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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

92 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/189-196 ]
गौड़े रहिं पात्साहा-आगे आरिन्दागिरि करे।
बार-लक्ष मुद्रा सेइ पात्साहारे भरे ॥ 189 ॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती गौड़देशमें रहता था
और बादशाहके लिये वहाँसे कर-संग्रह करता था।
प्रतिवर्ष बारह लाख मुद्राएँ ले जाकर गौड़देशके
बादशाहके कोषमें जमा करवाना उसका दायित्व था ॥ 189 ॥
परम-सुन्दर, पण्डित, नूतन यौवन।
नामाभासे 'मुक्ति' शुनि' ना हइल सहन ॥ 190 ॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती परम सुन्दर, विद्वान
तथा नवयुवक था। 'नामाभाससे ही मुक्तिकी प्राप्ति होती
हैं'-श्रीहरिदासके ये वचन सुनकर वह उसे सहन नहीं
कर पाया ॥ 190 ॥
क्रोधसे भरकर श्रीठाकुरके प्रति अवज्ञापूर्ण उक्ति :-
क्रुद्ध हञा बले सेइ सरोष वचन।
“भावुकेर सिद्धान्त शुन, पण्डितेर गण ॥ 191 ॥
पाखण्डीका नाममें अर्थवाद :-
कोटि-जन्मे ब्रह्मज्ञाने येइ 'मुक्ति' नय।
एइ कहे, -नामाभास-मात्रे सेइ 'मुक्ति' हय ॥" 192 ॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती क्रोधित हो गया और
रोषपूर्वक कहने लगा, - "हे विद्वानों, इस भावुक व्यक्तिका
सिद्धान्त सुनो। करोड़ों जन्मों तक ब्रह्मज्ञानका अनुशीलन
करनेसे जो मुक्ति सहज नहीं है, यह कह रहा है कि
नामाभास मात्रसे ही वह मुक्ति प्राप्त हो जाती
है ॥" 191-192 ॥
श्रीठाकुरके द्वारा शास्त्र-प्रमाण उद्धृत करना और प्रेमभक्ति
परायणके लिये मुक्तिकी तुच्छताका वर्णन :-
हरिदास कहेन, - "केने करह संशय?
शास्त्रे कहे, - नामाभास-मात्रे 'मुक्ति' हय ॥ 193 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - "आप संशय
क्यों कर रहे हैं? शास्त्रोंमें कहा गया है, - नामाभास
मात्रसे ही 'मुक्ति' हो जाती है ॥ 193 ॥
भक्तिसुख-आगे 'मुक्ति' अति-तुच्छ हय।
अतएव भक्तगण 'मुक्ति' नाहि लय ॥ 194 ॥
अनुवाद-भक्तिके सुखके आगे मुक्ति अति तुच्छ
है। अतएव भक्तगण दिये जानेपर भी मुक्ति नहीं
लेते ॥ 194 ॥
हरिभक्तिसुधोदयेमें-
त्वत्साक्षात्करणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य मे ।
सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो ॥ 195 ॥
अनुवाद- हे जगद्गुरो ! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार
पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ
और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे
हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है,
वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे
जो गड्ढा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता
है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है ॥ 195 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 7/98 संख्या देखें ॥ 195 ॥
श्रीठाकुरको शपथ-प्रदान :-
विप्र कहे, - "नामाभासे यदि 'मुक्ति' नय।
तबे तोमार नाक काटि' करह निश्चय ॥" 196 ॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीने कहा, - "यदि नामाभाससे
मुक्ति नहीं होती हो, तो मैं अवश्य ही तुम्हारी नाक
काट दूँगा ॥" 196 ॥
अमृताणुकणिका-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थमें
यह बात लिखी है (चैः भाः आदिखण्ड 16/300)-
"कलियुगे राक्षस-सकल विप्र-घरे।
जन्मिबेक सुजनेर हिंसा करिवारे ॥"
"सज्जन लोगोंके साथ हिंसा-द्वेष करनेके लिये
कलियुगमें सभी राक्षस ब्राह्मण-घरमें जन्म ग्रहण करेंगे।"
'भक्तिरत्नाकर', 'नरोत्तमविलास', 'रसिकमङ्गल' आदि
ग्रन्थोंकी आलोचना करनेसे भी यह जाना जाता है कि
पाखण्डी लोगोंने श्रील नरोत्तम ठाकुर, श्रीश्यामानन्द प्रभु

[ 3/196–204 तीसरा अध्याय 93
आदि आचार्योंके प्रति किस प्रकारसे विद्वेष किया है।
इसलिये जिस प्रकार प्रपञ्चमें भगवान्‌के आविर्भावके
साथ-साथ रावण, जरासन्ध, शिशुपाल, दन्तवक्र, कंस,
पूतना, अघासुर, बकासुर आदि लीलापोषणकारी असुर
जन्म ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार युग-युगमें आचार्यगणोंके
आविर्भूत होनेपर उनकी लीलापुष्टि करनेके लिये असुर
स्वभाववाले व्यक्तियोंकी भी वृद्धि होती है। चिरकालसे
यह जगत्‌की एक प्रथा है। श्रीविष्णुस्वामी, श्रीरामानुज,
श्रीमध्व, श्रीनिम्बार्क आदि आचार्योंकी जीवनीकी आलोचना
करनेपर भी इस बातकी साक्षी पद-पदमैं देखी जाती
है। जब आचार्यके विरुद्धमें समस्त अनाचारी समाज
विद्वेष करके अन्धतामिस्रमें प्रवेश करनेके लिये कृतसङ्कल्प
होता है, तब भी आचार्य सत्यकी सुदृढ़ नींवपर दृढ़तासे
खड़े रहकर उच्च स्वरसे सनातनी वाणीकी घोषणा
करनेमें एक पद भी पीछे नहीं हटते हैं। इसके द्वारा
ही आचार्यका आचार्यत्व प्रमाणित होता है।—“गौड़ीय
चतुर्थ खण्ड” ॥ 196 ॥
श्रीठाकुरके द्वारा शपथको स्वीकार करना :—
हरिदास कहेन,—“यदि नामाभासे 'मुक्ति' नय।
तबे आमार नाक काटिमु,—एइ सुनिश्चय ॥”197 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“यदि नामाभाससे
मुक्ति नहीं होती हो, तो निश्चय ही मैं अपनी नाक
काट दूँगा ॥”197 ॥
सभ्य व्यक्तियोंके द्वारा ब्रह्मबन्धुको धिक्कार-देना :—
शुनि' सभासद् उठे करि' हाहाकार।
मजुमदार सेइ विप्रे करिल धिक्कार ॥ 198 ॥
अनुवाद—इस प्रकार गोपाल-चक्रवर्त्तीकी चुनौतीकी
बात सुनकर सभामें उपस्थित सभी व्यक्ति उठकर खड़े
हो गये और हाहाकार करने लगे। श्रीहिरण्य तथा
श्रीगोवर्धन मजुमदारने उस ब्राह्मण अर्थात् गोपाल-चक्रवर्त्तीको
धिक्कार दिया ॥ 198 ॥
उसे नास्तिक हेतुवादी जानकर बलराम आचार्यके द्वारा
तिरस्कार और अभिशाप देना :—
बलाइ पुरोहित तारे करिला भर्त्सन ।
“घट-पटिया मूर्ख तुमि, भक्ति काँहा जान ?199 ॥
हरिदास ठाकुरे तुञ्जि कैलि अपमान !
सर्वनाश हबे तोर, ना हबे कल्याण ॥”200 ॥
अनुवाद—श्रीबलराम आचार्यने भी गोपाल चक्रवर्त्तीकी
भर्त्सना करते हुए कहा,—“तुम घट और पटको लेकर
तर्क करनेवाले मूर्ख हो, भक्तिके विषयमें तुम्हें क्या
ज्ञान है? तुमने श्रीहरिदास ठाकुरका अपमान किया है,
तुम्हारा सर्वनाश होगा, कभी कल्याण नहीं होगा ॥”199–200 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'घटपटिया',—घट और पटको
लेकर वृथा तर्क करनेवाले नैयायिक ॥ 199 ॥
नाममें अर्थवाद करनेवालेके सङ्गका परित्याग :—
शुनि' हरिदास तबे उठिया चलिला।
मजुमदार सेइ विप्रे त्याग करिला ॥ 201 ॥
अनुवाद—यह सब सुनकर श्रीहरिदास ठाकुर उठकर
चलने लगे। श्रीहिरण्य तथा श्रीगोवर्धन मजुमदारने उस
ब्राह्मणका त्याग कर दिया अर्थात् उसे आरिन्दाके पदसे
निष्कासित कर दिया ॥ 201 ॥
सभ्य व्यक्तियोंके द्वारा श्रीठाकुरके
चरणोंमें क्षमा-प्रार्थना :—
सभा-सहिते हरिदासेर पड़िला चरणे।
हरिदास हासि' कहे मधुर-वचने ॥ 202 ॥
अदोषदर्शी श्रीठाकुरके द्वारा क्षमा :—
“तोमा सबार दोष नाहि, एइ अज्ञ ब्राह्मण।
तार दोष नाहि, तार तर्कनिष्ठ मन ॥ 203 ॥
अचिन्त्य-स्वभाव अधोक्षज नामप्रभु—जड़ीय
युक्ति और तर्कसे अतीत :—
तर्केर गोचर नहे नामेर महत्त्व।
कोथा हैते जानिबे से एइ सब तत्त्व ? ?204 ॥

94 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/202-212 ]
श्रीकृष्णसे सभीकी कुशल-याचना :-
याह घर, कृष्ण करुन कुशल सबार।
आमार सम्बन्धे दुःख ना हउक काहार॥" 205॥
अनुवाद-श्रीहिरण्य तथा श्रीगोवर्धन मजुमदार सभाके
सभी सदस्यों सहित श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें गिर
गये। श्रीहरिदास ठाकुरने मुस्कुराते हुए मधुर वचन
कहे,-"आप सबका कोई दोष नहीं है, यह ब्राह्मण
अज्ञानी है, इसमें इसका भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि
इसका मन तर्कनिष्ठ है। नामका माहात्म्य तो तर्कके
द्वारा नहीं समझा जा सकता। तर्कनिष्ठ होनेके कारण
यह ब्राह्मण इन सब तत्त्वोंको कहाँसे जानेगा? आप
सभी अपने घर जाइये। श्रीकृष्ण आप सबका मङ्गल
करें। मेरे अपमानके विषयमें आप कुछ भी दुःख मत
कीजिये॥" 202-205॥
हिरण्य-गोवर्धनका पाखण्डी ब्रह्मबन्धुके सङ्गका वर्जन :-
तबे से हिरण्यदास निज-घरे आइल।
सेइ ब्राह्मणे निज-द्वार माना कैल॥ 206॥
अनुवाद-तब श्रीहिरण्यदास मजुमदार अपने घर
लौट आये और उन्होंने उस ब्राह्मण गोपाल-चक्रवर्त्तीको
अपने घरके द्वारके भीतर आनेसे मना कर दिया॥ 206॥
नाममें अर्थवाद और वैष्णव-अवज्ञाका
भीषण फल अथवा दण्ड :-
तिन दिन रहि' सेइ विप्रेर 'कुष्ठ' हैल।
अति उच्च-नासा तार गलिया पड़िला॥ 207॥
अनुवाद-तीन दिनोंमें ही उस ब्राह्मण गोपाल
चक्रवर्त्तीको कोढ़का रोग हो गया और उसके परिणामस्वरूप
उसकी अति ऊँची नाक गलकर गिर गयी॥ 207॥
चम्पक-कलि-सम हस्त-पदाङ्गुलि।
कौँकड़ हइल सब, कुष्ठे गेल गलि'॥ 208॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीके हाथ तथा पैरोंकी
अँगुलियाँ चम्पकपुष्पकी कलीके समान सुन्दर थी,
किन्तु कोढ़के रोगके कारण वे मुड़ गयीं और धीरे-धीरे
गल गयीं॥ 208॥
ठाकुरके ऐश्वर्यके दर्शनसे सभीके द्वारा उनकी स्तुति :-
देखिया सकल लोक हैल चमत्कार।
हरिदासे प्रशंसि' ताँरे करे नमस्कार॥ 209॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीकी ऐसी अवस्था देखकर
सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। सभीने श्रीहरिदास
ठाकुरके प्रभावकी प्रशंसा करते हुए उन्हें प्रणाम
किया॥ 209॥
भगवान् और भक्त (विष्णु और वैष्णवों)का स्वभाव :-
यद्यपि हरिदास विप्रेर दोष ना लइला।
तथापि ईश्वर तारे फल भुआइला॥ 210॥
अनुवाद-यद्यपि श्रीहरिदास ठाकुरने गोपाल चक्रवर्त्तीका
कोई अपराध नहीं लिया, तथापि भगवान्‌से यह सहन
नहीं हुआ और उन्होंने उसे उसके अपराधका फल
भुगवाया॥ 210॥
भक्त-स्वभाव, -अज्ञ-दोष क्षमा करे।
कृष्ण-स्वभाव, -भक्त-निन्दा सहिते ना पारे॥ 211॥
अनुवाद-भक्त स्वभावतः ही अज्ञानी व्यक्तिके
अपराधोंको क्षमा कर देते हैं। किन्तु श्रीकृष्णका स्वभाव
ऐसा है कि वे अपने भक्तकी निन्दाको सहन नहीं कर
पाते॥ 211॥
ब्रह्मबन्धुके क्लेशका श्रवण करके स्थान-त्याग
और शान्तिपुरमें आगमन :-
विप्र-दुःख शुनि' हरिदास मने दुःखी हैला।
बलाइ-पुरोहिते कहि' शान्तिपुर आइला॥ 212॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती कोढ़से कष्ट भोग रहा
है, यह सुनकर श्रीहरिदास ठाकुरका मन बहुत दुःखी
हुआ। श्रीहरिदास ठाकुर पुरोहित श्रीबलराम आचार्यको
बतलाकर शान्तिपुर आ गये॥ 212॥

[ 3/213-220 तीसरा अध्याय 95
[बायाँ स्तम्भ]
श्रीअद्वैताचार्यके साथ मिलन :-
आचार्ये मिलिया कैला दण्डवत् प्रणाम।
अद्वैत आलिङ्गन करि' करिला सम्मान ॥ 213 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यसे
मिलकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। श्रीअद्वैताचार्यने
उनका आलिङ्गन करके उनका सम्मान किया॥ 213 ॥
आचार्यके द्वारा श्रीठाकुरका आनुकूल्य-विधान
और गीता-भागवत-कीर्तन :-
गङ्गातीरे गोफा करि' निर्जने ताँरे दिला।
भागवत-गीतार भक्ति-अर्थ शुनाइला ॥ 214 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने गङ्गाके तटपर निर्जन
स्थानपर एक गुफा बनाकर श्रीहरिदास ठाकुरको रहनेके
लिये दे दी और उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरको भागवत
तथा गीताके भक्तिपरक अर्थोंका श्रवण कराया॥ 214 ॥
दोनोंका नित्य कृष्णकथा-संलाप :-
आचार्येर घरे नित्य भिक्षा-निर्वाहण।
दुइ जना मेलि' कृष्ण-कथा-आस्वादन ॥ 215 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके घरपर नित्य श्रीहरिदास
ठाकुर भोजन ग्रहण करते और दोनों मिलकर
श्रीकृष्ण-कथाका आस्वादन करते॥ 215 ॥
श्रीहरिदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति :-
हरिदास कहे, — “गोसाञि, करि निवेदने।
मोरे प्रत्यह अन्न देह' कोन् प्रयोजने ? ? 216 ॥
महा-महा विप्र एथा कुलीन-समाज।
आमारे आदर कर, ना वासह लाज ! ! 217 ॥
अलौकिक आचार तोमार, कहिते पाइ भय।
सेइ कृपा करिबा, —याते तोमार रक्षा हय ॥" 218 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, — “हे गोसाईं, मैं
आपसे एक निवेदन कर रहा हूँ। आप प्रतिदिन मुझे
किस उद्देश्यसे भोजन कराते हैं? यहाँ शान्तिपुरमें
बड़े-बड़े ब्राह्मण वास करते हैं और कुलीन समाज है।
[दायाँ स्तम्भ]
यद्यपि मैं तो नीचकुलका हूँ, तथापि आप लज्जाका
भय नहीं करके मुझे इतना आदर देते हैं। आपका
आचरण अलौकिक अर्थात् संसारकी मर्यादासे परे है।
यद्यपि आपको यह सब कहते हुए मुझे भय लगता
है, तथापि आप मुझपर ऐसी कृपा करना जिससे
आपकी समाजमें निन्दासे रक्षा हो ॥” 216-218 ॥
अनुभाष्य— 'रक्षा'- व्यवहारिक लोकसमाज रक्षा अथवा
सामाजिक लज्जा-निन्दादिसे रक्षा ॥ 218 ॥
जगद्गुरु लोकशिक्षक श्रीअद्वैताचार्यके निरपेक्ष
सात्वत-शास्त्र-सम्मत वचन :-
आचार्य कहेन, — “तुमि ना करिह भय।
सेइ आचरिब, येइ शास्त्रमत हय ॥ 219 ॥
तुमि खाइले हय कोटि ब्राह्मण-भोजन।”
एत बलि' श्राद्धपात्र कराइला भोजन ॥ 220 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “हे हरिदास ठाकुर !
आप भय मत कीजिये। मैं शास्त्रोंके मतके अनुसार
ही आचरण करूँगा। आपको भोजन करानेसे करोड़ों
ब्राह्मणोंको भोजन कराना हो जाता है।” यह कहकर
श्रीअद्वैताचार्यने श्रीहरिदास ठाकुरको श्राद्ध-पात्रका भोजन
कराया॥ 219-220 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'श्राद्धपात्र', -श्राद्धके दिन
गृहस्थ-वैष्णवोंको भगवान्को निवेदन करके सब प्रकारकी
खाद्य वस्तुओंको वैष्णवों और ब्राह्मणोंको भोजन
करानेका विधान है। श्रीअद्वैतप्रभुने संसारमें उस प्रकारके
श्राद्धदिवसके उपस्थित होनेपर श्रीहरिदासको श्राद्धपात्र
(अप्राकृत ब्राह्मण गुरु मानकर) खिलाया ॥ 220 ॥
तीसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—भक्तिसन्दर्भकी 177 संख्यामें उद्धृत
गरुड़पुराण वचन, —
“ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते।
सत्रयाजि सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः ॥
सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णु-भक्तो विशिष्यते।
वैष्णवानां सहस्रेभ्यः एकान्त्येको विशिष्यते ॥”

96 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/220-226 ]
[अर्थात् “हजार ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक याज्ञिक अधिकांश अवैष्णव हैं, इनका संसार-मोचन किस
पुरुष श्रेष्ठ है, हजारों याज्ञिक ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक प्रकार होगा? इसलिये श्रीअद्वैताचार्यने श्रीकृष्णको अवतरित
सर्ववेदान्त-शास्त्रज्ञ पुरुष श्रेष्ठ है, करोड़ों सर्ववेदान्त- करानेकी प्रतिज्ञा की और वे जल एवं तुलसी
शास्त्रज्ञोंकी अपेक्षा एक वैष्णव श्रेष्ठ है और हजारों अर्पणकर श्रीकृष्णकी पूजा करने लगे॥ 221-222 ॥
वैष्णवोंकी अपेक्षा एक एकान्तिक भक्त श्रेष्ठ है।”]
श्रीहरिदासके द्वारा नाम कीर्तन :-
भक्तिसन्दर्भकी 247 संख्यामें उद्धृत गरुड़पुराण वचन,- हरिदास करे गोफाय नाम-सङ्कीर्त्तन।
“भक्तिरष्टविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्त्तते। कृष्ण अवतीर्ण हबेन, -एइ ताँर मन ॥ 223 ॥
स विप्रेन्द्रो मुनिश्रेष्ठः स ज्ञानी स च पण्डितः।
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा हरिः॥” अनुवाद-इसी प्रकार श्रीहरिदास ठाकुर गुफामें
बैठकर नाम-सङ्कीर्त्तन करते थे। उनके मनमें भी यही
[अर्थात् “(भगवद्भक्तोंके प्रति वात्सल्य, पूजा-विषयमें भाव था कि नाम-सङ्कीर्त्तनके द्वारा श्रीकृष्ण अवश्य ही
अनुमोदन, भगवत् कथाके श्रवणमें प्रीति, स्वर-नेत्रादिका अवतरित होंगे॥ 223 ॥
विकार, भगवत् प्रीतिके लिये नृत्य, दम्भ परित्याग, स्वयं
अर्चन और विष्णुको जीविका नहीं बनाना)—यह आठ दोनोंके आह्वानसे जीवोंके उद्धारके लिये
प्रकारकी भक्ति यदि किसी म्लेच्छमें भी विद्यमान हो, श्रीकृष्णचैतन्य अवतार और नामप्रेमके
वितरणके द्वारा समस्त जगत्का उद्धार :-
तो उस व्यक्तिकी ब्राह्मणश्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ, पण्डित, ज्ञानीमें
दुइजनेर भक्त्ये चैतन्य कैला अवतार।
गणना होती है, उसे दान करेंगे, उसका अवशेष ग्रहण
नाम-प्रेम प्रचार कैला जगत् उद्धार ॥ 224 ॥
करेंगे एवं श्रीहरिकी भाँति उसकी पूजा करेंगे।”]
अनुवाद-इन दोनोंकी भक्तिके प्रभावसे श्रीचैतन्य
हःभःविः 10/91,-
“न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः। महाप्रभु अवतरित हुए। महाप्रभुने हरिनामके द्वारा प्रेमका
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्॥” प्रचार करके जगत्का उद्धार किया॥ 224 ॥
[अर्थात् “चारों वेदोंको जाननेपर भी यदि कोई मेरा
श्रीठाकुरके अप्राकृत चरित्रका वर्णन :-
अभक्त हो तो वह मुझे प्रिय नहीं है, परन्तु चण्डाल
आर अलौकिक एक चरित्र ताँहार।
भी भक्त होनेपर मुझे प्रिय है, उसे दान करना चाहिये,
याहार श्रवणे लोके हय चमत्कार ॥ 225 ॥
उसका उच्छिष्ट ग्रहण करना चाहिये और वह मेरी
श्रौतपन्थामें अप्राकृत अनुभूति,
भाँति ही पूज्य है।]॥ 220 ॥
तर्कपन्थामें वह असम्भव :-
श्रीअद्वैताचार्यकी जीवोंके प्रति अतुलनीय कृपा :- तर्क ना करिह, तर्कागोचर ताँर रीति।
जगत्-निस्तार लागि' करेन चिन्तन। विश्वास करिया शुन करिया प्रतीति ॥ 226 ॥
अवैष्णव-जगत् केमने हइबे मोचन ? ? 221 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरके जीवनकी अन्य एक
आचार्यके द्वारा श्रीकृष्णकी आराधना :-
अलौकिक घटना है जिसे सुनकर लोग आश्चर्यचकित
कृष्णे अवतारिते अद्वैत प्रतिज्ञा करिला।
हो जाते हैं। इस विषयमें किसी प्रकारका तर्क मत
जल-तुलसी दिया पूजा करिते लागिला ॥ 222 ॥
करना, क्योंकि उनकी रीति तर्कसे परे है। आप सभी
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य जगत्के उद्धारके लिये सदा श्रद्धापूर्वक विश्वासके साथ इन कथाओंको श्रवण
चिन्तन करते थे। उन्होंने विचार किया कि जगत्में कीजिये॥ 225-226 ॥

[ 3/227–240 तीसरा अध्याय 97
ठाकुर श्रीहरिदास और मायादेवीके उद्धारके वृत्तान्तका वर्णन :—
एकदिन हरिदास गोफाते बसिया।
नाम-सङ्कीर्त्तन करेन उच्च करिया॥227॥
**अनुवाद—**एकदिन श्रीहरिदास ठाकुर गुफामें बैठकर उच्च स्वरसे नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे॥227॥
ज्योत्स्नावती रात्रि, दश दिक् सुनिर्मल।
गङ्गार लहरी ज्योत्स्नाय करे झलमल॥228॥
**अनुवाद—**चाँदनी रात थी और चन्द्रमाकी किरणोंसे गङ्गाजीकी लहरें झलमल कर रही थीं। दसों दिशाएँ सुनिर्मल थीं॥228॥
द्वारे तुलसी-लेपा-पिण्डिर उपर।
गोफार शोभा देखि' लोकेर जुड़ाय अन्तर॥229॥
**अनुवाद—**गुफाके द्वारपर एक लिपे हुए मञ्चके ऊपर तुलसीजी विराजमान थीं। गुफाकी शोभाको देखकर लोगोंका हृदय शीतल हो जाता था॥229॥
हेनकाले एक नारी अङ्गने आइल।
ताँर अङ्गकान्त्ये स्थान पीतवर्ण हइल॥230॥
ताँर अङ्ग-गन्धे दश दिक् आमोदित।
भूषण-ध्वनिते कर्ण हय चमकित॥231॥
आसिया तुलसीरे सेइ कैला नमस्कार।
तुलसी परिक्रमा करि' गेला गोफा-द्वार॥232॥
**अनुवाद—**उसी समय एक नारी गुफाके बाहर आङ्गनमें आयी। उसकी अङ्गकान्तिसे सम्पूर्ण स्थान पीतवर्णका हो गया। उसके अङ्गोंकी गन्धसे दसों दिशाएँ सुगन्धसे भर गयीं, उसके आभूषणोंकी मधुर झङ्कार कानोंको आश्चर्यचकित कर रही थी। उसने आकर तुलसीको प्रणाम किया और वह तुलसीकी परिक्रमा करके गुफाके द्वारपर चली गयी॥230-232॥
योड़-हाते हरिदासेर वन्दिला चरण।
द्वारे बसि' कहे किछु मधुर वचन॥233॥
जीवमोहिनी मायाके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुरकी परीक्षा :—
“जगतेर बन्धु तुमि रूपगुणवान्।
तव सङ्ग लागि' मोर एथाके प्रयाण॥234॥
मोरे अङ्गीकार कर हञा सदय।
दीने दया करे,—एइ साधु-स्वभाव हय॥” 235॥
**अनुवाद—**उसने हाथ जोड़कर श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंकी वन्दना की। तब वह द्वारपर बैठकर ऐसे मधुर वचन कहने लगी,—“आप सम्पूर्ण जगत्के बन्धु हैं और अत्यन्त रूपवान् और गुणवान् हैं। आपके सङ्गके लिये ही मैं यहाँ आयी हूँ। आप कृपा करके मुझे अङ्गीकार कीजिये। दीन व्यक्तियोंपर कृपा करना ही साधुका स्वभाव होता है॥” 233-235॥
एत बलि' नाना-भाव करये प्रकाश।
याहार दर्शने मुनिर हय धैर्यनाश॥236॥
**अनुवाद—**यह कहकर वह अनेक प्रकारके भाव प्रकाशित करने लगी, जिन्हें देखकर मुनियोंके धैर्यका भी नाश हो जाता है॥236॥
निर्विकार हरिदास गम्भीर-आशय।
बलिते लागिला ताँरे हञा सदय॥237॥
ठाकुर श्रीहरिदासकी संख्या नामकीर्तन-यज्ञमें दीक्षा और निष्ठा :—
“संख्या-नाम-सङ्कीर्त्तन—एइ ‘महायज्ञ’ मन्ये।
ताहाते दीक्षित आमि हइ प्रतिदिने॥238॥
यावत् कीर्त्तन समाप्त नहे, ना करि अन्यकाम।
कीर्त्तन समाप्त हैले, हय दीक्षार विश्राम॥239॥
द्वारे बसि' शुन तुमि नाम-सङ्कीर्त्तन।
नाम समाप्त हैले करिमु तव प्रीति-आचरण॥” 240॥
**अनुवाद—**किन्तु गम्भीर हृदयवाले श्रीहरिदास ठाकुर

98 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/237–249 ]
निर्विकार होकर बैठे रहे। वे उसके प्रति दयासे युक्त
होकर कहने लगे,–“संख्यापूर्वक नाम-सङ्कीर्तनको मैं
'महायज्ञ' मानता हूँ। मैं प्रतिदिन उसमें दीक्षित होता हूँ
अर्थात् उसका नियमपूर्वक पालन करता हूँ। जब तक
कीर्तन समाप्त नहीं होता, तब तक मैं अन्य कोई काम
नहीं करता। कीर्तनके समाप्त होनेपर ही दीक्षाका
विश्राम होता है। आप द्वारपर बैठकर नाम-सङ्कीर्तन
श्रवण करो। नामके समाप्त होनेपर मैं आपको सन्तुष्ट
करनेवाला आचरण करूँगा॥”237-240 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरका मन तो सदैव श्रीकृष्णनाममें ही आविष्ट रहता था। इसलिये उस नारीके भाव निर्जन वनमें क्रन्दनके समान व्यर्थ हो गये॥ 244 ॥
अनुभाष्य—श्रीहरिदासका मन हरिनाम ग्रहणके समय सर्वदा श्रीकृष्णनाममें आविष्ट रहनेके कारण मायादेवीकी पुरुषोंको आकर्षित करनेवाली इन्द्रजाल जैसी बद्धजीव-मोहिनी स्त्रीभाव-माला निर्जन वनमें क्रन्दन करनेकी भाँति विफल हो गयी॥ 244 ॥
एत बलि' करेन तेंहो नाम-सङ्कीर्त्तन।
सेइ नारी बसि' करे श्रीनाम-श्रवण॥ 241 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीहरिदास ठाकुर नाम-सङ्कीर्तन करने लगे। वह नारी बैठकर श्रीनाम-श्रवण करने लगी॥ 241 ॥
कीर्त्तन करिते आसि' प्रातःकाल हैल।
प्रातःकाल देखि' नारी उठिया चलिल॥ 242 ॥
अनुवाद—कीर्तन करते करते ही प्रातःकाल हो गया। प्रातःकाल देखकर वह नारी वहाँसे उठकर चली गयी॥ 242 ॥
तृतीय दिवसेर रात्रि-शेष यबे हैल।
ठाकुरेर स्थाने नारी कहिते लागिल॥ 245 ॥
“तिन दिन वञ्चिला आमा करि' आश्वासन।
रात्रि-दिने नहे तोमार नाम-समापन॥” 246 ॥
अनुवाद—तीसरे दिन जब रात्रि समाप्त हुई, तब वह नारी श्रीहरिदास ठाकुरसे कहने लगी,–“आपने आश्वासन देकर भी तीन दिन तक मेरी वञ्चना की है। रात-दिन आपका नाम करना ही समाप्त नहीं होता॥”245-246 ॥
श्रीठाकुरकी अपने नियमानुसार सेवा :—
हरिदास ठाकुर कहेन,—“आमि कि करिमु?
नियम करियाछि, ताहा केमने छाड़िमु?? 247 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“मैं क्या करूँ? मैंने जो व्रत लिया है, उसे कैसे त्याग दूँ?” 247 ॥
तीन दिन तक मायाके द्वारा कठोर परीक्षा :—
एइमत तिनदिन करे आगमन।
नाना भाव देखाय, याते ब्रह्मार हरे मन॥ 243 ॥
अनुवाद—इसी प्रकार वह नारी तीन दिन तक श्रीहरिदास ठाकुरके पास आती-जाती रही। वह ऐसे-ऐसे अनेक भाव दिखाती थी जिससे वह ब्रह्माका मन भी हर सकती थी॥ 243 ॥
मायाके द्वारा अपना परिचय देना :—
तबे नारी कहे ताँरे करि' नमस्कार।
“आमि—माया, करिते आइलाङ परीक्षा तोमार॥ 248 ॥
अपनी पराजय-स्वीकार :—
ब्रह्मादि जीव, आमि सबारे मोहिलुँ।
एकेला तोमारे आमि मोहिते नारिलुँ॥ 249 ॥
अद्वयज्ञान नामप्रभुके एकान्तिक सेवक द्वितीय-अभिनिवेशयुक्त भोक्ताभावसे रहित श्रीठाकुरके निकट मायाकी पराजय :—
कृष्णे नामाविष्ट-मना सदा हरिदास।
अरण्ये रोदित हैल स्त्रीभाव-प्रकाश॥ 244 ॥
अनुवाद—तब उस नारीने श्रीहरिदास ठाकुरको

