देउटि ज्वालिया करेन प्रभुर अन्वेषण ॥ 14 ॥
अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने मशाल जलायी
और भक्तोंको अपने साथ लेकर महाप्रभुको ढूँढ़ने
लगे ॥ 14 ॥
अनुभाष्य— 'देउटि',—दीपकाष्ठ (मशाल) ॥ 14 ॥
इति-उति अन्वेषिया सिंहद्वारे गेला।
गाभीगण-मध्ये याइ' प्रभुरे पाइला ॥ 15 ॥
अनुवाद—इधर-उधर ढूँढ़ते हुए जब वे सिंहद्वारपर
पहुँचे, तब उन्हें महाप्रभु गायोंके बीच अचेतन अवस्थामें
मिले ॥ 15 ॥
महाप्रभुकी अवस्था :-
पेटेर भितर हस्त-पाद—कूर्मेर आकार।
मुखे फेन, पुलकाङ्ग, नेत्रे अश्रुधार ॥ 16 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके हाथ और पाँव उनके पेटके
भीतर चले जानेसे उनका शरीर कछुएके आकारका हो
गया था। उनके मुखसे फेन निकल रहा था, अङ्ग
पुलकित हो रहे थे और नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा

[ 17/16-28 सतरहवाँ अध्याय 421

प्रवाहित हो रही थी॥16॥
अचेतन पड़ियाछेन,—येन कुष्माण्ड-फल।
बाहिरे जड़िमा, अन्तरे आनन्द-विह्वल॥17॥
अनुवाद—महाप्रभु अचेतन अवस्थामें पड़े थे, उनका
शरीर कुम्हड़ेके (काशीफलके) समान दिख रहा था।
यद्यपि महाप्रभु बाहरमें जड़वत् (निष्क्रिय) थे, किन्तु
भीतरमें वे आनन्दसे विह्वल हो रहे थे॥17॥
गाभी-सब चौदिके शुँके प्रभुर श्रीअङ्ग।
दूर कैले नाहि छाड़े प्रभुर श्रीअङ्ग-सङ्ग॥18॥
अनुवाद—सभी गायें महाप्रभुको चारों ओरसे घेरकर
उनके श्रीअङ्गोंको सूंघ रही थी। उनको वहाँसे हटानेका
प्रयास करनेपर भी वे महाप्रभुके दिव्य कलेवरको
छोड़कर पीछे नहीं हट रही थीं॥18॥
महाप्रभुकी चेतनताको सम्पादित करनेमें
बहुत प्रयत्न और घरमें लाना :-
अनेक करिला यत्न, ना हय चेतन।
प्रभुरे उठाञा घरे आनिला भक्तगण॥19॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंके द्वारा बहुत
प्रयत्न करनेपर भी महाप्रभुकी चेतनता नहीं लौटी।
सभी भक्त महाप्रभुको उसी अवस्थामें उठाकर गम्भीरामें
ले आये॥19॥
उच्च-सङ्कीर्तनसे महाप्रभुकी चेतनता
और अर्द्धबाह्यदशामें आना :-
उच्च करि' श्रवणे करे नामसङ्कीर्त्तन।
अनेकक्षणे महाप्रभु पाइला चेतन॥20॥
अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके कानके निकट
उच्च स्वरसे नाम-सङ्कीर्तन करने लगे, तब बहुत देरके
बाद महाप्रभुमें चेतनता आयी॥20॥
चेतन हइले हस्त-पाद बाहिरे आइल।
पूर्ववत् यथायोग्य शरीर हइल॥21॥
अनुवाद—महाप्रभुमें चेतनता आनेपर उनके हाथ-पाँव
पेटसे बाहर आ गये, उनका दिव्य कलेवर पहलेकी
भाँति सामान्य हो गया॥21॥
श्रीस्वरूपको अपनी अवस्थाके विषयमें बतलाना :-
उठिया बसिलेन प्रभु, चाहेन इति-उति।
स्वरूपे कहेन,—“तुमि आमा आनिला कति??22॥
वेणु-शब्द शुनि' आमि गेलाङ वृन्दावन।
देखि,—गोष्ठे वेणु बाजाय व्रजेन्द्रनन्दन॥23॥
सङ्केते वेणुनादे राधा गेला कुञ्ज-घरे।
कुञ्जेरे चलिला कृष्ण क्रीड़ा करिवारे॥24॥
ताँर पाछे पाछे आमि करिनु गमन।
ताँर भूषण-ध्वनिते आमार हरिल श्रवण॥25॥
गोपीगण-सह विहार, हास-परिहास।
कण्ठध्वनि-उक्ति शुनि' मोर कर्णोल्लास॥26॥
हेनकाले तुमि सब कोलाहल करि'।
आमा लञा आइला बलात्कार करि'॥27॥
कृष्णकी ध्वनिका श्रवण करनेसे
वञ्चित महाप्रभुका विलाप :-
शुनिते ना पाइनु सेइ अमृतसम वाणी।
शुनिते ना पाइनु भूषण-मुरलीर ध्वनि॥”28॥
अनुवाद—महाप्रभु उठकर बैठ गये और इधर-उधर
देखने लगे। महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,—“तुम
मुझे कहाँ ले आये हो? मैं वेणु-ध्वनिको सुनकर
वृन्दावन गया था, वहाँ मैंने देखा कि व्रजेन्द्रनन्दन
गायोंके चरनेके स्थानमें वेणु बजा रहे हैं। वेणुकी
ध्वनिके द्वारा किये गये सङ्केतके अनुसार श्रीराधाने
कुञ्ज-कुटीरमें प्रवेश किया और श्रीकृष्ण भी उनके
साथ क्रीड़ा करनेके लिये उस कुञ्जकी ओर चल
दिये। मैं भी श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चलने लगा। उनके
आभूषणोंकी ध्वनिसे मेरे कान मुग्ध हो गये। उनके
द्वारा गोपियोंके साथ विहार, हास-परिहास करते समय

422 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/22-37 ]
उनके कण्ठकी ध्वनिके मेरे कानमें पड़नेपर कान
उल्लसित हो रहे थे। किन्तु उसी समय तुम सब
कोलाहल करके मुझे बलपूर्वक यहाँ ले आये। इसलिये
मैं श्रीकृष्णकी गोपियोंके साथ अमृतसम हास-परिहासकी
वाणीको और नहीं सुन पाया और न ही मैं उनके
आभूषणों और मुरलीकी ध्वनिको सुन पाया॥"22-28॥
भावावेशे स्वरूपे कहेन गद्गद-वाणी।
“कर्ण-तृष्णाय मरि, पड़ 'रसामृत' शुनि॥"29॥
अनुवाद-भावके आवेशमें महाप्रभुने गद्गद वाणीके
द्वारा श्रीस्वरूप दामोदरसे कहा,-"श्रीकृष्णके गुणोंके
श्रवणकी प्याससे मेरे कान मर रहे हैं, तुम रसामृत
पढ़कर मेरे कानोंकी प्यास बुझाओ, मैं उसे सुनना
चाहता हूँ॥"29॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'कर्ण-तृष्णाय',-कृष्णके गुणोंके
श्रवणकी प्याससे ॥ 29 ॥
श्रीगौरके आदेशसे श्रीस्वरूपके द्वारा श्लोकका पाठ :-
स्वरूप-गोसाञि प्रभुर भाव जानिया।
भागवतेर श्लोक पड़े मधुर करिया ॥ 30 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुके
भावको जानकर मधुर स्वरमें भागवतका एक श्लोक
पढ़ा ॥ 30 ॥
श्रीकृष्णवेणुके माधुर्यसे सब प्रकारके
सेवक ही मुग्ध और आकृष्ट :-
श्रीमद्भागवत (10/29/40) में-
का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृतवेणुगीत-
सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत् त्रिलोक्याम्।
त्रैलोक्य-सौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं
यद्गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यविभ्रन्॥ 31 ॥
अनुवाद-हे कृष्ण, तुम्हारे अमृतमय वेणुगीतके
द्वारा सम्मोहित होकर त्रिभुवनमें कौन-सी स्त्री आर्यचरितसे
(धर्मसे) विचलित नहीं होती? त्रिभुवनके सौभाग्य-स्वरूप
तुम्हारे इस रूपको देखकर समस्त गायें, पक्षी, वृक्ष
और हिरन भी पुलक-धारण किया करते हैं॥31॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 24/52 संख्या देखें॥31॥
गोपीभावमें आविष्ट महाप्रभुका चित्रजल्प :-
शुनि' प्रभु गोपीभावे आविष्ट हइला।
भागवतेर श्लोकार्थ करिते लागिला ॥ 32 ॥
अनुवाद-इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु गोपीभावमें
आविष्ट हो गये और भागवतके इस श्लोकका अर्थ
करने लगे॥ 32 ॥
श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंका अपना
भाव-वर्णन (चित्रजल्प) :-
यथा राग-
हैल गोपी भावावेश, कैल रासे परवेश,
कृष्णेर शुनि' उपेक्षा-वचन।
कृष्णेर मुख-हास्य वाणी, त्यागे ताहा सत्य मानि',
रोषे कृष्णे देन ओलाहन ॥ 33 ॥
श्लोकके अर्थका वर्णन-आरम्भ :-
“नागर, कह, तुमि करिया निश्चय।
एइ त्रिजगत् भरि', आछे यत योग्या नारी,
तोमार वेणु काँहा ना आकर्षय??34॥
वेणुके माधुर्यके बलका वर्णन-
कैला जगते वेणुध्वनि, सिद्धमन्त्रा योगिनी,
दूती हञा मोहे नारी-मन।
महोत्कण्ठा बाड़ाञा, आर्यपथ छोड़ाञा,
आनि' तोमाय करे समर्पण ॥ 35 ॥
अप्राकृत नवीन-मदन अथवा कामदेव अनङ्ग :-
धर्म छोड़ाय वेणुद्वारे, हाने कटाक्ष-कामशरे,
लज्जा भय सकल छोड़ाय।
एबे आमाय करि' रोष, कहिं 'पतित्यागे दोष',
धार्मिक हञा धर्म शिखाओ ! ! 36 ॥
अन्यकथा, अन्यमन, बाहिरे अन्य आचरण,
एइ सब शठ-परिपाटी।
तुमि जान परिहास, हय नारीर सर्वनाश,
छाड़ एइ सब कुटीनाटी ॥ 37 ॥

[ 17/33-40 सतरहवाँ अध्याय 423
वेणुनाद-अमृत-घोलेले, अमृत-समान मिठा-बोले, अनुभाष्य- 'घोलेले,'-साधारण भाषामें 'घोल खिलाती
अमृत-समान भूषण-शिञ्जित। है' अर्थात् आच्छादन अथवा पराजित करती है;
तिन अमृते हरे काण, हरे मन, हरे प्राण, पाठान्तरमें 'रोले' अर्थात् शोरसे, शब्दसे; पाठान्तरमें
केमने नारी धरिबेक चित? ?" 38 ॥ 'उगारे' अर्थात् डकारती है ॥ ३८ ॥
श्रीराधाभावमें महाप्रभुका श्रीकृष्णमाधुर्यका आस्वादन :-
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33-38 ॥ एत कहि' क्रोधावेशे, भावेर तरङ्गे भासे,
अमृतप्रवाह भाष्य - गोपियाँ भावमें आविष्ट होकर उत्कण्ठा-सागरे डुबे मन।
रासलीलामें प्रवेश करके कृष्णके उपेक्षा-वचन अर्थात् राधार उत्कण्ठा-वाणी, पड़ि' आपने बाखानि,
उदासीनता पूर्ण वचनोंको श्रवण करके 'कृष्णने उनका कृष्णमाधुर्य करे आस्वादन ॥ 39 ॥
त्याग कर दिया' -इसे सत्य मानकर कृष्णको रोषसहित अनुवाद - श्रीराधाके भावोंकी तरङ्गोंपर डूबते-उतराते
वचन कह रही हैं, -"ओहे नागर, बोलो, इस त्रिजगत्में महाप्रभुने क्रोधके आवेशमें यह कहा और फिर उनका
जितनी योग्य नारियाँ हैं, तुम्हारी वेणु किसको आकर्षित मन उत्कण्ठाके सागरमें डूब गया। महाप्रभु श्रीराधिकाकी
नहीं करती? जगत्में तुम्हारे द्वारा वेणुध्वनि करनेपर, उत्कण्ठामयी वाणीको पढ़कर श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन
वह [ध्वनि] मन्त्रादि-सिद्धा योगिनीरूपमें दूती बनकर करते हुए स्वयं उसकी व्याख्या करने लगे ॥ ३९ ॥
नारियोंके मनको मोहित (प्रलोभित) करती है एवं
उनकी अतिशय उत्कण्ठा बढ़ाकर (पति और गुरुजनों मधुरविग्रह मदनमोहन :-
आदिकी सेवारूपी) वेद-विहित पथका परित्याग करवाकर गोविन्दलीलामृत (8/5) में-
(परकीया-कान्ताभावमें) उन्हें तुम्हारे पास समर्पित नदज्ज्वलदनिस्वनः श्रवणकर्षिसञ्छिञ्जितः
करती है। वह वेणुध्वनि और आपका कटाक्षरूपी सनर्मरससूचकाक्षरपदार्थभङ्ग्युक्तिकः।
कामबाणके द्वारा हमें विद्ध करना, हमें धर्मपथ और रमादिक-वराङ्गणा-हृदयहारि-वंशीकलः
लज्जा-भयसे छुड़ाकर तुम्हारे निकट ले आये हैं। स मे मदनमोहनः सखि तनोति कर्णस्पृहाम् ॥ 40 ॥
किन्तु पति-त्यागादि दोष दिखलाकर और करवाकर
अब तुम धार्मिक व्यक्तिकी भाँति हमें धर्मकी शिक्षा दे अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥
रहे हो ! तुम्हारा मन-एक प्रकारका, बात - दूसरी अमृतप्रवाह भाष्य - हे सखि, जिनके कण्ठका स्वर
प्रकारकी और आचरण-तीसरे प्रकारका है। यह मेघके [मन्दगर्जनकी] भाँति गम्भीर है, जिनके आभूषणोंका
सब - शठताकी परिपाटी (कुशलतामात्र) है; तुम तो शब्द कानोंको आकर्षित करता है, जिनके नर्म-वचनोंमें
परिहास करना जानते हो, किन्तु उससे नारियोंका अनेक प्रकारकी परिपाटी है, जिनकी मुरलीध्वनि लक्ष्मी
सर्वनाश होता है, इसलिये इस सब कपटताको छोड़ो। आदि स्त्रियोंके हृदयको आकर्षित करती है, वे मदनमोहन
एक तो वेणुनादरूपी अमृतका घोल, उसपर तुम्हारी मेरे कानोंकी स्पृहाको वर्धित कर रहे हैं ॥ 40 ॥
वाक्यामृतरूपी मीठी-बोली, फिर उसपर भी अमृतके अनुभाष्य-
समान तुम्हारे आभूषणोंकी ध्वनि, - ये तीन प्रकारके हे सखि, नदज्ज्वलदनिस्वनः (नदतः गर्जनशीलस्य जलदस्य
अमृत मिलकर हमारे कान, मन और प्राणोंका हरण मेघस्य निस्वनः इव गम्भीरकण्ठध्वनिः यस्य सः) श्रवणकर्षिसत्
कर रहे हैं।" शिञ्जितः (गोपीकर्णस्य कर्षणे शीलं यस्य तत् सच्छिञ्जितः
'शिञ्जित,' - ध्वनि ॥ 33-38 ॥ सुमधुरं भूषणानां ध्वनिः यस्य सः) सनर्मरससूचकाक्षर-

424 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/40-48 ]
पदार्थ-भङ्ग्युक्तिकः (नर्मणा सह वर्त्तमानैः रससूचकैः अक्षरैः
पदार्थानां भङ्गी परिपाटी यस्यां तथाभूता उक्तिः यस्य सः)
रमादिकवराङ्गनाहृदयहारी-वंशीकलः (रमादिक-वराङ्गनानां
लक्ष्मादि-श्रेष्ठरमणीनां हृदयहारिहृदयाकर्षी वंश्याः कलः शब्दः
यस्य सः) मदनमोहनः मे (मम) कर्णस्पृहां (श्रवणाभिलाषं)
तनोति (वर्धयति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 40 ॥
श्लोकार्थ; श्रीकृष्णकी कण्ठध्वनिके माधुर्यका वर्णन :-
पुनर्यथा राग-
“कण्ठेर गम्भीर ध्वनि, नवघन-ध्वनि जिनि',
यार गाने कोकिल लाज पाय।
तार एक श्रुति-कणे, डुबाय जगतेर काणे,
पुनः काण बाहुड़ि' ना आय॥ 41 ॥
कह सखि, कि करि उपाय?
कृष्णेर से शब्द-गुणे, हरिले आमार काणे,
एबे ना पाय, तृष्णाय मरि' याय॥ 42 ॥ ध्रु ॥
श्रीकृष्णकी नूपुरकी ध्वनिके माधुर्यका वर्णन :-
नूपुर-किङ्किणी-ध्वनि, हंस-सारस जिनि',
कङ्कन-ध्वनि चटके लाजाय !
