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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2434, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2434

[ 16/142-151 सोलहवाँ अध्याय 417

विचार कर रही हैं।
'महाजने',—मानस-गङ्गा और यमुना; ये पुण्य-नदियाँ होनेके कारण 'महाजन' हैं।
पवित्र नदी होनेपर भी यह—नदी है, इसलिये उसके द्वारा यही कार्य (अर्थात् वेणुके उच्छिष्ट कृष्णके अधरामृतके रसका पान) सम्भव हो सकता है।
'ए अयोग्य',—यह वेणु स्थावर-वस्तु है, इसलिये कृष्णके अधरामृतको प्राप्त करनेके अयोग्य है॥ 142-149॥

सोलहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।

अनुभाष्य—किसी-किसीके मतानुसार, 'ये कैल अमृतमुदा',—अमृतको भी जो स्वमाधुर्यके बलसे आच्छादन (पराजित) करता है। 'मधु-मिषे',—मधुधाराके छलसे (श्रीधरस्वामि-टीका देखें) ॥ 144-148 ॥

सोलहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।

महाप्रभुका गोपीभावमें श्रीकृष्ण-प्रेमोन्माद :—
एतेक विलाप करि', प्रेमावेशे गौरहरि,
सङ्गे लञा स्वरूप-रामराय।
कभु नाचे, कभु गाय, भावावेशे मूर्च्छा याय,
एइरूपे रात्रि-दिन याय ॥ 150 ॥

अनुवाद—श्रीगौरहरिने इस प्रकार प्रेमावेशमें विलाप किया। महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराम force श्रीरामानन्द रायको साथमें लेकर कभी नृत्य करते, कभी गीत गाते और कभी भावावेशमें मूर्च्छित हो जाते। इस प्रकार महाप्रभुके दिन-रात व्यतीत होते ॥ 150 ॥

स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्रीचरण,
शिरे धरि' करि यार आश।
चैतन्यचरितामृत, अमृत हैते परामृत,
गाय दीनहीन कृष्णदास ॥ 151 ॥

इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे
कालिदासप्रसाद-विरहोन्माद-प्रलापो नाम षोड़शः परिच्छेदः।

अनुवाद—मैं, दीनहीन कृष्णदास, कृपाकी अभिलाषा करते हुए श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके श्रीचरणोंको अपने सिरपर धारण करके अमृतसे भी अत्यधिक श्रेष्ठ अमृत श्रीचैतन्यचरितामृतका गान कर रहा हूँ॥ 151 ॥

श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें
कालिदासप्रसाद-विरहोन्माद-प्रलाप नामक सोलहवें
अध्यायका अनुवाद समाप्त।