श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें312 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/59-66 ]
माताके समान आयु होनेपर भी स्त्रीका नाम श्रवण करने
मात्रसे जगद्गुरु लोक-शिक्षक संन्यासी-लीलाका अभिनय
करनेवाले महाप्रभुको सङ्कोच-बोध :-
मुकुन्दार मातार नाम शुनि' प्रभु सङ्कोच हैला।
तथापि ताहार प्रीते किछु ना बलिा ॥ 59 ॥
अनुवाद-मुकुन्दकी माताका नाम सुनकर महाप्रभुको
कुछ सङ्कोच हुआ, किन्तु उन्होंने श्रीपरमेश्वरके प्रति
प्रीतिके कारण उन्हें कुछ भी नहीं कहा ॥ 59 ॥
सरल स्नेहके कारण बाहरी शिष्टाचार अथवा बाह्य-
मर्यादा-ज्ञानके अभावके कारण दोष होनेपर भी भावग्राही
महाप्रभुका उसके निष्कपट व्यवहार-गुणसे सन्तोष :-
प्रश्रय-प्रागल्भ्य शुद्ध-वैदग्धी ना जाने।
अन्तरे सुखी हैला प्रभु तार सेइ गुणे ॥ 60 ॥
अनुवाद-श्रीपरमेश्वर सरल स्नेहके कारण
वाक्-चतुरायी नहीं जानते थे, महाप्रभु उनके इसी
गुणके कारण हृदयमें बहुत प्रसन्न हुए ॥ 60 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'मुकुन्दकी माता आयी हैं, '-यह
बात संन्यासीसे बोलना-केवल पूर्व-स्नेहके कारण
सरलतामात्र है। स्नेहके कारण सरलता कभी भी
शुद्ध-वैदग्धी अर्थात् शुद्ध वाक्-चातुर्यको नहीं जानती ॥ 60 ॥
अनुभाष्य-पाठान्तरमें, - 'प्रश्रय-पागल शुद्ध-वैदग्धी
ना जानें'; 'प्रश्रय' शब्दका अर्थ स्नेह, स्नेहयुक्त सम्मान,
विनय, विश्वास, आबदार [बाल-हठ] है। 'प्रागल्भ्य'-शब्दका
अर्थ प्रगल्भता, औधत्य, तेजस्विता है; 'वैदग्धी'- शब्दका
अर्थ चतुरता, रसिकता, शोभा, पटुता, पाण्डित्य, कौशल,
भङ्गिमा है ॥ 60 ॥
गुण्डिचा-मार्जन और रथके आगे नृत्य :-
पूर्ववत् सबा लञा गुण्डिचा-मार्जन।
रथ-आगे पूर्ववत् करिला नर्त्तन ॥ 61 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी भक्तोंके
साथ गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया और रथके आगे
नृत्य किया ॥ 61 ॥
ईश्वरकी यात्रादिके दर्शनके अन्तमें श्रीवासपत्नीके
द्वारा महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान :-
चातुर्मास्य सब यात्रा कैला दरशन।
मालिनी प्रभृति प्रभुरे कैला निमन्त्रण ॥ 62 ॥
अनुवाद-गौड़ीय भक्तोंने चातुर्मास्यके अन्तर्गत आनेवाले
समस्त महोत्सवोंके दर्शन किये। श्रीमालिनी आदि
महिला भक्तोंने अपने पतियोंके माध्यमसे महाप्रभुको
निमन्त्रण किया ॥ 62 ॥
प्रभुर प्रिय नाना द्रव्य आनियाछे देश हैते।
सेइ व्यञ्जन करि' भिक्षा देन घर-भाते ॥ 63 ॥
अनुवाद-सभी महिला भक्त अपने साथ गौड़देशसे
महाप्रभुको प्रिय लगनेवाले अनेक द्रव्य लायी थीं,
उन्होंने उन द्रव्योंके साथ घरमें ही चावल-सब्जी आदि
बनाकर महाप्रभुको भोजन करवाया ॥ 63 ॥
दिनमें भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन, रात्रिमें
निर्जनमें कृष्ण-विरह :-
दिने नाना क्रीड़ा करे लञा भक्तगण।
रात्र्ये कृष्ण-विच्छेदे प्रभु करेन रोदन ॥ 64 ॥
अनुवाद-महाप्रभु दिनके समय भक्तोंको साथमें
लेकर अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते थे, किन्तु रात्रिमें
कृष्ण-विरहमें विलाप करते थे ॥ 64 ॥
चातुर्मास्यके अन्तमें गौड़-गमनके पहले
भक्तोंके प्रति महाप्रभुकी उक्ति :-
एइमत नाना लीलाय चातुर्मास्य गेल।
गौड़देशे याइते तबे भक्ते आज्ञा दिल ॥ 65 ॥
अनुवाद-महाप्रभुका इस प्रकार अनेक लीलाएँ
करते हुए चातुर्मास्यका समय व्यतीत हो गया, तब
उन्होंने भक्तोंको गौड़देश लौट जानेकी आज्ञा दी ॥ 65 ॥
सब भक्त करेन महाप्रभुर निमन्त्रण।
सर्वभक्ते कहेन प्रभु मधुर वचन ॥ 66 ॥