एकबार येइ सुने, व्यापि' रहे तार काणे,
अन्यशब्द से काणे ना याय॥ 43 ॥
श्रीकृष्णके वचन-माधुर्यका वर्णन :-
से श्रीमुख-भाषित, अमृत हैते परामृत,
स्मित-कर्पूर ताहाते मिश्रित।
शब्द, अर्थ,-दुइ शक्ति, नाना रस करे व्यक्ति,
प्रत्यक्षर-नर्म-विभूषित ॥ 44 ॥
से अमृतेर एककण, कर्ण-चकोर जीवन,
कर्ण-चकोर जीये सेइ आशे।
भाग्यवशे कभु पाय, अभाग्ये कभु ना पाय,
ना पाइले मरये पियासे ॥ 45 ॥
वेणुध्वनिके माधुर्यका वर्णन :-
येबा वेणु-कलध्वनि, एकबार ताहा शुनि',
जगन्नारी-चित्त आउलाय।
नीवि-बन्ध पड़े खसि', बिना-मूले हय दासी,
बाउली हञा कृष्णपाशे धाय॥ 46 ॥
लक्ष्मीमें भी श्रीकृष्णमाधुर्य-आस्वादनका
लोभ, किन्तु असमर्थ्य :-
येबा लक्ष्मीठाकुराणी, तैं हो ये काकली शुनि',
कृष्ण-पाश आइसे प्रत्याशाय।
ना पाय कृष्णेर सङ्ग, बाड़े तृष्णा-तरङ्ग,
तप करे, तबु नाहि पाय॥ 47 ॥
श्रीकृष्णसेवाविहीन कानोंकी निन्दा :-
एइ शब्दामृत चारि, यार हय भाग्य भारि,
सेइ कर्णे इहा करे पान।
इहा येइ नाहि सुने, से काण जन्मिल केने,
काणाकड़ि-सम सेइ काण॥" 48 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 41-48 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-नवीन मेघकी ध्वनिको पराजित
करते हुए जिनके कण्ठकी गम्भीर ध्वनि विराजमान है;
जिनके मीठे गानसे कोयल भी लज्जित होती है, -जिनका
सामान्य थोड़ा-सा भी शब्द कानके भीतर जानेपर
जगत्के (अन्यान्य) शब्दको ऐसा निमग्न (पराजित)
करता है कि वह शब्द लौटकर नहीं आ पाता; हे
सखि, कृष्णके उसी शब्द-गुणसे मेरा कान अपहृत
हुआ है, अब उसे सुन नहीं पानेके कारण मैं तृष्णासे
मर रही हूँ। उनके नूपुर और किङ्किणीकी ध्वनि
हंस-सारसके स्वरको भी पराजित करती है, उनके
कङ्कनकी ध्वनि चटक पक्षीको भी लज्जित करती है।
जिनके कानमें वह एक बार भी प्रवेश करती है, वह
अन्य किसी शब्दको कानमें प्रवेश ही नहीं करने देती।
कृष्णके वचनकी माधुरी-अमृतकी अपेक्षा और भी
परम अमृतमयी है; उसपर भी वह हास्यरूपी कर्पूरसे
मिश्रित है; वह शब्दकी शक्ति, अर्थकी शक्ति और
शृङ्गार आदि अनेक रसोंकी व्यञ्जना करती है एवं
उसका प्रत्येक अक्षर-नर्म अर्थात् परिहास-भूषित है।
उस अमृतका एक कण (बिन्दु)-कर्णरूपी चकोरका

[ 17/41-51
सतरहवाँ अध्याय
425
जीवन-स्वरूप है; उसकी आशामें ही कर्ण-चकोर
जीवित रहता है; कभी तो भाग्यवशतः उसे प्राप्त करता
है, कभी अभाग्यवशतः उसे प्राप्त नहीं कर पाता; जब
प्राप्त नहीं कर पाता, तब प्याससे वह मरणापन्न हो
जाता है। पुनः उनकी वेणुकी मधुरध्वनि एकबार
सुननेपर जगत्की नारियोंका चित्त शिथिल हो जाता है,
नाड़ेका बन्धन ढीला पड़ जाता है एवं वे बिना मूल्यकी
दासी होकर पागलोंकी भाँति कृष्णकी ओर दौड़ पड़ती
हैं। और भी लक्ष्मी ठाकुराणी उनकी मुरलीकी ध्वनि
श्रवण करके प्रत्याशासे कृष्णके निकट आकर भी
कृष्णके सङ्गको प्राप्त नहीं कर पानेके कारण उनकी
तृष्णा-तरङ्ग और बढ़ जाती है; उसीकी आशासे वे
तपस्या करके भी कृष्णको प्राप्त नहीं कर पातीं। ये
चार प्रकारके शब्दामृत अर्थात् वचन, नूपुर-कङ्कणका
शब्द, कण्ठकी ध्वनि और मुरलीध्वनि भाग्यवान् लोगोंके
कानोंमें ही प्रवेश करते हैं। जिनके कानोंमें इन चार
प्रकारके शब्दामृतने प्रवेश नहीं किया, उन कानोंका
जन्म ही व्यर्थ है; कानी-कौड़ीकी भाँति वे कान-निरर्थक
हैं।
अनुवाद-इस प्रकार विलाप करते-करते महाप्रभुके
मनमें उद्वेग और भाव उदित हो आये, उनका मन
निराश्रय होकर व्याकुल हो गया। उनमें उद्वेग, विषाद,
मति, औत्सुक्य, त्रास, धृति और स्मृति आदि अनेक
सञ्चारी भाव एक साथ मिलित होकर उदित हो आये।
भाव-शाबल्यसे [सञ्चारी भावोंमें परस्पर युद्ध होनेपर
पूर्ववर्ती भावको दबाकर दूसरे भावका उदय होनेसे]
श्रीराधाके मुखसे निकली वाणी लीलांशुक श्रीबिल्वमङ्गल
ठाकुरके हृदयमें स्फुरित हुई थी। महाप्रभुने भी श्रीराधाके
उन्हीं भावोंमें विभावित एक श्लोकका पाठ किया।
महाप्रभु उन्मादकी अवस्थामें उस श्लोकका ऐसा अर्थ
करने लगे, जिसे इस जगत्का कोई भी व्यक्ति नहीं