[ 3/248–256 तीसरा अध्याय 99
प्रणाम करके उनसे कहा, — “मैं मायादेवी हूँ। मैं आपकी
परीक्षा लेनेके लिये आयी थी। ब्रह्मादि तक समस्त
जीवोंको मैंने मोहित किया है, मैं एकमात्र आपको ही
मोहित नहीं कर पायी ॥ 248–249 ॥
अनुभाष्य—आब्रह्मस्तम्ब अर्थात् ब्रह्मासे आरम्भ
करके देव-नर-पशु-पक्षी-तिर्यग्-स्थावर आदि तक
समस्त श्रेणियोंके सभी प्राणियोंको मायादेवी अपने
‘भोक्ता’ एवं स्वयंको ‘भोग्या’के रूपमें उपलब्धि करवाकर
मोहित करती है। किन्तु श्रीकृष्णकी सेवा करके
श्रीकृष्णेन्द्रियोंको ही तृप्त करनेका श्रीहरिदासका हृदयगत
भाव किसी भी प्रकारसे मायाके छलनेवाले प्रलोभनसे
वशीभूत नहीं हुआ। श्रीहरिदासकी भाँति समस्त शुद्ध
वैष्णवोंकी यही वैदान्तिक धारणा है कि शुद्धभक्त नित्य
श्रीकृष्णसेवक हैं और वे कभी भी मायाके भोक्ता नहीं
हैं। भगवान् नित्य, वैकुण्ठ, अधोक्षज, गुणातीत अथवा
अप्राकृत वस्तु हैं। जीव देहात्मबुद्धिको छोड़कर स्वयंको
कृष्णदास अथवा वैष्णव समझनेसे अर्थात् अधोक्षज
श्रीकृष्णकी सेवाके फलसे ही मायाके विक्रम अथवा
अनर्थसे पूर्णतया मुक्त हो सकता है ॥ 249 ॥
श्रीठाकुरकी प्रशंसा और स्तुति :-
महाभागवत तुमि,—तोमार दर्शने।
तोमार कृष्णनाम-कीर्त्तन-श्रवणे ॥ 250 ॥
श्रीठाकुरसे कृपा-याचना :-
चित्त शुद्ध हैल, चाहे कृष्णनाम लैते।
कृष्णनाम उपदेशि' कृपा करह आमाते ॥ 251 ॥
अनुवाद—आप महाभागवत हैं। आपके दर्शन
करने और आपके द्वारा किये गये श्रीकृष्णनाम-कीर्तनके
श्रवणसे मेरा चित्त शुद्ध हो गया है। अब मेरी भी
श्रीकृष्णनाम-कीर्तन करनेकी अभिलाषा हो गयी है।
आप श्रीकृष्णनामका उपदेश प्रदानकर मुझपर कृपा
कीजिये ॥ 250–251 ॥
अहैतुक-कृपा-अवतीर्ण श्रीचैतन्यके आश्रयमें कृष्णभक्तिके
अनुशीलनके बिना जीव जड़तुल्य :-
चैतन्यावतारे बहे प्रेमामृत-वन्या।
सब जीव प्रेमे भासे, पृथिवी हैल धन्या ॥ 252 ॥
अनुवाद—चैतन्य महाप्रभुके अवतीर्ण होनेसे प्रेमामृतकी
बाढ़ आ गयी है, समस्त जीव प्रेममें निमग्न हो रहे
हैं और पृथिवी धन्य हो गयी है ॥ 252 ॥
ए-वन्याय ये ना भासे, सेइ जीव—छार।
कोटिकल्पे तबे तार नाहिक निस्तार ॥ 253 ॥
अनुवाद—इस प्रेमकी बाढ़में जो निमग्न नहीं हुआ,
वह जीव अति निन्दनीय है। करोड़ों कल्पों तक भी
उसका उद्धार नहीं होगा ॥ 253 ॥
अनुभाष्य—तैंतालीस लाख बीस हजार (43,20,000)
सौरवर्षोंमें एक महायुग होता है, एक हजार महायुगोंका
एक कल्प होता है; उसके (कल्पके) भी करोड़ों गुणा
जितना समय ॥ 253 ॥
तीसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
पहले मदनको जय करनेवाले शम्भुसे
तारकब्रह्म रामनामकी प्राप्ति :-
पूर्वे आमि 'रामनाम' पाञाछि शिव हैते।
तोमार सङ्गे लोभ हैल 'कृष्णनाम' लैते ॥ 254 ॥
'रामनाम' और 'कृष्णनाम'के माहात्म्यका वैशिष्ट्य :-
मुक्ति-हेतु तारक हय 'रामनाम'।
'कृष्णनाम' पारक हञा करे प्रेमदान ॥ 255 ॥
कृष्णनाम-महामन्त्रकी दीक्षा और कृष्णप्रेमकी याचना :-
कृष्णनाम देह' तुमि मोरे कर धन्या।
आमारे भासाओ तैछे एइ प्रेमवन्या ॥ 256 ॥
अनुवाद—पहले मैंने शिवजीसे 'रामनाम' प्राप्त
किया था, किन्तु अब आपके सङ्गसे मुझे कृष्णनाम
ग्रहण करनेका लोभ हो गया है। मुक्ति प्रदान करनेके
कारण 'रामनाम' तारकब्रह्म कहलाता है। किन्तु 'कृष्णनाम'

100 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/254-265 ]
भवसागरसे पार करवाकर अर्थात् पारक बनकर प्रेमदान
करते हैं। आप मुझे कृष्णनाम प्रदान करके धन्य कर
दीजिये जिसके द्वारा मैं भी प्रेमकी बाढ़में निमग्न हो
जाऊँ॥" 254-256 ॥
मायादेवीके द्वारा श्रीठाकुरके शरणागत
होना और श्रीठाकुरके द्वारा उसे
कृष्णनाम-महामन्त्रकी दीक्षा प्रदान :-
एत बलि' वन्दि'ला हरिदासेर चरण।
हरिदास कहे,-“कर कृष्ण-सङ्कीर्त्तन ॥” 257 ॥
अनुवाद-यह कहकर मायादेवीने श्रीहरिदास ठाकुरके
चरणोंकी वन्दना की। श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - “आप
बस श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करो॥" 257 ॥
मायाका अन्तर्धान होना :-
उपदेश पाञा माया चलिला हञा प्रीत।
ए-सब कथाते कारो ना जन्मे प्रतीत ॥ 258 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरसे उपदेश प्राप्त करके
मायादेवी प्रसन्नतापूर्वक अन्तर्धान हो गयीं। किसी
दुर्भागेको इन सब बातोंमें विश्वास नहीं होता ॥ 258 ॥
अप्राकृत विश्वास ही श्रेयका कारण :-
प्रतीत करिते कहि कारण इहार।
याहार श्रवणे हय विश्वास सबार ॥ 259 ॥
अनुवाद-इन बातोंमें सबको विश्वास हो, इसलिये
मैं इसका कारण बतलाता हूँ, जिसे श्रवण करनेसे
सभीको विश्वास हो जायेगा ॥ 259 ॥
कृष्णप्रेमप्रदाता श्रीचैतन्यके अवतारमें कृष्णप्रेमकी प्राप्तिके
लिये देव-ऋषि आदि सभीका नररूपमें जन्मग्रहण :-
चैतन्यावतारे कृष्णप्रेमे लुब्ध हञा।
ब्रह्मा-शिव-सनकादि पृथिवीते जन्मिया ॥ 260 ॥
कृष्णनाम लञा नाचे, प्रेमवन्याय भासे।
नारद-प्रह्लादादि आसे मनुष्य-प्रकाशे ॥ 261 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके समय
श्रीकृष्णप्रेमके लिये लालायित होकर ब्रह्मा-शिव-सनकादिने
भी पृथ्वीपर जन्म ग्रहण किया। वे सब श्रीकृष्णनामका
उच्चारण करते हुए नृत्य करते हैं, प्रेमकी बाढ़में
निमग्न हो जाते हैं। इसी लोभसे श्रीनारद-प्रह्लाद आदि
भी मनुष्यका रूप धारण करके इस धराधामपर आते
हैं॥ 260-261 ॥
लक्ष्मी आदिका भी मनुष्यरूपमें कृष्ण-प्रेमास्वादन :-
लक्ष्मी-आदि करि' कृष्णप्रेमे लुब्ध हञा।
नाम-प्रेम आस्वादिला मनुष्ये जन्मिया ॥ 262 ॥
अनुवाद-लक्ष्मी आदिने भी श्रीकृष्णप्रेमके प्रति
लोभयुक्त होकर मनुष्यके रूपमें जन्म ग्रहण करके
नाम-प्रेमका आस्वादन किया ॥ 262 ॥
स्वयं श्रीकृष्णके द्वारा अपने माधुर्य-प्रेमका आस्वादन :-
अन्येर का कथा, आपने व्रजेन्द्रनन्दन।
अवतरि' करेन प्रेम-नाम आस्वादन ॥ 263 ॥
अनुवाद-अन्योंकी तो बात ही क्या, स्वयं व्रजेन्द्रनन्दन
भी अवतरित होकर प्रेम-नामका आस्वादन करते
हैं॥ 263 ॥
मायादेवीका भी कृष्णप्रेमास्वादनके प्रति लोभ;
एकमात्र शुद्धनाम और शुद्धकीर्तनकारीकी
कृपासे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :-
माया-दासी 'प्रेम' मागे,-इथे कि विस्मय ?
'साधुकृपा'-'नाम' बिना 'प्रेम' ना जन्माय ॥ 264 ॥
अनुवाद-तब श्रीकृष्णकी दासी माया यदि 'प्रेम'
माँगती हैं तो उसमें कैसा विस्मय ? वास्तवमें 'साधुकृपा'
और 'नाम'के बिना प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥ 264 ॥
चैतन्यावतारमें जगत्-जीवोंको कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :-
चैतन्य-गोसाञिर लीलार एइ त' स्वभाव।
त्रिभुवन नाचे, गाय, पाञा प्रेमभाव ॥ 265 ॥

[ 3/265-270 तीसरा अध्याय 101
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका यही तो उन सब लीलाओंको मैंने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके
स्वभाव है कि तीनों लोकोंके वासी प्रेमभावको प्राप्त मुखसे श्रवण किया है। इन सब लीलाओंको मैंने
करके नृत्य एवं गान करते हैं॥ 265 ॥ संक्षेपमें कहा है। क्षुद्रजीव होनेपर भी मैं श्रीचैतन्य
महाप्रभुकी कृपासे इन सब लीलाओंका वर्णन कर रहा
स्वयं भगवान् श्रीकृष्णादि समस्त ईश्वरतत्त्व हूँ॥ 267-268 ॥
और स्थावर-जङ्गमादि जीवोंकी
कृष्णकीर्तनके प्रभावसे कृष्णप्रेममें मत्तता :— नामाचार्य श्रीठाकुरके माहात्म्यके
कृष्ण-आदि, आर यत स्थावर-जङ्गमे। श्रवणसे शुद्धभक्तोंको आनन्द :—
कृष्णप्रेमे मत्त करे कृष्ण-सङ्कीर्तने॥ 266 ॥ हरिदास ठाकुरेर कहिलुँ महिमार कण।
याहार श्रवणे भक्तेर जुड़ाय श्रवण ॥ 269 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णनाम इतना आकर्षक और प्रभावशाली
है कि उसका सङ्कीर्तन सभी स्थावर-जङ्गम प्राणियोंको अनुवाद—मैंने श्रीहरिदास ठाकुरकी महिमाके एक
और यहाँ तक श्रीकृष्णको भी कृष्णप्रेममें मत्त कर देता कणका ही वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे भक्तोंके
है॥ 266 ॥ कानोंको आनन्द प्राप्त होता है॥ 269 ॥
श्रौतपन्थामें गुरुमुखसे ग्रन्थकारके द्वारा श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
इन सब लीलाओंका वर्णन :— चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 270 ॥
स्वरूप-गोसाञि कड़चाय ये लीला लिखिल।
रघुनाथदास-मुखे ये-सब शुनिल ॥ 267 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदास-
स्वयं ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :— ठाकुर-महिमा-कथनं नाम तृतीयः परिच्छेदः।
सेइ सब लीला कहि संक्षेप करिया। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
चैतन्य-कृपाते लिखि क्षुद्रजीव हञा ॥ 268 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 270 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुकी
जिन लीलाओंको कालक्रमसे लिपिबद्ध किया था श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदास-ठाकुर-
[श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने उन्हें कण्ठस्थ कर लिया था], महिमा-कथन नामक तीसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त।

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चौथा अध्याय
कथासार—श्रीसनातन गोस्वामी मथुरामण्डलसे अकेले
झारिखण्डके वनमार्गसे पुरुषोत्तम क्षेत्र (श्रीजगन्नाथपुरी)में
आये। मार्गमें गन्दे जल और उपवासके कारण उनके
शरीरमें पीब निकलनेवाली खाजका रोग हो गया।
खाजकी यातनासे उन्होंने मनमें विचार किया,—“मैं
महाप्रभुके सामने ही श्रीजगन्नाथके रथके पहियेके नीचे
इस शरीरका परित्याग करूँगा।” पुरुषोत्तममें आकर वे
श्रीहरिदासके वासस्थानपर रहे। महाप्रभु श्रीसनातनको
देखकर बड़े हर्षित हुए। बादमें महाप्रभुने श्रीसनातन
गोस्वामीको अनुपमकी गङ्गाप्राप्तिकी बात और श्रीरामके
चरणोंके प्रति उनकी निष्ठाकी बात बतलायी। एकदिन
महाप्रभुने श्रीसनातनसे कहा,—“देहत्याग आदि तामसिक
धर्म हैं,—देहत्यागके द्वारा कृष्णप्रेम प्राप्त नहीं किया जा
सकता; तुम इस तमोबुद्धिका परित्याग करो। तुम्हारा
शरीर तुमने मुझे अर्पित किया है, इसलिये तुम्हें इस
शरीरको परित्याग करनेका कोई अधिकार नहीं है।
तुम्हारे इस शरीरके द्वारा मैं अनेक भक्तिशास्त्रोंका प्रचार
और वृन्दावनमें लुप्त तीर्थोंका उद्धार करूँगा।” महाप्रभुके
उठकर चले जानेपर श्रीहरिदास और श्रीसनातनमें बहुत
बातचीत हुई। एकदिन महाप्रभुने श्रीसनातनको यमेश्वर
तोटामें बुला भेजा, श्रीसनातन समुद्रके पथसे वहाँ गये।
महाप्रभुके द्वारा पूछनेपर श्रीसनातनने कहा,—“सिंहद्वारके
मार्गसे श्रीजगन्नाथके सेवक आते-जाते हैं, इसलिये मैं
बालूके मार्गसे आया हूँ। मेरे पैरोंमें जो फफोले पड़ गये
हैं, मुझे उसका पता ही नहीं चला।” श्रीसनातनके इन
मर्यादा-स्थापक वचनोंको सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए।
पीब महाप्रभुके शरीरमें लगेगी, इसी कारण श्रीसनातन
महाप्रभुसे दूर-दूर रहते, किन्तु महाप्रभु बलपूर्वक उनका
आलिङ्गन करते। इस बातसे श्रीसनातनने बहुत दुःखी
होकर श्रीजगदानन्द पण्डितसे परामर्श किया, तो श्रीजगदानन्द
पण्डितने उन्हें रथयात्राके बाद वृन्दावन जानेका उपदेश
दिया। महाप्रभुने यह सुनकर श्रीजगदानन्दका कुछ
तिरस्कार किया और उनकी अपेक्षा श्रीसनातनके
श्रेष्ठत्वको दिखलाया। महाप्रभुने और भी कहा,—“तुम
शुद्धभक्त हो, तुम्हारी देहका भद्र या अभद्र होना, यह
विचार करने योग्य नहीं है। विशेषतः मैं संन्यासी हूँ,
मेरे द्वारा वैसा विचार करना उचित नहीं है।” अन्तमें
उन्होंने कहा,—“तुम मेरे लालनीय हो एवं मैं लालक
[प्यार करनेवाला] हूँ, इसलिये तुम्हारी पीबके प्रति मेरी
घृणा नहीं है।” इन सब प्रसङ्गोंके बाद महाप्रभुके द्वारा
श्रीसनातनको आलिङ्गन करनेसे ही श्रीसनातनके अङ्गोंसे
पीब-खाज आदि सब कुछ दूर हो गये। उस वर्ष
श्रीसनातनको पुरीमें ही रखकर महाप्रभुने (अगले वर्ष
उन्हें) श्रीवृन्दावन जानेकी आज्ञा दी। श्रीसनातन भी
उनकी आज्ञानुसार वनपथसे होते हुए वृन्दावन चले
गये। इधर श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके चरणकमलोंसे
विदायी लेकर, गौड़देशमें एक वर्ष तक रहकर कुटुम्ब,
ब्राह्मण और देवालयमें सम्पूर्ण धनको बाँटनेके बाद
वृन्दावनमें जाकर श्रीसनातनसे मिले। इसके पश्चात्
श्रीकविराज गोस्वामीने श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव
गोस्वामी द्वारा रचित ग्रन्थोंके नामोंका उल्लेख किया है।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
श्रीसनातनकी देहत्यागके सङ्कल्पसे रक्षा
करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :—
वृन्दावनात् पुनः प्राप्तं श्रीगौरः श्रीसनातनम्।
देहपातादवन् स्नेहात् शुद्धं चक्रे परीक्षया ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौरचन्द्रने वृन्दावनसे आये
श्रीसनातनको स्नेहवशतः देहत्यागसे उद्धार करके परीक्षा
लेकर शुद्ध किया था ॥ 1 ॥

104 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/1-9 ]
अनुभाष्य—
श्रीगौरः (महाप्रभुः) वृन्दावनात् पुनः प्राप्तं (काशीमिलनानन्तरं
क्षेत्रमागतं) श्रीसनातनं [प्रभुं] स्नेहात् देहपातात् (शरीरनाशात्)
अवन् (रक्षन्) परीक्षया शुद्धं चक्रे।
श्लोक-भावानुवाद—श्रीगौरचन्द्रने काशीमें मिलनेके
पश्चात् श्रीक्षेत्रमें वृन्दावनसे आये श्रीसनातनकी स्नेहवशतः
शरीर नाशसे रक्षा करके परीक्षा लेकर शुद्ध किया
था॥1॥
सपार्षद श्रीगौरको जय-प्रदान :-
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥
श्रीरूपका पुरीसे गौड़-गमन, श्रीसनातनका
वृन्दावनसे पुरीमें आगमन :-
नीलाचल हैते रूप गौड़े यबे गेला।
मथुरा हैते सनातन नीलाचल आइला॥3॥
अनुवाद—जब श्रीरूप गोस्वामी नीलाचलसे गौड़देश
गये, तभी श्रीसनातन गोस्वामी मथुरासे नीलाचल पहुँचे॥3॥
झारिखण्डके मार्गमें बहुत कष्ट सहन
करके पुरीमें आगमन :-
झारिखण्ड-वनपथे आइला एकेला चलिया।
कभु उपवास, कभु चर्वण करिया॥4॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी झारिखण्डके वनमार्गसे
अकेले चलते हुए आये। उन्होंने मार्गमें कभी तो
उपवास किया और कभी कुछ खा लिया॥4॥
बाहरसे देखनेसे श्रीसनातनके सभी
अङ्गोंमें खाजका दिखलायी देना :-
झारिखण्डेर जलेर दोषे, उपवास हैते।
गात्रे कण्डु हैल, रसा पड़े खाजुयाइते॥5॥
अनुवाद—झारिखण्डके गन्दे जलके कारण और
उपवास करनेसे श्रीसनातन गोस्वामीके शरीरमें खाज हो
गयी। शरीरमें खाजके कारण वे खुजली करते और
खुजली करनेसे पीब बहने लगती॥5॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'खाजुयाइते'—खुजलीवाले स्थानको
खुजलानेसे॥5॥
मार्गमें श्रीसनातनकी निराशा और आत्मदैन्यपूर्ण उक्ति :-
निर्वेद हइल पथे, करेन विचार।
'नीच-जाति, देह मोर—अत्यन्त असार॥6॥
अनुवाद—मार्गमें चलते हुए श्रीसनातन गोस्वामीके
हृदयमें ग्लानि और निराशा हुई और वे विचार करने
लगे,—'मैं नीच जातिका हूँ और मेरा शरीर भजनके
अत्यन्त अयोग्य है॥6॥
अनुभाष्य—'निर्वेद'—विरक्ति; 'असार',—कृष्णभजनके
अयोग्य॥6॥
जगन्नाथे गेले ताँर दर्शन ना पाइमु।
प्रभुर दर्शन सदा करिते नारिमु॥7॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथपुरीमें जानेपर भी मैं भगवान्
श्रीजगन्नाथके दर्शन नहीं कर पाऊँगा और सदैव
महाप्रभुके भी दर्शन नहीं कर पाऊँगा॥7॥
मन्दिर-निकटे शुनि ताँर वासा-स्थिति।
मन्दिर-निकटे याइते मोर नाहि शक्ति॥8॥
अनुवाद—मैंने सुना है कि महाप्रभुका वासस्थान
श्रीजगन्नाथ मन्दिरके निकट ही है और मन्दिरके निकट
जानेकी शक्ति (योग्यता) मुझमें नहीं है॥8॥
स्वयंको प्राकृत अपवित्र जीव समझकर
मर्यादाके उल्लङ्घनका भय :-
जगन्नाथेर सेवक फेरे कार्य-अनुरोधे।
ताँर स्पर्श हैले मोर हबे अपराधे॥9॥

[ 4/9-18 चौथा अध्याय 105
अनुवाद—श्रीजगन्नाथके सेवक सेवाके कार्योंसे मन्दिरके पास आते-जाते हैं, उनके साथ स्पर्श होनेपर मेरा अपराध होगा॥9॥
पुरीमें श्रीजगन्नाथके रथके आगे महाप्रभुके नृत्यके समय देहत्यागका सङ्कल्प :-
ताते यदि एइ देह भाल-स्थाने दिये।
दुःख-शान्ति हय आर सद्गति पाइये॥10॥
अनुवाद—इसलिये यदि इस शरीरको किसी अच्छे स्थानपर त्याग किया तो दुःखसे छुटकारा मिल जायेगा और साथ ही मुझे सद्गतिकी भी प्राप्ति होगी॥10॥
जगन्नाथ रथयात्राय हइबेन बाहिर।
ताँर रथ-चाकाय छाड़िमु एइ शरीर॥11॥
अनुवाद—जब श्रीजगन्नाथ रथयात्राके समय मन्दिरसे बाहर आयेंगे, तब मैं उनके रथके पहियेके नीचे आकर इस शरीरका त्याग कर दूँगा॥11॥
महाप्रभुर आगे, आर देखि' जगन्नाथ।
रथे देह छाड़िमु,—एइ परम-पुरुषार्थ॥'12॥
अनुवाद—मैं महाप्रभुके सामने ही श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके रथके पहियेके नीचे शरीर त्याग करूँगा,—यही मेरे लिये परम पुरुषार्थ होगा॥'12॥
ठाकुर श्रीहरिदासके स्थानपर आगमन :-
एइ त' निश्चय करि' नीलाचले आइला।
लोके पुछि' हरिदास-स्थाने उत्तरिला॥13॥
अनुवाद—ऐसा निश्चय करके श्रीसनातन गोस्वामी नीलाचलमें आये। लोगोंसे पूछ-पूछकर वे श्रीहरिदास ठाकुरकी भजन कुटियापर आ पहुँचे॥13॥
श्रीहरिदासको प्रणाम, श्रीहरिदासके द्वारा आलिङ्गन :-
हरिदासरे कैला तँह चरण वन्दन।
जानि' हरिदास ताँरे कैला आलिङ्गन॥14॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंकी वन्दना की। श्रीहरिदास ठाकुर उन्हें जानते थे, इसलिये उनका आलिङ्गन किया॥14॥
महाप्रभुके चरणोंके दर्शनके लिये व्याकुल श्रीसनातन :-
महाप्रभु देखिते ताँर उत्कण्ठित मन।
हरिदास कहे,—“प्रभु आसिबेन एखन॥”15॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीका मन महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो रहा था। श्रीहरिदास ठाकुरने उन्हें कहा,—“महाप्रभु अभी आने ही वाले हैं॥”15॥
महाप्रभुका आगमन :-
हेनकाले प्रभु 'उपलभोग' देखिया।
हरिदासे मिलिते आइला भक्तगण लञा॥16॥
अनुवाद—उसी समय महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके 'उपलभोग'का दर्शन करके अपने भक्तों सहित श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलनेके लिये आये॥16॥
दोनोंके द्वारा महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासका आलिङ्गन :-
प्रभु देखि' दुँहे पड़े दण्डवत् हञा।
प्रभु आलिङ्गिला हरिदासरे उठाञा॥17॥
अनुवाद—महाप्रभुको देखकर दोनोंने दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरको उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥17॥
श्रीसनातनके आगमनसे महाप्रभुमें विस्मय और प्रीति :-
हरिदास कहे,—“सनातन करे नमस्कार।”
सनातने देखि' प्रभु हैला चमत्कार॥18॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“महाप्रभु! सनातन आपको प्रणाम कर रहा है।” श्रीसनातन गोस्वामीको देखकर महाप्रभु आश्चर्यचकित हो गये॥18॥

106 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/19-28 ]
अपने प्रिय भक्तवरको आलिङ्गन करनेके लिये
भगवान्‌का आगे जाना, श्रीसनातनका दूर
भागना और दैन्यपूर्ण उक्ति :—
सनातने आलिङ्गिते प्रभु आगु हैला।
पाछे भागे सनातन कहिते लागिला ॥ 19 ॥
“मोरे ना हुँइह प्रभु, पड़ों तोमार पाय।
एके नीचजाति अधम, आर कण्डूरसा गाय ॥” 20 ॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन
करनेके लिये जैसे ही आगे बढ़े, श्रीसनातन गोस्वामी
पीछे भागते हुए कहने लगे,—“हे महाप्रभु! मैं आपके
चरणोंमें पड़ता हूँ, आप कृपया मुझे स्पर्श मत कीजिये,
मैं अधम हूँ और नीचजातिका भी हूँ, उसपर मेरे
शरीरमें खाजके कारण पीब निकल रही है ॥” 19-20 ॥
बलपूर्वक भगवान्‌के द्वारा अपने प्रिय
भक्तवरका आलिङ्गन :—
बलात्कारे प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैल।
कण्डूक्लेद महाप्रभुर श्रीअङ्गे लागिल ॥ 21 ॥
अनुवाद—परन्तु महाप्रभुने बलपूर्वक श्रीसनातन
गोस्वामीका आलिङ्गन किया जिससे पीब महाप्रभुके
श्रीअङ्गोंपर लग गयी ॥ 21 ॥
भक्तोंके साथ श्रीसनातनका मिलन :—
सब भक्तगणे प्रभु मिलाइला सनातने।
सनातन कैला सबार चरण वन्दने ॥ 22 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने अपने उपस्थित सभी भक्तोंके
साथ श्रीसनातन गोस्वामीका परिचय करवाया। श्रीसनातन
गोस्वामीने सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की ॥ 22 ॥
दीनतापूर्वक श्रीहरिदास और श्रीसनातनका
भक्तोंसे नीचे बैठना :—
प्रभु लञा बसिला पिण्डार उपरे भक्तगण।
पिण्डार तले बसिला हरिदास, सनातन ॥ 23 ॥
अनुवाद—महाप्रभु अपने भक्तोंको साथमें लेकर
एक चबूतरेपर बैठ गये, श्रीहरिदास ठाकुर तथा
श्रीसनातन गोस्वामी चबूतरेके नीचे बैठे ॥ 23 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन और ब्रजवासी भक्तोंके
कुशलकी जिज्ञासा और श्रीसनातनका उत्तर :—
कुशलवार्त्ता महाप्रभु पुछेन सनातने।
तेँह कहेन,—“परम मङ्गल देखिनु चरणे ॥” 24 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसनातनसे उनके कुशल-मङ्गलके
विषयमें पूछा। श्रीसनातनने कहा,—“आपके चरणकमलोंके
दर्शन हो गये, इसलिये सभी परम मङ्गल है ॥” 24 ॥
मथुरार वैष्णव-सबेर कुशल पुछिला।
सबार कुशल सनातन जानाइला ॥ 25 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे मथुराके
समस्त वैष्णवोंका कुशल-मङ्गल पूछा। श्रीसनातन गोस्वामीने
उन सभीकी कुशलताके विषयमें बतलाया ॥ 25 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको श्रीरूप
और श्रीअनुपमका संवाद-प्रदान :—
प्रभु कहे,—“इँहा रूप छिल दशमास।
इँहा हैते गौड़े गेला, हैल दिन दश ॥ 26 ॥
तोमार भाइ अनुपमेर हैल गङ्गा-प्राप्ति।
भाल छिल रघुनाथे दृढ़ ताँर भक्ति ॥” 27 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“रूप दस महीने तक
यहीं था। वह यहाँसे दस दिन पहले ही गौड़देश गया
है। तुम्हारे भाई अनुपमको गङ्गा-प्राप्ति हुई है। वह
बहुत अच्छा भक्त था, उसकी श्रीरघुनाथमें दृढ़ भक्ति
थी ॥” 26-27 ॥
श्रीसनातनके द्वारा अपने विषयमें दैन्य-उक्ति और
महाप्रभुकी अयाचित कृपाकी महिमाका वर्णन :—
सनातन कहे,—“नीच-वंशे मोर जन्म।
अधर्म, अन्याय यत,—आमार कुलधर्म ॥ 28 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मेरा जन्म

[ 4/28–41 चौथा अध्याय 107
नीच वंशमें हुआ है। जितने अधर्म तथा अन्यायपूर्ण
कार्य हैं, उन्हें करना तो मेरा कुलधर्म है॥ 28॥
अनुभाष्य—'नीच-वंशे',—मध्यलीला 1/189 संख्याका
अनुभाष्य देखें॥ 28॥
हेन वंशे घृणा छाड़ि' कैला अङ्गीकार।
तोमार कृपाय वंशे मङ्गल आमार॥ 29॥
अनुवाद—ऐसे वंशके प्रति घृणाका त्याग करके
आपने मुझे स्वीकार किया है, आपकी कृपासे ही मेरे
वंशमें मङ्गल है॥ 29॥
छोटे भाई श्रीअनुपमकी एकान्तिकी रामनिष्ठाका वर्णन :—
सेइ अनुपम–भाइ शिशुकाल हैते।
रघुनाथ–उपासना करे दृढ़चित्ते॥ 30॥
रात्रि–दिने रघुनाथेर ‘नाम’ आर ‘ध्यान’।
रामायण निरवधि सुने, करे गान॥ 31॥
तीनों भाइयोंकी परस्पर अकृत्रिम प्रीति :—
आमि आर रूप—ताँर ज्येष्ठसहोदर।
आमा–दोँहा–सङ्गे तँह रहे निरन्तर॥ 32॥
अनुवाद—मेरा भाई अनुपम बचपनसे ही भगवान्
श्रीरघुनाथकी दृढ़ चित्तसे उपासना करता था। अनुपम
रात-दिन भगवान् श्रीरघुनाथका ही नाम और उनका ही
ध्यान करता था। वह निरन्तर रामायणका श्रवण तथा
कीर्तन करता था। मैं और रूप अनुपमके बड़े भाई
हैं, अनुपम सदा हमारे साथ ही रहता था॥ 30-32॥
आमा–सबा–सङ्गे कृष्णकथा, भागवत सुने।
ताहार परीक्षा कैलुँ आमि–दुइजने॥ 33॥
श्रीअनुपमको दोनों बड़े भाइयोंके द्वारा श्रीकृष्णके गुण-
माधुर्यके वर्णनके द्वारा कृष्णभजनका प्रलोभन देना :—
“शुनह वल्लभ, कृष्ण—परम मधुर।
सौन्दर्य, माधुर्य, प्रेम–विलास—प्रचुर॥ 34॥
कृष्णभजन कर तुमि आमा–दुँहार सङ्गे।
तिन भाइ एकत्र रहिमु कृष्णकथा–रङ्गे॥” 35॥
अनुवाद—वह हमारे साथ श्रीकृष्णकथा और भागवत
भी सुनता था। हम दोनोंने अनुपमकी परीक्षा लेते हुए
कहा था,—“हे वल्लभ (अनुपम)! सुनो, श्रीकृष्ण परम
मधुर हैं। श्रीकृष्णमें सौन्दर्य, माधुर्य तथा प्रेमरूपी विलास
असीम है। इसलिये तुम हम दोनोंके साथ मिलकर
श्रीकृष्णका भजन करो। हम तीनों भाई एक साथ
श्रीकृष्णकथाके आनन्दमें डूबे रहेंगे॥” 33-35॥
दोनों बड़े भाइयोंके अत्यधिक अनुरोध करनेपर एकान्तिक
श्रीअनुपमका थोड़े समयके लिये चित्त-परिवर्तन :—
एइमत बार बार कहि दुइजन।
आमा-दुँहार गौरवे किछु फिरि' गेल मन॥ 36॥
श्रीअनुपमकी कृष्णभजन करनेकी इच्छा :—
“तोमा दुँहार आज्ञा आमि केमने लङ्घिमु?
दीक्षा-मन्त्र देह', कृष्ण-भजन करिमु॥” 37॥
अनुवाद—इस प्रकार हम दोनों बार बार उसे ऐसा
कहने लगे, तो हम दोनोंके प्रति सम्मानके कारण
अनुपमका मन कुछ परिवर्तित हो गया। अनुपमने
हमसे कहा,—“मैं आप दोनों भाईयोंकी आज्ञाका कैसे
उल्लङ्घन करूँ? आप मुझे दीक्षा-मन्त्र प्रदान कीजिये
जिससे मैं भी कृष्ण-भजन करूँ॥” 36-37॥
श्रीरामके भजनका परित्याग करनेके कारण
श्रीअनुपमकी चिन्ता और व्याकुलता :—
एत कहि' रात्रिकाले करेन चिन्तन।
‘केमने छाड़िमु रघुनाथेर चरण॥’ 38॥
क्रन्दन, जागरण और निवेदन :—
सब रात्रि क्रन्दन करि' कैल जागरण।
प्रातःकाले आमा दुँहाय कैल निवेदन॥ 39॥
श्रीअनुपमकी गम्भीर एकान्तिक रामनिष्ठा :—
“रघुनाथेर पादपद्मे बेचियाछोँ माथा।
काड़िते ना पारोँ माथा, पाङ बड़ व्यथा॥ 40॥
कृपा करि' मोरे आज्ञा देह' दुइजन।
जन्मे-जन्मे सेवों रघुनाथेर चरण॥ 41॥

108 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/38–48 ]
रघुनाथेर पादपद्म छाड़ान ना याय।
छाड़िवार मन हैले प्राण फाटि' याय॥"42॥
अनुवाद—यह कहकर अनुपम रात्रिकालमें विचार
करने लगा—'मैं भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंका
कैसे परित्याग करूँगा?' अनुपम उस रात सो नहीं
सका और सारी रात रोते-रोते बितायी। प्रातःकालमें
उसने हम दोनोंसे निवेदन किया,—'मैंने भगवान् श्रीरघुनाथके
चरणकमलोंमें अपने मस्तकको बेच दिया है। मैं अपने
मस्तकको वहाँसे उठा नहीं पा रहा हूँ। ऐसा करनेपर
मुझे बहुत अधिक पीड़ा होगी। आप दोनों कृपा करके
मुझे यही आज्ञा प्रदान कीजिये कि मैं जन्म-जन्मान्तर
तक भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंकी सेवा करूँ।
श्रीरघुनाथके चरणकमलोंका परित्याग करना मेरे लिये
सम्भव नहीं है। इस बातका विचार करनेसे ही मेरे
प्राण फटकर निकलने लगते हैं॥"38-42॥
छोटे भाईको दोनों बड़े भाइयोंका आशीर्वाद :-
तबे आमि-दुँहे तांरे आलिङ्गन कैलुँ।
“साधु, दृढ़भक्ति तोमार”—कहि' प्रशंसिलुँ॥43॥
अनुवाद—तब हम दोनोंने अनुपमको आलिङ्गन
किया और उसकी प्रशंसा करते हुए कहा,—“तुम्हारी
श्रीरघुनाथके प्रति दृढ़भक्ति साधुवाद योग्य है॥"43॥
महाप्रभुकी कृपाके प्रति दृढ़ आस्था :-
ये वंशेर उपरे तोमार हय कृपा-लेश।
सकल मङ्गल ताहे, खण्डे सब क्लेश॥"44॥
अनुवाद-“हे महाप्रभो! जिस वंशके प्रति आपकी
लेशमात्र भी कृपा होती है, वहाँ मङ्गल-ही-मङ्गल होता
है और समस्त प्रकारके कष्ट दूर हो जाते हैं॥"44॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिगुप्तकी
रामनिष्ठाके दृष्टान्तका वर्णन :-
गोसाञि कहेन,-“एइमत मुरारि-गुप्त।
पूर्वे आमि परीक्षिलुं तांर एइ रीत॥45॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मैंने भी इसी प्रकार
पहले मुरारि-गुप्तकी परीक्षा ली थी, उसकी भी
अनुपमकी भाँति श्रीरघुनाथके प्रति दृढ़भक्ति थी॥45॥
अनुभाष्य-इस प्रसङ्गमें मध्यलीला 15/137 से 157
संख्यामें वर्णित श्रीमुरारि गुप्तकी श्रीरामनिष्ठा विचारणीय
है॥45॥
अमृतानुकणा-इस प्रसङ्गमें मध्यलीला 8/83 संख्या-
"किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम।
तटस्था हञा विचारिले, आछे तर-तम॥"
यह पद्य और इसकी अनुभाष्य टीका विचारणीय
है॥45॥
एकान्तिक भक्त और भगवान्,
परस्परकी प्रीतिका वैशिष्ट्य :-
सेइ भक्त धन्य, ये ना छाड़े प्रभुर चरण।
सेइ प्रभु धन्य, ये ना छाड़े निज-जन॥46॥
अनुवाद-वही भक्त धन्य है जो अपने प्रभुके
चरणोंको कभी भी नहीं छोड़ता और वही प्रभु धन्य
हैं जो अपने सेवकको कभी नहीं त्यागते॥46॥
एकान्तिक भक्तवत्सल भगवान् :-
दुर्दैवे सेवक यदि याय अन्यस्थाने।
सेइ ठाकुर धन्य तांरे चुले धरि' आने॥47॥
अनुवाद-दुर्भाग्यसे यदि सेवक पतित होकर अन्य
किसी स्थानपर चला जाता है, तो वही प्रभु धन्य हैं
जो अपने उस सेवकको उसके केशोंसे पकड़कर पुनः
खींचकर ले आते हैं॥47॥
श्रीसनातनको श्रीहरिदासके साथमें रहनेकी आज्ञा :-
भाल हैल, तोमार इँहा हैल आगमने।
एइ घरे रह इँहा हरिदास-सने॥48॥
अनुवाद-अच्छा ही हुआ जो तुम्हारा यहाँ आगमन
हुआ है। तुम यहीं इसी घरमें हरिदास ठाकुरके साथ
रहो॥48॥

[ 4/49-57 चौथा अध्याय 109
श्रीसनातन और श्रीहरिदासकी प्रशंसा
करके महाप्रभुका आदेश :-
कृष्णभक्तिरसे दुँहे परम प्रधान।
कृष्णरस आस्वादन कर, लह कृष्णनाम॥"49॥
अनुवाद-तुम दोनों ही कृष्णभक्तिरसको जाननेमें
परम प्रवीण हो। तुम दोनों कृष्णरसका आस्वादन करो
और कृष्णनामका कीर्तन करो॥"49॥
महाप्रभुका प्रस्थान; दोनोंके लिये प्रसाद भेजना :-
एत बलि' महाप्रभु उठिया चलिला।
गोविन्द-द्वाराय दुँहे प्रसाद पाठाइला॥ 50॥
अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु उठकर चल दिये
और श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन
गोस्वामीके लिये प्रसाद भिजवाया॥ 50॥
श्रीसनातनके द्वारा मन्दिरके चक्रको देखकर प्रणाम :-
एइमत सनातन रहे प्रभुस्थाने।
जगन्नाथेर चक्र देखि' करेन प्रणामे॥ 51॥
अनुवाद-इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके
आश्रयमें रहने लगे। वे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके शिखरपर
लगे चक्रको देखकर उसे प्रणाम करते॥ 51॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'चक्र' - नीलचक्र॥ 51॥
प्रतिदिन दोनोंके साथ महाप्रभुका
साक्षात्कार और महाप्रसाद-प्रदान :-
प्रभु आसि' प्रतिदिन मिलेन दुइजने।
इष्टगोष्ठी, कृष्णकथा कहे कतक्षणे॥ 52॥
अनुवाद-महाप्रभु आकर प्रतिदिन श्रीहरिदास ठाकुर
और श्रीसनातन गोस्वामीसे मिलते और कुछ समय
तक कृष्णकथारूपी इष्टगोष्ठी करते॥ 52॥
दिव्यप्रसाद पाञा नित्य जगन्नाथ-मन्दिरे।
ताहा आनि' नित्य अवश्य देन दोंहाकारे॥ 53॥
अनुवाद-महाप्रभु प्रतिदिन श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे दिव्य
महाप्रसाद प्राप्त करते और अवश्य ही उसे श्रीहरिदास
ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीको देते थे॥ 53॥
एकदिन अन्तर्यामी महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके
पूर्व-सङ्कल्पके विषयमें बतलाना :-
एकदिन आसि' प्रभु दुँहारे मिलिला।
सनातने आचम्बिते कहिते लागिला॥ 54॥
श्रीसनातनको उपलक्ष्य करके मनोधर्मके द्वारा चलनेवाले
अनर्थयुक्त साधकको महाप्रभुके द्वारा शिक्षा प्रदान;
फल्गु-ज्ञान और वैराग्य कृष्णप्राप्तिके उपाय नहीं :-
“सनातन, देहत्यागे कृष्ण यदि पाइये।
कोटि-देह क्षणेके तबे छाड़िते पारिये॥ 55॥
युक्त-वैराग्यके साथ शुद्धभक्ति ही
कृष्णप्राप्तिका उपाय, अन्य कुछ नहीं :-
देहत्यागे कृष्ण ना पाइ, पाइये भजने।
कृष्णप्राप्त्येर उपाय कोन नाहि 'भक्ति' बिने॥ 56॥
अनुवाद-एकदिन महाप्रभु आकर उन दोनोंसे
मिले। वे अचानक श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने लगे,-'हे
सनातन! देहत्याग करनेसे यदि कृष्ण प्राप्त होते हों,
तो मैं एक क्षणमें ही करोड़ों शरीरोंको त्याग कर दूँ।
केवल देहत्याग करनेसे कृष्ण प्राप्त नहीं हो सकते, वे
तो भजनसे ही प्राप्त होते हैं। भक्तिके अतिरिक्त
कृष्णको प्राप्त करनेका अन्य कोई उपाय नहीं है॥ 54-56॥
अप्राकृत विशुद्धसत्त्वमयी भक्तिमें ही
श्रीकृष्णका वास, प्राकृत गुणमयी कर्म-ज्ञानकी
चेष्टासे श्रीकृष्णकी प्राप्ति नहीं :-
देहत्यागादि यत, सब-तमोधर्म।
तमो-रजो-धर्मे कृष्णेर ना पाइये मर्म॥ 57॥
अनुवाद-आत्महत्याके द्वारा देहत्याग आदि जैसे
जो कुछ कार्य हैं, वे सब तमोगुणी धर्मके अन्तर्गत हैं।
तमोगुणी और रजोगुणी धर्मके द्वारा कृष्णके मर्मको नहीं
जाना जा सकता॥ 57॥

