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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2326, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2326

[ 12/31-38 बारहवाँ अध्याय 309

अपनी स्तुतिको सुनकर प्रभुको आनन्द :—
शुनि' नित्यानन्दप्रभुर आनन्दित मन।
उठि' शिवानन्दे कैला प्रेम-आलिङ्गन ॥ 31 ॥
आनन्दित शिवानन्द करे समाधान।
आचार्यादि-वैष्णवेरे दिला वासस्थान ॥ 32 ॥

एत बलि' श्रीकान्त-बालक आगे चलि' यान।
सङ्ग छाड़ि' आगे गेला महाप्रभुर स्थान ॥ 36 ॥

अनुवाद—यह कहकर श्रीकान्त, जो अभी बालक
ही था, भक्त मण्डलीका साथ छोड़कर पहले ही
महाप्रभुके वासस्थानपर चला गया ॥ 36 ॥

अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके इन भावोंको सुनकर
श्रीनित्यानन्द प्रभुके मनमें आनन्द हुआ। उन्होंने
उठकर श्रीशिवानन्द सेनको प्रेमसे आलिङ्गन किया।
श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा आलिङ्गन प्राप्त करके श्रीशिवानन्द
सेन बहुत आनन्दित हुए। तब उन्होंने श्रीअद्वैताचार्य
आदि सभी वैष्णवोंके भी वासस्थानकी व्यवस्था की ॥ 31-32 ॥

श्रीकान्तको श्रीगोविन्दके द्वारा भगवद्विग्रहके
विषयमें मर्यादा-विधिको उपदेश :—
पेटाङ्गि-गाय करे दण्डवत्-नमस्कार।
गोविन्द कहे,—“श्रीकान्त, आगे पेटाङ्गि उतार ॥” 37 ॥

अनुवाद—श्रीकान्तने अपने शरीरपर अँगरखा (कुर्ता)
पहने हुए ही महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया, उसे ऐसा
करते देख श्रीगोविन्दने कहा,—“हे श्रीकान्त ! पहले तुम
अपना अँगरखा उतारो ॥” 37 ॥

श्रीनित्यानन्द (गुरुका) क्रोधाभास ही प्रच्छन्न परम-कृपा
और नित्यकल्याण-सूचक :—
नित्यानन्दप्रभुर सब चरित्र—'विपरीत'।
क्रुद्ध हञा लाथि मारि' करे तार हित ॥ 33 ॥

अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके समस्त विशिष्ट गुण
बाहरसे देखनेमें परस्पर विरोधी दिखलायी देते हैं।
श्रीनित्यानन्द प्रभुने क्रोधित होकर लात मारकर श्रीशिवानन्द
सेनका हित ही किया ॥ 33 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'पेटाङ्गि', — अँगरखा, जामा
(कुर्ता) ॥ 37 ॥

अनुभाष्य—तन्त्रवाक्य—
“वस्त्रेणावृत-देहस्तु यो नरः प्रणमेद्धरिम्।
श्वित्री भवति मूढात्मा सप्त जन्मनि भाविनि ॥”

[अर्थात् “हे भाविनि, जो मनुष्य वस्त्रसे आवृत
देहसे युक्त होकर श्रीहरिको प्रणाम करता है, वह मूढ़
व्यक्ति सात जन्मों तक श्वेत कुष्ठ रोगी होता
है।”] ॥ 37 ॥

श्रीकान्त-सेनके वृत्तान्तका वर्णन :—
शिवानन्देर भागिना, —श्रीकान्त-सेन नाम।
मामार अगोचरे कहे करि' अभिमान ॥ 34 ॥

मामाको श्रीनित्यानन्दके द्वारा लात मारे जानेको देखकर
दुःखी होकर अकेले पुरीमें जाकर महाप्रभुके दर्शन :—
“चैतन्येर पार्षद मोर मातुलेर ख्याति।
'ठाकुरालि' करेन गोसाञि, ताँरे मारे लाथि ॥” 35 ॥

अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनका भाँजा, जिसका नाम
श्रीकान्त सेन था, मामाकी अनुपस्थितिमें वह बड़े
अभिमानसे कहने लगा,—“मेरे मामाकी श्रीचैतन्य महाप्रभुके
पार्षदके रूपमें ख्याति है। श्रीनित्यानन्द प्रभुने अपना
प्रभुत्व स्थापित करनेके लिये उन्हें लात मारी है॥” 34-35 ॥

अन्तर्यामी महाप्रभुके द्वारा श्रीकान्तके
मनोभावको बतलाना :—
प्रभु कहे,—“श्रीकान्त आसियाछे पाञा मनोदुःख।
किछु ना बलिह, करूक, याते इहार सुख ॥” 38 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा,—“यह श्रीकान्त
मनसे बहुत दुःखी होकर आया है। तुम इसे कुछ मत
कहो, इसे वैसा ही करने दो जिससे इसे सुख
हो ॥” 38 ॥