जानता था॥ 49-50॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'लीलांशुक',-बिल्वमङ्गल
गोस्वामी॥ 50॥
अनुभाष्य-[लीलाशुकेके] पाठान्तरमें, -लीलासुख ॥ 50 ॥
'घटक',-एक प्रकारका पक्षी।
'शब्द, अर्थ, दुइ शक्ति', - 'अभिधा' और 'लक्षणा',
ये दो शब्दकी शक्तियाँ हैं; उनमें अर्थालङ्कार आदि ही
अर्थशक्ति है॥ 41-48॥
श्रीराधाकी उक्ति :-
बिल्वमङ्गल-कृत कृष्णकर्णामृतमें (42 वाँ श्लोक)-
किमिह कृणुमः कस्य ब्रूमः कृतं कृतमाशया
कथयत कथमन्यां धन्यामहो हृदयेशयः।
मधुरमधुरस्मेराकारे मनो नयनोत्सवे
कृपणकृपणा कृष्णे तृष्णा चिरं बत लम्बते॥ 51॥
महाप्रभुका भाव-शाबल्य :-
करिते ऐछे विलाप,
उठिल उद्वेग, भाव,
मने काहो नाहि आलम्बन ।
उद्वेग, विषाद, मति, औत्सुक्य, त्रास, धृति, स्मृति,
नानाभावेर हइल मिलन॥ 49॥
श्रीकृष्ण विरहोन्माद :-
भावशाबल्ये राधार उक्ति, लीलाशुके हैल स्फूर्ति,
सेइ भावे पड़े एक श्लोक ।
उन्मादेर सामर्थ्ये,
सेइ श्लोकेर करे अर्थे,
येइ अर्थ नाहि जाने लोक॥ 50॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 51॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हाय, मैं क्या करूँ ! किसको
कहूँ! उसकी आशामें मैंने जो किया है, सो किया,
अब अन्य कोई अच्छी बात बतलाओ। (कामरूपमें)
वे ही मेरे हृदयमें सोये हुए हैं, अतएव उनकी बात
करना मैं किस प्रकार छोड़ूँ? उन मधुर-हास्य-मूर्ति
मन और नयनके उत्सवरूप कृष्णमें मेरी दैन्यभावमयी
(दीन) तृष्णा सर्वदा वृद्धिका अवलम्बन कर रही है
(बढ़ रही है) ॥ 51॥
अनुभाष्य-

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426 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/51-53 ]
हे सख्यः, [तत्] इह (विप्रलम्भे वैशसे) किं कृणमः [येन
तद्दर्शनं स्यात्?] कस्य ब्रूमः [यूयम् अपि तुल्यावस्थाः एव,
तस्य] आशया (कृष्णलाभाशया) यत्कृतम् (अनुष्ठितं), तत्
कृतम्; अन्यां (कामपि) धन्यां (पुण्यां) कथां कथयत; अहो
(कष्टम्) हृदयेशयः (कामः शत्रुः मम हृदयमध्ये वसतीति न
त्याज्यः अतः अयमेव मां मारयतीति किं कुर्मः?) बत
(खेदे) मधुरमधुरस्मेराकारे (मधुरादपि मधुरः स्मेरः मदनमदादिभिः
उत्फुल्लश्च आकारः आकृतिः यस्य तस्मिन्) मनोनयनोत्सवे
(मनोनयनयोः उत्सव यस्मात् तस्मिन्) कृष्णे कृपणकृपणा
(कृपणादपि कृपाणा उत्कण्ठया सुकातरा) तृष्णा चिरम् (अनुक्षणं)
लम्बते (वर्धते)।
श्लोक-भावानुवाद—हे सखि! इस विरहके कष्टमें
हाय, मैं क्या करूँ (जिससे उनका दर्शन मिले)?
किसको कहूँ (तुम भी तो मेरे समान विरहमें दुःखी
हो)! कृष्णको पानेकी आशामें मैंने जो किया है, सो
किया, अब अन्य कोई अच्छी बात बतलाओ।
(कामरूपमें) वे ही मेरे हृदयमें सोये हुए हैं, अतएव
उनकी बात करना मैं किस प्रकार छोड़ूँ? उन
मधुर-हास्य-मूर्ति मन और नयनके उत्सवस्वरूप कृष्णमें
मेरी दैन्यभावमयी (दीन) तृष्णा प्रतिक्षण वर्धित हो रही
है॥ 51 ॥
अमृतानुकणिका—पहले आवेगके उदय होनेके कारण
श्रीराधा कह रही हैं,―'हे सखियों! इस विपदाके समय
मैं अब क्या करूँ, जिससे उनके दर्शन प्राप्त हों।'
उसके पश्चात् सखियोंको भी दुःखी देखकर चिन्ताके
उदय होनेपर कह रही हैं,―'किसको कहूँ, क्योंकि
सखियाँ भी मेरे समान दुःखी हैं, मेरा और कौन है,
किससे पूछूँ, कौन मेरे मङ्गलका उपाय बतलायेगा?'
उसी समय चिन्ताको आच्छादित करके 'मति' नामक
भावके उदय होनेपर पिङ्गलाके वचनके ('आशा ही
परमं दुःखं'के) समान कह रही हैं,—'कृष्णप्राप्तिकी
आशामें जो किया, सो किया, और कुछ करनेका अब
कोई प्रयोजन नहीं है। अर्थात् जो कुछ भी किया, वह
सब व्यर्थ ही था, इसलिये उस आशाका परित्याग
करना ही उचित है।' उसी समय 'अमर्ष'के उदय
होनेपर एक सखीसे कह रही हैं,―'उन अकृतज्ञ
कृष्णकी बातको छोड़कर तुम अन्य कोई पुण्य बात
बोलो।' उसी समय ही हृदयमें कृष्णकी स्फूर्ति होते ही
उन्हें बाणके द्वारा बींधनेवाले कामदेव मानकर उस
अमर्षभावको आच्छादित करके 'त्रास'के उदय होनेपर
व्याकुलता सहित कह रही हैं,―'हाय! कैसा कष्ट!
जिनको छोड़नेका विचार कर रही हूँ, वे ही मेरे हृदयमें
शयन कर रहे हैं, वह शत्रु काम मुझे पीड़ा दे रहा
है, अब क्या करूँ?' उसके पश्चात् उस व्याकुलताको
आच्छादित करके स्वाभाविक औत्सुक्यके उदय होनेपर
कह रही हैं,―'वेश्या पिङ्गलाने भी नैराश्यको ही परम
सुखका विषय कहा है, किन्तु हम श्रीकृष्णके विषयमें
इस प्रकारकी आशाको त्याग करनेमें असमर्थ हैं।
परित्यागकी बात तो दूर रहे, अपितु उन मधुर-हास्य-मूर्ति
मन और नयनके उत्सवस्वरूप (आनन्दप्रदायक) कृष्णके
प्रति तृष्णा प्रतिक्षण ही वर्धित हो रही है। वह तृष्णा
दीन होनेपर भी उत्कण्ठावशतः अतिदीन हो रही
है।'―(श्रील कविराज गोस्वामी टीका) ॥ 51 ॥
श्लोकार्थ; श्रीमतीकी श्रीकृष्णविरह-व्याकुलताका वर्णन :-
यथा राग-
“एइ कृष्णेर विरहे, उद्वेगे मन स्थिर नहे,
प्राप्त्युपाय चिन्तन ना याय।
येबा तुमि सखीगण, विषादे बाउल मन,
कारे पुछौं, के कहे उपाय ?? 52 ॥
अनुवाद—“इन श्रीकृष्णके विरहमें उद्विग्न होनेके
कारण मेरा मन स्थिर नहीं है, मैं उनकी प्राप्तिके
उपायका भी चिन्तन नहीं कर पा रही हूँ। हे मेरी
सखियों! विषादके कारण तुम्हारा मन भी पागल जैसा
हो गया है, किससे पूछें, हमें कौन कोई उपाय बता
सकता है ?52 ॥
हाहा सखि, कि करि उपाय!
क्या करौं, काँहा याङ, काँहा गेले कृष्ण पाङ,
कृष्ण बिना प्राण मोर याय ॥”53 ॥

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[ 17/53-58 सतरहवाँ अध्याय 427
अनुवाद—हाय-हाय! सखि, क्या उपाय करूँ! मैं
क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मुझे कहाँ जानेपर श्रीकृष्ण
मिलेंगे? श्रीकृष्णके बिना तो मेरे प्राण ही निकले जा
रहे हैं॥” 53 ॥
निराशाकी आकाङ्क्षा और आदर :—
क्षणे मन स्थिर हय, तबे मने विचारय,
बलिते हइल भावोद्गम।
पिङ्ग्लार वचन-स्मृति, कराइल भाव-मति,
ताते करे अर्थ-निर्धारण ॥ 54 ॥
अनुवाद—महाप्रभुका मन क्षण भरके लिये स्थिर
हो गया और उन्होंने मनमें कुछ विचार किया। वे जब
कुछ बोलने लगे, तब उनमें एक भाव उत्पन्न हुआ
जिसने उन्हें पिङ्गलाके वचनका स्मरण करा दिया। तब
वे पिङ्गलाके वचनका अर्थ-निर्धारण करने लगे॥ 54 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पिङ्ग्लार वचनकी स्मृति,'—पिङ्गला
वेश्याने जो कहा था,—“आशा हि परमं दुखं, नैराश्यं
परमं सुखम्” [अर्थात् इस संसारमें आशा ही मनुष्योंके
परम दुःख और आशाका त्याग ही परम सुखका
कारण होता है]। उस बातको स्मरण करके महाप्रभुमें
भावका उदय हुआ और वे उसका अर्थ निर्धारित
करने लगे॥ 54 ॥
अनुभाष्य—'पिङ्गलोपाख्यान'—भाः 11/8/22-44 संख्या
एवं महाभारतमें शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वका
174 वाँ अध्याय देखें॥ 54 ॥
श्रीकृष्ण-विस्मरणकी चेष्टा :—
“देखि एइ उपाये, कृष्ण-आशा छाड़ि दिये,
आशा छाड़िले सुखी हय मन।
छाड़ि' कृष्णकथा अधन्य, कह अन्यकथा धन्य,
याते हय कृष्णविस्मरण ॥” 55 ॥
श्रीकृष्णके द्वारा अप्राकृत कामदेवके
स्वरूपमें हृदयपर अधिकार :—
कहिते हइल स्मृति, चित्ते हैल कृष्णस्फूर्त्ति,
सखीरे कहे हञा विस्मिते।
“यारे चाहि छाड़िते, से शुञा आछे चित्ते,
कोन रीते ना पारि छाड़िते ॥” 56 ॥
राधाभावेर स्वभाव आन, कृष्णे कराय 'काम'-ज्ञान,
काम-ज्ञाने त्रास हैल चित्ते।
कहे, “ये जगत् मारे, से पशिल अन्तरे,
एइ वैरी ना देय पासरिते ॥” 57 ॥
अनुवाद—“मैं एक उपाय देख रही हूँ कि श्रीकृष्णकी
प्राप्तिकी आशाको ही छोड़ दिया जाय। उस आशाको
छोड़नेसे मन सुखी हो जायेगा। दुःख प्रदान करनेवाली
कृष्णकथाको छोड़कर कोई अन्य सुखप्रद कथा सुनाओ,
जिससे श्रीकृष्णका विस्मरण हो सके।” ऐसा कहते ही
श्रीमती राधिकाको श्रीकृष्णका स्मरण हो आया और
चित्तमें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हो आयी। वे विस्मित होकर
सखियोंसे कहने लगीं,—“मैं जिन्हें छोड़ना चाहती हूँ, वे
तो मेरे हृदयमें शयन कर रहे हैं, मैं किसी भी प्रकारसे
उन्हें छोड़ नहीं सकती।” श्रीराधाके स्वभावने उन्हें बोध
करवा दिया कि श्रीकृष्ण साक्षात् कामदेव हैं और मनमें
ऐसा भाव आते ही उनका चित्त भयभीत हो उठा। वे
कहने लगीं,—“यह कामदेव जो समस्त जगत्‌को परास्त
करता है और मेरे हृदयमें प्रवेश कर गया है, वह वैरी
मुझे श्रीकृष्णको भुलाने नहीं देता!” 55-57 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कृष्णे कराय 'काम'-ज्ञान,'—
कृष्णको कन्दर्प बोध कराता है॥ 57 ॥
