श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें420 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/7-16 ]
स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्लोकका
पाठ और विलापमयी उक्ति :-
मध्ये मध्ये आपने प्रभु श्लोक पड़िया।
श्लोकेर अर्थ करेन प्रभु विलाप करिया ॥ 7 ॥
अनुवाद—बीच-बीचमें स्वयं महाप्रभु भी श्लोक
पढ़ते और विलाप करते हुए श्लोकके अर्थको
प्रकाशित करते ॥ 7 ॥
महाप्रभुके शयनके बाद दोनोंका प्रस्थान :-
एइमते नानाभावे अर्द्धरात्रि हैल।
गोसाञिरे शयन कराइ' दुँहे घरे गेल ॥ 8 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुके अनेक प्रकारके
भावोंमें आधी रात बीत गयी। महाप्रभुको शय्यापर
लिटाकर श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द राय भी
अपने-अपने वासस्थानपर चले गये ॥ 8 ॥
महाप्रभुके द्वारा उच्च नाम-सङ्कीर्तन :-
गम्भीरार द्वारे गोविन्द करिला शयन।
अर्द्धरात्रित्रे प्रभु करेन उच्चसङ्कीर्त्तन ॥ 9 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द गम्भीराके (महाप्रभुके कमरेके)
द्वारपर लेट गये। तब आधी रातमें महाप्रभु उच्च स्वरसे
सङ्कीर्तन करने लगे ॥ 9 ॥
महाप्रभुका दिव्योन्माद :-
आचम्बिते शुनेन प्रभु कृष्णवेणु-गान।
भावावेशे प्रभु ताँहा करिला प्रयाण ॥ 10 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने अकस्मात् श्रीकृष्णका वेणुगान
सुना। तब भावावेशमें उन्होंने जहाँ श्रीकृष्ण वेणुगान
कर रहे थे, उस स्थानकी ओर गमन किया ॥ 10 ॥
तिनद्वारे कपाट ऐछे आछे त' लागिया।
भावावेशे प्रभु गेला बाहिर हञा ॥ 11 ॥
अनुवाद—गम्भीराके तीनों द्वारोंके कपाट बन्द थे,
किन्तु भावावेशमें महाप्रभु बाहर निकलकर चले गये ॥ 11 ॥
सिंहद्वार-दक्षिणे आछे तैलङ्गी-गाभीगण।
ताँहा याइ' पड़िला प्रभु हञा अचेतन ॥ 12 ॥
अनुवाद—सिंहद्वारके दक्षिणमें तैलङ्गी (तेलगु प्रदेश
की) गायें थी, महाप्रभु वहाँ भावावेशमें अचेतन होकर
उन गायोंके बीचमें गिर पड़े ॥ 12 ॥
महाप्रभुके शब्दको नहीं सुनकर सभीके
द्वारा महाप्रभुको ढूँढ़ना और उनकी प्राप्ति :-
एथा गोविन्द प्रभुर शब्द ना पाञा।
स्वरूपे बोलाइल कपाट खुलिया ॥ 13 ॥
अनुवाद—इधर श्रीगोविन्दने महाप्रभुका कोई भी
शब्द नहीं सुनकर द्वार खोला। महाप्रभुको भीतर नहीं
देखकर श्रीगोविन्दने श्रीस्वरूप दामोदरको बुलवाया ॥ 13 ॥
तबे स्वरूप-गोसाञि सङ्गे लञा भक्तगण।
देउटि ज्वालिया करेन प्रभुर अन्वेषण ॥ 14 ॥
अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने मशाल जलायी
और भक्तोंको अपने साथ लेकर महाप्रभुको ढूँढ़ने
लगे ॥ 14 ॥
अनुभाष्य— 'देउटि',—दीपकाष्ठ (मशाल) ॥ 14 ॥
इति-उति अन्वेषिया सिंहद्वारे गेला।
गाभीगण-मध्ये याइ' प्रभुरे पाइला ॥ 15 ॥
अनुवाद—इधर-उधर ढूँढ़ते हुए जब वे सिंहद्वारपर
पहुँचे, तब उन्हें महाप्रभु गायोंके बीच अचेतन अवस्थामें
मिले ॥ 15 ॥
महाप्रभुकी अवस्था :-
पेटेर भितर हस्त-पाद—कूर्मेर आकार।
मुखे फेन, पुलकाङ्ग, नेत्रे अश्रुधार ॥ 16 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके हाथ और पाँव उनके पेटके
भीतर चले जानेसे उनका शरीर कछुएके आकारका हो
गया था। उनके मुखसे फेन निकल रहा था, अङ्ग
पुलकित हो रहे थे और नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा