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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2441, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2441

424 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/40-48 ]
पदार्थ-भङ्ग्युक्तिकः (नर्मणा सह वर्त्तमानैः रससूचकैः अक्षरैः
पदार्थानां भङ्गी परिपाटी यस्यां तथाभूता उक्तिः यस्य सः)
रमादिकवराङ्गनाहृदयहारी-वंशीकलः (रमादिक-वराङ्गनानां
लक्ष्मादि-श्रेष्ठरमणीनां हृदयहारिहृदयाकर्षी वंश्याः कलः शब्दः
यस्य सः) मदनमोहनः मे (मम) कर्णस्पृहां (श्रवणाभिलाषं)
तनोति (वर्धयति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 40 ॥
श्लोकार्थ; श्रीकृष्णकी कण्ठध्वनिके माधुर्यका वर्णन :-
पुनर्यथा राग-
“कण्ठेर गम्भीर ध्वनि, नवघन-ध्वनि जिनि',
यार गाने कोकिल लाज पाय।
तार एक श्रुति-कणे, डुबाय जगतेर काणे,
पुनः काण बाहुड़ि' ना आय॥ 41 ॥
कह सखि, कि करि उपाय?
कृष्णेर से शब्द-गुणे, हरिले आमार काणे,
एबे ना पाय, तृष्णाय मरि' याय॥ 42 ॥ ध्रु ॥
श्रीकृष्णकी नूपुरकी ध्वनिके माधुर्यका वर्णन :-
नूपुर-किङ्किणी-ध्वनि, हंस-सारस जिनि',
कङ्कन-ध्वनि चटके लाजाय !
एकबार येइ सुने, व्यापि' रहे तार काणे,
अन्यशब्द से काणे ना याय॥ 43 ॥
श्रीकृष्णके वचन-माधुर्यका वर्णन :-
से श्रीमुख-भाषित, अमृत हैते परामृत,
स्मित-कर्पूर ताहाते मिश्रित।
शब्द, अर्थ,-दुइ शक्ति, नाना रस करे व्यक्ति,
प्रत्यक्षर-नर्म-विभूषित ॥ 44 ॥
से अमृतेर एककण, कर्ण-चकोर जीवन,
कर्ण-चकोर जीये सेइ आशे।
भाग्यवशे कभु पाय, अभाग्ये कभु ना पाय,
ना पाइले मरये पियासे ॥ 45 ॥
वेणुध्वनिके माधुर्यका वर्णन :-
येबा वेणु-कलध्वनि, एकबार ताहा शुनि',
जगन्नारी-चित्त आउलाय।
नीवि-बन्ध पड़े खसि', बिना-मूले हय दासी,
बाउली हञा कृष्णपाशे धाय॥ 46 ॥
लक्ष्मीमें भी श्रीकृष्णमाधुर्य-आस्वादनका
लोभ, किन्तु असमर्थ्य :-
येबा लक्ष्मीठाकुराणी, तैं हो ये काकली शुनि',
कृष्ण-पाश आइसे प्रत्याशाय।
ना पाय कृष्णेर सङ्ग, बाड़े तृष्णा-तरङ्ग,
तप करे, तबु नाहि पाय॥ 47 ॥
श्रीकृष्णसेवाविहीन कानोंकी निन्दा :-
एइ शब्दामृत चारि, यार हय भाग्य भारि,
सेइ कर्णे इहा करे पान।
इहा येइ नाहि सुने, से काण जन्मिल केने,
काणाकड़ि-सम सेइ काण॥" 48 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 41-48 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-नवीन मेघकी ध्वनिको पराजित
करते हुए जिनके कण्ठकी गम्भीर ध्वनि विराजमान है;
जिनके मीठे गानसे कोयल भी लज्जित होती है, -जिनका
सामान्य थोड़ा-सा भी शब्द कानके भीतर जानेपर
जगत्के (अन्यान्य) शब्दको ऐसा निमग्न (पराजित)
करता है कि वह शब्द लौटकर नहीं आ पाता; हे
सखि, कृष्णके उसी शब्द-गुणसे मेरा कान अपहृत
हुआ है, अब उसे सुन नहीं पानेके कारण मैं तृष्णासे
मर रही हूँ। उनके नूपुर और किङ्किणीकी ध्वनि
हंस-सारसके स्वरको भी पराजित करती है, उनके
कङ्कनकी ध्वनि चटक पक्षीको भी लज्जित करती है।
जिनके कानमें वह एक बार भी प्रवेश करती है, वह
अन्य किसी शब्दको कानमें प्रवेश ही नहीं करने देती।
कृष्णके वचनकी माधुरी-अमृतकी अपेक्षा और भी
परम अमृतमयी है; उसपर भी वह हास्यरूपी कर्पूरसे
मिश्रित है; वह शब्दकी शक्ति, अर्थकी शक्ति और
शृङ्गार आदि अनेक रसोंकी व्यञ्जना करती है एवं
उसका प्रत्येक अक्षर-नर्म अर्थात् परिहास-भूषित है।
उस अमृतका एक कण (बिन्दु)-कर्णरूपी चकोरका