अनुभाष्य—'मारे',—'मार' अर्थात् कामदेवके रूपमें
पराजित करता है॥ 57 ॥
श्रीकृष्णके लिये उत्सुकता :—
औत्सुक्येर प्राधान्य, जिनि' अन्य भाव-सैन्य,
उदय हैल निज राज्य-मने।
मने हइल लालस, ना हय आपन-वश,
दुःखे मने करेन भर्त्सने ॥ 58 ॥

428 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/58-65 ]
श्रीमतीकी श्रीकृष्ण-परतन्त्रता :-
“मन मोर वाम-दीन, जल बिना येन मीन,
कृष्ण बिना क्षणे मरि' याय।
मधुर हास्य वदने, मन-नेत्र-रसायने,
कृष्णतृष्णा द्विगुण बाड़ाय ॥ 59 ॥
अनुवाद—तभी अन्य समस्त भावोंरूपी सेनाको
परास्त करके औत्सुक्य (उत्सुकता) भाव प्रधान हो
गया और वह उनके अपने राज्यरूपी मनमें उदित
हुआ। औत्सुक्यके कारण श्रीराधा मनमें श्रीकृष्ण
प्राप्तिकी लालसासे अवश हो गयीं, इसी दुःखसे वे
मनमें अपनी भर्त्सना करने लगीं,–“वाम्य-स्वभावके
कारण मेरा मन दीन हो रहा है, श्रीकृष्णके बिना यह
जलके बिना मछलीके समान एक क्षणमें ही मर
जायेगा। किन्तु दूसरी ओर मैं जब श्रीकृष्णका दर्शन
करती हूँ तो उनका मधुर हास्यसे युक्त मुखमण्डल,
जो मन और नेत्रोंके लिये रसायनस्वरूप है, उनको
प्राप्त करनेकी तृष्णाको दोगुना बढ़ा देता है॥ 58-59॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘वाम-दीन’,—वाम्यभावप्रयुक्त दीन;
मन और नेत्रके रसायनस्वरूप मधुरहास्य मुखवाले
कृष्णमें दोगुनी तृष्णाको बढ़ाता है॥ 59 ॥
श्रीकृष्णविरहमें विलाप :-
हाहा कृष्ण प्राणधन, हाहा पद्मलोचन,
हाहा दिव्य सद्गुण-सागर।
हाहा श्यामसुन्दर, हाहा पीताम्बरधर,
हाहा रासविलास नागर !॥60॥
विरहिणी राधाके भावमें महाप्रभुका दौड़ना :-
काँहा गेले तोमा पाइ, तुमि कह,–ताँहा याइ,”
एत कहि' चलिला धाञा।
स्वरूप उठि' कोले करि', प्रभुरे आनिल धरि',
निज स्थाने बसाइला निया॥ 61॥
अनुवाद—राधाभावमें आविष्ट महाप्रभु श्रीकृष्णके
विरहमें विलाप करते हुए कहने लगे,—“हा हा प्राणधन
कृष्ण! हा हा कमलनयन! हा हा दिव्य सद्गुण-सागर!
हा हा श्यामसुन्दर! हा हा पीताम्बरधारी! हा हा
रासविलास नागर! तुम ही बताओ कि कहाँ जानेसे
तुम मुझे मिलोगे, मैं वहीं चली जाऊँगी।” महाप्रभु यह
कहकर दौड़ने लगे। श्रीस्वरूप दामोदरने उठकर महाप्रभुको
पकड़कर गोदमें ले लिया और उन्हें वापस लाकर
उनके स्थानपर बैठा दिया॥ 60-61॥
श्रीस्वरूपकी चेष्टासे चेतनताकी प्राप्ति;
श्रीस्वरूपके द्वारा भावोपयोगी-गान :-
क्षणेके प्रभुर बाह्य हैला, स्वरूपेरे आज्ञा दिला,
“स्वरूप, किछु कर मधुर गान।”
स्वरूप गाय विद्यापति, गीतगोविन्द-गीति,
शुनि' प्रभुर जुड़ाइल काण॥ 62॥
अनुवाद—महाप्रभु अचानक बाह्यदशामें आ गये
और उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरको कहा,—“हे स्वरूप!
कुछ मधुर गान सुनाओ।” श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीविद्यापति
द्वारा रचित गीत और श्रीगीतगोविन्दकी गीतिका गान
किया। गान सुनकर महाप्रभुके कान शीतल हो
गये॥ 62॥
महाप्रभुके दिव्योन्मादादि महाभाव—मर्त्यबुद्धिके
द्वारा उन्हें समझना असम्भव :-
एइमत महाप्रभु प्रतिरात्रि-दिने।
उन्माद-चेष्टित हय प्रलाप-वचने॥ 63॥
अनुवाद—इस प्रकार प्रति रात-दिन महाप्रभुकी
चेष्टाएँ उन्मादग्रस्त व्यक्तिकी भाँति होतीं और प्रलापमय
वचन होते॥ 63॥
एकदिने यत हय भावेर विकार।
सहस्र मुखेते वर्णे यदि, नाहि पाय पार॥ 64॥
जीव दीन कि करिबे, ताहार वर्णन।
शाखा-चन्द्र-न्याय करि' दिग्दर्शन॥ 65॥
अनुवाद—महाप्रभुमें एक ही दिनमें जितने भावोंके

[ 17/64-72 सतरहवाँ अध्याय 429
विकार उत्पन्न होते, जब अनन्तदेव केवल उन्हींका
सैकड़ों मुखोंसे वर्णन करके भी उनका पार नहीं पा
सकते, तब मेरे जैसा दीन-हीन जीव उनका क्या वर्णन
करेगा? मैं तो केवल शाखाचन्द्र-न्यायकी भाँति दिग्दर्शन
करवा रहा हूँ॥ 64-65 ॥
अनुभाष्य—श्रीगौराङ्गकी दिव्योन्माद-चेष्टा विषयिणी
लीला वर्णन करनेमें सहस्र मुखोंसे अनन्त-शक्तिमान्
अनन्तदेव भी समर्थ नहीं हैं; मैं—दीन शक्तिहीन,
अत्यन्त असमर्थ जीव हूँ, इसलिये सम्पूर्ण रूपसे
गौरलीलाका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हुआ हूँ; तथापि
दिशा निरूपित करनेके लिये मैंने शाखाचन्द्रन्याय-मात्रका
आश्रय लिया है॥ 65 ॥
महाप्रभुके दिव्योन्माद-श्रवणसे प्रेमतत्त्वके ज्ञानका उदय :—
इहा येइ शुने, तार जुड़ाय मन-काण।
अलौकिक गूढ़प्रेम चेष्टा हय ज्ञान॥ 66 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके दिव्योन्मादके विषयमें जो कुछ