110 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/58-63 ]
कृष्णभक्ति ही कृष्णप्रेमकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय :-
'भक्ति' बिना कृष्णे कभु नहे 'प्रेमोदय'।
प्रेम बिना कृष्णप्राप्ति अन्य हैते नय ॥ 58 ॥
अनुवाद-‘भक्ति’के बिना कृष्णके प्रति कभी भी
'प्रेमका उदय' नहीं हो सकता। प्रेमके बिना अन्य किसी
उपायसे कृष्णकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ 58 ॥
श्रीमद्भागवत (11/14/20) में-
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 59 ॥
अनुवाद-हे उद्धव ! मेरे प्रति की गयी प्रबल भक्ति
जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग,
अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा-
अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और
त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं
किया जा सकता है ॥ 59 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 17/76 संख्या देखें ॥ 59 ॥
मनोधर्मी साधकके द्वारा भेदबुद्धिसे फल्गु-त्याग
और ज्ञानकी चेष्टा-जड़ेन्द्रिय तृप्तिमयी,
श्रीकृष्णप्रीति-तात्पर्यमयी नहीं होनेके कारण
उसके द्वारा श्रीकृष्णप्राप्ति असम्भव :-
देहत्यागादि तमो-धर्म-पातक-कारण।
साधक ना पाय ता'ते कृष्णेर चरण ॥ 60 ॥
अनुवाद-आत्महत्या आदि तमोधर्मका पालन तो
नरकमें गिरानेवाले पापका कारण बनता है, उससे
साधकको कृष्णके चरणोंकी प्राप्ति नहीं होती ॥ 60 ॥
सिद्ध अनुरागी भक्तकी गाढ़-विप्रलम्भसे उत्पन्न देहत्यागकी
इच्छा-सम्पूर्ण श्रीकृष्णकी इच्छासे चालित और श्रीकृष्ण-
प्रीति चेष्टामयी, उससे ही उसे श्रीकृष्णकी प्राप्ति :-
प्रेमी भक्त वियोगे चाहे देह छाड़िते।
प्रेमे कृष्ण मिले, सेह ना पाय मरिते ॥ 61 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 61 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-कृष्णके विच्छेदमें प्रेमिक-भक्त
अपनी देहको त्याग करनेकी इच्छा करते हैं; उसी
प्रेमके बलसे ही वे कृष्णको प्राप्त करते हैं, इसलिये
वे देहत्याग नहीं कर पाते अर्थात् कृष्ण उन्हें मरने नहीं
देते ॥ 61 ॥
गाढ़ानुरागेर वियोग ना याय सहन।
ता'ते अनुरागी वाञ्छे आपन-मरण ॥ 62 ॥
अनुवाद-गाढ़ अनुराग होनेपर कृष्णका विरह
सहन नहीं होता, इसलिये अनुरागी व्यक्ति अपनी
मृत्युकी कामना करता है ॥ 62 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 12/31 संख्या देखें-
“किन्तु अनुरागी लोकेर स्वभाव एक हय।
इष्ट ना पाइले निजप्राणसे छोड़य॥”
[अर्थात् “किन्तु अनुरागी व्यक्तियोंका यह स्वभाव
होता है कि वे अपने इष्टको न पाकर अपने प्राणोंको
त्याग देते हैं।"] ॥ 61-62 ॥
श्रीवासुदेवके प्रति रुक्मिणीके द्वारा अनुराग-निवेदन :-
श्रीमद्भागवत (10/52/43) में-
यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजःस्नपनं महान्तो
वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै।
यह्य॑म्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं
जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात् ॥ 63 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे कमलनयन, अपने तमोगुणका
विनाश करनेके लिये शिव जैसे महान व्यक्ति भी
जिनके चरणकमलोंकी रजमें स्नान करनेकी इच्छा
करते हैं, आपका वह प्रसाद यदि मुझे प्राप्त नहीं हुआ,
तब फिर आपकी प्राप्तिके लिये व्रतसे दुर्बल होकर
जीवन परित्याग करके सौ जन्मोंमें ऐसे ही व्रत करते
हुए उसके बाद आपकी कृपाको प्राप्त कर ही
लूँगी ॥ 63 ॥

[ 4/63-66 चौथा अध्याय 111
[बायाँ स्तम्भ]
अनुभाष्य—लोगोंके मुखसे श्रीकृष्णकी अनन्त
सद्गुणावली श्रवण करके, भीष्मककी पुत्री श्रीरुक्मिणीके
द्वारा [मनसे] उन्हें अपने पतिके रूपमें वरण करनेपर
भी उनके बड़े भाई कृष्णद्वेषी रुक्मीने चेदिनरेश
शिशुपालको ही उनके वरके रूपमें चुना है, ऐसा
सुनकर [रुक्मिणीने] निर्जनमें एक प्रेमपत्र लिखकर एक
विश्वसनीय ब्राह्मणको देकर तत्क्षणात् उसे श्रीकृष्णके
पास भेजा। ब्राह्मण द्वारकामें उपस्थित होकर श्रीकृष्णके
द्वारा यथाविधि सत्कार प्राप्त करनेके पश्चात् श्रीकृष्णकी
अनुमतिसे रुक्मिणीके उस प्रेमपत्रको पढ़ने लगे—
हे अम्बुजाक्ष (कमलनयन), आत्मनः (स्वस्य) तमः
(अज्ञानम्) अपहत्यै (विनाशाय) उमापतिः (शिवः) इव
महान्तः (ब्रह्मादयः) यस्य (भवतः) अङ्घ्रि-पङ्कजरजःस्नपनं
(अङ्घ्रिपङ्कजस्य पादपद्मस्य रजोभिः स्नपनं) वाञ्छन्ति, तद्भवत्प्रसादं
(तस्य भवतः अनुग्रहं) यर्हि अहं न लभेय (न प्राप्नुयां, तर्हि)
व्रतकृशान् (व्रतैः उपवासादिभिः कृशान्) असून् (प्राणान्)
जह्यां (त्यजेयम्,–एवमेव) शतजन्मभिः [अपि तव प्रसादः]
स्यात्।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥
श्रीकृष्णके प्रति रासोत्सुका गोपियोंके
द्वारा अनुराग-निवेदन :-
श्रीमद्भागवत (10/29/35) में—
सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण
हासावलोक-कल-गीतज-हृच्छयाग्निम्।
नो चेद्वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहा
ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ॥ 64 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे प्रिय, आपकी मन्द-मुस्कानके
दर्शनसे और आपके [मुरलीके] कलगीतको श्रवण
करके हमारी जिस कामाग्निने वृद्धि प्राप्त की है, उसे
अपने अधरामृतके सञ्चारके द्वारा सिञ्चित करके
शीतल करो; वैसा नहीं करनेसे हे सखे, हम तुम्हारे
विरहसे उत्पन्न अग्निके द्वारा दग्ध देहसे [योगियोंके
[दायाँ स्तम्भ]
समान] ध्यानके द्वारा तुम्हारे चरणोंके सान्निध्यमें उपस्थित
होंगी ॥ 64 ॥
अनुभाष्य—चाँदनीसे स्नान की हुई शारदीय रात्रिमें
श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनिसे सम्पूर्ण रूपमें आकृष्ट
गोपवधुएँ आत्म-विस्मृत होकर श्रीकृष्णके समीप उपस्थित
हुईं। श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी वर्धित
करनेके उद्देश्यसे उन्हें घरमें जानेके लिये कहा। तब
कृष्णमें ही समर्पित प्राणवाली गोपियाँ दुःखित होकर
रुद्धकण्ठसे गद्गद वचनोंके द्वारा श्रीकृष्णसे कह रही
हैं—
हे अङ्ग (कृष्ण,) त्वदधरामृतपूरकेण (तव ओष्ठसम्बन्धिना
सुधाप्रवाहेण) नः (अस्माकं) हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निं
(हाससहितेन अवलोकः च कलगीतं मधुरवंशीध्वनिः च
ताभ्यां जातः यः हृदि शेते वसति हृच्छयः कामः सः एव
अग्निः दाहकः तं) सिञ्च (निर्वापय); नोचेत् हे सखे, वयं
विरहजाग्न्युपयुक्तदेहाः (विरहजेन विरहात् जनिष्यते यः अग्निः
तेन उपयुक्तदेहाः दग्धशरीराः सत्यः योगिनः इव) ध्यानेन ते
(तव) पदयोः पदवीम् (अन्तिकं) याम (प्राप्नुयाम्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥
श्रीसनातनको उपलक्ष्य करके महाप्रभुके द्वारा अनर्थयुक्त
साधकको निरन्तर हरिभजनकी शिक्षा प्रदान :-
कुबुद्धि छाड़िया कर श्रवण-कीर्त्तन।
अचिरात् पाबे तबे कृष्णप्रेम-धन ॥ 65 ॥
अनुवाद—कुबुद्धिका परित्याग करके श्रवण-कीर्त्तन
करो, तब तुम अतिशीघ्र कृष्णप्रेमरूपी धनको प्राप्त
करोगे ॥ 65 ॥
अनुभाष्य—'कुबुद्धि',— कृष्णसेवापरायण बुद्धिके
अतिरिक्त नश्वर जड़ेन्द्रियकी तृप्तिके परायण असती
बुद्धि ॥ 65 ॥
स्त्रीके सङ्गसे उत्पन्न शौक्र जन्मवादका खण्डन;
कृष्णभजनमें योग्यताका निर्देश;
शुद्धभक्त ही गुरु अथवा महत्तम :-
नीचजाति नहे कृष्णभजने अयोग्य।
सत्कुल-विप्र नहे भजनेर योग्य ॥ 66 ॥