मैंने संक्षेपमें वर्णन किया है, उसे जो भी श्रवण करता
है उसके कान और मन आनन्दित हो जाते हैं एवं
उसे अलौकिक गूढ़ कृष्णप्रेमकी चेष्टाओंको समझनेकी
योग्यता प्राप्त हो जाती है॥ 66 ॥
श्रीमतीके भावमें महाप्रभुके द्वारा स्वयं श्रीकृष्णप्रेमका
आस्वादन और जीवोंमें उसका वितरण :—
अद्भुत निगूढ़ प्रेमेर माधुर्य-महिमा।
आपनि आस्वादि' प्रभु देखाइला सीमा॥ 67 ॥
अनुवाद—प्रेमके माधुर्यकी महिमा आश्चर्यजनक
रूपसे निगूढ़ है। महाप्रभुने उसका स्वयं आस्वादन
करके उसकी सीमाको दिखलाया है॥ 67 ॥
महावदान्य और श्रीकृष्णप्रेम-प्रदाता :—
अद्भुत-दयालु चैतन्य—अद्भुत-वदान्य।
ऐछे दयालु दाता लोके शुने नाहि अन्य॥ 68 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु अद्भुत दयालु हैं और
अद्भुत उदार हैं। हमने इस जगत्में उनके अतिरिक्त
किसी ऐसे दयालु दाताके विषयमें नहीं सुना है॥ 68 ॥
श्रीचैतन्यके भजनसे ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :—
सर्वभावे भज, लोक, चैतन्य-चरण।
याहा हैते पाइबा कृष्णप्रेमामृत-धन॥ 69 ॥
अनुवाद—आप सब श्रीचैतन्य महाप्रभुके
चरणकमलोंका सभी प्रकारसे एकान्तिक भजन कीजिये,
जिससे आपको कृष्णप्रेमामृतरूपी धनकी प्राप्ति होगी॥ 69 ॥
अनुभाष्य—'सर्वभावे',—सब प्रकारसे, एकान्त
भावसे॥ 69 ॥
महाप्रभुका दिव्योन्माद (उद्घूर्णा और
चित्रजल्प) वर्णित :—
एइ त' कहिलुँ प्रभुर 'कूर्माकृति'-भाव।
उन्माद-चेष्टित ताते उन्माद-प्रलाप॥ 70 ॥
अनुवाद—मैंने महाप्रभुकी भावावस्थामें प्रकाशित
कूर्माकृतिका वर्णन किया है, जिसमें उनकी उन्मादग्रस्त
चेष्टाओं और उन्माद-प्रलापका भी वर्णन हुआ है॥ 70 ॥
श्रीरघुनाथके द्वारा स्वरचित ग्रन्थमें
महाप्रभुकी यह लीला-वर्णित :—
एइ लीला स्वग्रन्थे रघुनाथ-दास।
चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे करियाछेन प्रकाश॥ 71 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने स्वरचित चैतन्यस्तव-
कल्पवृक्षमें उपरोक्त लीलाको प्रकाशित किया है॥ 71 ॥
(स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष स्तवका पाँचवाँ श्लोक)—
अनुद्घाट्य द्वारत्रयमुरु च भित्त्रित्रयमहो
विलङ्घ्योच्चैः कालिङ्गिकसुरभिमध्ये निपतितः।
तनुद्यत्सङ्कोचात् कमठ इव कृष्णोरुविरहात्-
विराजन् गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति॥ 72 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 72 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीकाशीमिश्रके घरके] बन्द

430 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/72-73 ]
तीनों द्वारोंको खोला नहीं गया, तथापि उस कमरेसे गोदावरी नदी जिस स्थानपर समुद्रसे मिली है,
बाहर निकलकर तीन दीवारोंको लाँघकर तैलङ्गी वहाँपर तैलङ्गदेशकी राजधानी 'करिङ्ग' अथवा 'दक्षिण
गायोंके बीचमें भूमिपर पड़े हुए और सम्पूर्ण शरीरके कलिङ्ग' अवस्थित थी। तैलङ्गी गायको संस्कृत भाषामें
सिकुड़ जानेसे कृष्णविरहमें कछुएकी आकृतिको प्राप्त 'कालिङ्गिक-सुरभि' कहकर लिखा गया है॥72॥
करके जो श्रीगौराङ्गदेव वहाँ विराजमान थे, वे मेरे
हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त बना रहे हैं॥72॥ सत्रहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
सत्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥73॥
अनुभाष्य- इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे
अहो, [काशीमिश्रगृहे] द्वारत्रयम् अनुद्घाट्य (अनुन्मुच्य) कूर्माकारानुभावोन्मादप्रलापो नाम सप्तदशः परिच्छेदः।
उरु (उन्नत) भित्तित्रयं (प्राचीरत्रयं) च उच्चैः विलंघ्य अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
(उल्लङ्घ्य) कालिङ्गिकसुरभिमध्ये (त्रैलङ्गदेशान्तर्गत करिङ्ग- कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
देशोद्भव-गोषु मध्ये) निपतितः कृष्णोरुविरहात् (कृष्णस्य वर्णन कर रहा है॥73॥
विषमविच्छेदात्) तनूद्यत्सङ्कोचात् (तनौ शरीरे उदयन् यः
सङ्कोचः खर्वत्वं तस्मात्) कमठः (कूर्मः) इव विराजन् गौराङ्गः
मम हृदये उदयन् मां मदयति (आनन्दयति)। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें कूर्माकार-अनुभाव और
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। उन्माद-प्रलाप नामक सत्तरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।